प्रश्न 1: महाराज जी,नामजप करते हुए मन में जो विकार आते हैं, उन्हें कैसे संभालें?
उत्तर:
नामजप करते समय मन में तरह-तरह के गलत विचार, पुराने संस्कार और विकार आना इस बात का प्रमाण नहीं है कि आपका भजन गलत हो रहा है। महाराज जी समझाते हैं कि हमारा मन एक ऐसी चिप की तरह है जिसमें न जाने कितने जन्मों की बातें, अच्छी-बुरी आदतें और संस्कार भरे पड़े हैं। सामान्य अवस्था में हमें इनके भीतर भरे होने का पता नहीं चलता, लेकिन जैसे ही हम भजन में बैठते हैं, वे धीरे-धीरे बाहर आने लगते हैं।
इसे ऐसे समझिए कि घर में कब कूड़ा भर गया, इसका हमें पता नहीं चलता। लेकिन जब हम उसे साफ करने लगते हैं, तभी कूड़ा दिखाई देता है। इसी तरह नामजप और भजन मन की सफाई का काम करते हैं। इसलिए भजन करते समय अचानक बहुत गंदे विचार आने लगें तो घबराने की जरूरत नहीं है। वे विचार नए पैदा नहीं हो रहे, बल्कि मन में पहले से जमा चीजें बाहर निकल रही हैं।
महाराज जी कहते हैं कि नाम का पहरा लगा हुआ है। इसलिए विकारों को देखकर उनसे लड़ना नहीं चाहिए। बस यह देखते रहना है कि ये विचार आ रहे हैं और निकल रहे हैं। अगर हम उन विचारों के साथ लड़ने लगेंगे, तो हमारा ध्यान उन्हीं पर चला जाएगा और वे और मजबूत हो सकते हैं। बुरी से बुरी बात मन में आए तो उसमें रस नहीं लेना है, उसके पीछे नहीं जाना है। उसे केवल गुजरते हुए देखना है और नामजप जारी रखना है।
महाराज जी ने यह भी समझाया कि मन में कोई पुरानी वासना बार-बार आ सकती है। एक ही विचार कई बार आए तो इसका अर्थ यह नहीं कि वह अभी तक निकला ही नहीं। अगर मन में बहुत लंबे समय से चीजें जमा हैं तो उनके निकलने में भी समय लगेगा। इसलिए साधक को धैर्य रखना चाहिए। जल्दी परिणाम पाने की बेचैनी नहीं करनी चाहिए।
भजन का प्रभाव धीरे-धीरे दिखाई देता है। पहले जिस गलत काम या विचार में मन को आनंद आता था, भजन बढ़ने के बाद उसी बात को लेकर भीतर से दुख होने लगता है। गलत काम हो जाए तो पहले जैसा गर्व नहीं रहता, बल्कि मन में पश्चाताप होने लगता है। यही मन के निर्मल होने की पहचान है। जब किसी गलत प्रवृत्ति के प्रति भीतर से अरुचि और दुख पैदा होने लगे तो समझना चाहिए कि भजन अपना काम कर रहा है।
इसलिए नामजप करते समय मन में विकार आएं तो न डरें, न परेशान हों और न ही उनके साथ बहें। उन्हें आने दें और नाम के सहारे निकलने दें। लगातार भजन करते रहने से मन धीरे-धीरे निर्मल होता जाएगा। महाराज जी के अनुसार, जब मन निर्मल हो जाता है तो भगवान की प्राप्ति का मार्ग खुल जाता है।
प्रश्न 2: अगर हम परमात्मा का अंश हैं, तो हमसे गलतियाँ कैसे हो जाती हैं?
उत्तर:
महाराज जी इस प्रश्न का मूल कारण हमारे अपने दृष्टिकोण में बताते हैं। केवल यह सुन लेना कि हम परमात्मा के अंश हैं, पर्याप्त नहीं है। व्यवहार में हम अपने आपको परमात्मा का अंश मानकर नहीं जीते, बल्कि शरीर को ही अपना स्वरूप मान लेते हैं। हम सोचते हैं—मैं पुरुष हूँ, मैं यह कर रहा हूँ, मुझे क्रोध आया, मैंने यह खाया, मैंने यह किया। यही कर्तापन हमारे बंधन का कारण बनता है।
महाराज जी समझाते हैं कि प्रकृति के तीन गुणों—सत्व, रज और तम—से प्रेरित होकर संसार की क्रियाएं चलती हैं। कभी मन में सात्त्विक भाव आते हैं, कभी राजसिक और कभी तामसिक। लेकिन हम इन भावों को प्रकृति की प्रक्रिया के रूप में देखने के बजाय तुरंत अपने ऊपर ले लेते हैं। हम कहते हैं, “मुझे गुस्सा आया”, “मैंने यह किया”, “मैंने वह किया।” इसी ‘मैं’ के कारण कर्तापन पैदा होता है और फिर कर्मों का बंधन भी आता है।
महाराज जी ‘निमित्त मात्र’ होने की बात पर विशेष जोर देते हैं। इसका अर्थ केवल बोलने की बात नहीं है कि “सब भगवान कर रहे हैं।” इसे जीवन में अनुभव करना है। हर समय यह देखने का अभ्यास करना है कि मैं केवल निमित्त हूँ और सब कुछ परमात्मा की सत्ता से हो रहा है। जब यह भाव भीतर मजबूत होता है तो धीरे-धीरे काम और क्रोध जैसे विषयों का चिंतन कम होने लगता है।
लेकिन जब तक हम अपने आपको कर्ता और भोगता मानते हैं, तब तक गलती और उसके फल से हमारा संबंध बना रहता है। महाराज जी कहते हैं कि हम शरीर को अपना मानते हैं, शरीर से जुड़े संबंधों को अपना मानते हैं और संसार के भोगों को अपना मानते हैं। यही पकड़ हमारा बंधन बन जाती है। जैसे कोई व्यक्ति किसी वस्तु को इतनी मजबूती से पकड़ ले कि उसे छोड़ने के बाद ही वह मुक्त हो सके, उसी तरह हमारी अपनी मान्यताएं हमें बांधती हैं।
परमात्मा का अंश होने की बात केवल विचार करने से अनुभव में नहीं आती। उसके लिए भजन और नामजप आवश्यक हैं। महाराज जी स्पष्ट कहते हैं कि केवल बुद्धि के विचार से यह स्थिति प्राप्त नहीं होगी। नामजप करते रहना है, परोपकार करना है, पाप कर्मों से बचना है और धीरे-धीरे यह चिंतन रखना है कि प्रकृति का प्रवाह चल रहा है और मैं परमात्मा का अंश हूँ। इस चिंतन और भजन से भीतर धीरे-धीरे प्रकाश आने लगता है और अपने वास्तविक स्वरूप की ओर जाने का मार्ग समझ में आने लगता है।
इसलिए गलती होने का कारण यह नहीं कि परमात्मा का अंश होने में कोई कमी है। समस्या यह है कि हमने अपने वास्तविक स्वरूप को जाना नहीं और शरीर तथा कर्तापन को ही अपना सत्य मान लिया। जब कर्ता और भोक्ता होने का अहंकार धीरे-धीरे मिटता है और परमात्मा के प्रति वास्तविक चिंतन और भजन बढ़ता है, तब जीवन की दिशा बदलने लगती है।
प्रश्न 3: प्रेमी भक्त और विवेकी भक्त में क्या अंतर है?
उत्तर:
महाराज जी के अनुसार प्रेमी भक्त और विवेकी भक्त दोनों ही भगवान की ओर बढ़ते हैं, लेकिन दोनों की चाहत और उनका भाव अलग होता है। विवेकी भक्त विवेक के माध्यम से असत को छोड़कर सत में स्थित होना चाहता है और अंततः मोक्ष प्राप्त करना चाहता है। वहीं प्रेमी भक्त की इच्छा कुछ और ही होती है—वह भगवान से प्रेम करना चाहता है और उसके प्रेम में ही संतुष्ट रहना चाहता है।
विवेकी भक्त संसार की अस्थिरता को समझकर उससे अलग होना चाहता है। उसके भीतर यह बोध रहता है कि जो कुछ संसार और शरीर से संबंधित है, वह स्थायी नहीं है। इसलिए वह असत का त्याग करके सत में स्थित होना और मुक्ति प्राप्त करना चाहता है। उसके मार्ग में विवेक प्रमुख साधन है।
प्रेमी भक्त की मांग इससे अलग होती है। वह भगवान से यह नहीं कहता कि मेरा दुख दूर कर दो, मुझे संसार का सुख दे दो, मुझे धन दे दो, मान-सम्मान दे दो या मुझे मोक्ष दे दो। उसकी चाहत केवल भगवान के चरणों में प्रेम की होती है। वह चाहता है कि चाहे मुझे बार-बार जन्म लेना पड़े, लेकिन हर जन्म में भगवान के प्रति मेरा प्रेम बना रहे। वह उनका नाम जपे, उनकी भक्ति करे, उनकी लीला सुने और उनके प्रेम में तड़पे।
यही कारण है कि महाराज जी कहते हैं—विवेकी को अपना बल है और प्रेमी को भगवान का बल है। विवेकी अपने विवेक के द्वारा रास्ता पकड़ता है, जबकि प्रेमी भगवान के चरणों में अपने आपको रख देता है। प्रेमी भक्त के भीतर भगवान को पाने के अलावा कोई दूसरी मांग नहीं रहती।
हालांकि इसका अर्थ यह नहीं कि ज्ञान और भक्ति एक-दूसरे से अलग हैं। महाराज जी स्पष्ट करते हैं कि दोनों एक-दूसरे के पूरक हैं। जैसे बीज के बिना वृक्ष और वृक्ष के बिना बीज की कल्पना पूरी नहीं होती, वैसे ही ज्ञान के बिना भक्ति और भक्ति के बिना ज्ञान भी पूर्ण नहीं होते। साधारण ज्ञान से भक्ति की ओर बढ़ते हैं और भक्ति के आगे बढ़ने पर असाधारण ज्ञान की स्थिति आती है।
पहले सत्संग से यह समझ आती है कि क्या करना चाहिए और क्या नहीं करना चाहिए। फिर श्रद्धा के साथ भक्ति शुरू होती है। भगवान के स्वरूप, उनकी महिमा और उनके स्वभाव को समझना ज्ञान का पक्ष है, जबकि उन्हें जानकर उनसे प्रेम करना भक्ति का पक्ष है। धीरे-धीरे दोनों साथ-साथ आगे बढ़ते हैं।
इसलिए प्रेमी भक्त भगवान से किसी फल के लिए प्रेम नहीं करता। उसके लिए भगवान ही लक्ष्य हैं। विवेकी भक्त मुक्ति की ओर देखता है, जबकि प्रेमी भक्त के लिए भगवान के चरणों में प्रेम ही पर्याप्त है। वह मुक्ति को भी अपनी मांग नहीं बनाता; उसकी इच्छा होती है कि जन्म-जन्मांतर तक भगवान का नाम, भजन, कीर्तन और प्रेम बना रहे। यही दोनों के भाव का मुख्य अंतर है।
प्रश्न 4: मीरा जी के इस पद का क्या अर्थ है?
उत्तर:
महाराज जी ने मीरा जी के पद—“गली तो चारों बंद हुई है, मैं हरि से मिलूँ कैसे जाऊँ…” —का अर्थ बाहरी गलियों से नहीं, बल्कि मनुष्य के अंतःकरण की स्थिति से समझाया है। उनके अनुसार हमारे अंतःकरण में मन, बुद्धि, चित्त और अहंकार—ये चार प्रमुख पक्ष हैं। जब ये चारों संसार और माया की ओर लगे हुए हों तो भगवान तक जाने वाली राह जैसे बंद हो जाती है।
मीरा जी जब कहती हैं कि चारों गलियां बंद हैं, तो महाराज जी इसे इसी स्थिति से जोड़ते हैं। मन भगवान में नहीं लग रहा, बुद्धि भगवान की ओर नहीं जा रही, चित्त संसार में उलझा हुआ है और अहंकार अपने कर्तापन तथा भोगने के भाव में लगा हुआ है। ऐसे में साधक चाहे भगवान की ओर जाना चाहता हो, लेकिन उसके भीतर की चारों दिशाएं संसार की ओर खिंची हुई हैं।
इसके बाद पद की अगली पंक्ति—“ऊंची नीची राह रटीली, पांव नहीं ठहराऊं”—का भाव समझाते हुए महाराज जी कहते हैं कि साधक की मनःस्थिति स्थिर नहीं रहती। कभी मन भजन की तरफ जाता है और कभी भोगों की तरफ। कभी भीतर ऊंची और अच्छी वृत्ति आती है तो कभी नीचे खींचने वाली वृत्ति आ जाती है। मन एक जगह टिक नहीं पाता। यही साधक की कठिनाई है।
लेकिन इसी जगह सद्गुरु की कृपा का महत्व सामने आता है। महाराज जी कहते हैं कि जब रास्ते कठिन हों, मन स्थिर न हो और भीतर की स्थितियां बार-बार बदलती रहें, तब सद्गुरु हाथ पकड़कर साधक को आगे ले जाते हैं। जिस रास्ते पर अपने बल से चलना कठिन लग रहा था, गुरु की कृपा से वही रास्ता पार होने लगता है। मीरा जी के पद में भी सद्गुरु द्वारा मिलाए जाने की बात इसी कृपा की ओर संकेत करती है।
महाराज जी यह भी बताते हैं कि बड़े भक्त जब अपनी स्थिति का वर्णन करते हैं तो वे कई बार हमारे जैसे साधकों के मन की दशा को भी सामने रख देते हैं। मीरा जी स्वयं अत्यंत ऊंची भक्ति की स्थिति में थीं, लेकिन उनके पद में जो भाव व्यक्त हुआ है, उसमें साधक की उस बेचैनी को समझा जा सकता है जिसमें वह भगवान से मिलना चाहता है, लेकिन मन और अंतःकरण बार-बार संसार की ओर खिंचते हैं।
हमारे लिए इसका सार यह है कि मन, बुद्धि, चित्त और अहंकार को धीरे-धीरे भगवान की ओर मोड़ना है। कभी भजन में मन लगेगा, कभी नहीं लगेगा; कभी अच्छी वृत्ति आएगी, कभी संसार की ओर खिंचाव होगा। इस उतार-चढ़ाव से निराश नहीं होना चाहिए। सद्गुरु की शरण, उनकी आज्ञा और भजन को पकड़कर चलते रहना है। जब गुरु का हाथ मिल जाता है तो कठिन रास्ते भी पार होने लगते हैं।
प्रश्न 5: क्या सत्य या सत्य का अनुभव केवल बुद्धि से ही किया जा सकता है?
उत्तर:
महाराज जी इस प्रश्न का उत्तर बहुत स्पष्ट रूप से देते हैं कि परमात्मा या सत्य को केवल बुद्धि और तर्क के सहारे नहीं जाना जा सकता। इसके लिए श्रद्धा और विश्वास आवश्यक हैं। ज्ञान प्राप्त करने के लिए भी श्रद्धा चाहिए और भक्ति के लिए भी श्रद्धा चाहिए। श्रद्धा के बाद विश्वास आता है और फिर उस विश्वास के आधार पर प्राप्त होने वाला ज्ञान धीरे-धीरे अनुभव में बदलता है।
महाराज जी समझाते हैं कि हमारी बुद्धि प्रकृति से संबंधित है। इसलिए बुद्धि मुख्य रूप से प्रकृति से जुड़े विषयों को समझने और उनका विश्लेषण करने में सक्षम है। लेकिन परमात्मा प्रकृति से परे तत्व हैं। इसलिए केवल तर्क की कसौटी पर परमात्मा को पकड़ना संभव नहीं है। बुद्धि अपनी सीमा के भीतर ही काम करती है।
यही कारण है कि केवल किसी व्यक्ति की बाहरी गतिविधियों को देखकर उसकी आंतरिक आध्यात्मिक स्थिति का पता नहीं लगाया जा सकता। महाराज जी ने उदाहरण देकर समझाया कि कोई महान संत बाहर से सामान्य व्यवहार करता हुआ दिखाई दे सकता है। वह साधारण बातचीत कर सकता है, भोजन के बारे में पूछ सकता है, लेकिन केवल इन बाहरी बातों के आधार पर यह तय नहीं किया जा सकता कि उसकी वास्तविक आध्यात्मिक अवस्था क्या है। बाहरी प्रकृति को बुद्धि देख सकती है, लेकिन भीतर की परमात्म स्थिति को केवल बाहरी व्यवहार देखकर नहीं जाना जा सकता।
फिर प्रश्न आता है कि श्रद्धा और विश्वास उत्पन्न कैसे होंगे? महाराज जी इसके लिए महापुरुषों का संग और सत्संग बताते हैं। जब हम संतों से भगवान के प्रेम, करुणा और उनके स्वभाव की बातें सुनते हैं, तो हृदय में श्रद्धा पैदा होती है। श्रद्धा के साथ जब साधक उस मार्ग पर चलना शुरू करता है तो धीरे-धीरे कुछ अनुभव होने लगते हैं और उन अनुभवों से विश्वास मजबूत होता जाता है।
इसलिए यहाँ बुद्धि को पूरी तरह बेकार बताने की बात नहीं है, बल्कि उसकी सीमा को समझने की बात है। संसार के विषयों को समझने में बुद्धि उपयोगी है, लेकिन परमात्मा के अनुभव तक पहुंचने के लिए केवल तर्क पर्याप्त नहीं है। महाराज जी के अनुसार, श्रद्धा को आगे रखना होगा और महापुरुषों की आज्ञा तथा मार्गदर्शन पर विश्वास करके चलना होगा।
महाराज जी के अनुसार भक्ति का पहला सोपान ही संतों का संग बताया गया है। संतों से सुनना, उनके बताए मार्ग पर चलना, नामजप करना और श्रद्धा को बढ़ाना—इन सबके द्वारा साधक धीरे-धीरे उस अनुभव की ओर बढ़ता है जो केवल बौद्धिक समझ से प्राप्त नहीं होता। श्रद्धा से मार्ग खुलता है, विश्वास से कदम आगे बढ़ते हैं और साधना के द्वारा अनुभव गहरा होता जाता है।
इसलिए सत्य को केवल तर्क की कसौटी पर पकड़ने की कोशिश करने के बजाय श्रद्धा, विश्वास, सत्संग और भजन के मार्ग पर आगे बढ़ना आवश्यक है। बुद्धि हमें बहुत कुछ समझा सकती है, लेकिन परमात्मा की वास्तविक अनुभूति के लिए हृदय का खुलना और साधना का अनुभव आवश्यक है। यही इस उत्तर का मुख्य भाव है।
Credit:
“यह लेख संत श्री प्रेमानंद जी महाराज के एकान्तिक वार्तालाप प्रवचन की अमृत वाणी पर आधारित है।”