प्रश्न 1: महाराज जी,झूठ बोलने की आदत हो गई है, अब पत्नी भी विश्वास नहीं करती। यह आदत कैसे छोड़ूँ?
उत्तर:
महाराज जी समझाते हैं कि झूठ बोलने की आदत को एक दिन में पूरी तरह छोड़ देना आसान नहीं होता। यदि व्यक्ति लंबे समय से किसी परिस्थिति से बचने के लिए झूठ बोलता रहा है, तो उसका मन हर बार परेशानी से निकलने के लिए झूठ का सहारा लेने लगता है। उसे लगता है कि अभी झूठ बोलकर बच जाऊँगा, लेकिन वास्तव में वह समस्या से निकलता नहीं है, बल्कि आगे के लिए और बड़ी परेशानी खड़ी कर देता है।
झूठ की सबसे बड़ी हानि यही है कि धीरे-धीरे लोगों का विश्वास समाप्त हो जाता है। यदि पति-पत्नी के बीच विश्वास ही नहीं रहा, तो संबंध में बहुत बड़ा नुकसान हो जाता है। व्यक्ति बाद में सच भी बोले तो सामने वाला उसे सच मानने में कठिनाई महसूस करता है। महाराज जी ने इसी बात को समझाने के लिए उस लड़के का उदाहरण दिया जो मजाक में बार-बार गाँव वालों से कहता था कि भेड़िया आ गया। जब सचमुच भेड़िया आया और उसने सहायता के लिए पुकारा, तो किसी ने उसकी बात पर विश्वास नहीं किया। इससे समझना चाहिए कि झूठ बोलने की आदत अंततः सत्य की कीमत भी कम कर देती है।
इसलिए महाराज जी कहते हैं कि झूठ को धीरे-धीरे कम करना होगा। ऐसा नहीं कि आज से अचानक अपने आपको बिल्कुल सत्यवादी घोषित कर दिया और फिर मन तथा परिस्थिति के दबाव में वही पुरानी आदत वापस आ गई। अभ्यास से ही आदत बदलेगी। जहाँ झूठ बोलकर बचने का मन करे, वहाँ थोड़ा साहस करके सत्य बोलने का प्रयास करना चाहिए।
व्यापार के विषय में भी महाराज जी कहते हैं कि मुनाफे के लिए झूठ बोलना आवश्यक नहीं है। वस्तु जितने की है, जितना उचित लाभ है, उतना लेकर साफ-साफ बता देना चाहिए। शुरुआत में शायद ऐसा लगे कि इससे बहुत अधिक धन नहीं बनेगा, लेकिन धीरे-धीरे लोगों को विश्वास हो जाएगा कि यह व्यक्ति बेईमान नहीं है और एक उचित मूल्य पर सामान देता है। तब विश्वास के कारण लोग उसके पास स्वयं आएँगे।
महाराज जी का संदेश बहुत सीधा है—झूठ और बेईमानी से बचिए, सत्य के साथ चलिए और किसी को धोखा मत दीजिए। पत्नी से भी साफ कहिए कि अब झूठ नहीं बोलूँगा और विश्वास वापस बनाने का प्रयास करूँगा। क्योंकि जीवन में संबंध तभी सुंदर रहते हैं जब हमारी जुबान पर दूसरे व्यक्ति को विश्वास हो।
प्रश्न 2: पशु चिकित्सा से पशु ठीक हो जाता है तो प्रसन्नता होती है, लेकिन नहीं बचा पाता तो लोग गाली देते हैं। ऐसी स्थिति में क्या करें?
उत्तर:
महाराज जी डॉक्टर के प्रयास और अंतिम परिणाम के बीच का अंतर बहुत सुंदर तरीके से समझाते हैं। डॉक्टर का काम है कि वह अपनी पूरी योग्यता और क्षमता के अनुसार रोगी के उपचार का प्रयास करे। यदि कोई पशु बीमार है तो डॉक्टर को भगवान से प्रार्थना करनी चाहिए कि उस समय उस रोग के लिए उचित औषधि का ज्ञान हो और वह अपना सर्वोत्तम प्रयास कर सके। इसके बाद यदि पशु ठीक हो जाता है तो डॉक्टर को मिलने वाली प्रशंसा को अपने ऊपर नहीं लेना चाहिए, बल्कि भगवान को धन्यवाद देना चाहिए।
लेकिन हर बार परिणाम हमारे हाथ में नहीं होता। महाराज जी समझाते हैं कि औषधि में रोग का निवारण करने की क्षमता हो सकती है, लेकिन किसी जीव की आयु बढ़ा देना डॉक्टर के हाथ में नहीं है। यदि किसी जीव की आयु पूरी हो चुकी है, तो बहुत अच्छा उपचार करने के बाद भी वह शरीर छोड़ सकता है। इसलिए डॉक्टर को अपने प्रयास को परिणाम से अलग समझना चाहिए।
यदि डॉक्टर ने अपनी ओर से पूरी ईमानदारी से उपचार किया, उचित औषधि दी और पूरा प्रयास किया, फिर भी पशु नहीं बच पाया, तो उसे अपने आपको दोषी मानकर टूटने की आवश्यकता नहीं है। महाराज जी कहते हैं कि परिणाम भगवान के अधीन है। डॉक्टर का अधिकार अपने प्रयास तक है, जीव की अंतिम आयु उसके हाथ में नहीं है।
इसी प्रकार यदि पशु ठीक हो जाए और लोग डॉक्टर की बहुत प्रशंसा करें, तब भी अहंकार नहीं आना चाहिए। भीतर यह भाव रहना चाहिए कि अच्छा डॉक्टर तो भगवान हैं और भगवान की प्रेरणा से ही सही औषधि और सही प्रयास हो पाया। यदि प्रशंसा को अपना मान लिया और मन में यह बैठ गया कि मैं बहुत बड़ा डॉक्टर हूँ, तो अहंकार बढ़ सकता है। फिर जब किसी गंभीर मामले में सफलता नहीं मिलेगी और लोग गाली देंगे, तो मन बहुत दुखी होगा।
महाराज जी कहते हैं कि प्रशंसा में अत्यधिक हर्ष और निंदा में अत्यधिक शोक—दोनों से बचना चाहिए। प्रसन्न रहना अलग बात है। यदि भीतर भगवान का आश्रय है, तो सफलता मिले या असफलता, मन में समता बनी रह सकती है। सामने वाला अज्ञान के कारण कुछ भी कहे, डॉक्टर को यह समझना चाहिए कि मैंने अपनी ओर से पूरा प्रयास किया था।
इसलिए उपचार करते समय भगवान से प्रार्थना करें, पूरी क्षमता से प्रयास करें, सफलता मिले तो उसे भगवान की कृपा मानें और असफलता आने पर धैर्य रखें। यही भाव व्यक्ति को प्रशंसा और निंदा दोनों से बचाकर समता की ओर ले जाता है।
प्रश्न 3: बार-बार असफल होने के कारण अब असफलता से डर लगता है। प्रयास करने से भी डर लगता है, क्या करूँ?
उत्तर:
महाराज जी बहुत स्पष्ट रूप से कहते हैं कि बार-बार असफलता मिलने पर भी प्रयास छोड़ना नहीं चाहिए। यदि किसी व्यक्ति के जीवन में ऐसी परिस्थितियाँ आ रही हैं जहाँ उसे लगातार असफलता मिल रही है, तो उसे यह नहीं मान लेना चाहिए कि अब उसके लिए कुछ संभव ही नहीं है। प्रयास करते रहना आवश्यक है।
महाराज जी प्रारब्ध की बात समझाते हुए बताते हैं कि हमारे जीवन में पूर्व के कर्मों का भी प्रभाव आता है। यदि प्रारब्ध में किसी प्रकार का दुख या असफलता भोगना लिखा है, तो कई बार व्यक्ति को सफलता नहीं मिलती। लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि हमें प्रयास करना छोड़ देना चाहिए। बल्कि हर बार प्रयास करके उस परिस्थिति का सामना करना चाहिए। महाराज जी कहते हैं कि भजन के बल से प्रारब्ध को कमजोर करने का प्रयास करना चाहिए। नाम-जप, मंत्र-अनुष्ठान और भगवान के स्तोत्रों में सामर्थ्य बताई गई है।
इसलिए यदि एक बार असफल हुए हैं तो दूसरी बार प्रयास करें। दूसरी बार भी सफलता नहीं मिली तो फिर प्रयास करें। लेकिन साथ में यह भी देखना चाहिए कि क्या उसी मार्ग पर लगातार चलते रहना उचित है या कोई दूसरा रास्ता अपनाया जा सकता है। महाराज जी स्वयं उदाहरण देते हैं कि यदि किसी पद को प्राप्त करने के लिए बार-बार असफलता मिल रही है तो यह आवश्यक नहीं कि केवल वही पद प्राप्त करके ही जीवन में धन या परिवार का पालन संभव होगा। व्यक्ति व्यापार कर सकता है, कोई छोटा काम कर सकता है या पढ़ाई के आधार पर दूसरी नौकरी चुन सकता है। अर्थात लक्ष्य के लिए प्रयास करते रहें, लेकिन आवश्यकता पड़ने पर मार्ग बदलने में संकोच न करें।
माता-पिता के दुख और उनकी अपेक्षाओं को लेकर भी महाराज जी कहते हैं कि इस चिंता में इतना नहीं डूबना चाहिए कि व्यक्ति स्वयं ही टूट जाए। माता-पिता दुखी हैं, लेकिन हर परिणाम हमारे हाथ में नहीं है। हमें अपने प्रयास पर ध्यान देना है। दूसरों की अपेक्षाओं के कारण निराश होकर गलत कदम उठाना बुद्धिमानी नहीं है।
इसलिए असफलता से डरकर प्रयास बंद मत कीजिए। नाम-जप कीजिए, भगवान से जुड़े रहिए, विवेकपूर्वक निर्णय लीजिए और धैर्य रखिए। आज सफलता न मिले तो कल मिल सकती है। और यदि किसी एक मार्ग में बार-बार असफलता मिल रही है तो दूसरा मार्ग अपनाइए। जीवन का रास्ता केवल एक ही विकल्प पर निर्भर नहीं है।
महाराज जी का भाव यही है कि निराश होकर बैठना नहीं है। भजन का बल लेकर प्रयास करते रहना है और भगवान से प्रार्थना करते रहना है।
प्रश्न 4: नामजप का कोई ऐसा तरीका है जिससे कम समय में भी अधिक लाभ हो?
उत्तर:
महाराज जी इस प्रश्न के उत्तर में केवल घंटे या माला की संख्या को महत्व नहीं देते, बल्कि निरंतरता पर जोर देते हैं। यदि किसी विद्यार्थी के पास पढ़ाई के कारण केवल लगभग एक घंटे का समय है, तो उसे यह चिंता नहीं करनी चाहिए कि इतने कम समय में नामजप का लाभ कैसे मिलेगा। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि जब भी अवसर मिले, भगवान के नाम का अभ्यास लगातार बना रहे।
महाराज जी उदाहरण देते हैं कि जब आप अपना आवश्यक कार्य कर रहे हैं और उस समय पूरा ध्यान काम में लगाना जरूरी है, तब नामजप के लिए अलग से बैठना संभव नहीं हो सकता। लेकिन जैसे ही काम से थोड़ा खाली समय मिला, तुरंत नाम का अभ्यास शुरू कर दें। पढ़ाई से उठे—राधा नाम लिया, फिर पढ़ाई में लग गए। दोबारा एक क्षण का खाली समय मिला—फिर नाम लिया। इस प्रकार धीरे-धीरे मन को नाम के अभ्यास की आदत डालनी है।
खाली समय में नामजप करना तो स्पष्ट रूप से किया जा सकता है। खाते समय, चलते-फिरते या दैनिक कार्यों के बीच भी नाम चलता रहे, तो उसे लेकर अत्यधिक चिंता नहीं करनी चाहिए कि उस समय पूरा ध्यान नाम में नहीं है। महाराज जी कहते हैं कि अभी इतना पकड़कर रखिए कि नाम चलता रहे। पूर्ण ध्यान की स्थिति अलग साधना और शांत अवस्था में आती है।
धीरे-धीरे अभ्यास इतना गहरा हो सकता है कि नाम अपने आप भीतर चलने लगे। महाराज जी इसे बहुत सुंदर तरीके से समझाते हैं। जैसे हम बातचीत कर रहे होते हैं, लेकिन भीतर मन में कई विचार अपने आप चलते रहते हैं। उसी जगह यदि लंबे अभ्यास के बाद भगवान का नाम स्थापित हो जाए, तो बाहर व्यक्ति अपना काम करता रहेगा और भीतर नाम चलता रहेगा। फिर उसे नाम चलाने के लिए बार-बार अलग से प्रयास नहीं करना पड़ेगा।
महाराज जी इसके लिए लंबे समय तक निरंतर और आदरपूर्वक अभ्यास की बात कहते हैं। साधना को कुछ दिन करके छोड़ देना नहीं है। लगातार अभ्यास से मन की पुरानी वृत्ति धीरे-धीरे बदलती है। जब भजन मन में गहराई से उतर जाता है, तब व्यक्ति बाहर की बातचीत और काम करते हुए भी भीतर से भगवान के नाम में जुड़ा रह सकता है।
इसलिए कम समय होने पर भी निराश होने की आवश्यकता नहीं है। एक घंटे को छोटा समझकर छोड़ना नहीं है; उस समय को पूरी श्रद्धा से लगाइए और दिन के छोटे-छोटे खाली क्षणों में भी नाम को जोड़ते जाइए। धीरे-धीरे निरंतरता ही साधना को गहराई देगी।
प्रश्न 5: भगवान की शरण में पूरी तरह कैसे रहें और हर परिस्थिति में निश्चिंत कैसे हों?
उत्तर:
महाराज जी शरणागति को केवल बोलने या मान लेने की बात नहीं बताते, बल्कि इसे जीवन की पूरी जिम्मेदारी भगवान को सौंप देने का भाव बताते हैं। जब व्यक्ति वास्तव में भगवान को अपना स्वामी मान लेता है, तब उसे यह चिंता कम करनी चाहिए कि मेरा जीवन कैसा होगा, मेरे साथ क्या होगा या परिस्थिति मेरे अनुसार होगी या नहीं। भाव यह होना चाहिए कि मैं भगवान का हूँ और अब मेरी जिम्मेदारी भगवान की है।
महाराज जी बहुत सुंदर उदाहरण देते हैं कि जब कोई मकान किसी दूसरे व्यक्ति के नाम कर दिया जाता है, तो उसके अंदर की छोटी-से-छोटी वस्तु भी उसी के अधिकार में मानी जाती है। उसी तरह जब साधक अपने शरीर, मन, बुद्धि और अहंकार को भगवान के चरणों में समर्पित कर देता है, तो फिर अपने जीवन की हर परिस्थिति को लेकर अत्यधिक चिंता करना शरणागति के भाव को कमजोर करता है।
महाराज जी कहते हैं कि शरणागत व्यक्ति को यह भाव रखना चाहिए कि सुख आए या दुख, पाप-पुण्य, काम-क्रोध या कोई अन्य परिस्थिति—यदि वह भगवान की ओर से आई है तो उसका सामना भगवान के दास के रूप में करना है। यदि हम स्वयं को भगवान का दास मानते हैं, तो फिर यह प्रश्न नहीं रहना चाहिए कि परिस्थिति मेरी पसंद की है या नहीं। जो परिस्थिति आई है, उसका आदर करते हुए उसमें अपना कर्तव्य निभाना है।
सबसे महत्वपूर्ण बात महाराज जी हिम्मत और विश्वास की बताते हैं। वे कहते हैं कि यदि नाव डूब रही हो तो पतवार फेंक देनी नहीं है। भले ही परिस्थिति कठिन हो, फिर भी नाम नहीं छोड़ना है, भगवान का आश्रय नहीं छोड़ना है। बिना हिम्मत के यदि पतवार छोड़ दी तो फिर रास्ता और कठिन हो जाएगा। इसलिए शरणागति का अर्थ परिस्थितियों से भागना नहीं, बल्कि भगवान पर भरोसा करके उनका सामना करना है।
महाराज जी का भाव है कि आज से ही यह मान लो—हे नाथ! जैसे भी हैं, पवित्र हैं या अपवित्र, चंचल हैं या अचंचल, अब आपके हैं। अब अपने लिए चिंता करना हमारा काम नहीं है। हमारा काम भगवान का चिंतन करना है और योग-क्षेम की चिंता भगवान पर छोड़ देनी है।
ऐसी शरणागति में व्यक्ति हर समय अपनी कमियाँ गिनकर जलता नहीं रहता। वह भगवान की ओर देखता है और सोचता है कि जो कुछ मिला है, उनकी कृपा से मिला है। सुखद और दुखद प्रारब्ध को समान भाव से स्वीकार करते हुए यदि हर क्षण यह अनुभव बना रहे कि भगवान की हम पर बड़ी कृपा है, तो जीवन का दृष्टिकोण ही बदलने लगता है।
इसलिए पूर्ण शरणागति का भाव यही है—अपना सब कुछ भगवान को सौंप देना, अपना चिंतन करते रहना और अपनी चिंता भगवान पर छोड़ देना। फिर परिस्थिति कैसी भी हो, मन में भगवान का आश्रय बना रहता है।
Credit:
“यह लेख संत श्री प्रेमानंद जी महाराज के एकान्तिक वार्तालाप प्रवचन की अमृत वाणी पर आधारित है।”
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