प्रश्न 1: महाराज जी,यदि अपनी संतान द्वारा कष्ट मिले, तो क्या उसे भी दंड मिलेगा?
उत्तर:
महाराज जी समझाते हैं कि यदि माता-पिता को अपनी संतान के द्वारा अपमान या कष्ट मिलता है, तो माता-पिता अपने पूर्व कर्मों का फल भोग रहे हो सकते हैं, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि संतान के कर्म का कोई परिणाम नहीं होगा। यदि संतान अपने माता-पिता के साथ धर्म के विरुद्ध आचरण करती है, उन्हें जानबूझकर दुख देती है या उनका अपमान करती है, तो वह अपने लिए नया कर्म बना रही है और उसके परिणाम उसे भी भुगतने पड़ेंगे।
महाराज जी इस स्थिति में केवल शिकायत या बदला लेने की भावना रखने के बजाय भगवान से प्रार्थना करने की बात कहते हैं। संतान की बुद्धि शुद्ध हो जाए, इसके लिए नामजप करके भगवान से प्रार्थना करनी चाहिए। यदि संभव हो तो उसके लिए दो-चार माला नामजप करके भी भगवान से उसके कल्याण की प्रार्थना करें।
महाराज जी कहते हैं कि नामजप से बुद्धि शुद्ध होती है और शुद्ध बुद्धि से अपराध करने की प्रवृत्ति कम होती है। केवल हाथ में माला चलाते रहना पर्याप्त नहीं है। यदि उंगलियां माला फेर रही हैं लेकिन मन संसार में लगा हुआ है और भगवान का चिंतन नहीं हो रहा, तो केवल माला घूमने से वह परिवर्तन नहीं आएगा जिसकी आवश्यकता है।
इसलिए संतान से मिले दुख के समय भी भगवान का नाम लेते रहें और उसके लिए भगवान से सद्बुद्धि की प्रार्थना करें। महाराज जी के अनुसार जब बुद्धि शुद्ध होगी तो दूसरों को दुख देने की प्रवृत्ति भी कम होगी और हृदय में कोमलता आएगी।
प्रश्न 2: सारी समस्याओं का समाधान प्राप्त होने के बाद भी उन्हें जीवन में क्यों नहीं उतार पा रहा हूँ?
उत्तर:
महाराज जी इस प्रश्न का कारण बहुत स्पष्ट बताते हैं—भजन रूपी अध्यात्म बल की कमी। केवल किसी समस्या का समाधान सुन लेना और उसे अपने जीवन में उतार देना दोनों अलग बातें हैं। जब तक भीतर साधना का बल नहीं आता, तब तक मनुष्य सही बात को जानने के बाद भी उसे व्यवहार में लाने में कमजोर पड़ सकता है।
महाराज जी पुराने संस्कारों का उदाहरण देते हैं। जैसे कोई बड़ा वृक्ष आंधी में जड़ से उखड़ जाए, फिर भी कई महीनों तक हरा-भरा दिखाई दे सकता है, उसी तरह अनेक जन्मों से बने पुराने संस्कारों की जड़ कमजोर होने के बाद भी उनका प्रभाव कुछ समय तक दिखाई दे सकता है। इसलिए साधक को यह देखकर निराश नहीं होना चाहिए कि वह बार-बार उसी गलती की ओर खिंच रहा है।
महाराज जी कहते हैं कि यदि व्यक्ति वास्तव में भगवान की शरण में है तो उसे दृढ़ विश्वास रखना चाहिए और नामजप करते रहना चाहिए। जहां तक गलत परिस्थिति से बच सकते हैं, बचने का प्रयास करें। और जब लगे कि अपनी सामर्थ्य से रोकना संभव नहीं हो रहा, तब भगवान के सामने पूरी तरह शरणागत होकर उनसे सहायता मांगें—“प्रभु, मैं अपनी शक्ति से नहीं बच पा रहा, आप ही संभालिए।”
लेकिन जानबूझकर गलत रास्ते पर जाना अलग बात है। महाराज जी समझाते हैं कि यदि कोई व्यक्ति जानते हुए भी बार-बार गलत कर्म करने का निर्णय लेता है, तो उसे उसका परिणाम भुगतना पड़ेगा। गलती हो जाना उतना खतरनाक नहीं है जितना गलती के बाद निराश होकर भजन और आध्यात्मिक मार्ग से ही मन हटा लेना।
इसलिए साधक को गिरने से बचने का प्रयास करते रहना है, लेकिन यदि चूक हो जाए तो खुद को आध्यात्मिक रूप से समाप्त मानकर बैठ नहीं जाना है। नामजप करते रहना है, भगवान की शरण में रहना है और फिर से संभलकर आगे बढ़ना है।
प्रश्न 3: क्या बिना वैराग्य के भी भगवद्-प्राप्ति हो सकती है?
उत्तर:
महाराज जी स्पष्ट रूप से कहते हैं कि हां, गृहस्थ जीवन में रहते हुए भी भगवद्-प्राप्ति हो सकती है। इसके लिए बाहरी रूप से सब कुछ छोड़कर विरक्त होना ही आवश्यक नहीं है। मुख्य बात यह है कि गृहस्थ जीवन में जो भी भोग और जिम्मेदारियां हैं, उन्हें धर्मपूर्वक निभाया जाए और साथ-साथ भगवान का भजन किया जाए।
महाराज जी उदाहरण देकर समझाते हैं कि भूख लगी है तो धर्मपूर्वक कमाए हुए अन्न से भोजन करना, काम की आवश्यकता हो तो धर्मपूर्वक अपनी पत्नी के साथ गृहस्थ धर्म निभाना और बच्चों से भी भगवान के भाव से प्रेम करना—यदि यह सब धर्म की मर्यादा में है तो यही गृहस्थ का उचित जीवन है। समस्या भोग में नहीं, अधर्मपूर्वक किए गए भोग और गलत आचरण में है।
महाराज जी बताते हैं कि काम, क्रोध और लोभ जब अधर्म के रूप में जीवन में आते हैं तो पतन का कारण बनते हैं। लेकिन गृहस्थ जीवन धर्मपूर्वक जीते हुए भगवान का नामजप किया जाए तो वही जीवन भगवद्-प्राप्ति की दिशा में ले जा सकता है।
वे यह भी स्पष्ट करते हैं कि केवल बाहरी वैराग्य पर्याप्त नहीं है। यदि कोई व्यक्ति साधु का वेश धारण कर ले लेकिन उसका आचरण गलत हो और भगवान का भजन न करे, तो केवल वेश से भगवद्-प्राप्ति नहीं होगी। उसी प्रकार गृहस्थ व्यक्ति यदि अच्छे आचरण के साथ भजन करता है तो उसके लिए भी भगवान की प्राप्ति संभव है।
इसलिए महाराज जी के अनुसार गृहस्थ हो या विरक्त—दोनों के लिए अच्छे आचरण और भगवान का भजन आवश्यक हैं। केवल वेश या जीवन की बाहरी स्थिति निर्णायक नहीं है।
प्रश्न 4: महाराज जी,आज के समाज को देखकर विवाह से डर लगने लगा है।
उत्तर:
महाराज जी इस चिंता को गंभीर मानते हुए बताते हैं कि आज के समय में चरित्र से जुड़ी बहुत-सी समस्याएं दिखाई देती हैं। इसलिए विवाह को लेकर डर या चिंता होना समझ में आता है। लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि संसार में अच्छे और पवित्र चरित्र वाले लोग बिल्कुल नहीं हैं। महाराज जी कहते हैं कि दुराचारियों के बीच भी सदाचारी लोग रहते हैं और आज भी बहुत-सी पवित्र लड़कियां और लड़के हैं जो अपने जीवन को अच्छे आचरण में रखते हैं।
हालांकि महाराज जी यह भी कहते हैं कि आज के वातावरण में चरित्रवान जीवनसाथी मिलना कठिन हो गया है। वे विशेष रूप से युवाओं में नशे, गलत संबंधों और अशुद्ध आचरण जैसी प्रवृत्तियों को लेकर चिंता व्यक्त करते हैं। उनके अनुसार मोबाइल और आधुनिक साधनों के माध्यम से भी बच्चों और युवाओं के मन में गलत भावनाएं प्रवेश कर रही हैं।
ऐसी स्थिति में महाराज जी विवाह को लेकर केवल डरने के बजाय भगवान की शरण लेने की बात कहते हैं। यदि विवाह आपके भाग्य में है तो भगवान से प्रार्थना करें कि जीवनसाथी सुशील, सज्जन और पवित्र आचरण वाला मिले। उन्होंने करदम जी का उदाहरण देते हुए भगवान से योग्य पत्नी की प्रार्थना और तपस्या का प्रसंग भी बताया है।
महाराज जी का जोर इस बात पर भी है कि हम स्वयं अपने चरित्र को पवित्र रखें। आज समाज में क्या हो रहा है, इसे देखकर निराश होने के बजाय व्यक्ति को अपने जीवन को अच्छा बनाना चाहिए। अपने चरित्र की रक्षा करना और अपने जीवन को महान बनाना ही सबसे महत्वपूर्ण है।
इसलिए विवाह को केवल भय की दृष्टि से देखने के बजाय भगवान पर भरोसा रखते हुए अपने आचरण को शुद्ध रखना चाहिए और जीवनसाथी के लिए भी भगवान से प्रार्थना करनी चाहिए।
प्रश्न 5: एक साधु के लिए करणीय और अकरणीय सूत्रों को समझाने की कृपा करें।
उत्तर:
महाराज जी साधु के लिए सबसे पहला लक्ष्य भगवत्-प्राप्ति बताते हैं। उनकी दृष्टि में पूरा जगत भगवान के स्वरूप से भरा हुआ है। इसलिए साधु को हर व्यक्ति और हर रूप में परमात्मा का भाव रखने का प्रयास करना चाहिए।
इसके साथ महाराज जी साधु के लिए सबसे महत्वपूर्ण सावधानी बताते हैं कि पराई माता-बहनों के प्रति कभी भी भोग की दृष्टि नहीं होनी चाहिए। यदि मन में कभी गलत विचार आ भी जाए तो उसे क्रिया का रूप नहीं लेने देना है। साधु जीवन में इस विषय में विशेष सावधानी आवश्यक है।
दूसरा नियम वाणी से संबंधित है। महाराज जी कहते हैं कि साधु की वाणी सत्य और भगवान की चर्चा में लगनी चाहिए। अनावश्यक विषय-चर्चा से बचना है। इसी प्रकार कानों से भगवान की चर्चा सुननी है और संसार के विषयों को सुनने में रुचि नहीं रखनी है।
महाराज जी मोबाइल को लेकर भी साधुओं और साधकों को विशेष सावधानी की सलाह देते हैं। मोबाइल का उपयोग यदि सत्संग सुनने के लिए हो तो ठीक है, लेकिन एकांत में बैठे साधक के लिए गलत दृश्य और गलत सामग्री बहुत बड़ा आकर्षण बन सकती है। इसलिए मोबाइल को आवश्यकता के अनुसार ही उपयोग करना और बाकी समय उससे दूर रहना चाहिए।
वे साधु के जीवन के लिए कुछ और संयम बताते हैं—कम बोलना, कम सुनना, कम देखना, कम सोना और कम आहार करना। साथ ही स्त्री से उचित दूरी, धन और कीर्ति से बचाव तथा संसार के अनावश्यक प्रपंच से दूरी रखने की बात कही गई है।
सबसे महत्वपूर्ण बात निरंतर भजन है। गुरु से मिला मंत्र लगातार जपते रहना है और जीवन को भगवान के चिंतन में लगाए रखना है। महाराज जी बताते हैं कि साधु जीवन में बाहरी सुविधाओं को बढ़ाने के बजाय तप, संयम और भगवान के नाम में मन को लगाए रखना ही मुख्य साधना है।
अंततः महाराज जी साधु को कंचन, कामिनी और कीर्ति से बचने तथा खूब नामजप करने की प्रेरणा देते हैं। साधु के लिए बाहरी पहचान से अधिक महत्वपूर्ण यह है कि उसका मन भगवान में स्थिर हो और उसका जीवन भगवत्-प्राप्ति की दिशा में आगे बढ़े।
प्रश्न 6: नौकरी, फैमिली सब संभाल रही हूँ, फिर भी जीवन का उद्देश्य समझ नहीं आ रहा है।
उत्तर:
महाराज जी इस प्रश्न में सबसे पहले जीवन के लक्ष्य को निश्चित करने की बात कहते हैं। यदि मन में बार-बार “आध्यात्मिक मार्ग पर चलूं या नहीं”, “यह सही है या नहीं”, “लेकिन ऐसा हो गया तो?” जैसे विकल्प और संदेह बने रहेंगे तो मन स्थिर नहीं हो पाएगा। महाराज जी कहते हैं कि लक्ष्य में ‘लेकिन’ नहीं होना चाहिए। लक्ष्य स्पष्ट होना चाहिए।
यदि व्यक्ति का लक्ष्य भगवान की प्राप्ति है तो नौकरी और परिवार को उस लक्ष्य के विरुद्ध नहीं, बल्कि उसी मार्ग का हिस्सा समझकर चलना चाहिए। महाराज जी कहते हैं—नामजप करते रहो, पति को भगवान का भाव रखो और परिवार को भगवान की सेवा समझो। परिवार की सेवा और जिम्मेदारियों का फल भी भगवान की प्राप्ति की दिशा में होना चाहिए।
महाराज जी यह भी समझाते हैं कि जीवन में सुख और दुख दोनों आते रहते हैं। सुख मिलने पर बहुत अधिक फूलना नहीं चाहिए और दुख आने पर भगवान को भूलना नहीं चाहिए। यदि सुख में अत्यधिक आसक्ति होगी तो दुख आने पर मन अधिक परेशान होगा। इसलिए दोनों परिस्थितियों को पार करते हुए भगवान का नाम लेते रहना चाहिए।
इस प्रश्न में सेना में सेवा कर रही महिला का संदर्भ भी आता है। महाराज जी त्याग को महानता से जोड़ते हुए समझाते हैं कि जो व्यक्ति अपने व्यक्तिगत सुखों का त्याग करके राष्ट्र की सेवा करता है, उसके जीवन में भी एक महान उद्देश्य है। इसलिए अपनी वर्तमान जिम्मेदारी को छोटा समझकर दूसरे भक्तों से अपनी तुलना नहीं करनी चाहिए।
महाराज जी विशेष रूप से कहते हैं कि हर व्यक्ति के लिए एक जैसी दिनचर्या जरूरी नहीं है। जिस परिस्थिति में आप हैं, उसी परिस्थिति में भगवान का नाम लेना चाहिए। सेना के जवानों के लिए उन्होंने कहा कि वे राष्ट्र की रक्षा करते हुए अंदर से “राधा-राधा” नाम का स्मरण कर सकते हैं।
इसलिए जीवन का उद्देश्य खोजने के लिए जरूरी नहीं कि नौकरी या परिवार छोड़ दिया जाए। अपने वर्तमान कर्तव्य को ईमानदारी से निभाते हुए भगवान को जीवन का अंतिम लक्ष्य बनाना और नामजप करते रहना—महाराज जी इसी दिशा की ओर संकेत करते हैं।
Credit:
“यह लेख संत श्री प्रेमानंद जी महाराज के एकान्तिक वार्तालाप प्रवचन की अमृत वाणी पर आधारित है।”
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