माला-1391: महाराज जी, आपको इतनी हिम्मत कहाँ से मिलती है? मैं बात-बात पर हार मान जाता हूँ!,श्री प्रेमानंद महाराज जी के अमृत वचनों से नाम जप महिमा

प्रश्न 1: महाराज जी, आपको इतनी हिम्मत कहाँ से मिलती है? मैं बात-बात पर हार मान जाता हूँ!

उत्तर:
महाराज जी बताते हैं कि कठिन परिस्थितियों को सहते-सहते मनुष्य के भीतर सहन करने की शक्ति पैदा होती है। जैसे किसी पहलवान को शुरुआत में एक चोट भी बहुत अधिक लगती है, लेकिन कुश्ती का अभ्यास करते-करते जब उसे हजारों चोटें सहने की आदत हो जाती है, तब वही चोट उसे उतनी परेशान नहीं करती। उसी प्रकार जीवन में लगातार आने वाली कठिन परिस्थितियों ने महाराज जी के भीतर दुख और विपत्ति को सहने का अभ्यास बना दिया।

महाराज जी कहते हैं कि हमारा अभ्यास ही ऐसा बन गया कि दुख को भी सुख की तरह स्वीकार कर लें। विपत्ति आए तो उससे घबराने के बजाय उसे अपना साथी मानकर सहते रहें। संसार में कोई भी व्यक्ति वास्तव में हमारा स्थायी साथी नहीं है। पास बैठे हुए लोग भी हमारी अंदर की पीड़ा को पूरी तरह नहीं समझ सकते। जब वास्तविक पीड़ा आती है, तब उसे भगवान ही जानते हैं, क्योंकि भगवान हमारे हृदय में विराजमान हैं।

महाराज जी समझाते हैं कि जब चित्त भगवान के आनंद में डूब जाता है, तब संसार की पीड़ा का प्रभाव कम होने लगता है। वे इसे ऐसे समझाते हैं जैसे किसी व्यक्ति को बेहोशी का इंजेक्शन लगा दिया जाए और उसके बाद शरीर पर चीरा लगाने पर भी दर्द का अनुभव न हो। उसी प्रकार जब मन भगवान के आनंद में स्थित होने लगता है, तब जीवन की कठिनाइयों को पार करना आसान हो जाता है।

इसीलिए महाराज जी अध्यात्म को जीवन का वास्तविक आधार बताते हैं। जिस जीवन में ज्ञान और भक्ति का प्रकाश नहीं है, वह जीवन केवल संसार के भोगों में उलझा रह जाता है। मनुष्य शरीर पाकर भगवान के भजन में रुचि होना बहुत बड़ा सौभाग्य है। इसके विपरीत भोग, नशे और बुरी आदतों में समय नष्ट करने पर बाद में पछताना पड़ सकता है।

महाराज जी यह भी बताते हैं कि संसार में स्वार्थरहित प्रेम यदि कोई करता है तो वह भगवान और भगवान के भक्त हैं। इसलिए जब जीवन में कोई कठिनाई आए तो केवल संसार से सहारे की अपेक्षा न रखें। भगवान का आश्रय लें, उनका नाम जपें और धीरे-धीरे अपने भीतर दुख सहने की शक्ति विकसित करें। बार-बार गिरने पर भी हार नहीं माननी है। भजन करते हुए आगे बढ़ते रहना है।


प्रश्न 2: भगवान को पाने से ज़्यादा उनकी व्याकुलता अच्छी लगती है, क्या यह स्थिति सही है?

उत्तर:
महाराज जी बताते हैं कि भगवान के लिए व्याकुल होना, उनके विरह में तड़पना और उनके दर्शन की इच्छा में रोना एक विशेष प्रकार की पवित्र अवस्था है। जिस हृदय में भगवान के प्रति सच्ची रुचि और पवित्रता आने लगती है, उसे संसार की चीजों की अपेक्षा भगवान का चिंतन अधिक प्रिय लगने लगता है। ऐसे व्यक्ति को भगवान को पाने की अंतिम स्थिति से भी अधिक भगवान के लिए किया जाने वाला साधन प्रिय लग सकता है।

महाराज जी इसे इस भाव से समझाते हैं कि केवल भगवान की प्राप्ति की इच्छा ही नहीं, बल्कि भगवान का नाम इतना प्रिय हो जाए कि उसके बिना एक क्षण भी रहना कठिन लगे। हर समय भगवान का चिंतन चलता रहे और मन उनके स्मरण में ही लगा रहे। यदि एक क्षण के लिए भी भगवान का स्मरण छूट जाए तो भीतर व्याकुलता पैदा हो जाए।

जब साधक के भीतर यह स्थिति आती है, तब धीरे-धीरे संसार की वस्तुओं का आकर्षण कम होने लगता है। रुपया, पैसा, पद, प्रतिष्ठा, परिवार और भोग पहले जैसे प्रिय नहीं लगते। महाराज जी के अनुसार जब तक संसार की कोई न कोई चीज हमें बहुत अच्छी लगती है, तब तक साधक को अपने भीतर संघर्ष करते रहना पड़ता है। लेकिन जब भगवान के अलावा कुछ भी अच्छा नहीं लगता, तब चित्त स्वाभाविक रूप से भगवान की ओर जाने लगता है।

यह स्थिति अचानक नहीं आती। इसके लिए निरंतर भगवान का चिंतन और भजन आवश्यक है। मनुष्य अपने दैनिक कार्य करता रहे, लोगों से मिले-जुले, लेकिन भीतर से अनासक्त रहे और किसी से अनावश्यक अपेक्षा न रखे। जब निरंतर भगवान में स्थिति बनने लगती है तो व्याकुलता अपने आप उत्पन्न होने लगती है।

महाराज जी बताते हैं कि जिस व्यक्ति का हम रात-दिन चिंतन करते हैं और उसका दर्शन नहीं होता, उसके लिए मन में बेचैनी स्वाभाविक है। इसी प्रकार यदि भक्त का मन लगातार भगवान में लगा रहे और भगवान के दर्शन की लालसा बढ़ती जाए, तो विरह की व्याकुलता उत्पन्न होती है।

इसलिए भगवान को पाने से अधिक भगवान के लिए व्याकुलता अच्छी लगना गलत स्थिति नहीं है, यदि वह व्याकुलता वास्तव में भगवान के प्रति प्रेम और निरंतर चिंतन से उत्पन्न हुई हो। यह साधना की गहरी अवस्था की ओर संकेत कर सकती है। इसके लिए नाम-जप, भगवान का चिंतन और निरंतर भजन करते रहना चाहिए।


प्रश्न 3: हम अपनी आत्मिक शक्ति कैसे प्राप्त करें?

उत्तर:
महाराज जी इस प्रश्न को बहुत मूल स्तर से समझाते हैं। वे कहते हैं कि सबसे पहले यह समझना आवश्यक है कि आत्मा और हम दो अलग-अलग नहीं हैं। हम स्वयं आत्मा हैं। जब तक व्यक्ति अपने आपको आत्मा से अलग मानकर आत्मिक शक्ति प्राप्त करने की कोशिश करता रहेगा, तब तक बात स्पष्ट नहीं होगी। आत्मिक शक्ति बाहर से किसी वस्तु की तरह प्राप्त करने की चीज नहीं है। व्यक्ति अपनी वास्तविक शक्ति को भूल गया है और उसे अपने वास्तविक स्वरूप का ज्ञान करना है।

महाराज जी बताते हैं कि हम भूल से अपने शरीर को ही अपना स्वरूप मान लेते हैं। कोई स्वयं को स्त्री मानता है, कोई पुरुष, कोई अपने शरीर और उसकी पहचान को ही अपना वास्तविक परिचय मान लेता है। लेकिन शरीर और आत्मा एक नहीं हैं। इसलिए सबसे पहले इस बात का ज्ञान होना चाहिए कि मैं शरीर नहीं हूँ, बल्कि आत्मा हूँ।

जब व्यक्ति को अपने आत्मस्वरूप का वास्तविक ज्ञान प्राप्त होता है, तब आत्मिक शक्ति प्रकट होने लगती है। महाराज जी बताते हैं कि आत्मा का स्वरूप ही पूर्ण प्रसन्नता है। आत्मा को किसी वस्तु की आवश्यकता नहीं है। आत्मा किसी सांसारिक इच्छा के कारण असंतुष्ट नहीं होती। इसलिए वास्तविक संतुष्टि को बाहरी वस्तुओं में खोजने के बजाय अपने स्वरूप की ओर जाना चाहिए।

महाराज जी फिर मन की स्थिति को अलग करके समझाते हैं। मन लगातार कुछ न कुछ चाहता रहता है। जैसे किसी छोटे बच्चे को खिलौना चाहिए। एक खिलौने से कुछ समय खेल लेने के बाद उसे दूसरा खिलौना चाहिए, फिर तीसरा। उसी प्रकार मन संसार के अलग-अलग भोगों को खिलौने की तरह चाहता रहता है। लेकिन इन भोगों से मन की वास्तविक भूख समाप्त नहीं होती।

मन को जिस आनंद की तलाश है, वह सांसारिक वस्तुओं से स्थायी रूप से नहीं मिल सकता। महाराज जी बताते हैं कि जब मन भगवान के चरणों में लगता है, तभी उसे वास्तविक तृप्ति मिलती है। रुपया, पैसा, पद, प्रतिष्ठा और भोग थोड़ी देर के लिए मन को प्रसन्न कर सकते हैं, लेकिन उसके बाद वही इच्छा फिर उठ जाती है।

इसलिए आत्मिक शक्ति के लिए महाराज जी नाम-जप, भगवान की कथाओं का श्रवण और भगवान से प्रार्थना करने का मार्ग बताते हैं। भगवान से प्रार्थना करनी चाहिए कि वे हमारे चंचल मन को अपने चरणों में लगा लें। मन बहुत हठी है और विषयों की ओर भागता है, इसलिए भगवान से ही उसके ऊपर अपनी कृपा करने की प्रार्थना करनी चाहिए।


प्रश्न 4: सत्संग से सही मार्ग पर चल रहा हूँ, पर काम, क्रोध आदि विकार बहुत शक्तिशाली प्रतीत होते हैं। इन पर विजय कैसे मिले?

उत्तर:
महाराज जी इस बात पर विशेष जोर देते हैं कि काम, क्रोध, लोभ, मोह और अहंकार जैसे विकारों से लड़ने के लिए सबसे पहले यह समझना जरूरी है कि मैं मन नहीं हूँ। मन में काम और क्रोध जैसे भाव उठते हैं, लेकिन जो मन को देख रहा है, वह मन से अलग है। यदि हम मन में उठने वाली हर बात को अपना ही स्वरूप मान लेंगे, तो उससे दूरी बनाना कठिन हो जाएगा।

महाराज जी समझाते हैं कि मन ही अलग-अलग अवस्थाओं में बुद्धि, चित्त और अहंकार के रूप में काम करता है। इसलिए जो विचार मन में आया, उसे तुरंत अपना मानकर उसके अनुसार चलना आवश्यक नहीं है। यदि कोई गलत विचार आ भी गया, तो साधक उसे स्वीकार न करे और नाम-जप करते हुए उससे हट जाए।

गृहस्थ साधक के लिए महाराज जी धर्मयुक्त जीवन जीने की बात कहते हैं। गृहस्थ जीवन में जो धर्म के अनुसार उचित है, उसे स्वीकार किया जा सकता है। लेकिन गलत चिंतन, पराई माता-बहनों के प्रति गलत दृष्टि, अनुचित दृश्य देखना और गलत संग करना छोड़ना होगा। ये चीजें मन को और अधिक उसी दिशा में ले जाती हैं।

महाराज जी बताते हैं कि भगवान के नाम से बड़ी शक्ति है। भगवान का नाम जपते हुए और भगवान से प्रार्थना करते हुए काम, क्रोध आदि दोषों पर धीरे-धीरे विजय प्राप्त की जा सकती है। जिस प्रकार ‘वाहेगुरु’ का स्मरण किया जाता है, उसी प्रकार भगवान के नाम का स्मरण हृदय को आनंद देता है। भगवान और उनके नाम में कोई अलगाव नहीं माना गया है। नाम-स्मरण से भीतर आनंद आने लगता है और जब हृदय में आनंद का अनुभव होने लगता है तो मन का बाहर के भोगों की तरफ जाना कम होने लगता है।

महाराज जी यह भी कहते हैं कि केवल विकारों को दबाते रहना पर्याप्त नहीं है। भीतर का आनंद जागना जरूरी है। जब भगवान के आनंद का अनुभव होने लगता है, तब मन स्वयं विषयों से हटने लगता है।

इसलिए काम और क्रोध बहुत शक्तिशाली लगें तो घबराना नहीं है। नाम-जप को और बढ़ाना है, गुरु-वाणी का पाठ करना है, गलत संग और गलत चिंतन से बचना है तथा भगवान से प्रार्थना करनी है। महाराज जी के अनुसार जब काम, क्रोध, लोभ, मोह और अहंकार से हृदय खाली होने लगता है, तब भगवान के प्रकट होने की स्थिति बनती है।


प्रश्न 5: काम और ज़िम्मेदारियों के कारण एक नियमित समय पर पूजा-पाठ नहीं कर पाती। मुझे क्या करना चाहिए?

उत्तर:
महाराज जी स्पष्ट करते हैं कि गृहस्थ साधक के लिए यह जरूरी नहीं है कि वह रोज किसी एक निश्चित समय पर लंबी पूजा के लिए बैठ ही जाए। यह बात विशेष रूप से विरक्त साधकों के लिए हो सकती है, लेकिन गृहस्थ जीवन की अपनी जिम्मेदारियाँ होती हैं। यदि सुबह पति को कार्यालय जाना है, बच्चों को विद्यालय जाना है और घर की व्यवस्था करनी है, तो उन जिम्मेदारियों को छोड़कर केवल पूजा में बैठ जाना गृहस्थ जीवन की उचित व्यवस्था नहीं है।

महाराज जी गृहस्थ जीवन की साधना का बहुत सुंदर तरीका बताते हैं। वे कहते हैं कि घर के काम करते हुए भगवान का नाम लिया जा सकता है। रसोई बनाते समय नाम-जप करें, झाड़ू लगाते समय नाम लें और जो भी कार्य कर रहे हैं, उसे भगवान का स्मरण करते हुए करें। गृहस्थ जीवन में परिवार की सेवा को भी पूजा का ही रूप मानना चाहिए।

महाराज जी विशेष रूप से यह भाव रखने को कहते हैं कि परिवार के प्रत्येक सदस्य में भगवान का दर्शन करें। पति में भगवान का भाव करें, पुत्र में भगवान का भाव करें और सास-ससुर में भी भगवान का भाव रखें। यदि परिवार के किसी सदस्य को पानी चाहिए और हम उसे छोड़कर केवल मंदिर में भगवान को जल चढ़ाने चले जाएँ, तो यह भाव अधूरा है। क्योंकि जिस परिवार के सदस्य की सेवा का दायित्व हमें मिला है, उसमें भी भगवान का ही दर्शन करना चाहिए।

महाराज जी के अनुसार हमारा घर ही भगवान का मंदिर बन सकता है। इसलिए यह जरूरी नहीं कि हम हर समय मंदिर में जाकर ही भक्ति करें। यदि घर में रहते हुए परिवार की सेवा भगवान के भाव से की जा रही है और साथ-साथ नाम-जप चलता रहता है, तो वही जीवन साधना बन सकता है।

इसलिए यदि काम और जिम्मेदारियों के कारण नियमित समय पर पूजा के लिए बैठना संभव नहीं हो पा रहा है, तो स्वयं को दोष देकर निराश होने की आवश्यकता नहीं है। अपने दैनिक कामों को ही भगवान के स्मरण से जोड़ें। रसोई बनाते समय नाम लें, घर का काम करते समय नाम लें और परिवार की सेवा करते समय भगवान का भाव रखें।

महाराज जी का मुख्य संदेश यही है कि गृहस्थ जीवन में जिम्मेदारियों से भागना नहीं है। जिम्मेदारियों को धर्मपूर्वक निभाते हुए नाम-जप करते रहना है। इस प्रकार घर-परिवार के बीच रहते हुए भी भक्ति लगातार चलती रह सकती है।


प्रश्न 6: घर-परिवार में रहते हुए शादी-ब्याह और पार्टियों में जाना पड़ता है, ऐसी जगहों पर क्या करें?

उत्तर:
महाराज जी बताते हैं कि गृहस्थ व्यक्ति संसार के व्यवहार से पूरी तरह अलग होकर नहीं रह सकता। रिश्तेदारों के विवाह, पारिवारिक कार्यक्रम और सामाजिक अवसर जीवन में आते ही हैं। इसलिए केवल इस कारण से परेशान होने की जरूरत नहीं है कि ऐसी जगह जाना पड़ रहा है। लेकिन वहाँ जाकर हमें अपने धर्म और साधना के नियमों को छोड़ना भी नहीं चाहिए।

महाराज जी स्पष्ट करते हैं कि जो भी सांसारिक कार्य हम कर रहे हैं, वह धर्मयुक्त होना चाहिए और उसे भगवान को समर्पित करने का भाव रखना चाहिए। भगवान को समर्पित किया हुआ धर्मयुक्त कर्म साधना का रूप ले सकता है। लेकिन इसमें पाप कर्म शामिल नहीं होना चाहिए।

उदाहरण के रूप में महाराज जी विवाह का उल्लेख करते हैं। यदि विवाह शास्त्रीय मर्यादा के अनुसार हो रहा है और वहाँ भगवान की पूजा तथा धार्मिक विधि का पालन हो रहा है, तो उसमें सम्मिलित होना अलग बात है। लेकिन यदि उसी कार्यक्रम में मांस, शराब और अनुचित व्यवहार को शामिल कर दिया गया है, तो उसे भगवान की पूजा नहीं कहा जा सकता। इसलिए गृहस्थ को यह विवेक रखना चाहिए कि वह किस चीज में भाग ले रहा है।

यदि किसी ऐसी जगह जाना मजबूरी है जहाँ लोग अनुचित भोजन कर रहे हैं या ऐसा वातावरण है जो हमारी साधना के अनुकूल नहीं है, तो महाराज जी कहते हैं कि वहाँ जाना आवश्यक होने पर जाया जा सकता है, लेकिन अपने धर्म का पालन करते हुए। उन्होंने ऐसी स्थिति में भोजन न करने का उदाहरण दिया है। यदि लोग पूछें कि आप नहीं खा रहे हैं, तो कोई सरल कारण बताकर अपनी बात रख सकते हैं। हर बात पर बहस करने या दूसरों को गलत साबित करने की जरूरत नहीं है।

महाराज जी यह भी समझाते हैं कि यदि लोग हमें साधु, पंडित या बहुत भक्त कहकर मजाक करें, तब भी हमें अपने मार्ग से हटना नहीं चाहिए। हमें दूसरों की चाल देखकर अपना आचरण नहीं बदलना है। यदि हम अपने धर्म और भजन के मार्ग पर सही चल रहे हैं और लोग कुछ भी कह रहे हैं, तो उससे हमारे भीतर गर्व भी नहीं आना चाहिए और न ही अपने मार्ग से हटना चाहिए।

इसलिए गृहस्थ जीवन में सामाजिक कार्यक्रमों से पूरी तरह बचना हमेशा संभव नहीं है। आवश्यकता पड़ने पर जाना है, लेकिन धर्मपूर्वक रहना है, अनुचित भोजन और अनुचित आचरण से बचना है और अपने भजन को नहीं छोड़ना है। जहाँ भी रहें, भीतर भगवान का स्मरण बना रहे।

Credit:
“यह लेख संत श्री प्रेमानंद जी महाराज के एकान्तिक वार्तालाप प्रवचन की अमृत वाणी पर आधारित है।”

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