प्रश्न 1: महाराज जी,ऐसा क्या करूँ कि नामजप में ध्यान दिन-प्रतिदिन गहरा होता जाए?
उत्तर:
महाराज जी इस प्रश्न के उत्तर में सबसे पहले भजन की निरंतरता पर जोर देते हैं। कई बार ऐसा होता है कि नामजप में मन बहुत लग जाता है और कभी मन बिल्कुल नहीं लगता। उस समय जबरदस्ती भी नामजप करना पड़ता है। लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि मन नहीं लग रहा तो नामजप छोड़ दें। महाराज जी कहते हैं कि भजन को कभी छोड़ना नहीं चाहिए। संतों की कृपा और भक्तों के आश्रय के बिना भजन में गाढ़ी रुचि पैदा होना कठिन है।
महाराज जी विशेष रूप से भक्तों का स्मरण करने, भक्तों की चरण-वंदना करने और भक्तों की नामावली का पाठ करने की बात कहते हैं। उनका कहना है कि भगवान से भी अधिक भक्तों के यश को सुनना और भक्तों के चरित्रों का स्मरण करना भक्ति को बढ़ाने वाला है। यदि रोज भक्तों की नामावली का पाठ किया जाए और भक्तों के चरित्र सुने जाएँ, तो धीरे-धीरे भगवान के प्रति गाढ़ा भाव आने लगता है।
इसके साथ महाराज जी साधक के भोजन और आचरण पर भी ध्यान देने को कहते हैं। भोजन सात्त्विक होना चाहिए और भगवान को अर्पित करके प्रसाद के रूप में ग्रहण करना चाहिए। अमनिया भोजन से बचना और पवित्र आचरण रखना चाहिए। संतों का आश्रय भी बनाए रखना चाहिए।
महाराज जी समझाते हैं कि नामजप का प्रभाव धीरे-धीरे भीतर दिखाई देता है। प्रारंभ में नामजप हमारे अनर्थों और पाप प्रवृत्तियों का नाश करता है। इसके बाद नामजप में आनंद की अनुभूति होने लगती है। जब नाम में आनंद आने लगता है तो मन को भगवान के नाम में लगाने के लिए उतनी मेहनत नहीं करनी पड़ती। मन अपने आप संसार से हटकर नाम की ओर लौटने लगता है।
इसलिए यदि अभी मन कभी लगता है और कभी नहीं लगता, तो निराश होने की आवश्यकता नहीं है। नामजप छोड़ना नहीं है। भक्तों का आश्रय लेना है, भक्तों के चरित्र सुनने हैं, सात्त्विक और प्रसादी भोजन करना है, पवित्र आचरण रखना है और निरंतर नामजप करते रहना है। महाराज जी के अनुसार जब नाम में आनंद आने लगेगा, तब मन स्वयं ही उसमें रमने लगेगा।
प्रश्न 2: बचपन में दीक्षा मिल गई थी, व्रत लेने के बाद गोपाल-मंत्र मिला; अब कौन-सा मंत्र जपूँ?
उत्तर:
महाराज जी इस स्थिति में सबसे पहले संशय छोड़ने की बात कहते हैं। यदि साधक के मन में लगातार यही शंका बनी रहे कि पहले मिला हुआ मंत्र जपूँ या बाद में मिला हुआ मंत्र, कौन-सा अधिक लाभ देगा और किससे सिद्धि होगी, तो साधना में ही रुकावट आने लगती है। महाराज जी स्पष्ट रूप से कहते हैं कि गुरु के वचन पर विश्वास होना चाहिए।
जिस मंत्र की दीक्षा बाद में गुरु से मिली है, अब उसी मंत्र को श्रद्धा और पवित्रता से जपने की बात महाराज जी कहते हैं। वे समझाते हैं कि जब विरक्त होकर आगे बढ़ चुके हो तो पीछे की बातों को लेकर संशय में नहीं रहना चाहिए। जो मंत्र अभी मिला है, उसी में पूरी श्रद्धा रखकर साधना करनी चाहिए।
महाराज जी इस साधक को विशेष रूप से गोपाल महामंत्र को श्रद्धा से जपने के लिए कहते हैं। साथ ही वे यह भी समझाते हैं कि यदि मंत्र में मन लग रहा हो तो मंत्र का जप करें और यदि किसी समय मंत्र में रुचि न हो तो भगवान के नाम का जप करते रहें। वे राधे-श्याम और राधा-कृष्ण जैसे नामों का भी उदाहरण देते हैं और बताते हैं कि नामजप निरंतर चलता रहना चाहिए।
इस उत्तर में महाराज जी एक और महत्वपूर्ण बात स्पष्ट करते हैं—शिक्षा गुरु और दीक्षा गुरु में अंतर है। शिक्षा तो हम बहुत से संतों और महात्माओं से ले सकते हैं। किसी संत की कोई बात अच्छी लगी, उससे कोई सीख मिली, तो वह हमारे लिए शिक्षा गुरु के समान हो सकता है। लेकिन दीक्षा गुरु को बार-बार बदलना उचित नहीं है। महाराज जी दत्तात्रेय जी के चौबीस गुरुओं का उदाहरण देते हुए समझाते हैं कि उनसे शिक्षा ली गई थी, दीक्षा नहीं।
इसलिए साधक को मंत्रों की तुलना करते हुए संशय में नहीं पड़े रहना चाहिए। गुरु से जो मंत्र मिला है, उसे श्रद्धा से जपना चाहिए और भगवान की शरण में रहना चाहिए। महाराज जी का भाव यही है कि अब जितनी श्वासें मिली हैं, उन्हें भगवान के स्मरण में लगाना है और अपने प्रयास के साथ भगवान की कृपा पर भरोसा रखना है।
प्रश्न 3: मोक्ष और आत्मज्ञान में क्या अंतर है?
उत्तर:
महाराज जी इस प्रश्न का उत्तर बहुत गहराई से समझाते हैं। वे कहते हैं कि आत्मज्ञानी को ही मोक्ष प्राप्त होता है। लेकिन आत्मज्ञान का अर्थ केवल यह जान लेना नहीं है कि आत्मा क्या है या शास्त्रों में आत्मा के विषय में क्या लिखा है। अपने वास्तविक स्वरूप का ज्ञान होना और उस ज्ञान का अनुभव होना—इन दोनों में अंतर है।
महाराज जी समझाते हैं कि मनुष्य केवल स्थूल शरीर नहीं है। स्थूल शरीर के बाद सूक्ष्म शरीर और कारण शरीर भी हैं। जब इन तीनों शरीरों से अपना संबंध छूट जाता है और अपने वास्तविक स्वरूप का बोध हो जाता है, तब मुक्त पुरुष की स्थिति आती है। महाराज जी कहते हैं कि मोक्ष कोई पदवी या कोई पकड़कर रखने वाली वस्तु नहीं है।
वे इसे बहुत सरल उदाहरण से समझाते हैं। यदि किसी व्यक्ति को हलवा बनाने की पूरी विधि पता है, उसने उसके बारे में बहुत पढ़ा है और वह दूसरे को उसकी विधि भी बता सकता है, लेकिन उसने कभी हलवा खाया ही नहीं, तो केवल जानकारी से उसे हलवे के स्वाद का अनुभव नहीं होगा। उसी तरह आत्मा के बारे में शास्त्र पढ़ लेना, सुन लेना और उसके विषय में बोल लेना आत्मबोध नहीं है। जब उस ज्ञान का अनुभव और साक्षात्कार होता है, तब बात पूरी होती है।
महाराज जी आगे बताते हैं कि इस अनुभव के लिए संसार के भोगों से वैराग्य, सत्-असत् का विवेक, इंद्रियों का संयम, मन का निग्रह, गुरु के चरणों में श्रद्धा, गुरु द्वारा दिए हुए भजन में चित्त की स्थिति और मोक्ष की तीव्र इच्छा आवश्यक है। साधना के बल से जब वास्तविक बोध होता है, तब तीनों शरीरों के प्रति जो हमारा राग है, वह छूटने लगता है।
यही महाराज जी के अनुसार मोक्ष की स्थिति है—जिसे हम अपना मानकर पकड़े हुए हैं, उससे हमारा राग छूट जाए। वास्तव में बंधन किसी ने बाहर से हमें पकड़कर नहीं बनाया; हमने स्वयं शरीर, मन और संसार को पकड़ रखा है। जब पकड़ छूटती जाती है, तो बंधन भी समाप्त होता जाता है।
इसलिए आत्मज्ञान केवल जानकारी नहीं है। जब ज्ञान का अनुभव होता है और अपने वास्तविक स्वरूप का बोध हो जाता है, तब वही आत्मज्ञान मोक्ष की ओर ले जाता है।
प्रश्न 4: ध्यान में बैठती हूँ तो नींद आने लगती है, क्या करूँ?
उत्तर:
महाराज जी इस स्थिति के लिए बहुत सीधा उपाय बताते हैं। यदि ध्यान में बैठते ही नींद आने लगे और आँखें बार-बार बंद होने लगें, तो उसी अवस्था में बैठे रहने के बजाय खड़े हो जाना चाहिए और थोड़ा टहलना चाहिए। महाराज जी ठंडा पानी पास रखने का उपाय भी बताते हैं, ताकि जब बहुत अधिक नींद आए तो उसका उपयोग करके स्वयं को जाग्रत रखा जा सके।
महाराज जी के अनुसार ध्यान में बैठने का उद्देश्य सोना नहीं है। इसलिए जब शरीर नींद की ओर जाने लगे तो साधक को अपनी स्थिति बदलनी चाहिए। थोड़ी देर चल लेना, ठंडा पानी रख लेना और फिर ध्यान में बैठना इस स्थिति में सहायता कर सकता है।
इसके साथ महाराज जी पवित्र भोजन और पवित्र संग की बात भी कहते हैं। वे पूछते हैं कि साधक का भोजन कैसा है और फिर पवित्र भोजन पर जोर देते हैं। उनका कहना है कि गंदा देखना नहीं, गंदा सुनना नहीं, गंदा बोलना नहीं और गंदा करना नहीं—इस प्रकार के आचरण से हृदय धीरे-धीरे पवित्र होने लगता है।
महाराज जी नामजप की निरंतरता को भी ध्यान से जोड़ते हैं। वे कहते हैं कि भगवान के किसी एक नाम का निरंतर जप करते रहना चाहिए। उदाहरण के रूप में वे वाहेगुरु और राधा नाम का जप बताते हैं। जब संसार का चिंतन धीरे-धीरे कम होकर भगवान के नाम का चिंतन बढ़ता है और वही चिंतन गाढ़ा होता जाता है, तब ध्यान की स्थिति आने लगती है।
ध्यान के समय मन भटक जाए तो भी परेशान नहीं होना है। महाराज जी कहते हैं कि अभ्यास करते रहो। मन बार-बार भागेगा तो बार-बार वापस लाना है। लगातार अभ्यास करने से धीरे-धीरे मन टिकने लगेगा। पहले शायद एक-दो सेकंड टिकेगा, फिर कुछ और समय, और धीरे-धीरे यह अवधि बढ़ती जाएगी।
ध्यान के विषय को भी महाराज जी स्पष्ट करते हैं—मन को बार-बार “राधा-राधा” में लगाना है। मन भाग जाए तो फिर उसे उसी नाम में वापस लाना है। यही बार-बार करने से ध्यान की भूमि मजबूत होगी और धीरे-धीरे ध्यान में स्थिरता आने लगेगी।
इसलिए नींद आने पर निराश होने की जरूरत नहीं है। शरीर को जगाइए, पवित्र भोजन और संग रखिए, नामजप में निरंतरता रखिए और ध्यान में भागते मन को बार-बार वापस लाते रहिए।
प्रश्न 5: भगवान ने दुखालय संसार की रचना ही क्यों की?
उत्तर:
महाराज जी इस प्रश्न को सामान्य तरीके से नहीं देखते। वे कहते हैं कि पहले यह समझना जरूरी है कि “आप कौन हैं?” हमारी सबसे बड़ी भूल यह है कि हम अपने वास्तविक स्वरूप को भूलकर स्वयं को कभी स्त्री, कभी पुरुष, कभी किसी संबंध और कभी शरीर के रूप में मान लेते हैं। इसी भूल के कारण संसार का सुख-दुख हमें वास्तविक दिखाई देता है।
महाराज जी संसार की तुलना स्वप्न से करते हैं। जैसे स्वप्न में किसी व्यक्ति का गला काटा जा रहा हो तो उस व्यक्ति को बचाने के लिए चाहे कितने ही लोग लगा दिए जाएँ, स्वप्न के भीतर से उसे वास्तविक रूप में बचाया नहीं जा सकता। उसे बचाने का एक ही उपाय है—उसे जगा दिया जाए। उसी प्रकार संसार के इस भ्रम से निकलने का उपाय अपने वास्तविक स्वरूप को जानना है।
महाराज जी कहते हैं कि जीव वास्तव में अविनाशी, चैतन्य और सुखस्वरूप है। अपने स्वरूप को भूल जाना ही दुख का कारण है और अपने स्वरूप को जानकर इस भ्रम का नाश हो जाना ही परम सिद्धि है। इसलिए प्रश्न यह नहीं है कि भगवान ने संसार क्यों बनाया, बल्कि पहले यह समझना चाहिए कि हम वास्तव में कौन हैं।
वे यह भी कहते हैं कि भगवान ने कोई खराब व्यवस्था नहीं बनाई। हमें आँखें मिली हैं, कान मिले हैं, वाणी मिली है, हाथ मिले हैं। यदि इनका उचित उपयोग करें तो आनंद है और यदि इनका गलत उपयोग करें तो उसी के परिणामस्वरूप दुख आता है। जैसे अधिक मात्रा में कोई अच्छी वस्तु भी परेशानी का कारण बन सकती है, वैसे ही संसार की वस्तुओं का अनुचित उपयोग दुख का कारण बनता है।
महाराज जी के अनुसार जब हम संसार और भोगों को सत्य मानकर उनमें सुख खोजते हैं, तब सुख-दुख दोनों का अनुभव होता है। संसार का सुख भी स्थायी नहीं है। मन एक सुख पाकर फिर दूसरे सुख की खोज में निकल जाता है और भीतर की अतृप्ति बनी रहती है। वास्तविक सुख हमारे अपने स्वरूप का सुख है, क्योंकि हम भगवान के अंश और भगवत्स्वरूप हैं।
इसलिए समाधान संसार से भागना नहीं, बल्कि अपने वास्तविक स्वरूप को जानना और साधना करना है। महाराज जी नामजप, भगवान के पावन चरित्रों का श्रवण और संयमित जीवन की बात कहते हैं। गलत कर्मों से बचते हुए साधना करने पर हृदय में आनंद आने लगता है।
प्रश्न 6: अगर भजन करूँगा, तो पारिवारिक और सामाजिक ज़िम्मेदारियाँ सही से नहीं निभा पाऊँगा!
उत्तर:
महाराज जी इस शंका को बिल्कुल उल्टा समझाते हैं। वे कहते हैं कि भक्ति करने से कर्तव्य छूटता नहीं, बल्कि कर्तव्य को ठीक से निभाने की शक्ति बढ़ती है। वे भक्त अम्बरीष जी का उदाहरण देते हैं, जो महान राजा थे और फिर भी भगवान के महान भक्तों में उनकी गणना होती है। यदि भक्ति के कारण व्यक्ति अपने कर्तव्य से विमुख हो जाता, तो ऐसे महान भक्तों का जीवन इसका उदाहरण नहीं होता।
महाराज जी समझाते हैं कि भक्ति व्यक्ति के दृष्टिकोण को बदल देती है। अभी हम परिवार के लोगों से केवल अपने संबंध के आधार पर प्रेम करते हैं—माँ को माँ मानकर, पिता को पिता मानकर और परिवार को अपना मानकर। लेकिन भक्ति की भावना आने पर वही माँ-पिता और परिवार भगवान के रूप में दिखाई देने लगते हैं। तब उनके प्रति हमारा व्यवहार भी भगवान की सेवा की भावना से होने लगता है।
इसी तरह नौकरी और सामाजिक जिम्मेदारी को भी केवल नौकरी या विभाग समझकर नहीं, बल्कि भगवान द्वारा दिया हुआ कर्तव्य समझकर करना चाहिए। महाराज जी कहते हैं कि नामजप करते हुए धर्मपूर्वक अपने कर्तव्य का पालन करें और परिवार का पालन-पोषण भगवान के भाव से करें। इससे भक्ति जीवन से अलग कोई चीज नहीं रह जाती, बल्कि जीवन जीने का आधार बन जाती है।
महाराज जी यह भी कहते हैं कि भक्ति व्यक्ति को गलत काम करने से रोकने की शक्ति देती है। यदि अधिकारी गलत काम करने के लिए कहे तो केवल नौकरी बचाने के लिए गलत काम नहीं करना चाहिए। भक्त के भीतर यह भाव आना चाहिए कि “मैं भगवान का भक्त हूँ, इसलिए गलत नहीं करूँगा।” भक्ति व्यक्ति को निर्भय और निर्लोभी बनाने के साथ-साथ कर्तव्य का पालन करने वाला बनाती है।
महाराज जी स्पष्ट शब्दों में कहते हैं कि भक्ति कर्तव्य छुड़वाती नहीं है, बल्कि कर्तव्य को पुष्ट करती है। ज्ञान और वैराग्य भी भक्ति के ही सहायक हैं और जितनी आवश्यकता होती है, भगवान उतना देते हैं।
गृहस्थ जीवन को लेकर भी महाराज जी कहते हैं कि बहुत से महान भक्त गृहस्थ जीवन में हुए हैं। इसलिए गृहस्थ होना भक्ति में बाधा नहीं है। अपने पद और जिम्मेदारी का निष्ठापूर्वक पालन करना भी भगवान की पूजा बन सकता है। नामजप करते हुए परिवार का पालन करना और अपने कर्तव्य को ईमानदारी से निभाना ही भक्ति की सुंदर स्थिति है।
इसलिए भजन करने से जिम्मेदारियाँ छूटेंगी नहीं। सच्ची भक्ति व्यक्ति को जिम्मेदारियों से भागना नहीं, बल्कि उन्हें भगवान की सेवा समझकर और अधिक निष्ठा से निभाना सिखाती है।
Credit:
“यह लेख संत श्री प्रेमानंद जी महाराज के एकान्तिक वार्तालाप प्रवचन की अमृत वाणी पर आधारित है।”
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