माला-1195:क्या आत्मा को कुछ पाना है या आत्मा पूर्ण है?श्री प्रेमानंद महाराज जी के अमृत वचनों से नाम जप महिमा
1️⃣ प्रश्न: गुरु की अंग सेवा की इच्छा — स्वार्थ या विशुद्ध प्रीति? उत्तर:महाराज जी स्पष्ट करते हैं कि संसार की प्रीति और गुरु-इष्ट की प्रीति में अंतर है। संसार में जो प्रेम है, उसमें राग, आसक्ति और स्वार्थ मिला होता है। लेकिन गुरु और इष्ट के प्रति जो भाव है, वह परमार्थ स्वरूप है।