प्रश्न 1. महाराज जी,यदि पढ़ाई में अच्छा नहीं कर पाते, तो निराश क्यों हो जाते हैं?
उत्तर:
महाराज जी कहते हैं कि पढ़ाई में अगर हम अच्छा नहीं कर पा रहे हैं, तो सबसे पहले यह देखना चाहिए कि हम अच्छा क्यों नहीं कर पा रहे हैं। बिना कारण जाने निराश होकर बैठ जाना सही नहीं है। यदि किसी विषय में कमजोरी है तो उसे अधिक ध्यान और अभ्यास से सुधारा जा सकता है।
महाराज जी विद्यार्थियों को समझाते हैं कि विद्यार्थी जीवन वास्तव में तपस्वी और संयमी जीवन होना चाहिए। अगर हम ब्रह्मचर्य, पवित्र आहार और संयम से रहते हैं तो पढ़ाई बहुत सरल हो सकती है। लेकिन अगर हमारा मन मोबाइल, गेम, मनोरंजन, गलत संगति या दूसरी सांसारिक चीजों में लगा रहेगा तो पढ़ाई में एकाग्रता कैसे आएगी?
वे कहते हैं कि पढ़ाई को भी साधना की तरह करना चाहिए। केवल किताब पढ़ लेना पर्याप्त नहीं है। विषय को समझना, उसका मनन करना और फिर उसे जीवन में अनुभव करना—यह अध्ययन की वास्तविक प्रक्रिया है।
महाराज जी शरीर को स्वस्थ रखने पर भी जोर देते हैं। व्यायाम, दौड़ और नियमित दिनचर्या से शरीर और दिमाग दोनों सक्रिय रहते हैं। साथ ही वे कहते हैं कि सूर्योदय से पहले उठने का अभ्यास करना चाहिए। देर रात तक मोबाइल चलाना और फिर सुबह देर तक सोना विद्यार्थी के लिए अच्छी दिनचर्या नहीं है।
इसलिए अगर पढ़ाई में कमजोरी है तो निराश होने के बजाय अपनी दिनचर्या और अभ्यास को देखिए। मोबाइल और अनावश्यक मनोरंजन कम कीजिए, संयमित जीवन रखिए, समय पर सोइए-उठिए और पढ़ाई को साधना मानकर कीजिए।
महाराज जी का संदेश साफ है—कमजोरी देखकर हारना नहीं है, बल्कि अपनी कमी को पहचानकर मेहनत करनी है।
प्रश्न 2. भजन करते हुए इतना आनंद आता है कि भजन रुक जाता है, क्या करें?
उत्तर:
महाराज जी इस विषय में बहुत स्पष्ट रूप से कहते हैं कि ऐसा आनंद किस काम का जिसमें भजन ही रुक जाए? यदि भजन करते-करते आनंद की अनुभूति हो रही है तो उस समय भजन छोड़ना नहीं चाहिए, बल्कि और अधिक उत्साह से भजन करना चाहिए।
महाराज जी एक सुंदर उदाहरण देते हैं। वे कहते हैं कि अगर हमें रबड़ी अच्छी लगती है और उसका स्वाद अच्छा आ रहा है तो क्या हम स्वाद आने के कारण रबड़ी को फेंक देंगे? नहीं, बल्कि उसे और प्रेम से खाएँगे। उसी प्रकार भगवान के नाम-जप से जो आनंद मिल रहा है, उसका कारण स्वयं भजन है। इसलिए आनंद आने पर भजन छोड़ देना उचित नहीं है।
वे पतंग और डोरी का उदाहरण भी देते हैं। नाम डोरी है और भगवान पतंग के समान हैं। जैसे डोरी हाथ में रहेगी तो पतंग हमारे पास आती जाएगी, वैसे ही नाम-जप चलता रहेगा तो भगवान की ओर हमारी गति बनी रहेगी। अगर डोरी हाथ से छूट गई तो पतंग दूर चली जाएगी।
महाराज जी यह भी बताते हैं कि साधक को मिलने वाला थोड़ा-सा आनंद अंतिम अवस्था नहीं है। यदि थोड़े से आनंद में ही साधक संतुष्ट होकर साधना छोड़ देता है, तो वह आगे मिलने वाले महान आनंद का अधिकारी नहीं बन पाता।
उन्होंने सेवा का उदाहरण देते हुए बताया कि एक गोपी भगवान की सेवा में पंखा कर रही थी। सेवा करते हुए उसे इतना आनंद आया कि वह उसी आनंद में डूब गई और पंखा करना रुक गया। उसकी गुरु रूपा गोपी ने उसे सेवा से बाहर कर दिया, क्योंकि सेवा में आनंद लेने वाला नहीं, आनंद देने वाला बनना है।
इसलिए महाराज जी की शिक्षा है—चाहे कितना भी आनंद आए, नाम-जप नहीं छूटना चाहिए। भगवान का स्मरण ही साधक का आधार है।
प्रश्न 3. दो साल से परीक्षा पास नहीं हो रही, डर लग रहा है कि इस बार भी नहीं होगी।
उत्तर:
महाराज जी इस स्थिति में सबसे पहले कहते हैं—निराश क्यों हो रहे हो? अभी से यह निर्णय क्यों कर लिया कि इस बार भी परीक्षा पास नहीं होगी? उनके अनुसार ऐसा नकारात्मक विचार ही व्यक्ति को कमजोर कर देता है।
महाराज जी कहते हैं कि हम भगवान के अविनाशी बच्चे हैं, इसलिए हमें पहले से हार मानने की जरूरत नहीं है। अगर पिछली बार सफलता नहीं मिली तो इसका अर्थ यह नहीं कि आगे भी नहीं मिलेगी। बल्कि हमें अपनी तैयारी की कमी को देखना चाहिए और अगली बार इतनी अच्छी तैयारी करनी चाहिए कि परिणाम बदल जाए।
वे विद्यार्थी को समझाते हैं कि भय और नकारात्मक विचार व्यक्ति को परास्त कर देते हैं। अगर लगातार यही सोचते रहेंगे कि “मैं फेल हो जाऊँगा”, तो मन उसी विचार में फँस जाएगा और पढ़ाई प्रभावित होगी। इसलिए ऐसा विचार मन में आने ही नहीं देना चाहिए।
महाराज जी यह भी कहते हैं कि विद्यार्थी जीवन तपस्वी जीवन है। अगर मन पढ़ाई के बजाय बॉयफ्रेंड-गर्लफ्रेंड, मोबाइल, नशे या दूसरी गलत चीजों में लगा रहेगा तो पढ़ाई में एकाग्रता कैसे आएगी? किसी विषय को एकाग्र होकर पढ़ेंगे तो वह दिमाग में बैठ जाएगा।
अगर फिर भी कभी असफलता मिल जाए तो जीवन समाप्त नहीं हो जाता। महाराज जी कहते हैं कि फेल हो जाने पर भी निराश नहीं होना है। एक वर्ष और मिलेगा, उस समय अपनी कमियों को सुधारकर पहले से बेहतर तैयारी करनी है।
माता-पिता को भी बच्चों को असफल होने पर अपमानित या मानसिक रूप से परेशान नहीं करना चाहिए। उन्हें बच्चों का उत्साह बढ़ाना चाहिए।
इसलिए डरने के बजाय मेहनत करो, नाम-जप करो और सकारात्मक रहो। डर इस बात का होना चाहिए कि हमसे कोई गलत काम न हो; पढ़ाई में असफलता से डरकर पहले ही हार नहीं माननी चाहिए।
प्रश्न 4. यदि हृदय विकारों से भरा हो, तो भगवान के प्रति व्याकुलता कैसे उत्पन्न हो?
उत्तर:
महाराज जी कहते हैं कि यदि हृदय में काम, क्रोध, लोभ, मोह, अहंकार और दूसरे विकार हैं, तो भगवान के दर्शन के लिए सच्ची व्याकुलता उत्पन्न करना कठिन लग सकता है। लेकिन इसका उपाय भी उन्होंने बहुत सरल बताया है—भगवान का नाम-जप।
महाराज जी कहते हैं कि नाम की जयघोष में कोई भी विकार टिक नहीं सकता। विकार उस अंतःकरण में अपना प्रभाव दिखाते हैं जो भगवान से विमुख है। जब मन भगवान की ओर हो जाता है और शरणागति आती है, तो धीरे-धीरे विकार कमजोर होने लगते हैं।
वे समझाते हैं कि जितना अधिक नाम-जप होगा, उतना ही मन निर्विकार होता जाएगा। मन की शुद्धि के साथ भगवान के प्रति विश्वास मजबूत होगा और फिर भक्ति में प्रेम बढ़ेगा। जब प्रेम बढ़ता है तो भगवान के बिना रहना कठिन लगने लगता है और उनके दर्शन की व्याकुलता पैदा होती है।
महाराज जी बताते हैं कि भगवान के लिए रोना और उनके दर्शन की लालसा प्रेम की बड़ी अवस्था है। जब अंतःकरण भगवान के प्रेम में पिघलने लगता है, तब पुराने विकार वैसे ही समाप्त होने लगते हैं जैसे भुने हुए दाने में अंकुर निकलने की संभावना समाप्त हो जाती है।
इसके लिए केवल नाम-जप ही नहीं, बल्कि भगवान की लीला-कथा सुनना और भगवत्-प्रेमी संतों के चरणों की रज का आश्रय लेना भी महाराज जी बताते हैं। संसार की बातें कम हों और भगवान का चिंतन अधिक हो, यही साधक को आगे ले जाता है।
महाराज जी कहते हैं कि प्रेम पाने की इच्छा भी बहुत कम लोगों में होती है। हम अक्सर भगवान से धन, मान, प्रतिष्ठा और संसार की अनुकूलता माँगते रहते हैं। लेकिन वास्तविक साधक भगवान से केवल भगवान का प्रेम माँगता है।
इसलिए यदि हृदय विकारों से भरा है तो पहले निराश न हों। नाम-जप को पकड़ लें, सत्संग और भगवान की कथा सुनें तथा भगवान की शरण में रहें। धीरे-धीरे हृदय शुद्ध होगा और भगवान के दर्शन की सच्ची व्याकुलता स्वयं जागने लगेगी।
प्रश्न 5. कैसे जानें कि हम भक्ति के मार्ग पर सही चल रहे हैं?
उत्तर:
महाराज जी बताते हैं कि भक्ति के मार्ग पर चलने के कुछ स्पष्ट लक्षण होते हैं। भक्ति केवल पूजा या नाम-जप तक सीमित नहीं है, बल्कि धीरे-धीरे हमारे पूरे जीवन और व्यवहार में परिवर्तन दिखाई देने लगता है।
भक्ति की शुरुआत भगवान का नाम-जप करने, भगवान का कीर्तन करने, उनकी कथा सुनने, भगवान को भोग लगाकर प्रसाद ग्रहण करने और भगवान की शरण में रहने से होती है। लेकिन जैसे-जैसे भक्ति आगे बढ़ती है, हमारे व्यवहार में भी बदलाव आने लगता है।
महाराज जी कहते हैं कि जब हम भक्ति के मार्ग पर सही चल रहे होते हैं तो हम किसी का अहित नहीं करना चाहते। किसी को बुरा सोचने, बुरा बोलने या बुरा करने की इच्छा कम होने लगती है। किसी माता या बहन को गलत दृष्टि से देखने की प्रवृत्ति नहीं रहती। हमारा मन धीरे-धीरे भगवान में लगने लगता है।
महाराज जी के अनुसार, भगवान की कृपा का एक बड़ा लक्षण यह भी है कि हमें भगवान के प्रेमी संतों का संग और दर्शन प्राप्त होने लगे। उनके दर्शन, उनकी बातें और उनके साथ अपनापन मिलना बहुत दुर्लभ माना गया है।
वे हनुमान जी और विभीषण जी का उदाहरण देते हैं। विभीषण जी की भक्ति पहले से चल रही थी, लेकिन हनुमान जी के दर्शन के बाद उनकी शरणागति और विश्वास और अधिक मजबूत हुआ। इसी तरह प्रेमी संतों का संग भगवान की विशेष कृपा का संकेत माना गया है।
महाराज जी यह भी कहते हैं कि यदि हमारे मुख से भगवान का नाम निरंतर चल रहा है तो हमें अकेला नहीं समझना चाहिए। जहाँ नाम है, वहाँ भगवान हैं।
इसलिए भक्ति की प्रगति केवल यह देखकर नहीं करनी चाहिए कि हमें कोई विशेष अनुभव हुआ या नहीं। अपने जीवन को देखिए—क्या निंदा कम हुई? क्या बुरे विचार कम हुए? क्या भगवान का नाम बढ़ा? क्या संतों के प्रति प्रेम बढ़ा? क्या दूसरों का अहित करने की इच्छा कम हुई?
अगर ये परिवर्तन आ रहे हैं तो समझिए कि भक्ति सही दिशा में आगे बढ़ रही है और भगवान की कृपा हो रही है।
प्रश्न 6. क्या प्रारब्ध हमारे आध्यात्मिक मार्ग में भी बाधा डालता है?
उत्तर:
महाराज जी के अनुसार, हाँ, प्रारब्ध का प्रभाव भजन के मार्ग में भी बाधा डाल सकता है। जब साधक के ऊपर बुरा प्रारब्ध आता है तो कई बार उसकी गंदी बातें और गलत आचरण बढ़ने लगते हैं तथा उसे बुरे कार्यों में ही रुचि होने लगती है। इसके विपरीत अच्छा प्रारब्ध होने पर अच्छे आचरणों में रुचि बढ़ती है।
लेकिन महाराज जी यह भी स्पष्ट करते हैं कि साधक को इन बाधाओं के सामने हार नहीं माननी चाहिए। भक्ति का मार्ग कोई आसान खेल नहीं है। इसमें लगातार संघर्ष करना पड़ता है। उन्होंने दस इंद्रियों और मन का उदाहरण देकर समझाया कि एक को संभालते हैं तो दूसरा भटकने लगता है। इसलिए साधक को पूरे जीवन सावधान रहकर साधना करनी पड़ती है।
महाराज जी कहते हैं कि जब कठिन परिस्थिति या माया का तूफान आए तो भगवान के चरणों का सहारा पकड़ लेना चाहिए। जैसे तेज तूफान में कोई मजबूत पहाड़ का सहारा लेता है, वैसे ही साधक को भगवान की शरण लेनी चाहिए। भगवान की शरण ही माया को पार करने का आधार है।
उन्होंने यह भी कहा कि शुद्ध परमार्थ का मार्ग बहुत कठिन है। इसमें बहुत तपना पड़ता है और लगातार सावधान रहना पड़ता है। साधक को कंचन, कामिनी और कीर्ति जैसी बड़ी बाधाओं से भी बचना पड़ता है। यदि साधक इन आकर्षणों में रुक गया और सांसारिक मनोरंजन में फँस गया तो उसकी साधना कमजोर हो सकती है।
इसलिए बुरा प्रारब्ध आने पर यह नहीं सोचना चाहिए कि अब भजन संभव ही नहीं है। बल्कि उसी समय भगवान का नाम और अधिक पकड़ना चाहिए।
महाराज जी का संदेश यही है कि प्रारब्ध बाधा डाल सकता है, लेकिन भगवान की शरण छोड़ना समाधान नहीं है। जैसे भी परिस्थिति आए, भगवान को पकड़कर साधना में लगे रहना है। अंत तक भगवान ही साधक को संभालें—यही विश्वास रखना चाहिए।
Credit:
“यह लेख संत श्री प्रेमानंद जी महाराज के एकान्तिक वार्तालाप प्रवचन की अमृत वाणी पर आधारित है।”
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