माला-1399:वैराग्य के साथ चिड़चिड़ापन क्यों आता है? श्री प्रेमानंद महाराज जी के अमृत वचनों से नाम जप महिमा

प्रश्न 1: महाराज जी,कुछ समय से संसार से वैराग्य और अंदर चिड़चिड़ापन बना रहता है, क्या करें?

उत्तर:
महाराज जी समझाते हैं कि भजन बढ़ने पर संसार की बहुत-सी बातें भीतर से अच्छी लगना कम हो सकती हैं। व्यक्ति को संसार का बनावटी व्यवहार, विषय-भोग और अनावश्यक बातचीत पसंद नहीं आती। यह भाव भीतर आ सकता है, लेकिन यदि हम गृहस्थ जीवन में हैं तो अपने कर्तव्यों और रिश्तों को छोड़ नहीं सकते। घर-परिवार और समाज के साथ उचित व्यवहार करना भी हमारा धर्म है।

इसलिए महाराज जी कहते हैं कि अंदर की वैराग्य वृत्ति को अपने भीतर रखें, लेकिन बाहर व्यवहार प्रेम और सम्मान से करें। किसी को यह महसूस नहीं होना चाहिए कि हमें उससे बात करना पसंद नहीं है या हम संसार से अलग हो गए हैं। कोई घर आए तो प्रेम से मिलें, सम्मान से बात करें और जितना आवश्यक हो उतना उचित व्यवहार करें।

महाराज जी संसार को एक नाटक की तरह समझने की बात कहते हैं। जैसे नाटक में व्यक्ति अपनी भूमिका निभाता है, वैसे ही हमें भी संसार में मिली भूमिका को निभाना है। कोई भाई है, कोई पत्नी है, कोई रिश्तेदार है—उनके साथ धर्म के अनुसार व्यवहार करना है। भीतर से यह समझ रखना है कि स्थायी सत्य केवल भगवान हैं; शरीर और संसार के संबंध एक दिन छूट जाएंगे।

इसलिए वैराग्य आने पर चिड़चिड़े होकर लोगों से दूर भागने की जरूरत नहीं है। भजन को भीतर मजबूत करें और व्यवहार को मधुर रखें। महाराज जी के अनुसार व्यवहार में गलती होने से परमार्थ में भी बाधा पड़ सकती है, इसलिए भगवान को सबमें देखते हुए अपने कर्तव्य निभाते रहना चाहिए।


प्रश्न 2: क्या सत्त्व, रज और तमोगुण से अलग भी कोई गुण है, या इन्हीं को प्रेम कहते हैं?

उत्तर:
महाराज जी स्पष्ट करते हैं कि सत्त्व, रज और तम—इन तीनों गुणों को प्रेम नहीं कहा जा सकता। ये तीनों माया के बंधन से संबंधित हैं और इन्हीं गुणों के प्रवाह में संसार बंधा हुआ है। इसलिए प्रेम को इन तीनों गुणों के भीतर नहीं ढूँढना चाहिए।

महाराज जी प्रेम की स्थिति को त्रिगुणातीत बताते हैं। अर्थात जहाँ व्यक्ति इन तीनों गुणों से ऊपर उठता है, वहाँ प्रेम का वास्तविक जागरण होता है। वे प्रेम के लक्षण बताते हुए इसे गुणरहित, कामनारहित और अनुभव स्वरूप बताते हैं। जब साधक तीनों गुणों के प्रभाव से ऊपर उठकर निरंतर भगवान के चिंतन में तन्मय होने लगता है, तब प्रेम की जागृति होती है।

लेकिन केवल इस बात को समझ लेना कि त्रिगुणातीत अवस्था क्या है, पर्याप्त नहीं है। महाराज जी बार-बार भजन और नामजप पर जोर देते हैं। सत्त्वगुण हो, रजोगुण हो या तमोगुण—नामजप चलता रहना चाहिए। धीरे-धीरे भजन के प्रभाव से इन गुणों का प्रभाव शांत होता जाता है और साधक गुणातीत अवस्था की ओर बढ़ता है।

महाराज जी समझाते हैं कि यह ऐसी अनुभूति है जिसे केवल शब्दों में पूरी तरह नहीं बताया जा सकता। जैसे मिठास का अनुभव किसी दूसरे व्यक्ति को केवल समझाने से नहीं कराया जा सकता; उसे स्वयं चखना पड़ता है। उसी प्रकार भगवान के आनंद और प्रेम का वास्तविक अनुभव भजन से ही होता है।

इसलिए महाराज जी का सीधा मार्ग है—खूब नामजप करो। नाम को पकड़कर चलते रहो। सत्त्व, रज और तम के विषय में केवल चर्चा करते रहने के बजाय नामजप में तन्मय होना है। भजन के प्रभाव से आगे की अवस्था अपने आप समझ में आने लगेगी।


प्रश्न 3: क्या शुद्ध अवस्था में ही इष्ट का नामजप करना चाहिए?

उत्तर:
महाराज जी बताते हैं कि नामजप किया जा सकता है, लेकिन कुछ साधना-विधियों के नियम अलग होते हैं। उन्होंने विशेष रूप से मासिक धर्म या सूतक जैसी स्थिति के संदर्भ में समझाया कि ऐसी अवस्था में अपने इष्ट का नाम भीतर ही भीतर लिया जा सकता है और भगवान का स्मरण किया जा सकता है। नामजप पर रोक नहीं है।

हाँ, इस दौरान कुछ बाहरी साधना-विधियों के नियमों का पालन करना बताया गया है। जैसे माला को स्पर्श नहीं करना, भगवान के विग्रह को स्पर्श नहीं करना और ग्रंथ को हाथ में लेकर पाठ नहीं करना। लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि भगवान का नाम लेना ही बंद कर दिया जाए। मन में नाम का स्मरण और नामजप किया जा सकता है।

महाराज जी यह भी बताते हैं कि भगवान के पद जो याद हों, उन्हें भाव से गाया जा सकता है और नाम-कीर्तन किया जा सकता है। कुछ दिनों की निषेध अवधि के बाद स्नान करके सामान्य दिनचर्या और भगवान की सेवा में वापस आने की बात कही गई है।

इसलिए नामजप को केवल बाहरी शुद्धता तक सीमित नहीं करना चाहिए। नाम का स्मरण भीतर से चलता रह सकता है। बाहरी साधना के कुछ नियम अपनी जगह हैं, लेकिन भगवान का नाम लेने पर रोक नहीं है।

महाराज जी की बात का मुख्य भाव यही है कि नाम भगवान का है और उसका स्मरण किसी भी परिस्थिति में मन के भीतर किया जा सकता है। इसलिए यदि किसी विशेष परिस्थिति में माला या विग्रह का स्पर्श न करने का नियम हो, तो भी मन से नामजप करते रहें और भगवान को याद करते रहें।


प्रश्न 4: राम-नाम जापकों के कुछ महत्वपूर्ण प्रश्न क्या हैं?

उत्तर:
महाराज जी राम-नाम के साधकों के लिए सीताराम नाम के निरंतर जप और भगवान श्रीराम के चरित्र के श्रवण-मनन पर विशेष जोर देते हैं। यदि किसी साधक के भीतर भगवान श्रीराम के प्रति प्रेम जागृत करना है तो वे सीताराम नाम का जप करने, हनुमान जी की आराधना करने और रामचरितमानस के पाठ, गायन तथा श्रवण को साधना का हिस्सा बनाने की बात कहते हैं।

महाराज जी समझाते हैं कि भगवान के चरित्र में ही प्रेम और शरणागति छिपी हुई है। इसलिए जब हम भगवान के पवित्र चरित्रों को सुनते और उनका वर्णन करते हैं, तो उनका प्रभाव हमारे मन पर पड़ता है। रामचरितमानस के माध्यम से भगवान के चरित्र को बार-बार सुनना और मनन करना साधक के लिए बहुत उपयोगी बताया गया है।

एक अन्य साधक ने यह संशय रखा कि गुरु और राम-नाम को लेकर उसके मन में भ्रम है। महाराज जी ने उसे सरलता से “सीताराम, सीताराम” जपने को कहा और इस नाम को ही गुरु-मंत्र की तरह स्वीकार करके श्रद्धा से जपने की बात कही। उनका भाव था कि नाम में बहुत सामर्थ्य है और नामजप से ही सब ठीक हो जाएगा।

इसलिए राम-नाम के साधक के लिए मुख्य बात है कि नाम को पकड़कर रखें। सीताराम का जप करें, भगवान श्रीराम के चरित्र का श्रवण करें और हनुमान जी के चरणों में आश्रय का भाव रखें। महाराज जी के अनुसार हनुमान जी की कृपा से सियाराम के चरणों में प्रीति प्राप्त होती है।


प्रश्न 5: निराकार का पथिक था, अभी नामजप करने लगा हूँ। क्या करूँ?

उत्तर:
महाराज जी समझाते हैं कि साधक साकार और निराकार के विचारों में उलझने के बजाय पहले अपने वास्तविक स्वरूप को समझे। हमारा वास्तविक स्वरूप किसी बाहरी शरीर के आकार तक सीमित नहीं है। शरीर का एक आकार है, लेकिन जीव का वास्तविक स्वरूप उस आकार से अलग है। महाराज जी इसे बिजली के उदाहरण से समझाते हैं—बिजली स्वयं पंखा, हीटर या एसी नहीं है, लेकिन जिस उपकरण में जाती है, उसी के अनुसार उसका प्रभाव दिखाई देता है।

इसी प्रकार ब्रह्म की सत्ता अलग-अलग शरीरों में अलग-अलग रूपों में दिखाई देती है, लेकिन उसका अपना कोई निश्चित भौतिक आकार नहीं है। इसलिए महाराज जी कहते हैं कि हम भी अपने वास्तविक स्वरूप में निराकार हैं, लेकिन शरीर के आकार में फँसे हुए हैं। अब इसी आकार से निराकार की ओर लौटना है।

इसका उपाय महाराज जी नामजप बताते हैं। भगवान के नाम का जप करते हुए भगवान के स्वरूप में तन्मय होने से धीरे-धीरे शरीर और संसार का चिंतन छूटने लगता है। इसके बाद साधक के सामने उसके भाव के अनुसार वास्तविकता प्रकाशित होने लगती है। इसलिए साकार या निराकार को लेकर ज्यादा उलझने के बजाय भजन को पकड़ने की बात कही गई है।

महाराज जी आगे नामजप के साथ शास्त्रों का स्वाध्याय, पवित्र आहार, पवित्र विचार और पवित्र आचरण रखने पर भी जोर देते हैं। कम बोलना, संयम रखना और साधना के लिए समय देना भी बताया गया है।

इसलिए यदि निराकार मार्ग से नामजप की ओर आए हैं तो किसी भ्रम में पड़ने की आवश्यकता नहीं है। नामजप करते रहें और साधना को गहरा करें। महाराज जी के अनुसार भजन से ही धीरे-धीरे वह स्थिति अनुभव में आने लगेगी जिसे केवल चर्चा करके नहीं जाना जा सकता।


प्रश्न 6: वृन्दावन से बाहर रहते हुए क्या करें कि भक्ति में अग्रसर होते रहें?

उत्तर:
महाराज जी बहुत स्पष्ट कहते हैं कि भक्ति स्थान की मोहताज नहीं है। उन्होंने उदाहरण दिया कि यदि लंका जैसी कठिन जगह में विभीषण जी भक्ति कर सकते थे, तो दुबई या दुनिया के किसी दूसरे स्थान पर रहकर भक्ति करना कैसे असंभव हो सकता है? भक्ति मूल रूप से हृदय का विषय है।

यदि व्यक्ति भीतर से भगवान को याद करता है, नामजप करता है और यह दैन्यता रखता है कि “प्रभु, मैं ऐसी जगह रहता हूँ जहाँ आपकी भक्ति का वातावरण नहीं है, फिर भी मेरी भक्ति कैसे बने?”—तो यह भगवान का स्मरण ही उसके भीतर भक्ति को बढ़ाने वाला बन सकता है। महाराज जी बताते हैं कि भगवान हर जगह व्यापक हैं।

इसलिए घर को भी भगवान की स्मृति से जोड़ सकते हैं। घर में ठाकुर जी की सेवा करें, राधा-कृष्ण का स्मरण करें और खूब नामजप करें। महाराज जी कहते हैं कि हरि सर्वत्र हैं; प्रेम जागृत होने पर भगवान की उपस्थिति हर जगह अनुभव होने लगती है।

महाराज जी भक्ति के लिए तीन महत्वपूर्ण बातें बताते हैं—भजन, साधुसंग और निरंतर नामस्मरण। प्रेम भजन से प्रकट होता है और भजन साधुसंग से पुष्ट होता है। इसलिए यदि वृन्दावन में रहना संभव नहीं है तो जहाँ हैं वहीं से सत्संग सुनें, नामजप करें और भगवान को याद करते रहें।

साथ ही पवित्र भोजन और पवित्र जीवन पर भी ध्यान देना है। महाराज जी ने बाहर रहते हुए भी घर से बना प्रसाद ले जाने और पवित्र भोजन रखने की बात कही। मुख्य बात यह है कि जगह बदलने से ज्यादा हृदय की दिशा बदलनी जरूरी है।


प्रश्न 7: क्या करें जिससे कर्तव्यनिष्ठ सैनिक बन सकें?

उत्तर:
महाराज जी के अनुसार किसी सैनिक को अपने कर्तव्य के प्रति सच्चा और समर्पित बनाने में अध्यात्म की बहुत बड़ी भूमिका है। जब तक मनुष्य के भीतर स्वार्थ की बुद्धि रहती है, तब तक वह केवल अपने हित के बारे में सोचता है। लेकिन जब परहित की भावना जागती है तो उसके भीतर दिव्यता का विकास होने लगता है।

महाराज जी कहते हैं कि यह परहित की भावना अध्यात्म से आती है और अध्यात्म नामजप और सत्संग से जागृत होता है। इसलिए सैनिक चाहे ड्यूटी पर हो या किसी दूर स्थान पर तैनात हो, वह नामजप और सत्संग को अपने जीवन में बनाए रख सकता है। यदि प्रतिदिन किसी संत के पास जाना संभव नहीं है तो उपलब्ध माध्यम से सत्संग सुना जा सकता है।

इसके साथ पवित्र आहार और पवित्र आचरण भी जरूरी बताया गया है। महाराज जी मांस, मदिरा और गलत आचरण से बचने की बात करते हैं। उनके अनुसार नामजप और सत्संग अध्यात्म का अंकुर पैदा करते हैं और संयमित जीवन उसकी रक्षा करता है।

महाराज जी यह भी बताते हैं कि अध्यात्म से बुद्धि शुद्ध होती है। जब बुद्धि शुद्ध होती है तो व्यक्ति कठिन परिस्थितियों में भी धैर्य रख सकता है। उदाहरण के रूप में यदि छुट्टी की मांग स्वीकार न हो तो तुरंत क्रोध या निराशा में आने के बजाय धैर्य रखना और अगली संभावना की प्रतीक्षा करना संभव होता है।

राष्ट्र के प्रति समर्पण और कर्तव्यनिष्ठा भी इसी शुद्ध बुद्धि से मजबूत होती है। यदि व्यक्ति का मन केवल स्वार्थ से चल रहा हो तो कोई उसे लालच देकर अपने पक्ष में कर सकता है। लेकिन राष्ट्र और धर्म के प्रति गहरा भाव हो तो वह अपने कर्तव्य से समझौता नहीं करता। इसलिए महाराज जी का मार्ग है—नामजप, सत्संग, पवित्र आहार, पवित्र आचरण और परहित की भावना।


प्रश्न 8: नकारात्मक विचारों से पाप बन जाते हैं, इनको कैसे कम करूँ?

उत्तर:
महाराज जी बताते हैं कि हमारे भीतर सुमति और कुमति, दोनों प्रकार की बुद्धि और विचारों की संभावना रहती है। जब कुमति बढ़ती है तो नकारात्मक और गलत विचार बढ़ने लगते हैं। इसलिए केवल विचारों को जबरदस्ती रोकने के बजाय अपने जीवन के उन कारणों को सुधारना जरूरी है जिनसे बुद्धि और मन प्रभावित हो रहे हैं।

महाराज जी सबसे पहले भोजन को शुद्ध करने की बात कहते हैं। उनके अनुसार जैसा भोजन होता है, वैसा ही मन और बुद्धि पर प्रभाव पड़ता है। इसलिए नशे और अशुद्ध भोजन से बचना चाहिए तथा घर का शुद्ध भोजन अपनाना चाहिए। यदि व्यक्ति लगातार राजसिक और तामसिक भोजन लेता रहेगा तो उसके भीतर नकारात्मक विचारों का प्रभाव भी बढ़ सकता है।

इसके बाद महाराज जी नामजप, शास्त्र-स्वाध्याय और सत्संग को अपनाने की बात कहते हैं। इनसे बुद्धि को शुद्ध दिशा मिलती है और गलत विचारों पर नियंत्रण पाने में सहायता मिलती है। विशेष रूप से नशे को छोड़ने पर उन्होंने बहुत जोर दिया और इसे तुरंत छोड़ने का नियम लेने को कहा।

महाराज जी समझाते हैं कि कई बार व्यक्ति तनाव कम करने के लिए नशे का सहारा लेने लगता है, लेकिन यह रास्ता समस्या को समाप्त नहीं करता। इसके बजाय भगवान के नाम का ध्यान करने को कहा गया है। उनके अनुसार राधा नाम का ध्यान मन के तनाव को दूर करने में सहायक है।

इसलिए नकारात्मक विचारों को कम करने के लिए केवल “गलत मत सोचो” कहना पर्याप्त नहीं है। भोजन सुधारना है, नशा छोड़ना है, नामजप करना है, शास्त्रों का स्वाध्याय और सत्संग करना है तथा पवित्र विचारों और आचरण को अपनाना है। धीरे-धीरे बुद्धि की दिशा बदलने लगेगी। महाराज जी अंत में नामजप को पकड़कर आगे बढ़ने की बात कहते हैं।

Credit:
“यह लेख संत श्री प्रेमानंद जी महाराज के एकान्तिक वार्तालाप प्रवचन की अमृत वाणी पर आधारित है।”

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