माला-1398: एकनिष्ठ भक्ति करें तो क्या बाकी देवता नाराज़ होंगे? श्री प्रेमानंद महाराज जी के अमृत वचनों से नाम जप महिमा

प्रश्न 1: महाराज जी,यदि देवताओं की पूजा न करूँ, तो क्या यह अपराध होगा?

उत्तर:
महाराज जी समझाते हैं कि यदि किसी साधक की श्रीराम जी में एकनिष्ठ श्रद्धा है और वह अपने इष्ट श्रीराम जी की ही आराधना करना चाहता है, तो दूसरे देवी-देवताओं की पूजा न करने पर अपराध का भाव रखने की आवश्यकता नहीं है। इसे समझने के लिए महाराज जी वृक्ष का उदाहरण देते हैं। जैसे पेड़ की अलग-अलग शाखाओं, पत्तों और फूलों को अलग-अलग पानी देने के बजाय यदि उसके मूल में पानी डाल दिया जाए तो पूरा वृक्ष ही तृप्त होता है, उसी तरह भगवान की आराधना करने से उनके भीतर स्थित समस्त देवी-देवताओं की आराधना हो जाती है।

महाराज जी के अनुसार भगवान ही सबके मूल हैं। इसलिए यदि कोई व्यक्ति भगवान श्रीराम के चरणों की अनन्य भाव से आराधना करता है तो उससे समस्त देवी-देवताओं की आराधना अपने आप हो जाती है। किसी एक देवी या देवता को केवल अलग नाम-रूप मानकर उसकी पूजा करने से पूर्ण आराधना का भाव नहीं आता, लेकिन यदि उसी देवी-देवता में भगवान का भाव रखा जाए तो बात बदल जाती है।

इसलिए यदि कभी किसी देवी-देवता की आराधना करें भी, तो उन्हें भगवान के ही रूप में देखें और उनसे कोई सांसारिक स्वार्थ मांगने के बजाय अपने इष्ट के प्रति प्रेम और प्रीति की प्रार्थना करें। महाराज जी कहते हैं कि यदि हमने श्रीराम को अपना इष्ट माना है तो हमारी मुख्य प्रार्थना यही हो कि श्रीराम के चरणों में हमारी प्रीति बनी रहे। ऐसा करने में कोई अपराध नहीं है।

अर्थात एकनिष्ठ होकर अपने इष्ट की आराधना करना दूसरे देवी-देवताओं का अपमान नहीं है। भगवान को सबके भीतर देखने का भाव हो तो आराधना का स्वरूप ही व्यापक हो जाता है।


प्रश्न 2: बहुत पुण्य करता हूँ, फिर भी कष्ट और दुःख क्यों मिल रहे हैं?

उत्तर:
महाराज जी इस प्रश्न की शुरुआत ही एक महत्वपूर्ण बात से करते हैं। जब कोई व्यक्ति कहता है कि “मैं बहुत पुण्य करता हूँ”, तो सबसे पहले उस वाक्य में छिपे अहंकार को देखना चाहिए। महाराज जी समझाते हैं कि यदि वास्तव में कोई व्यक्ति पुण्य करता है तो उसके भीतर यह गर्व नहीं होना चाहिए कि “मैं बहुत पुण्यात्मा हूँ।” क्योंकि पुण्य करने की सामर्थ्य भी भगवान की कृपा और प्रेरणा से ही मिलती है।

महाराज जी सेवा और सहायता को मनुष्य का धर्म बताते हैं। किसी बीमार व्यक्ति की सहायता करना, किसी परेशान व्यक्ति को सहयोग देना या अपने परिवार, समाज और देश की सेवा करना हमारे मनुष्य होने के नाते कर्तव्य हैं। इसलिए हर सेवा के बाद यह भावना रखना कि “मैंने बहुत पुण्य कर दिया”, भीतर के अहंकार को बढ़ा सकता है। इसके बजाय यह समझना चाहिए कि भगवान ने हमें सेवा करने का अवसर दिया है।

जहाँ तक दुःख और कष्ट का प्रश्न है, महाराज जी कहते हैं कि दुःख हमारे कर्मों का फल होता है। इस जन्म में हम जो कुछ देख रहे हैं, उसके पीछे केवल वर्तमान के कर्म ही नहीं हैं; पूर्व जन्मों के कर्म भी अपना फल देते हैं। हमारे पूर्व पुण्यों से अच्छी बुद्धि और अनुकूल परिस्थितियाँ मिलती हैं तथा पूर्व पापों से दुःख और प्रतिकूल परिस्थितियाँ आती हैं।

इसलिए वर्तमान परिस्थिति को लेकर परेशान होने के बजाय हमें यह देखना चाहिए कि अभी हम कैसी “नई खेती” कर रहे हैं। पिछले कर्मों का जो फल सामने आ रहा है, उसे भोगते हुए वर्तमान में अच्छे कर्म करने हैं। नामजप करना है, दूसरों का परोपकार करना है और किसी को कष्ट देने से बचना है।

महाराज जी का संकेत यह है कि पुण्य करके उसका अहंकार न करें। सेवा को अपना धर्म समझकर करें और दुःख आने पर भगवान को दोष देने के बजाय अपने कर्मों की ओर देखें। इससे मन में शिकायत के स्थान पर सुधार और भजन की भावना पैदा होगी।


प्रश्न 3: क्या भगवान शिव की भी दास्य, सख्य आदि भाव से भक्ति की जा सकती है?

उत्तर:
हाँ, महाराज जी स्पष्ट रूप से बताते हैं कि भगवान शिव की आराधना भी अलग-अलग भावों से की जा सकती है। भगवान तो भगवान हैं, इसलिए उनके प्रति जिस भाव से भक्ति की जाती है, उसी भाव के अनुसार उनका अनुभव किया जा सकता है। महाराज जी इसके लिए स्वयं भगवान शिव के हनुमान रूप का उदाहरण देते हैं। भगवान शिव ने हनुमान जी के रूप में श्रीराम की दास्य भाव से सेवा की और श्रीराम की प्रत्येक आज्ञा का पालन किया।

इसी आधार पर महाराज जी कहते हैं कि भगवान शिव को कोई अपना स्वामी मानकर भज सकता है, कोई उन्हें अपना सखा मान सकता है और कोई उन्हें अपने प्रियतम के रूप में भी भावित कर सकता है। जिस भाव से भगवान शिव की आराधना की जाएगी, उसी भाव के अनुसार उनकी प्राप्ति हो सकती है।

हालाँकि महाराज जी यह भी बताते हैं कि सामान्य रूप से भगवान शिव की आराधना में माता-पिता या स्वामी का भाव अधिक देखा जाता है। प्रियतम के रूप में उनकी भक्ति का उदाहरण जगदंबा जी से जुड़ा बताया गया है। वहीं दास्य, सख्य, वात्सल्य, कांता और सहचरी जैसे भावों का उल्लेख मुख्यतः श्यामा-श्याम और सियाराम के संदर्भ में किया जाता है।

इसलिए साधक के लिए मुख्य बात यह है कि भगवान के प्रति उसका भाव सच्चा हो। भगवान शिव को केवल किसी दूर बैठे देवता के रूप में देखने के बजाय अपने भाव के अनुसार उनसे संबंध स्थापित किया जा सकता है। जिस प्रकार भगवान के प्रति श्रद्धा और प्रेम बढ़ता है, उसी प्रकार भक्ति का भाव भी भीतर गहराता जाता है।

महाराज जी द्वारा बताए गए भाव का सार यही है कि भगवान को जिस भाव से पुकारा जाता है, वे उसी भाव में साधक के सामने प्रकट होने की कृपा करते हैं। इसलिए भगवान शिव की भक्ति में भी दास्य या सख्य जैसे भाव रखे जा सकते हैं।


प्रश्न 4: क्या केवल नामजप करूँ या स्तोत्र, चालीसा आदि का पाठ भी करना चाहिए?

उत्तर:
महाराज जी इसके उत्तर में केवल एक साधन को पकड़ने के बजाय भजन की एक पूरी व्यवस्था बताते हैं। वे कहते हैं कि साधक को अपने समय को पाँच भागों में बाँटकर सत्संग, स्वाध्याय, सुमिरन, सेवा और समाधि—इन पाँचों को जीवन में स्थान देना चाहिए। इसलिए केवल नामजप ही करना है और स्तोत्र, चालीसा या अन्य स्वाध्याय बिल्कुल नहीं करना है, ऐसा नहीं है।

सत्संग के लिए थोड़ा समय निकालना चाहिए। यदि रोज संतों के पास जाकर सत्संग सुनना संभव न हो तो उपलब्ध साधनों के माध्यम से भी शास्त्रसम्मत सत्संग सुना जा सकता है। लेकिन महाराज जी सावधान करते हैं कि सत्संग ऐसा होना चाहिए जो शास्त्रसम्मत हो और भगवान की ओर ले जाने वाला हो, केवल मनोरंजन के लिए कही गई बातें सत्संग नहीं हैं।

इसके बाद स्वाध्याय है। इसमें हनुमान चालीसा, श्रीसूक्त, पुरुषसूक्त, दुर्गा, सरस्वती तथा अन्य शास्त्रों का पाठ और अध्ययन किया जा सकता है। इसलिए यदि किसी व्यक्ति को स्तोत्र या चालीसा पढ़ने में रुचि है तो वह उसे स्वाध्याय के रूप में कर सकता है। इसके बाद सुमिरन अर्थात नामजप और मंत्रजप है। गुरु के वचनों और महावाक्यों का स्मरण भी इसमें आता है।

फिर सेवा है—माता-पिता, गुरुजन और भगवान की सेवा। और पाँचवाँ है समाधि, जिसमें एकांत में बैठकर मन की गति को देखना और चित्तवृत्तियों को हटाकर लक्ष्य, अर्थात परमात्मा में लगाना बताया गया है। यदि समाधि की स्थिति न बन पाए तो कम से कम नाम का ध्यान करने की बात कही गई है।

इसलिए साधक अपने समय को इन पाँचों में बाँट सकता है। नामजप को छोड़ना नहीं है, लेकिन सत्संग, स्वाध्याय, सेवा और एकांत साधना को भी जीवन में स्थान देना है। इस प्रकार भजन अधिक संतुलित और पूर्ण रूप से आगे बढ़ता है।


प्रश्न 5: युवा भविष्य की चिंताओं में इतने खोए रहते हैं कि वे आज में नहीं जी पाते, इसे कैसे बदलें?

उत्तर:
महाराज जी भविष्य की चिंता से बचने का सबसे बड़ा उपाय भगवान के नाम और भगवान के सानिध्य में बताते हैं। जब नामजप हमारे जीवन में चलता रहता है तो भीतर यह विश्वास मजबूत होता है कि मेरे भगवान मेरे साथ हैं। जब संपूर्ण सृष्टि का संचालन करने वाला भगवान मेरे साथ है तो फिर भविष्य को लेकर लगातार चिंता करने में अपना वर्तमान क्यों खराब करना?

भविष्य ऐसी चीज है जिसके बारे में हमें निश्चित रूप से पता ही नहीं है। हम बार-बार सोचते हैं—अगर ऐसा हो गया तो क्या होगा, अगर मैं असफल हो गया तो क्या होगा, लोग क्या कहेंगे, आगे क्या होगा? इस तरह की सोच धीरे-धीरे मन में डर और बेचैनी पैदा करती है। महाराज जी बताते हैं कि नामजप के द्वारा मन को बार-बार वर्तमान में वापस लाया जा सकता है।

महाराज जी अपने जीवन का अनुभव बताते हुए समझाते हैं कि एक समय परिस्थितियाँ बहुत कठिन थीं, लेकिन भगवान पर भरोसा बना रहा। जब कोई सहारा दिखाई नहीं देता था, तब भी भगवान ने ऐसी व्यवस्था की कि आज हजारों लोग सेवा के लिए खड़े हैं। इससे उनका भाव यही है कि भगवान अपने भक्त की व्यवस्था स्वयं करते हैं।

भविष्य की चिंता अक्सर इसलिए भी बढ़ जाती है क्योंकि हमारा मन नकारात्मक संभावनाओं को बार-बार सोचता रहता है। विद्यार्थी सोचता है कि अगर वह परीक्षा में असफल हो गया तो क्या होगा, माता-पिता क्या कहेंगे, आगे क्या होगा। लेकिन महाराज जी बताते हैं कि इसी स्थिति में भगवान का चिंतन करने से दृष्टिकोण बदलता है। यदि भगवान साथ हैं तो असफलता की स्थिति में भी कोई दूसरा मार्ग निकल सकता है।

इसलिए युवा को भविष्य के विचारों में उलझते रहने के बजाय नामजप को अपना सहारा बनाना चाहिए। भगवान को अपने साथ अनुभव करना चाहिए और वर्तमान में जो कर्तव्य सामने है, उसे करते रहना चाहिए। भविष्य क्या होगा, यह हमारे हाथ में नहीं है; लेकिन आज हमारा मन किसके स्मरण में रहेगा, यह साधना से बदला जा सकता है।


प्रश्न 6: बुरे वक्त में लगता है भगवान ने मेरे साथ ऐसा क्यों किया?

उत्तर:
महाराज जी इस स्थिति को कर्म के नियम से समझाते हैं। वे कहते हैं कि जब हमारे जीवन में दुःख, आर्थिक परेशानी, शारीरिक कष्ट या कोई अन्य विपत्ति आती है तो सबसे पहले हमें यह नहीं सोचना चाहिए कि भगवान ने हमारे साथ ऐसा क्यों किया। यदि किसी व्यक्ति ने कोई कर्म किया है और उसका फल उसे मिल रहा है तो इसमें भगवान का दोष नहीं है। कर्म का अपना विधान है और उसी के अनुसार उसका फल प्राप्त होता है।

महाराज जी बताते हैं कि हमारे वर्तमान जीवन में जो दुःख दिखाई दे रहे हैं, उनके पीछे अनेक जन्मों के कर्म भी हो सकते हैं। इसलिए यह समझना जरूरी है कि हर परिस्थिति को केवल आज किए गए कर्मों से नहीं जोड़ा जा सकता। पूर्व कर्मों का फल भी जीवन में अलग-अलग रूपों में सामने आता है—कभी अपमान के रूप में, कभी असफलता, कभी विपत्ति और कभी बड़े नुकसान के रूप में।

ऐसी स्थिति में भगवान को दोष देने के बजाय उनकी शरण में जाना चाहिए। महाराज जी नामजप, भगवान की आराधना और दूसरों का परोपकार करने पर जोर देते हैं। यदि हमसे गलतियाँ हुई हैं तो भगवान से क्षमा की प्रार्थना करनी चाहिए और आगे पाप कर्म न हों, ऐसी बुद्धि की प्रार्थना करनी चाहिए।

महाराज जी एक महत्वपूर्ण बात यह भी कहते हैं कि दुःख के समय भगवान को कोसने के बजाय स्वयं की ओर देखना चाहिए। अपने आप से कहना चाहिए कि मुझसे कोई गलती हुई होगी, चाहे इस जन्म में या पहले, जिसका परिणाम मुझे भोगना पड़ रहा है। इसे स्वीकार करके आगे गलती न करने का संकल्प लेना चाहिए। इससे भीतर आत्मबल आता है।

इसलिए बुरा समय आने पर भगवान से विश्वास नहीं हटाना है। कर्म का फल भोगते हुए भी नामजप और भगवान की शरण नहीं छोड़नी है। परोपकार से हृदय को पवित्र करना है और अपने कर्मों को सुधारते रहना है। भगवान को दोष देने से परिस्थिति नहीं बदलती; लेकिन उनकी शरण में जाकर अपना जीवन सुधारने से आगे की दिशा बदल सकती है।


प्रश्न 7: ईश्वर के बारे में सोचने के लिए क्या भाव करना पड़ेगा?

उत्तर:
महाराज जी इस प्रश्न का उत्तर एक बहुत महत्वपूर्ण बात से शुरू करते हैं—ईश्वर का चिंतन करने से पहले नामजप आवश्यक है। क्योंकि हमारे मन में पहले से ही अनेक प्रकार के कुभाव चल रहे होते हैं। कभी शरीर और भोगों का चिंतन होता है, कभी धन का, कभी मान-सम्मान का और कभी दूसरे सांसारिक विषयों का। जब तक ये कुभाव कमजोर नहीं होंगे, तब तक भगवान के प्रति स्थिर और शुद्ध भाव बनना कठिन रहेगा।

महाराज जी के अनुसार जितना अधिक नामजप किया जाएगा, उतने ही कुभाव धीरे-धीरे नष्ट होंगे। इसलिए सबसे पहले नाम को पकड़ना है। केवल अपने रहने की जगह या वातावरण बदल लेने से मन नहीं बदलता, क्योंकि माया हर जगह है। धाम में भी माया का प्रभाव हो सकता है। परिवर्तन तब आता है जब भजन से हमारी दृष्टि बदलती है।

महाराज जी कहते हैं कि जब कुभावों का नाश होगा तभी सद्भाव और भगवान के प्रति वास्तविक भाव उत्पन्न होगा। इसलिए ईश्वर के बारे में सोचने के लिए किसी विशेष कल्पना को जबरदस्ती मन में बनाने से पहले अपने मन को नामजप से शुद्ध करना जरूरी है। नाम ही वह आधार है जिसके द्वारा मन धीरे-धीरे संसार के चिंतन से हटकर भगवान की ओर जाता है।

महाराज जी नामजप को जीवन का मुख्य आधार बताते हुए कहते हैं कि हर प्रश्न का उत्तर नाम में मिलता है। गुरु ने जो नाम दिया है, उसे खूब जपना चाहिए और निरंतर जपते रहना चाहिए। जब नाम निरंतर चलता रहता है तो संसार के चिंतन के लिए मन को उतना अवसर नहीं मिलता।

इसलिए ईश्वर का चिंतन करने के लिए पहले मन को नाम के सहारे स्थिर करना है। नामजप से कुभाव कम होंगे, फिर सद्भाव जागेगा और धीरे-धीरे भगवान के प्रति वास्तविक प्रेम और भाव विकसित होगा। महाराज जी का जोर इसी बात पर है कि नाम को छोड़कर केवल विचार करने से बात नहीं बनेगी। निरंतर नामजप ही वह आधार है जिससे मन संसार से हटकर परमात्मा की ओर जाने लगता है।

Credit:
“यह लेख संत श्री प्रेमानंद जी महाराज के एकान्तिक वार्तालाप प्रवचन की अमृत वाणी पर आधारित है।”

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