माला-1219:भीतर मृत्यु का भय और अधूरापन क्यों लगता है? श्री प्रेमानंद महाराज जी के अमृत वचनों से नाम जप महिमा

महाराज जी

प्रश्न 1: महाराज जी,भीतर मृत्यु का भय और अधूरापन क्यों लगता है? उत्तर:महाराज जी कहते हैं कि यह भय इसलिए उत्पन्न होता है क्योंकि मनुष्य को भीतर से यह अनुभव होता है कि जिस उद्देश्य के लिए जीवन मिला था, वह अभी पूरा नहीं हुआ। जब साधक को लगता है कि जीवन यूँ ही निकल

माला-1217:भय क्यों लगता है और निर्भय कैसे बनें? श्री प्रेमानंद महाराज जी के अमृत वचनों से नाम जप महिमा

महाराज जी

प्रश्न 1: महाराज जी,लोगों की शरीर पर की गई टिप्पणियों से मन दुखी हो जाए तो क्या करें? उत्तर:महाराज जी कहते हैं कि यह शरीर हमारे कर्मों के अनुसार मिला हुआ है—कोई पतला है, कोई मोटा, कोई सुंदर है, कोई साधारण। इसमें दुखी होने की आवश्यकता नहीं है, क्योंकि यह शरीर हम नहीं हैं, बल्कि

माला-1216:गंभीर बीमारी में भजन और शरीर की चिंता में संतुलन कैसे रखें? श्री प्रेमानंद महाराज जी के अमृत वचनों से नाम जप महिमा

महाराज जी

प्रश्न 1: गंभीर बीमारी में भजन और शरीर की चिंता में संतुलन कैसे रखें? उत्तर:महाराज जी बताते हैं कि शरीर भी भगवान का दिया हुआ साधन है, इसलिए उसकी पूरी तरह उपेक्षा करना उचित नहीं है। लेकिन साथ ही यह भी सत्य है कि शरीर नश्वर है और एक दिन समाप्त हो जाएगा। इसलिए साधक

माला-1215:नाम जप से वास्तव में क्या परिवर्तन होता है? श्री प्रेमानंद महाराज जी के अमृत वचनों से नाम जप महिमा

महाराज जी

प्रश्न 1: माया और भोग बार-बार साधक को गिराते क्यों हैं? उत्तर:महाराज जी बताते हैं कि माया भगवान की ही शक्ति है, जो साधक की परीक्षा लेती है। वह हमारे सामने बार-बार भोग, मान, प्रतिष्ठा और आकर्षण रखती है ताकि हम अपने मार्ग से भटक जाएँ। जब साधक भगवान की ओर बढ़ना चाहता है, तब

माला-1214:विवेक व्यवहार में क्यों नहीं उतरता? श्री प्रेमानंद महाराज जी के अमृत वचनों से नाम जप महिमा

महाराज जी

प्रश्न 1: महाराज जी,संतों के बिना मार्ग कैसे चले? उत्तर:महाराज जी कहते हैं कि केवल शास्त्र पढ़ने से पूर्ण लाभ नहीं मिलता, जब तक कोई प्रगट संत न मिले। शास्त्र दवा है, लेकिन संत वैद्य हैं। संत ही हमारे स्वभाव और स्थिति के अनुसार मार्ग बताते हैं। इसलिए यदि प्रगट संत न मिले तो उनकी

माला-1213:कर्म क्या है? क्या भगवान ही कर्मों का फल तय करते हैं? श्री प्रेमानंद महाराज जी के अमृत वचनों से नाम जप महिमा

महाराज जी

प्रश्न 1: महाराज जी, मैं ईमानदारी से जीवन जीता हूँ और दूसरों की मदद करता हूँ, फिर भी मुझे दुख क्यों मिलता है? उत्तर:महाराज जी कहते हैं कि संसार में जो भी सुख और दुख हमें प्राप्त होते हैं, वे केवल इस जन्म के कर्मों से नहीं आते, बल्कि हमारे पूर्व जन्मों के कर्मों का

माला-1212:क्या मृत्यु का समय पहले से तय होता है? श्री प्रेमानंद महाराज जी के अमृत वचनों से नाम जप महिमा

महाराज जी

प्रश्न 1: गुरु अपराध क्या है और इससे कैसे बचें? उत्तर:महाराज जी बताते हैं कि गुरु ही साधक को नाम, मंत्र, भजन और भगवान तक पहुँचने का मार्ग प्रदान करते हैं। इसलिए गुरु के प्रति श्रद्धा और समर्पण भक्ति का आधार है। गुरु अपराध का अर्थ है गुरु की आज्ञा का उल्लंघन करना, गुरु की

माला-1211:क्रोध और आवेश में क्या अंतर है? श्री प्रेमानंद महाराज जी के अमृत वचनों से नाम जप महिमा

महाराज जी

प्रश्न 1: नशे की लत में फंसे व्यक्ति को उससे बाहर निकलने के लिए क्या करना चाहिए? उत्तर:महाराज जी कहते हैं कि नशा मनुष्य के विवेक, स्वास्थ्य और परिवार—तीनों को नष्ट कर देता है। जो व्यक्ति शराब या किसी भी प्रकार के व्यसन में फंस जाता है, उसकी बुद्धि धीरे-धीरे भ्रष्ट हो जाती है। वह

माला-1209:यदि सब भगवान की संतान हैं तो काम, क्रोध और लोभ क्यों बनाए गए? श्री प्रेमानंद महाराज जी के अमृत वचनों से नाम जप महिमा

महाराज जी

भक्ति मार्ग में आसक्ति, नाम-जप और शरणागति का रहस्य – महाराज जी के अमृत वचन मनुष्य जीवन का सबसे बड़ा उद्देश्य परमात्मा की प्राप्ति है। लेकिन जीवन में संबंध, आसक्ति, विकार, मोह और भ्रम साधक को बार-बार विचलित कर देते हैं। संत महापुरुष बताते हैं कि यदि साधक सही विवेक, नाम-जप और गुरु की शरण

माला-2008:भगवान की भक्ति कठोर नियमों से करनी चाहिए या सरलता से? श्री प्रेमानंद महाराज जी के अमृत वचनों से नाम जप महिमा

महाराज जी

प्रश्न 1:भगवान की भक्ति कठोर नियमों से करनी चाहिए या सरलता से? उत्तर:महाराज जी कहते हैं कि भक्ति में दोनों की आवश्यकता होती है – सरलता और कठोरता। दूसरों के प्रति हमें सरल और क्षमाशील होना चाहिए, लेकिन अपने लिए हमें कठोर अनुशासन रखना चाहिए। अक्सर लोग उल्टा करते हैं – अपने लिए ढील रखते