प्रश्न 1: महाराज जी,हमारे संचित पाप और पुण्य खत्म हो रहे हैं, यह कैसे पता चलेगा?
उत्तर:
महाराज जी बताते हैं कि जब हमारे संचित पाप-पुण्य क्षीण होने लगते हैं, तो इसका सबसे बड़ा संकेत हमारे अंदर की स्थिति में परिवर्तन के रूप में दिखाई देता है। मन पहले की तरह संसार की इच्छाओं और विषयों में उलझा नहीं रहता। धीरे-धीरे पाप करने की इच्छाएँ कम होने लगती हैं और हृदय में एक अलग प्रकार की शांति आने लगती है।
महाराज जी के अनुसार ऐसी अवस्था में चिंता, शोक और भय कम होने लगते हैं। व्यक्ति के अंदर एक प्रकार की निर्भयता और निश्चिंतता आने लगती है। उसका मन भगवान में अधिक लगने लगता है। उसे संसार से मिलने वाली वस्तुओं, पद या प्रतिष्ठा की पहले जैसी चाह नहीं रहती।
जब नवधा भक्ति जीवन में अपना प्रभाव डालती है और भगवान के प्रति प्रेम प्रकट होने लगता है, तब साधक की स्थिति और भी बदल जाती है। उसके अंदर भगवान के लिए ऐसी तन्मयता आती है कि उसे संसार की दूसरी इच्छाएँ छोटी लगने लगती हैं। महाराज जी बताते हैं कि उस अवस्था में न किसी विशेष वस्तु की चाह रहती है, न किसी पद की, न जीवन-मृत्यु को लेकर कोई विशेष इच्छा। हृदय केवल अपने प्रभु के लिए व्याकुल रहता है।
महाराज जी कहते हैं कि जब हृदय में किसी प्रकार की कामना, वासना और सांसारिक लालसा नहीं रह जाती और चित्त निरंतर भगवान में लगा रहता है, तो यह संकेत है कि अब जीवन का उद्देश्य पूरा होने की दिशा में है।
इसलिए केवल बाहरी परिस्थितियों को देखकर यह नहीं समझना चाहिए कि हमारे संचित कर्म समाप्त हो रहे हैं। असली संकेत अपने मन और हृदय में देखना है। भगवान के अलावा दूसरी इच्छाएँ कम हों, चिंता-भय घटे, संसार से मोह छूटे और प्रभु के लिए हृदय में निरंतर व्याकुलता बढ़े—महाराज जी के अनुसार यही महत्वपूर्ण संकेत हैं।
प्रश्न 2: सही फैसला कैसे लें?
उत्तर:
महाराज जी बताते हैं कि जब जीवन में किसी विषय को लेकर दुविधा हो और समझ न आए कि क्या करना सही है, तो सबसे पहले यह देखना चाहिए कि वह निर्णय शास्त्र और संत-महापुरुषों के वचनों से प्रमाणित है या नहीं। जो महापुरुष भगवान के निकट पहुँचे हुए हैं, उनके बताए मार्ग को आधार बनाया जा सकता है।
इसके साथ महाराज जी एक और बहुत महत्वपूर्ण बात बताते हैं—हमारा हृदय भी सही और गलत का संकेत देता है। जब हम कुछ गलत सोचने या गलत करने जा रहे होते हैं, तो अंदर से तुरंत एक संकेत आता है कि यह ठीक नहीं है। वह आवाज बहुत तेज नहीं होती। बहुत धीमे ढंग से अंदर से लगता है कि यह काम मत करो।
महाराज जी कहते हैं कि कई बार हम उस आवाज को अपने विचार समझ लेते हैं, जबकि वास्तव में वह हृदय में बैठे भगवान की ओर से मिलने वाला संकेत हो सकता है। जब कोई कार्य गलत होता है तो अंदर से बेचैनी होती है और हृदय रोकता है। इसके विपरीत जब कोई कार्य सही होता है तो हृदय में शीतलता और प्रसन्नता का अनुभव होता है।
लेकिन यहां एक बात समझना जरूरी है। मन हमेशा सही दिशा नहीं दिखाता। महाराज जी बताते हैं कि मन विषयों की ओर आकर्षित हो सकता है, जबकि हृदय में बैठे आराध्य भगवान गलत कार्य से रोकते हैं। इसलिए केवल मन की इच्छा को ही सही फैसला नहीं मान लेना चाहिए।
सही निर्णय के लिए तीन आधार महाराज जी की बातों में दिखाई देते हैं—शास्त्र का प्रमाण, संत-महापुरुषों के वचन और हृदय की निर्मल चेतावनी। यदि कोई काम इन आधारों के विपरीत है और अंदर से भी लगातार संकेत मिल रहा है कि यह गलत है, तो उसे नहीं करना चाहिए।
महाराज जी कहते हैं कि भगवान सबके हृदय में बैठे हैं और सबको उपदेश देते हैं। इसलिए फैसला लेते समय अपने भीतर की उस सूक्ष्म आवाज को भी सुनना सीखना चाहिए।
प्रश्न 3: दीक्षा के बाद भी यदि गलत आचरण करते रहेंगे, तो क्या होगा?
उत्तर:
महाराज जी इस प्रश्न पर बहुत स्पष्ट और कठोर चेतावनी देते हैं। वे कहते हैं कि यदि कोई व्यक्ति संसार में पाप करता रहा और फिर गुरु की शरण में आ गया, तो गुरु की शरण लेने से पहले किए गए पापों के लिए कृपा मिल सकती है। लेकिन गुरु की शरण में आने के बाद जान-बूझकर वही पाप दोबारा करना बहुत गंभीर बात है।
महाराज जी इसे समझाने के लिए कहते हैं कि पहले किए हुए पापों के बाद व्यक्ति गुरु की शरण में आया और उसने संकल्प किया कि अब वह गलत आचरण नहीं करेगा। लेकिन अगर इसके बाद भी वह जानबूझकर उसी गलत आचरण में लौट जाता है, तो वह साधारण भूल नहीं रह जाती। इसे महाराज जी “रजिस्टर्ड पाप” जैसी गंभीर स्थिति बताते हैं।
वे समझाते हैं कि केवल बाद में “सॉरी” बोल देने से जानबूझकर किए गए पाप समाप्त नहीं हो जाते। यदि व्यक्ति को मालूम है कि कोई कार्य गलत है, फिर भी वह उसे करता है और सोचता है कि गुरु की शरण में आने के कारण सब क्षमा हो जाएगा, तो यह बहुत बड़ी भूल है। ऐसे कर्मों का फल भोगना पड़ सकता है।
महाराज जी इसलिए कहते हैं कि गुरु की शरण में आने के बाद व्यक्ति को अपने आचरण के प्रति और अधिक सावधान होना चाहिए। यदि कभी भूल से कोई गलती हो जाए तो वह अलग बात है, लेकिन जानबूझकर पाप करना अलग बात है।
ऐसी स्थिति में महाराज जी तत्काल सावधान होने, भगवान से प्रार्थना करने, नाम-जप करने और गंदे आचरण छोड़ने की बात कहते हैं। वे यह भी कहते हैं कि जब तक व्यक्ति अपने आचरण पर नियंत्रण रखने के लिए तैयार न हो, तब तक गुरु मंत्र लेकर फिर मनमानी करना उचित नहीं है।
इसलिए दीक्षा को गलत काम करने की छूट नहीं समझना चाहिए। गुरु की शरण का अर्थ है अपने जीवन को सुधारना, पुराने गलत आचरण को छोड़ना और भगवान के मार्ग पर चलना।
प्रश्न 4: पिछले 24 वर्षों में गलत आचरण ही हुए हैं, अब भगवान कैसे मिलेंगे?
उत्तर:
महाराज जी इस प्रश्न पर निराश होने के बजाय जीवन को सुधारने की प्रेरणा देते हैं। यदि पिछले जीवन में गलतियाँ हुई हैं और व्यक्ति को अब अपनी गलतियों का एहसास हो गया है, तो इसका मतलब यह नहीं कि अब उसके लिए भगवान की प्राप्ति का मार्ग बंद हो गया। गलतियों को पहचानकर उन्हें छोड़ना और जीवन को पवित्र करना ही आगे का रास्ता है।
महाराज जी इसके लिए एक बहुत सरल उदाहरण देते हैं। वे कहते हैं कि अगर कोई पात्र गंदा हो जाए तो उसे फेंक नहीं देते। उसे साफ करते हैं। उसी तरह अगर हमारा जीवन गलत आचरणों के कारण गंदा हो गया है, तो हमें अपने जीवन का भी मार्जन करना है, उसे शुद्ध करना है।
इसके लिए महाराज जी भगवान की लीला-कथा सुनने, नाम-जप करने, नाम-कीर्तन करने, अच्छे आचरण अपनाने और अपनी पुरानी गलतियों को दोबारा न दोहराने की बात कहते हैं। व्रत और उपवास के द्वारा भी जीवन को पवित्र करने की बात वे बताते हैं।
महाराज जी यह भी समझाते हैं कि इतिहास में ऐसे अनेक लोग हुए हैं जिनका जीवन पहले बहुत गलत रहा, लेकिन बाद में उन्होंने भगवान का आश्रय लिया और उनका जीवन बदल गया। इसलिए अपने अतीत को देखकर यह सोच लेना कि “अब भगवान मुझे कैसे मिलेंगे?” उचित नहीं है।
वे भगवान की शरण का भरोसा देते हुए कहते हैं कि भगवान की शरण में जाकर नाम-जप और भक्ति करने से जीवन पवित्र किया जा सकता है। इसलिए मनुष्य को अपनी पुरानी गलतियों को बार-बार याद करके निराश नहीं होना चाहिए, बल्कि आज से सुधार शुरू करना चाहिए।
महाराज जी की बात का सार यही है कि पिछले 24 साल जैसे भी रहे हों, आज का दिन बदला जा सकता है। गलतियों की पुनरावृत्ति रोकिए, भगवान का नाम लीजिए, उनकी कथा सुनिए, कीर्तन कीजिए और भगवान की शरण में जाइए।
गंदे पात्र को फेंका नहीं जाता, उसे धोकर फिर उपयोग किया जाता है। उसी तरह मनुष्य का जीवन भी सुधारा जा सकता है। इसलिए निराश होने की बजाय अभी से अपने जीवन को भगवान की ओर मोड़ना चाहिए।
प्रश्न 5: आत्मा, परमात्मा और जीव के बीच क्या संबंध है?
उत्तर:
महाराज जी इस प्रश्न का उत्तर देते हुए बताते हैं कि आत्मा और परमात्मा में कोई वास्तविक भेद नहीं है। जो व्यक्ति अपने वास्तविक स्वरूप को भूलकर शरीर को ही अपना स्वरूप मान लेता है, उसे “जीव” कहा जाता है। जब उसे अपने वास्तविक स्वरूप का बोध हो जाता है, तब वही आत्मा और वही परमात्मा स्वरूप है।
महाराज जी के अनुसार आत्मा वास्तव में निर्विकार, अविनाशी और अजन्मा स्वरूप है। लेकिन जब व्यक्ति शरीर और अंतःकरण के साथ अपने को जोड़ लेता है और यह मानने लगता है कि “मैं यही शरीर हूँ”, तब देहाभिमान के कारण उसे जीव कहा जाता है।
अर्थात आत्मा कोई अलग चीज बनकर जीव नहीं हुई। जीव की संज्ञा देहाभिमान के कारण है। जब यह भ्रम दूर हो जाता है तो व्यक्ति अपने वास्तविक स्वरूप को पहचान लेता है। महाराज जी इसी बात को समझाते हुए कहते हैं कि ब्रह्मज्ञान प्राप्त करने से कोई नया ब्रह्म नहीं बनता, बल्कि उसका भ्रम समाप्त होता है।
महाराज जी कहते हैं कि जो आत्मा है वही अखंड परमात्मा है और जो परमात्मा है वही आत्मस्वरूप में स्थित है। इस दृष्टि से परमात्मा के अतिरिक्त दूसरा कुछ नहीं है। वे इसके लिए भगवान के वचन और उपनिषदों में कही गई बातों का उल्लेख करते हैं कि सब कुछ ब्रह्म ही है और ईश्वर के अतिरिक्त दूसरा कुछ नहीं है।
इसे सरल रूप में समझें तो महाराज जी की बात यह है कि हमारा वास्तविक स्वरूप शरीर नहीं है। शरीर के साथ अपनी पहचान जोड़ने से जीवभाव आता है और अपने वास्तविक स्वरूप का बोध होने पर आत्मस्वरूप प्रकट होता है।
महाराज जी अंत में कहते हैं कि यह बात केवल सुन लेने से पूरी तरह समझ में नहीं आएगी। भजन करने से इसका अनुभव और समझ गहरी होगी। इसलिए आत्मा-परमात्मा के संबंध को केवल बौद्धिक विषय न बनाकर भजन और साधना के माध्यम से समझने की बात वे कहते हैं।
प्रश्न 6: मुझे शरणागत होना भी नहीं आता, मैं क्या करूँ?
उत्तर:
महाराज जी कहते हैं कि शरणागति कोई ऐसी विधि नहीं है जिसे पहले किताब से पढ़कर या किसी खास तरीके से सीखना पड़े। जब जीव को हर तरफ से अपने लिए कोई सहारा दिखाई नहीं देता और उसे समझ में आता है कि अब अपने बल पर कुछ नहीं हो सकता, तब भगवान की शरणागति अपने आप जागती है।
महाराज जी द्रौपदी और गजेंद्र के उदाहरण से इसे समझाते हैं। जब तक द्रौपदी को अपने पति, महापुरुषों और अपनी स्वयं की शक्ति पर भरोसा था, तब तक उसने भगवान को उस तरह नहीं पुकारा। लेकिन जब उसे लगा कि अब कोई सहारा नहीं बचा, तब उसने भगवान को पुकारा। इसी प्रकार गजेंद्र ने भी बहुत समय तक स्वयं संघर्ष किया। जब उसकी अपनी शक्ति समाप्त हो गई और कोई दूसरा सहारा नहीं रहा, तब उसने भगवान का आश्रय लिया।
महाराज जी बताते हैं कि विभीषण के साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ। जब रावण ने उन्हें लात मारकर निकाल दिया और उन्हें लगा कि अब वहां कोई आश्रय नहीं है, तब वे भगवान की ओर चले गए। यानी जब संसार के सारे रास्ते बंद दिखाई देते हैं और भगवान का रास्ता खुला दिखाई देता है, तब जीव स्वाभाविक रूप से भगवान की शरण में जाता है।
शरणागति के लिए महाराज जी संतों और गुरुजनों का आश्रय लेने तथा भगवान की महिमा सुनने की बात भी कहते हैं। संसार के दुख को देखकर जब व्यक्ति को भगवान की ओर जाने की इच्छा होती है, वही धीरे-धीरे शरणागति का भाव बनाती है।
इसलिए अगर आपको लगता है कि “मुझे शरणागत होना नहीं आता”, तो इस बात को लेकर परेशान होने की जरूरत नहीं है। भगवान का नाम लेते रहिए, संतों का आश्रय लीजिए और भगवान की महिमा सुनते रहिए।
महाराज जी के अनुसार जब भीतर से यह दृढ़ हो जाएगा कि “मेरे लिए भगवान के अलावा कोई दूसरा सहारा नहीं है”, तब शरणागति का भाव अपने आप जागेगा।
प्रश्न 7: मैंने कभी शराब नहीं पी, अब दोस्त मुझे जड़बुद्धि और पिछड़ी हुई सोच वाला कहते हैं, क्या करूँ?
उत्तर:
महाराज जी इस स्थिति में बहुत स्पष्ट कहते हैं कि यदि कोई व्यक्ति गलत आचरण से बच रहा है और उसके दोस्त उसे जड़बुद्धि या पिछड़ी सोच वाला कहते हैं, तो उसे अपने सही मार्ग से हटने की जरूरत नहीं है। केवल लोगों के कहने पर शराब पीना या कोई गलत आचरण करना समझदारी नहीं है।
महाराज जी कहते हैं कि वास्तव में विवेकवान वही है जो गलत आचरण से बचता है। यदि कोई व्यक्ति शराब, मांस या दूसरे गलत आचरणों से दूर रहता है, सात्विक आहार लेता है और अच्छे विचार रखता है, तो उसे दूसरों की बातों से विचलित नहीं होना चाहिए। लोग मजाक या प्रमादवश कुछ भी कह सकते हैं, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि हम अपने अच्छे संस्कार छोड़ दें।
महाराज जी यह भी कहते हैं कि अगर कोई हमें गलत कह रहा है और वास्तव में हमारी गलती है तो हमें सुधार करना चाहिए। लेकिन यदि हम सही हैं, तो केवल आलोचना सुनकर दुखी होकर गलत रास्ते पर नहीं जाना चाहिए। दूसरे हमें मूर्ख कहें, जड़ कहें या पुरानी सोच वाला कहें, फिर भी अपने सही आचरण पर दृढ़ रहना चाहिए।
वे शराब के संबंध में बताते हैं कि इससे स्वास्थ्य, पैसा, व्यवहार और चरित्र पर बुरा प्रभाव पड़ सकता है। उनके अनुसार नशे में व्यक्ति का व्यवहार ठीक नहीं रहता और धीरे-धीरे उसका जीवन बिगड़ सकता है। इसलिए केवल दोस्तों के दबाव या समाज में आधुनिक दिखने के लिए शराब पीना उचित नहीं है।
महाराज जी बच्चों और युवाओं को गलत संगति और गलत आचरण से बचने की सलाह देते हैं। वे कहते हैं कि दूसरों के दबाव में आकर अपना जीवन गंदा नहीं करना चाहिए।
इसलिए यदि दोस्त आपको पिछड़ी सोच वाला कहते हैं तो मुस्कुराकर अपने मार्ग पर चलते रहिए। महाराज जी की बात का सार यही है कि सही आचरण के लिए दृढ़ रहना ही वास्तविक बुद्धिमानी है। आज लोग कुछ भी कहें, लेकिन हमें अपने जीवन को पवित्र और संयमित रखने का प्रयास करना चाहिए।
Credit:
“यह लेख संत श्री प्रेमानंद जी महाराज के एकान्तिक वार्तालाप प्रवचन की अमृत वाणी पर आधारित है।”
यह भी पढ़ें: माला-1377: आलस्य और मोबाइल के अधिक उपयोग पर जीत कैसे पाई जाए?,श्री प्रेमानंद महाराज जी के अमृत वचनों से नाम जप महिमा