प्रश्न 1: महाराज जी,भोग-भोग कर थक गया हूँ, अब क्या करूँ?
उत्तर:
महाराज जी समझाते हैं कि मनुष्य भोगों से इसलिए तृप्त नहीं हो पाता क्योंकि मन बार-बार यही सोचता रहता है कि अगली बार, अगली वस्तु या अगला अनुभव मुझे सुख देगा। थोड़ी देर के लिए लगता है कि अब कुछ नहीं चाहिए, लेकिन फिर वही इच्छा दोबारा उठती है। पहले मन में भोग का चिंतन होता है, फिर उसे प्राप्त करने की इच्छा होती है, फिर उसकी क्रिया होती है और भोग लेने के बाद भी मन को वह स्थायी सुख नहीं मिलता जिसकी उसे तलाश थी। इस तरह मनुष्य बार-बार उसी चक्र में फँसता चला जाता है।
अगर अब आपको यह समझ में आ गया है कि भोगों में वह स्थायी आनंद नहीं है जिसकी आपको तलाश है, तो यहीं से दिशा बदलनी है। महाराज जी कहते हैं कि भगवान की शरणागति भीतर से भगवान को पुकारने से शुरू होती है। मन से भगवान के सामने अपना जीवन समर्पित करिए और मानिए कि अब मेरा जीवन आपके चरणों में है।
इसके लिए महाराज जी तीन चीजों को विशेष रूप से बताते हैं—भगवान का चरणामृत, भगवान का नामामृत और भगवान का लीलामृत। नियमित नामजप करें, भगवान के चरणामृत का सेवन करें और भगवान के चरित्रों का श्रवण करें। श्रीमद्भागवत, रामचरितमानस तथा संत-महापुरुषों द्वारा गाए गए भगवान के चरित्रों का श्रवण हृदय को पवित्र करता है।
साथ ही अपने आचरण को भी बदलना जरूरी है। केवल यह सोच लेना कि अब मुझे भोग नहीं चाहिए और फिर वही गलत आचरण करते रहना शरणागति नहीं है। महाराज जी बताते हैं कि मन हमें भ्रम में डालता है कि इस भोग में सुख है, लेकिन जब उसे प्राप्त करते हैं तो चिंतन में दिखाई देने वाला सुख वास्तविकता में नहीं मिलता। असली आनंद भगवान में है।
इसलिए यदि भोगों से सच में थक चुके हैं, तो मन को फिर उसी रास्ते पर मत ले जाइए। आज से भगवान को अपना आश्रय मानिए, नामजप बढ़ाइए, भगवान के चरित्र सुनिए और गलत आचरण से बचते हुए धीरे-धीरे अपनी दिशा भगवान की ओर मोड़ दीजिए।
प्रश्न 2: स्थूल, सूक्ष्म, कारण शरीर, यातना देह और देव देह क्या होते हैं?
उत्तर:
महाराज जी इस विषय को समझाने के लिए स्वप्न का उदाहरण देते हैं। जब हम स्वप्न में होते हैं तो हमें अपने स्थूल शरीर का पता नहीं रहता, फिर भी स्वप्न के भीतर हमें एक पूरा संसार दिखाई देता है। उसमें सुख-दुख, अनुकूलता-प्रतिकूलता और अलग-अलग अनुभव होते हैं। वास्तव में उस समय बाहरी वस्तुएँ उसी रूप में मौजूद नहीं होतीं, लेकिन मन एक अलग अनुभव की रचना कर देता है।
महाराज जी आगे बताते हैं कि जागृत अवस्था और स्वप्न की अवस्था को लेकर राजा जनक का प्रसंग इसी बात को समझाने के लिए है। स्वप्न में जो सत्य दिखाई देता है, जागने पर वह असत्य लगता है और जागृत अवस्था में जो सत्य दिखाई देता है, स्वप्न में जाने पर वह पीछे छूट जाता है। इस दृष्टि से दोनों अवस्थाएँ परिवर्तनशील हैं।
महाराज जी के अनुसार स्थूल, सूक्ष्म और कारण शरीर तथा शुभ-अशुभ कर्मों से संबंधित देव देह और यातना देह—ये सब माया के अंतर्गत हैं। वे बताते हैं कि इनकी अपनी स्वतंत्र और अंतिम सत्ता नहीं है। जैसी हमारी दृष्टि और जैसी हमारी सोच होती जाती है, उसी के अनुसार हमें संसार का अनुभव होने लगता है। यदि दृष्टि राम में लग जाए तो सबमें राम दिखाई देने लगते हैं, यदि दृष्टि श्याम में लग जाए तो सबमें श्याम का भाव आने लगता है।
लेकिन यहां एक महत्वपूर्ण बात यह है कि केवल बौद्धिक रूप से यह समझ लेना पर्याप्त नहीं है। महाराज जी कहते हैं कि मन, बुद्धि और अंतःकरण आत्मस्वरूप का वास्तविक चिंतन नहीं कर सकते। गुरु की कृपा और साधना के द्वारा अंतःकरण का मार्जन होता है। जैसे निर्मल जल में नीचे की वस्तु साफ दिखाई देती है, वैसे ही पवित्र और निर्मल अंतःकरण में आत्मस्वरूप का प्रतिबिंब स्पष्ट हो सकता है।
इसलिए गृहस्थ साधक के लिए महाराज जी पहले नामजप, अच्छे आचरण, गुरुजनों की शरण और समाज की सेवा बताते हैं। जब अंतःकरण पवित्र होता है, तभी आगे के तत्व को समझने की क्षमता आती है।
प्रश्न 3: क्या देश-विदेश घूमना भी विषय-भोग माना जाएगा?
उत्तर:
महाराज जी इस प्रश्न को बहुत सरल उदाहरण से समझाते हैं। यदि कोई व्यक्ति देश-विदेश केवल सुंदर दृश्य देखने, आंखों को आनंद देने और प्रकृति का मनोरम अनुभव लेने के लिए घूम रहा है, तो यह आध्यात्मिक साधना नहीं है। इसे इंद्रियों का विषयों की ओर जाना कहा जा सकता है। जैसे किसी स्थान पर जाकर होटल, भोजन या सुंदर दृश्य देखकर केवल आंखों और इंद्रियों को आनंद देना—यह आध्यात्मिक दृष्टि से भक्ति नहीं बन जाता।
लेकिन उसी दृश्य को देखने की भावना बदल जाए, तो उसका स्वरूप भी बदल सकता है। उदाहरण के लिए किसी पर्वत को देखकर केवल उसकी सुंदरता में न रुककर भगवान शिव की तपस्या का भाव आने लगे, किसी वृक्ष को देखकर श्यामा-श्याम के वहां आने और बैठने की भावना होने लगे, तो बाहरी दृश्य के साथ भीतर भगवान का चिंतन जुड़ गया। तब वही दृश्य साधक के लिए भगवान की स्मृति का माध्यम बन सकता है।
महाराज जी स्पष्ट करते हैं कि प्राकृतिक सुंदरता से मिलने वाला सुख और आध्यात्मिक सुख एक ही चीज नहीं हैं। प्रकृति का दृश्य कितना भी सुंदर हो, वह परिवर्तनशील है। इसलिए केवल आंखों को मिलने वाला आनंद स्थायी आध्यात्मिक आनंद नहीं है।
इसके विपरीत जब किसी स्थान का संबंध भगवान की लीला और उनके पावन चरित्रों से हो और वहां जाने पर भगवान का स्मरण और भाव जागे, तो वह तीर्थयात्रा का रूप ले सकता है। चित्रकूट, ब्रजधाम, अयोध्या तथा भगवान से संबंधित पवित्र स्थानों के दर्शन को महाराज जी इसी भाव से जोड़ते हैं।
इसलिए केवल घूमने को ही भक्ति मान लेना उचित नहीं है। स्थान से ज्यादा महत्वपूर्ण आपकी दृष्टि और भीतर का भाव है। यदि बाहर सुंदर दृश्य है और भीतर केवल इंद्रियों का आनंद है, तो वह विषय का अनुभव है; लेकिन उसी दृश्य के माध्यम से भगवान का स्मरण होने लगे तो साधना का भाव जुड़ सकता है।
प्रश्न 4: जब से नामजप शुरू किया है, तब से इंद्रियाँ उतनी ही परेशान कर रही हैं। इनसे कैसे जीतें?
उत्तर:
महाराज जी कहते हैं कि यह संघर्ष साधना के रास्ते में आता है। जब तक जीवन का लक्ष्य स्पष्ट नहीं होता, तब तक मन इधर-उधर खिंचता रहता है। इसलिए सबसे पहले अपने भीतर यह निश्चित करिए कि मुझे भगवान की प्राप्ति करनी है। जब लक्ष्य दृढ़ हो जाता है, तब मन किसी विषय की ओर जाए तो भी साधक उसके पीछे जाने से मना कर सकता है।
महाराज जी बहुत महत्वपूर्ण बात कहते हैं—मन का जाना और हमारा उसके साथ चले जाना दोनों अलग बातें हैं। मन में कोई इच्छा उठ सकती है, कोई विचार आ सकता है, लेकिन हमें उसके अनुसार क्रिया करना आवश्यक नहीं है। यदि हम दृढ़ होकर किसी गलत विषय को “नहीं” कह देते हैं, तो धीरे-धीरे मन भी उस दिशा में जाना कम कर देता है।
इसलिए मन में आने वाली हर तरंग से डरने की जरूरत नहीं है। महाराज जी कहते हैं कि छोटी-मोटी भूलों और मन की तरंगों को लेकर बहुत चिंता मत करो। शांत रहो और भजन करते रहो। भगवान की शरण में रहकर नामजप करने वाले साधक को यदि कोई चूक हो भी जाए तो उसे लेकर भजन छोड़ देना समाधान नहीं है।
महाराज जी गृहस्थ साधकों के लिए यह भी स्पष्ट करते हैं कि धर्मयुक्त गृहस्थ जीवन और गलत आचरण एक बात नहीं हैं। लेकिन पराई स्त्री के प्रति गलत दृष्टि रखना पाप है। इसलिए अपनी स्थिति और मर्यादा को समझते हुए संयम रखना है।
सबसे जरूरी बात है कि हार माननी नहीं है। महाराज जी कहते हैं कि साधक को आक्रमण सहने पड़ेंगे—काम, क्रोध, लोभ, मोह आदि के। लेकिन जो व्यक्ति इन भावों के अनुसार तुरंत क्रिया नहीं करता, साक्षी भाव से उन्हें सह लेता है और फिर भगवान की ओर लौट आता है, वह आगे बढ़ता है।
इसलिए नामजप शुरू करने के बाद संघर्ष बढ़ता हुआ लगे तो यह सोचकर रुकिए मत कि मैं हार रहा हूं। नामजप करते रहिए, लक्ष्य दृढ़ रखिए, मन की तरंगों को सहिए और गलत क्रिया से बचिए। महाराज जी का संदेश है—100 बार गिरें तो 101वीं बार फिर उठें; रुकना नहीं है।
प्रश्न 5: मैं अपने आप को कैसे पहचानूँ?
उत्तर:
महाराज जी के अनुसार अपने वास्तविक स्वरूप को पहचानना केवल शीशे में अपना शरीर देखकर संभव नहीं है। जब हम शीशे में देखते हैं तो हमें यही लगता है कि यही मैं हूं—यह शरीर, यह चेहरा, यह पुरुष या स्त्री का स्वरूप। लेकिन महाराज जी बताते हैं कि यह प्रकृति से बना हुआ शरीर एक यंत्र के समान है; वास्तविक “मैं” इससे अलग है।
अपने आपको पहचानने के लिए सबसे पहले गुरु के चरणों का आश्रय और साधना आवश्यक है। गुरु से प्राप्त नाम और साधना पर चलते हुए जब बुद्धि धीरे-धीरे पवित्र होती है, तब संसार और भोगों का आकर्षण कम होने लगता है। महाराज जी कहते हैं कि जिस बुद्धि में संसार और भोग ही सुख के स्रोत दिखाई देते हैं, वह अभी अपवित्र अवस्था में है। जब परमात्मा प्रिय होने लगते हैं और संसार की आसक्ति कम होने लगती है, तब बुद्धि पवित्र होने की दिशा में बढ़ती है।
महाराज जी बताते हैं कि जब हमारी बुद्धि शरीर को ही अपना स्वरूप मानती है, तब “मैं पुरुष हूं”, “मैं स्त्री हूं”, “मैं करता हूं”, “मैं भोगता हूं” जैसे भाव मजबूत रहते हैं। लेकिन जब बुद्धि परमात्मा में लगती है और भीतर से यह भाव आता है कि “आपके सिवा मेरा कोई नहीं”, तब धीरे-धीरे अपने वास्तविक स्वरूप की ओर दृष्टि जाती है।
यह अवस्था केवल बातें सुनकर प्राप्त नहीं होती। महाराज जी स्पष्ट कहते हैं कि इसके लिए भजन करना पड़ेगा। समर्थ गुरु का आश्रय लेकर उनकी आज्ञा के अनुसार साधना करनी होगी। साधना करते-करते जब बुद्धि पवित्र होती है और संसार तथा भोगों का त्याग भीतर से होने लगता है, तब अपने स्वरूप का ज्ञान प्रकट होता है। इसे भी भगवान की कृपा ही समझना चाहिए।
महाराज जी अंत में बहुत सीधी बात कहते हैं—पहले खूब भजन करो और गुरु के चरणों का आश्रय लो, तभी अपने वास्तविक स्वरूप को पहचानने की दिशा खुलेगी। केवल ज्ञान की बातें सुनकर उन्हें दोहराया जा सकता है, लेकिन अनुभव तभी होगा जब जीवन में उस साधना को उतारा जाएगा।
यानी अपने आपको पहचानने की शुरुआत किसी कठिन बौद्धिक अभ्यास से नहीं, बल्कि गुरु-आश्रय, नामजप, साधना और बुद्धि की शुद्धि से होती है। जब भीतर की दृष्टि बदलती है, तब धीरे-धीरे यह समझ आने लगती है कि जिसे अब तक “मैं” मान रहे थे, वह केवल शरीर है; वास्तविक स्वरूप उससे कहीं अलग है।
Credit:
“यह लेख संत श्री प्रेमानंद जी महाराज के एकान्तिक वार्तालाप प्रवचन की अमृत वाणी पर आधारित है।”
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