माला-1393: मेरे अंदर अहंकार नहीं, फिर भी लोग ऐसा क्यों समझते हैं? श्री प्रेमानंद महाराज जी के अमृत वचनों से नाम जप महिमा

प्रश्न 1: महाराज जी,मेरे अंदर अहंकार नहीं, फिर भी लोग ऐसा क्यों समझते हैं?

उत्तर:
महाराज जी इस प्रश्न को बहुत गहराई से समझाते हैं। वे कहते हैं कि जब कोई व्यक्ति स्वयं यह कहने लगे कि “मेरे अंदर अहंकार नहीं है”, तो यहीं से एक सूक्ष्म अहंकार दिखाई देने लगता है। क्योंकि यह अनुभव किसने कराया कि हमारे अंदर अहंकार बिल्कुल नहीं है? हमने स्वयं ही अपने मन से यह निष्कर्ष निकाल लिया कि मैं निराभिमानी हूँ। महाराज जी के अनुसार यही बात अहंकार का लक्षण बन सकती है।

सच्चे निराभिमानी भक्त की स्थिति कुछ और होती है। वह अपने अंदर दोषों को देखता है और स्वयं को दूसरों से बड़ा या श्रेष्ठ नहीं मानता। महाराज जी हनुमान जी और शबरी जी के उदाहरण से बताते हैं कि महान भक्त भी अपने आपको बहुत छोटा और अधम मानकर भगवान के सामने दीनता रखते हैं। हनुमान जी जैसे महान भक्त, जिन्हें भगवान स्वयं बुद्धिमानों में श्रेष्ठ और बलवानों में महान बताते हैं, वे भी अपने लिए अत्यंत दीन भाव रखते हैं। शबरी जी भी भगवान के सामने अपने आपको बहुत अधम और अयोग्य मानकर ही बोलती हैं।

इसलिए यदि कोई व्यक्ति यह कहे कि “मेरे अंदर तो अहंकार है ही नहीं, फिर लोग मुझे घमंडी क्यों समझते हैं?”, तो उसे बाहर के लोगों को गलत साबित करने से पहले अपने भीतर देखना चाहिए। हो सकता है कि मन ने ही अपने बारे में यह प्रमाण दे दिया हो कि मैं बहुत विनम्र हूँ। लेकिन अपने बारे में स्वयं प्रमाणपत्र देना ही सूक्ष्म अहंकार हो सकता है।

महाराज जी गोस्वामी तुलसीदास जी के भाव को भी सामने रखते हैं कि निराभिमान महापुरुष अपने अवगुणों को देखते हैं। उनका भाव यह नहीं होता कि मेरे अंदर कोई दोष नहीं है, बल्कि वे अपने दोषों को ही देखते हैं।

इसलिए साधक को यह नहीं सोचना चाहिए कि “मैं अहंकारी नहीं हूँ।” बल्कि अपने भीतर लगातार दीनता रखनी चाहिए—मेरे अंदर बहुत दोष हैं, मैं भगवान की कृपा के बिना कुछ भी नहीं हूँ। जब ऐसा भाव आता है तो व्यक्ति दूसरों से अपने सम्मान की अपेक्षा कम करता है और अपने अंदर देखने की क्षमता बढ़ती है।


प्रश्न 2: ईश्वर का ज्ञान बड़ा है या प्रेम प्राप्त करना?

उत्तर:
महाराज जी इस प्रश्न का उत्तर देते हुए बताते हैं कि ईश्वर का ज्ञान और ईश्वर का प्रेम—इन दोनों में से किसी एक को छोटा और दूसरे को बड़ा नहीं कहा जा सकता। दोनों एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं। वास्तव में भगवान के प्रति शुद्ध प्रेम के लिए भगवान का ज्ञान होना बहुत आवश्यक है।

महाराज जी समझाते हैं कि जब तक हमें यह पता ही नहीं कि भगवान कौन हैं, उनका स्वरूप क्या है, उनका स्वभाव कैसा है, उनकी महिमा क्या है और उनका प्रभाव क्या है, तब तक हमारे अंदर उनके प्रति वास्तविक विश्वास कैसे पैदा होगा? और जब विश्वास ही नहीं होगा तो सच्चा प्रेम कैसे उत्पन्न होगा? इसलिए भगवान को जानना प्रेम की दिशा में एक आवश्यक आधार है।

महाराज जी के अनुसार पहले भगवान के स्वरूप और उनकी महिमा का ज्ञान होना चाहिए। जब यह ज्ञान होता है कि हमारे आराध्य भगवान ही सभी जीवों में विराजमान हैं, तब मनुष्य की दृष्टि बदलने लगती है। वह हर जगह अपने प्रभु को देखने का अभ्यास करता है। इसी ज्ञान से धीरे-धीरे भगवान के प्रति विश्वास और फिर प्रेम उत्पन्न होता है।

महाराज जी यह भी स्पष्ट करते हैं कि केवल आँखों से आँसू आ जाना ही प्रेम का प्रमाण नहीं है। प्रेम की स्थिति इससे कहीं गहरी है। जब भगवान के रूप, गुण और माधुर्य की छाप हृदय, मन, बुद्धि और दृष्टि में बस जाए और संसार की दूसरी चीजें पहले जैसी आकर्षक न लगें, तब प्रेम की वास्तविक स्थिति समझ में आती है।

महाराज जी कहते हैं कि ज्ञान और प्रेम को अलग-अलग करके यह कहना कि ज्ञान छोटा है और प्रेम बड़ा, उचित नहीं है। वे दोनों आँखों का उदाहरण देते हैं—हमारी दो आँखें हैं, लेकिन दृष्टि एक ही है। उसी प्रकार ज्ञान और प्रेम दोनों आवश्यक हैं और दोनों एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं।

इसलिए साधक को केवल प्रेम की बातें करने तक सीमित नहीं रहना चाहिए। भगवान के बारे में सुनना चाहिए, उनकी महिमा को समझना चाहिए, सत्संग करना चाहिए और उस ज्ञान को अपने जीवन में उतारना चाहिए। जब ज्ञान हृदय में उतरता है, तब भगवान के प्रति विश्वास मजबूत होता है और उसी से प्रेम की गहराई बढ़ती है।

महाराज जी का मुख्य भाव यही है कि भगवान को जानना और भगवान से प्रेम करना—दोनों साथ-साथ चलते हैं। ज्ञान प्रेम को दिशा देता है और प्रेम ज्ञान को सार्थक बनाता है।


प्रश्न 3: तीन दिन निर्जला रहकर भजन करने से अधिक भजन होता है, तो क्या हमेशा भूखे रहकर ही भजन करें?

उत्तर:
महाराज जी इस प्रश्न में बाहरी तपस्या और वास्तविक भजन के बीच का अंतर बहुत स्पष्ट करते हैं। वे कहते हैं कि तीन दिन निर्जला रहना अपने आप में भगवत्प्राप्ति का कारण नहीं है। केवल पानी न पीने या भोजन न करने से यह सिद्ध नहीं होता कि भगवान में हमारा मन अधिक लग गया। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि हमारा चित्त कहाँ लगा हुआ है।

महाराज जी समझाते हैं कि संसार में ऐसे बहुत से जीव हैं जो केवल पानी पीकर रहते हैं, कुछ मिट्टी या दूसरे पदार्थों से अपना जीवन चलाते हैं, कुछ फल पर रहते हैं और कुछ वायु पर निर्भर रहते हैं। क्या केवल इस कारण उन्हें भगवान की प्राप्ति हो जाती है? नहीं। यदि केवल भोजन या जल का त्याग ही भगवत्प्राप्ति का साधन होता, तो ऐसे सभी जीव भगवान को प्राप्त हो जाते।

इसलिए मुख्य बात व्रत की कठोरता नहीं, बल्कि चित्त की दिशा है। महाराज जी कहते हैं कि सात्त्विक और अल्प आहार, भगवान को अर्पित किया हुआ पवित्र भोजन और रोज नियमित भजन—यह अधिक महत्वपूर्ण है। यदि कोई व्यक्ति चार रोटी खाता है तो दो रोटी खाकर भी अपने शरीर को हल्का रख सकता है और भगवान के चिंतन में मन लगा सकता है।

महाराज जी गोपियों का उदाहरण देते हैं। वे गृहस्थ जीवन के सारे काम करती थीं—गायों की सेवा, घर के काम, भोजन बनाना, परिवार की देखभाल आदि। बाहर से उनकी सारी क्रियाएँ संसार के अनुसार थीं, लेकिन उनकी चित्तवृत्ति भगवान श्रीकृष्ण में लगी हुई थी। यही उनके जीवन की विशेषता थी।

महाराज जी आगे बताते हैं कि एक दिन बहुत कठोर व्रत करके अगले दो दिन संसार के प्रपंच में लगे रहना उचित साधना नहीं है। उससे अच्छा है कि रोज थोड़ा-थोड़ा, लेकिन निरंतर भजन चलता रहे। अल्पाहार करें, पवित्र भोजन करें और भोजन भगवान को अर्पित करके ग्रहण करें। सबसे बड़ी बात यह है कि मन बार-बार भगवान के चरणों का चिंतन करे।

इसलिए निर्जला व्रत करना गलत नहीं बताया गया है, लेकिन उसका अभिमान नहीं होना चाहिए और उसे भजन का मुख्य आधार नहीं समझना चाहिए। भगवान की प्राप्ति बाहरी क्रियाओं से नहीं, बल्कि चित्त के भगवान की ओर लगने से होती है। यही इस पूरे उत्तर का मुख्य भाव है।


प्रश्न 4: अपने जूनियर्स पर क्रोध करना पड़े तो क्या करें?

उत्तर:
महाराज जी इस प्रश्न में क्रोध और अनुशासन के बीच का अंतर समझाते हैं। वे कहते हैं कि यदि किसी व्यक्ति के पास जिम्मेदारी या पद है और उसके अधीन लोग काम करते हैं, तो केवल इस डर से कि कहीं मैं उन्हें डाँट न दूँ, अपनी जिम्मेदारी से पीछे नहीं हटना चाहिए। जहाँ किसी की गलती से काम की व्यवस्था बिगड़ रही हो, वहाँ उसे समझाना, डाँटना या आवश्यकता पड़ने पर कार्रवाई करना भी जिम्मेदारी का हिस्सा हो सकता है।

महाराज जी उदाहरण देते हैं कि माता-पिता बच्चों को कभी-कभी डाँटते हैं, गुरु शिष्य को शासन में रखते हैं और शिक्षक विद्यार्थी को अनुशासन में रखते हैं। यदि माता-पिता यह तय कर लें कि हम बच्चे को कभी नहीं डाँटेंगे, गुरु कहे कि मैं शिष्य को कभी नहीं समझाऊँगा और शिक्षक कहे कि मैं विद्यार्थी को कभी अनुशासन में नहीं रखूँगा, तो व्यवस्था ठीक से नहीं चल पाएगी।

इसी प्रकार यदि किसी अधिकारी के अधीन कर्मचारी काम कर रहे हैं और कोई बार-बार लापरवाही करता है, तो उसे उसके कर्तव्य का पालन कराने के लिए कठोरता दिखानी पड़ सकती है। महाराज जी इसे हर परिस्थिति में व्यक्तिगत क्रोध नहीं मानते। यदि उद्देश्य व्यवस्था को ठीक करना और सामने वाले को उसके कर्तव्य का पालन कराना है, तो आवश्यक शासन किया जा सकता है।

महाराज जी इसके पीछे भय और अनुशासन की आवश्यकता भी बताते हैं। वे कहते हैं कि समाज में यदि किसी प्रकार का अनुशासन और कानून का भय बिल्कुल समाप्त हो जाए, तो व्यवस्था बिगड़ सकती है। भगवान का भय, धर्म का भय, गुरु का भय, शास्त्र का भय और कानून का भय व्यक्ति को गलत काम करने से रोकने में भूमिका निभाते हैं।

लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि व्यक्ति हर समय गुस्से में रहे या अपने पद का अहंकार करे। बात यह है कि जहाँ जिम्मेदारी के कारण कठोर होना आवश्यक है, वहाँ उचित शासन करें; केवल अपने अहंकार या व्यक्तिगत नाराजगी के कारण किसी को न सताएँ।

महाराज जी गुरु और शिष्य के संबंध का उदाहरण देते हुए यह भी बताते हैं कि गुरु हमेशा सामने हो यह जरूरी नहीं है। यदि शिष्य ने गलत काम किया है तो भीतर से ही उसे अपराध का अनुभव होने लगता है और गुरु के सामने जाने में संकोच होता है। इससे पता चलता है कि वास्तविक अनुशासन केवल बाहरी डाँट से नहीं, बल्कि भीतर की जागरूकता से भी आता है।

इसलिए यदि पद के कारण जूनियर्स को डाँटना पड़े तो उद्देश्य स्पष्ट रखें—व्यवस्था सुधारना है, व्यक्ति को अपमानित करना नहीं। अपने कर्तव्य का पालन धर्मपूर्वक करें और व्यक्तिगत क्रोध को उससे अलग रखें।


प्रश्न 5: कोई झूठा इल्जाम लगाए तो सफाई दें या नहीं? भीतर के द्वंद्व को कैसे शांत करें?

उत्तर:
महाराज जी इस परिस्थिति को प्रारब्ध और कर्म के दृष्टिकोण से समझाते हैं। यदि किसी व्यक्ति की कोई गलती नहीं है और फिर भी कोई उसे नीचा दिखा रहा है या उस पर झूठा आरोप लगाकर दंड दिला रहा है, तो ऐसी स्थिति में मन के भीतर बहुत बड़ा द्वंद्व पैदा हो सकता है। व्यक्ति सोचता है—मैंने तो कुछ गलत किया ही नहीं, फिर मेरे साथ ऐसा क्यों हो रहा है?

महाराज जी कहते हैं कि यदि वास्तव में कोई ऐसा पूर्व कर्म है जिसका दंड अभी तक नहीं मिला था, तो वह किसी परिस्थिति के माध्यम से सामने आ सकता है। ऐसी स्थिति में भीतर यह भाव रखना चाहिए कि हो सकता है यह मेरा ही कोई प्रारब्ध हो। इससे मन में उठने वाला द्वंद्व धीरे-धीरे शांत हो सकता है।

लेकिन महाराज जी यह भी कहते हैं कि यदि व्यक्ति के पास अपनी बात स्पष्ट करने के लिए उचित आधार है, तो वह अपनी पूरी सफाई प्रस्तुत कर सकता है। अपनी बात सत्य रूप से कहना गलत नहीं है। फिर भी यदि सफाई देने के बाद सामने वाला व्यक्ति आपको नीचा दिखाने का प्रयास करता रहे और तत्काल सत्य सामने न आए, तो हर समय उसी बात को लेकर भीतर जलते रहना आवश्यक नहीं है। ऐसी स्थिति में मौन रहकर अपने कर्तव्य पर टिके रहने का भाव रखा जा सकता है।

महाराज जी एक घटना के माध्यम से बताते हैं कि कभी-कभी कोई व्यक्ति वास्तव में निर्दोष दिखाई देता है, फिर भी परिस्थितियाँ ऐसी बन जाती हैं कि समाज उसे दोषी मान लेता है। बाद में जब वास्तविकता सामने आती है तो पता चलता है कि उसके ऊपर लगाया गया आरोप गलत था। लेकिन उस व्यक्ति ने पूर्व में कोई ऐसा गुप्त पाप किया था जिसका दंड उसे किसी और रूप में मिला। महाराज जी इस उदाहरण के माध्यम से कर्मों के परिणाम और प्रारब्ध की बात समझाते हैं।

इसलिए यदि हमारे साथ भी कोई ऐसी परिस्थिति आ जाए जिसमें हम स्वयं को निर्दोष जानते हैं, तो पहले उचित रूप से अपनी बात रखें। उसके बाद यदि परिस्थिति हमारे नियंत्रण से बाहर है, तो भगवान पर भरोसा रखें। महाराज जी धैर्य और भगवान से साहस माँगने की बात कहते हैं—हे भगवान! यदि मेरा कोई कर्म है तो मुझे इतना साहस दीजिए कि मैं बिना विकार के इसे सह सकूँ और आगे बढ़ सकूँ।

महाराज जी के अनुसार सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि ऐसी परिस्थिति में नाम-जप न छूटे। हर घंटे किए गए अपने कार्य को भगवान को समर्पित करने का अभ्यास करें और धर्मपूर्वक अपना कर्तव्य निभाते रहें। भय या प्रलोभन में आकर गलत कार्य न करें।

इसलिए झूठे आरोप की स्थिति में सत्य को स्पष्ट करना एक बात है और उसी आरोप को लेकर भीतर लगातार जलते रहना दूसरी बात। अपनी ओर से सत्य और धर्म के साथ खड़े रहें, परिणाम भगवान पर छोड़ें और नाम-जप के द्वारा मन को भगवान की ओर लगाए रखें। यही धीरे-धीरे भीतर के द्वंद्व को शांत करने का मार्ग बनता है।

Credit:
“यह लेख संत श्री प्रेमानंद जी महाराज के एकान्तिक वार्तालाप प्रवचन की अमृत वाणी पर आधारित है।”

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