प्रश्न 1: महाराज जी, क्या शरणागत को भगवान से भौतिक कामनाएँ करनी चाहिए?
उत्तर:
महाराज जी समझाते हैं कि जब कोई व्यक्ति वास्तव में भगवान की शरण में आ जाता है, तो उसके भीतर सबसे पहले भगवान के प्रति भरोसा और समर्पण आना चाहिए। शरणागति का अर्थ केवल यह नहीं है कि हम भगवान के सामने अपनी इच्छाओं की सूची रख दें। सच्ची शरणागति तो तब मजबूत होती है, जब मनुष्य अपनी इच्छा से अधिक भगवान की इच्छा को महत्व देने लगे। भगवान सर्वज्ञ हैं, उन्हें हमारे जीवन की हर परिस्थिति का पता है। उन्हें यह भी पता है कि हमें कब क्या चाहिए और किस परिस्थिति में रखना हमारे लिए मंगलकारी है।
इसलिए अगर जीवन में कोई परेशानी है, कोई दुख है या कोई असुविधा है और भगवान जानते हुए भी हमें उसी परिस्थिति में रख रहे हैं, तो शरणागत व्यक्ति को यह विश्वास रखना चाहिए कि इसमें भी भगवान का कोई मंगल विधान होगा। उसे अपनी इच्छा को भगवान की इच्छा के ऊपर थोपने की कोशिश नहीं करनी चाहिए। वह यह भाव रखे कि प्रभु जैसा रखना चाहते हैं, मैं उसी में प्रसन्न रहूँगा और आपकी शरण में रहकर आपका नाम स्मरण करता रहूँगा।
हाँ, यदि किसी व्यक्ति से अपनी परेशानी सहन नहीं हो रही और वह भगवान से कुछ माँगना चाहता है, तो प्रार्थना कर सकता है। लेकिन उस प्रार्थना में भी भगवान को स्वतंत्रता देनी चाहिए। जैसे कोई संकट है या जीवन में आवश्यक धन की जरूरत है, तो भगवान से अपनी आवश्यकता कह सकते हैं। लेकिन साथ में यह भी प्रार्थना होनी चाहिए कि यदि इस इच्छा की पूर्ति होने से मेरा भजन छूट जाए, भगवान से मेरा संबंध कमजोर हो जाए या मैं आपकी शरण से दूर हो जाऊँ, तो प्रभु ऐसी इच्छा पूरी मत करना।
महाराज जी के अनुसार भगवान से अपनी सांसारिक जरूरतों के लिए माँगना बहुत ऊँची अवस्था नहीं है। उससे श्रेष्ठ भाव यह है कि मनुष्य भगवान पर पूरा विश्वास करे और कहे कि प्रभु, आपको सब पता है। आप सर्वज्ञ हैं, आप मेरे वर्तमान, भविष्य और मेरी आवश्यकताओं को जानते हैं। मुझे वही दीजिए जो मेरे लिए उचित है।
भगवान ने भी भरोसा दिया है कि जो व्यक्ति अनन्य भाव से उनका चिंतन करता है, उसके योग और क्षेम की जिम्मेदारी भगवान स्वयं लेते हैं। अर्थात जो आवश्यक है उसकी प्राप्ति और जो प्राप्त है उसकी रक्षा—यह व्यवस्था भगवान पर छोड़ी जा सकती है। इसलिए शरणागत का सबसे बड़ा काम अपनी इच्छाओं के पीछे भागना नहीं, बल्कि निरंतर भगवान का स्मरण, नाम-जप और उनके चरणों का आश्रय लेना है।
प्रश्न 2: दोस्तों का प्रभाव जल्दी पड़ जाता है, पार्टियों आदि में अच्छा लगता है। इससे कैसे बचें?
उत्तर:
महाराज जी बताते हैं कि जब तक भजन की शक्ति हमारे भीतर दृढ़ नहीं होती, तब तक जिस वातावरण में हम जाते हैं, उसका रंग मन पर जल्दी चढ़ जाता है। इसलिए यदि हम ऐसे लोगों के बीच जाते हैं जहाँ भोग-विलास, पार्टियाँ, खान-पान और सांसारिक मनोरंजन प्रमुख हैं, तो मन भी उसी तरफ आकर्षित होने लगता है। इसका कारण यह नहीं कि व्यक्ति पूरी तरह खराब हो गया है, बल्कि अभी उसकी साधना इतनी मजबूत नहीं हुई है कि वह बाहरी वातावरण के प्रभाव से अपने मन को बचा सके।
महाराज जी कहते हैं कि गृहस्थ जीवन में अपने संबंधों और सामाजिक जिम्मेदारियों को निभाना गलत नहीं है। हम किसी के भाई हैं, किसी के पति हैं, किसी के पिता हैं, किसी के मित्र हैं। हमें इन सभी संबंधों के साथ धर्म के अनुसार अच्छा व्यवहार करना चाहिए। लेकिन भीतर से इन संबंधों में अत्यधिक आसक्ति नहीं होनी चाहिए। बाहर से अपना व्यवहार ठीक रखें, लेकिन भीतर भगवान का आश्रय बना रहे।
इसके लिए लगातार नाम-जप करना बहुत जरूरी है। जब भजन बढ़ता है तो धीरे-धीरे विवेक जागता है। फिर व्यक्ति को यह समझ आने लगती है कि कौन-सी चीज वास्तव में उसके लिए हितकारी है और कौन-सी केवल क्षणिक आकर्षण है। अभी यदि पार्टी में जाने पर अच्छा लग रहा है और नाम-जप करते समय ऐसा लगता है कि मैं दोहरी जिंदगी जी रहा हूँ, तो घबराने की जरूरत नहीं है। महाराज जी कहते हैं कि धीरे-धीरे सत्य को पकड़ने का प्रयास करना चाहिए।
संसार की चमक, भोग और मनोरंजन आकर्षक लग सकते हैं, लेकिन उनसे मन की वास्तविक तृप्ति नहीं होती। महाराज जी इसी बात की ओर ध्यान दिलाते हैं कि बचपन से जवानी और फिर बुढ़ापे तक शरीर बदलता रहा, लेकिन मन की भोग की इच्छा अपने आप समाप्त नहीं हुई। इसका परिवर्तन भजन से ही होगा।
इसलिए अपने ऊपर अचानक बहुत कठोर दबाव डालने के बजाय नियमित रूप से नाम-जप करें, सत्संग सुनें, शास्त्रों का स्वाध्याय करें और अपने आचरण को पवित्र रखने का प्रयास करें। जब भजन गहरा होगा तो वही चीजें, जिनमें आज मन बहुत आकर्षित होता है, धीरे-धीरे अपना प्रभाव खोने लगेंगी।
महाराज जी यह भी समझाते हैं कि निराश नहीं होना चाहिए। परमार्थ का मार्ग पहाड़ पर चलने जैसा है। चलते समय कई बार पैर फिसल सकते हैं, मन संसार की ओर जा सकता है, लेकिन साधक को हिम्मत नहीं हारनी चाहिए। धीरे-धीरे आगे बढ़ते रहना है। नाम-जप करते रहना है और अपने चरित्र पर विशेष ध्यान रखना है।
प्रश्न 3: मैं भाई जी महाराज के परिकर से हूँ, लेकिन अभिमान के कारण क्रोध जल्दी आ जाता है। इससे कैसे बचूँ?
उत्तर:
महाराज जी क्रोध के मूल में छिपे अभिमान और अपनी बात मनवाने की इच्छा की ओर संकेत करते हैं। अक्सर हमें क्रोध इसलिए आता है क्योंकि सामने वाला हमारे अनुसार व्यवहार नहीं करता। हमें लगता है कि हम सही हैं, हमारी बात मानी जानी चाहिए और दूसरा व्यक्ति हमारे अनुकूल चले। लेकिन साधक के लिए यही सबसे बड़ी परीक्षा है।
महाराज जी कहते हैं कि यदि किसी महापुरुष का एक वचन भी जीवन में वास्तव में धारण कर लिया जाए और उसे केवल सुनने के बजाय आचरण में उतार लिया जाए, तो वह व्यक्ति के जीवन को बदल सकता है। भाव यह है कि हर व्यक्ति में अपने प्रभु को देखने का अभ्यास करना चाहिए। जब हम सामने वाले को केवल एक व्यक्ति, अपने अधीन व्यक्ति, अपने बेटे, पत्नी, नौकर या किसी अन्य संबंध के रूप में देखते हैं, तब उससे अपेक्षाएँ पैदा होती हैं। और जब अपेक्षा पूरी नहीं होती, तब क्रोध आता है।
क्रोध का एक बड़ा कारण है—दूसरों से अपने अनुकूल व्यवहार की माँग। हम चाहते हैं कि सामने वाला हमारे अनुसार चले। लेकिन महाराज जी साधक का लक्षण बताते हुए समझाते हैं कि साधक को अनुकूल और प्रतिकूल दोनों परिस्थितियों में संतुलित रहने का अभ्यास करना चाहिए। केवल अनुकूल स्थिति में शांत रहना कोई बड़ी बात नहीं है। असली साधना तब दिखाई देती है, जब परिस्थिति हमारे विरुद्ध हो और फिर भी हमारा मन अपने प्रभु से दूर न हो।
जब क्रोध आने लगे, उसी समय यह भाव करना चाहिए कि मेरे प्रभु शायद इसी व्यक्ति के रूप में मेरी परीक्षा ले रहे हैं। वे मुझे क्रोध से मुक्त करना चाहते हैं। यदि मैं इस समय क्रोध करूँगा तो परीक्षा में असफल हो जाऊँगा। लेकिन यदि मैं शांत रह गया तो मेरा अभिमान भी कम होगा और भगवान से मेरा संबंध भी मजबूत होगा।
महाराज जी नाम-जप को इसका बहुत बड़ा उपाय बताते हैं। निरंतर नाम-जप से हृदय धीरे-धीरे शांत होने लगता है। फिर बात-बात पर प्रतिक्रिया देने की इच्छा कम होती है। सामने वाला कुछ गलत कह दे तो तुरंत जवाब देने, बहस करने या गुस्सा करने की जगह व्यक्ति शांत रह सकता है।
इसलिए जब भी क्रोध आए, भगवान को याद करें और उनसे ही कहें कि प्रभु, मुझे क्रोध से बचाइए। मुझे आपसे दूर मत होने दीजिए। सबमें वही प्रभु हैं, फिर हम किससे नाराज हों? यह भाव धीरे-धीरे अभिमान को कमजोर करता है और साधक को समता की ओर ले जाता है।
प्रश्न 4: यदि शैव, वैष्णव, द्वैत और अद्वैत सभी का उद्देश्य एक ही है, तो अलग-अलग मार्ग क्यों हैं?
उत्तर:
महाराज जी बताते हैं कि अलग-अलग साधना मार्ग इसलिए हैं क्योंकि सभी मनुष्यों की बुद्धि, रुचि और मानसिक प्रवृत्ति एक जैसी नहीं होती। हर व्यक्ति की मति अलग है। किसी का मन साकार भगवान में अधिक लगता है, किसी की रुचि निराकार चिंतन में हो सकती है, किसी की भक्ति देवी के प्रति अधिक हो सकती है और किसी की भगवान के किसी विशेष स्वरूप में। इसलिए भगवान ने अलग-अलग मार्ग और अलग-अलग उपासना के रूप स्वीकार किए हैं।
यदि किसी व्यक्ति की रुचि किसी विशेष रूप में है और उसी रूप में उसका मन पूरी तरह लग सकता है, तो उसके लिए उसी मार्ग पर चलना स्वाभाविक हो जाता है। भगवान ने विविध आचार्यों, विविध इष्टों और विविध साधना पद्धतियों के माध्यम से मनुष्यों के लिए रास्ते बनाए हैं। इसका उद्देश्य लोगों को अलग-अलग करके रखना नहीं, बल्कि उनकी अलग-अलग प्रवृत्तियों के अनुसार उन्हें परमात्मा की ओर ले जाना है।
महाराज जी का भाव है कि परमात्मा एक ही हैं। वही परमात्मा शिव के रूप में, देवी के रूप में, राम के रूप में, कृष्ण के रूप में और अनेक रूपों में प्रकट होते हैं। मनुष्य की रुचि जिस रूप में लग जाए, उसे उसी में ईमानदारी और निष्ठा से आगे बढ़ना चाहिए। केवल मार्ग बदलते रहने से साधना गहरी नहीं होती। जिस मार्ग में मन की वास्तविक रति हो जाए, उसी में सच्चाई से लग जाना चाहिए।
इसी कारण भगवान ने ज्ञानयोग, भक्तियोग, कर्मयोग और अन्य साधना मार्गों की व्यवस्था बताई है। किसी की प्रवृत्ति ज्ञान की ओर है तो वह ज्ञान के माध्यम से आगे बढ़ सकता है। किसी का हृदय भक्ति में अधिक लगता है तो वह भक्ति को अपना आधार बना सकता है। किसी की प्रवृत्ति कर्म की है तो कर्म को भगवान को समर्पित करके आगे बढ़ सकता है।
महाराज जी विशेष रूप से ईमानदारी और अच्छे आचरण पर जोर देते हैं। केवल अपने मार्ग को लेकर गर्व करना साधना नहीं है। जिस मार्ग में श्रद्धा है, उसी में ठीक से चलना, भगवान का स्मरण करना और अपना आचरण अच्छा रखना आवश्यक है।
इस दृष्टि से अलग-अलग मार्गों का होना विरोध का कारण नहीं है। मनुष्यों की अलग-अलग मति के कारण अलग-अलग मार्ग हैं, लेकिन यदि व्यक्ति अपने चुने हुए मार्ग में ईमानदारी से चलता है और भगवान की ओर बढ़ता है, तो उसका मंगल हो सकता है।
प्रश्न 5: डर लगता है कि अगर मेरे प्रियजन की मृत्यु हो गई तो मैं कैसे रहूँगी?
उत्तर:
महाराज जी इस भय को समझाते हुए सबसे पहले मृत्यु की वास्तविकता को स्वीकार करने की बात कहते हैं। यह संसार ही ऐसा है जहाँ प्रत्येक शरीर को एक दिन समाप्त होना है। कोई जन्म के समय चला जाता है, कोई बचपन में, कोई युवावस्था में, कोई वृद्धावस्था में और किसी की मृत्यु किसी दुर्घटना या बीमारी के कारण हो जाती है। मृत्यु कब और किस रूप में आएगी, इसका निश्चित पता किसी को नहीं है। इसलिए मनुष्य को पहले से ही इस सत्य के लिए अपने मन को तैयार करना चाहिए।
जिस व्यक्ति से हमें बहुत प्रेम होता है, उसके शरीर के छूटने की कल्पना भी हमें भीतर से हिला देती है। लेकिन महाराज जी बताते हैं कि हमारा असली दुख केवल मृत्यु से नहीं, बल्कि मोह से पैदा होता है। हम किसी व्यक्ति के शरीर को अपना मानकर उससे बहुत गहरा संबंध बना लेते हैं। फिर जब शरीर हमारे सामने नहीं रहता, तो हमें लगता है कि अब हम उसके बिना रह ही नहीं पाएँगे।
महाराज जी अपने जीवन के अनुभव का भाव बताते हुए कहते हैं कि बचपन में ही यह विचार आया कि जिन माता-पिता को हम इतना प्यार करते हैं, वे भी एक दिन चले जाएँगे। तब ऐसा कौन है जो कभी नहीं जाएगा? इसी विचार ने भगवान की ओर जाने की प्रेरणा दी। भगवान से ऐसी मित्रता करनी चाहिए कि मृत्यु का भय धीरे-धीरे समाप्त हो।
महाराज जी यह भी समझाते हैं कि जब जीवात्मा शरीर छोड़ देती है तो शरीर वहीं पड़ा रहता है और अंततः उसका अंतिम संस्कार कर दिया जाता है। इससे यह समझना चाहिए कि जिस शरीर को हम इतना अपना मान रहे हैं, वह वास्तव में स्थायी नहीं है। हमें अपने प्रियजनों में भगवान को देखने का अभ्यास करना चाहिए। जब हम उनमें भगवान का दर्शन करेंगे तो हमारा प्रेम केवल शरीर तक सीमित नहीं रहेगा।
इसका अर्थ यह नहीं कि प्रियजन के जाने पर दुख बिल्कुल नहीं होगा। बिछड़ने का दर्द स्वाभाविक है। लेकिन हमें इतना मोह नहीं होना चाहिए कि अपने कर्तव्य और भगवान का स्मरण ही भूल जाएँ। इसलिए अभी से नाम-जप और भगवान का आश्रय लेना चाहिए।
महाराज जी कहते हैं कि जिस व्यक्ति का शरीर हमारे सामने है, उससे प्रेम करते हुए उसके भीतर भगवान को देखने का अभ्यास करें। और जब भगवान का आश्रय मजबूत होगा, तब मृत्यु का भय कम होने लगेगा। प्रियजन का शरीर एक दिन अवश्य छूटेगा, लेकिन हमें उस सत्य को स्वीकार करके भगवान के चरणों में अपना मन लगाना है।
प्रश्न 6: क्या भजन करने से पुनर्जन्म नहीं होगा?
उत्तर:
महाराज जी इस विषय को केवल इतना कहकर समाप्त नहीं करते कि भजन करने से पुनर्जन्म नहीं होगा। वे इसके पीछे के मूल कारण की ओर ध्यान दिलाते हैं। उनके अनुसार जब तक अज्ञान बना रहता है, तब तक जन्म और मृत्यु का क्रम चलता रहता है। हमें अपने वास्तविक स्वरूप का ज्ञान नहीं होता और हम शरीर को ही अपना स्वरूप मान लेते हैं।
महाराज जी समझाते हैं कि यह पंचभूतों से बना शरीर है। पंचभूतों का एक साथ आना शरीर का बनना कहलाता है और उनका अलग हो जाना हमें मृत्यु दिखाई देता है। लेकिन जो जीवात्मा भीतर है, उसका वास्तविक जन्म और मृत्यु नहीं होती। समस्या यह है कि हम अपने आपको शरीर मान बैठे हैं। हम कहते हैं कि मैं पुरुष हूँ, मैं यह हूँ, मैं वह हूँ, जबकि साधना का उद्देश्य यह जानना है कि मैं वास्तव में शरीर नहीं हूँ।
जब तक यह वास्तविक ज्ञान अनुभव में नहीं आता, तब तक कर्म और कर्म-संस्कार जीव को आगे जन्मों से बाँधे रखते हैं। मनुष्य शरीर को अपना मानकर कर्म करता है और उन्हीं कर्मों के संस्कार आगे की यात्रा का कारण बनते हैं। इसलिए केवल थोड़ा-बहुत भजन कर लेना ही पर्याप्त नहीं बताया गया है। भजन ऐसा होना चाहिए जिससे भीतर ज्ञान जागे और अपने वास्तविक स्वरूप का अनुभव हो।
महाराज जी भजन को उस व्यक्ति को जगाने के समान बताते हैं जो स्वप्न में दुख भोग रहा है। स्वप्न में जब तक व्यक्ति सो रहा है, तब तक उसका दुख उसे वास्तविक लगता है। लेकिन जागने पर पता चलता है कि वह तो स्वप्न था। उसी प्रकार जब आत्मस्वरूप का ज्ञान जागता है, तब जन्म-मरण की जो धारणा हम शरीर के स्तर पर मानते रहे हैं, उसकी वास्तविकता समझ में आती है।
भजन से ज्ञान प्राप्त होता है और उस ज्ञान से कर्म-संस्कार नष्ट होने लगते हैं। जब व्यक्ति को अनुभव हो जाता है कि मैं शरीर नहीं, बल्कि आत्मस्वरूप हूँ, तब बंधन समाप्त होता है। महाराज जी यह भी बताते हैं कि भगवान की कृपा और ज्ञान—दोनों के माध्यम से यह स्थिति आती है।
इसलिए भजन का उद्देश्य केवल किसी अगले जन्म को रोकना नहीं है। भजन का वास्तविक परिणाम भीतर के अज्ञान का नाश और अपने स्वरूप का अनुभव है। जब अज्ञान समाप्त होता है और भगवान का प्रेम जागता है, तब जन्म-मरण के बंधन से मुक्ति की अवस्था आती है।
प्रश्न 7: प्रारंभिक साधक के मन में तो इच्छाएँ आती रहती हैं, तो भगवान कैसे मिलेंगे?
उत्तर:
महाराज जी बताते हैं कि प्रारंभिक साधक के मन में इच्छाएँ और वासनाएँ उठना कोई ऐसी बात नहीं है जिसके कारण वह साधना छोड़ दे। मन में वासना है तो उसे देखकर निराश होने के बजाय भगवान की ओर और अधिक लगना चाहिए। प्रश्न यह है कि इन इच्छाओं के साथ साधक क्या करता है और भगवान से क्या प्रार्थना करता है।
यदि किसी व्यक्ति के मन में कोई इच्छा है तो केवल यह मान लेना कि पहले हर इच्छा पूरी होगी और उसके बाद ही भगवान की प्राप्ति होगी—ऐसा आवश्यक नहीं है। महाराज जी समझाते हैं कि किसी इच्छा की पूर्ति के लिए उसी स्तर का कर्म और भजन भी आवश्यक होता है। लेकिन यदि साधक भगवान से यह प्रार्थना करे कि प्रभु मेरी इच्छाओं को पूरा करने के बजाय उनका ही नाश कर दें और मुझे अपने चरणों का प्रेम दे दें, तो भगवान बिना उन इच्छाओं की सांसारिक पूर्ति किए भी भीतर की वासनाओं को समाप्त कर सकते हैं।
इसलिए साधक को सबसे पहले नाम-जप को अपना आधार बनाना चाहिए। सत्संग सुनना चाहिए, शास्त्रों का स्वाध्याय करना चाहिए, बड़े-बुजुर्गों की सेवा करनी चाहिए और पवित्र आहार लेना चाहिए। इन सबका उद्देश्य अपने भीतर की भूमिका को साधना के योग्य बनाना है।
महाराज जी यह भी समझाते हैं कि यदि किसी वस्तु की प्राप्ति भगवान की ओर से होती है तो वह व्यक्ति को अंततः अनासक्ति की ओर ले जा सकती है। लेकिन जब मनुष्य अपनी सांसारिक इच्छाओं के पीछे स्वयं कर्म करके भोग प्राप्त करता है, तो उससे आसक्ति बढ़ सकती है। इसलिए भगवान से यह प्रार्थना करना अधिक उचित है कि जो भी दें, अपनी कृपा से दें और उससे हमारा मन संसार में न फँसे।
वासना को केवल विवेक से दबाने का प्रयास करने पर वह कुछ समय के लिए शांत हो सकती है, लेकिन स्थायी रूप से समाप्त होना कठिन है। बार-बार वही परिस्थिति आने पर वह फिर जाग सकती है। महाराज जी के अनुसार वास्तविक वासना-नाश तब होता है जब भीतर भगवत आनंद का अनुभव होने लगता है। तब संसार के भोग अपने आप फीके लगने लगते हैं और भगवान के आनंद में मन की वास्तविक रुचि पैदा होती है।
इसलिए प्रारंभिक साधक को अपनी इच्छाओं से डरकर भजन नहीं छोड़ना चाहिए। खूब नाम-जप करना चाहिए और भगवान से प्रार्थना करनी चाहिए कि वे भीतर की वासनाओं का स्थायी नाश करें तथा अपने चरणों में प्रेम दें। यही साधक को धीरे-धीरे भीतर से बदलता है।
प्रश्न 8: परिवार के कर्तव्यों का पालन करते हुए भगवद्-प्राप्ति कैसे करूँ?
उत्तर:
महाराज जी स्पष्ट रूप से बताते हैं कि परिवार की जिम्मेदारियों को छोड़ना ही भगवद्-प्राप्ति का रास्ता नहीं है। गृहस्थ जीवन में जो भी हमारे संबंध और कर्तव्य हैं, उन्हें धर्म के अनुसार निभाते हुए भी भगवान की ओर बढ़ा जा सकता है। आवश्यकता केवल इतनी है कि हम उन कर्तव्यों को अपना निजी स्वार्थ मानकर न करें, बल्कि भगवान को समर्पित करके करें।
सबसे पहले पूरे परिवार को भगवान को समर्पित करने का भाव रखना चाहिए। इसके बाद परिवार के प्रति जो भी जिम्मेदारी है, उसे ठीक प्रकार से निभाना चाहिए। कोई किसी का भाई है, कोई पति है, कोई पिता है, कोई पत्नी है—इन सभी संबंधों का अपना कर्तव्य है। इन संबंधों को छोड़ना नहीं है, बल्कि इनके प्रति अपने धर्म का ठीक से पालन करना है।
महाराज जी बताते हैं कि नाम-जप करते हुए यदि हम अपने कर्तव्यों को भगवान को समर्पित करते रहें तो गृहस्थ जीवन स्वयं साधना का माध्यम बन सकता है। हम जो भी उचित कर्म कर रहे हैं, उसे भगवान को अर्पित करने का भाव रखें। एक-दो घंटे या अपनी सुविधा के अनुसार समय-समय पर अपने किए हुए कर्मों को भगवान को समर्पित करने की भावना बनाए रखें।
कर्म किए बिना कोई भी व्यक्ति नहीं रह सकता। आँखें बंद करना भी एक कर्म है और भीतर विचार चलना भी एक प्रकार की क्रिया है। इसलिए कर्म से बचना संभव नहीं है। महत्वपूर्ण यह है कि हम किस प्रकार के कर्म करते हैं और उन्हें किस भाव से करते हैं।
महाराज जी शुभ और अशुभ कर्मों का अंतर बताते हैं। धर्म के अनुसार किया गया कर्तव्य कर्म भगवान को समर्पित किया जा सकता है। लेकिन पाप या गलत आचरण को कर्तव्य बताकर भगवान को समर्पित नहीं किया जा सकता। इसलिए पहले अपने आचरण को ठीक रखना जरूरी है। गलत काम करके यह कहना कि भगवान को समर्पित कर दिया, उचित नहीं है।
महाराज जी इसे भगवान के बैंक में जमा करने जैसी बात से समझाते हैं। यदि हम भगवान के पास अच्छे कर्म और सही आचरण जमा करेंगे तो उसका फल भी उसी प्रकार मिलेगा। इसलिए गृहस्थ को अपने धर्मानुसार कर्तव्य करते रहना चाहिए, पाप कर्म से बचना चाहिए, नाम-जप करना चाहिए और अपने प्रत्येक उचित कर्म को भगवान को समर्पित करना चाहिए।
इस प्रकार परिवार की जिम्मेदारियाँ निभाते हुए भी मन भगवान में लगाया जा सकता है। समस्या परिवार में रहना नहीं है; समस्या तब होती है जब “मेरा परिवार, मेरा पुत्र, मेरी पत्नी, मेरे रिश्तेदार” के मोह में मन पूरी तरह फँस जाता है और भगवान का स्मरण छूट जाता है। इसलिए गृहस्थ जीवन में कर्तव्य निभाते हुए नाम-जप और समर्पण को साथ लेकर चलना ही महाराज जी द्वारा बताए गए मार्ग का मुख्य भाव है।
Credit:
“यह लेख संत श्री प्रेमानंद जी महाराज के एकान्तिक वार्तालाप प्रवचन की अमृत वाणी पर आधारित है।”