प्रश्न 1. महाराज जी,अगर गुरु में दोष-बुद्धि हो जाए, तो क्या करें?
उत्तर:
महाराज जी के अनुसार, गुरु के प्रति दोष-बुद्धि आ जाना साधक के लिए बहुत गंभीर स्थिति है। हमें सबसे पहले अपने मन को देखना चाहिए कि कहीं हमारी अपनी अपेक्षाएँ, अहंकार या मन की कोई बात पूरी न होने के कारण तो गुरु के प्रति दोष दिखाई नहीं देने लगा। गुरु ने हमें नाम दिया, मंत्र दिया और भगवान के मार्ग पर चलने का अवसर दिया, इसलिए उनके उपकार को भूलकर उनके दोष देखने लगना उचित नहीं है।
महाराज जी कहते हैं कि शरणागति का अर्थ केवल तब तक गुरु को मानना नहीं है, जब तक वे हमारी इच्छा के अनुसार व्यवहार करें। गुरु प्रेम करें, डाँटें या तिरस्कार करें, साधक को हर स्थिति में उनके प्रति श्रद्धा बनाए रखने का प्रयास करना चाहिए।
लेकिन इसका अर्थ यह भी नहीं कि मन में कोई कठिनाई होने पर निंदा और विवाद शुरू कर दिया जाए। महाराज जी के अनुसार, यदि किसी कारण से मन बहुत अशांत हो रहा है और दोष-बुद्धि हट नहीं रही, तो गुरु की निंदा न करें। विनम्रता से प्रणाम करके कुछ दूरी बना लें और खूब नाम जप करें। अपने मन को भगवान के नाम में लगाकर पहले अपनी दृष्टि को शुद्ध करने का प्रयास करें।
महाराज जी समझाते हैं कि हम अपनी गलतियों को तो आसानी से क्षमा कर देते हैं, लेकिन गुरु के विषय में निर्णय करने बैठ जाते हैं। इसलिए पहले अपने आपको देखना चाहिए कि क्या हम वास्तव में इतने शुद्ध और योग्य हैं कि गुरु के दोषों का निर्णय कर सकें?
इसलिए यदि गुरु में दोष-बुद्धि उत्पन्न हो जाए, तो तुरंत निंदा, विरोध और अपमान की ओर नहीं जाना चाहिए। नाम जप करें, अपने मन की जांच करें, श्रद्धा बचाने का प्रयास करें और यदि आवश्यक हो तो शांतिपूर्वक दूरी बनाकर भी गुरु की निंदा से बचें।
प्रश्न 2. क्या आज के समय में गृहस्थ में रहते हुए भी भगवान को प्रसन्न करने वाली भक्ति की जा सकती है?
उत्तर:
महाराज जी के अनुसार, भगवान की प्राप्ति या भगवान को प्रसन्न करने वाली भक्ति केवल संन्यास लेने वालों के लिए नहीं है। गृहस्थ व्यक्ति भी अपने परिवार और जिम्मेदारियों के बीच रहकर सच्चे मन से भक्ति करे तो वह भी भगवान की प्राप्ति कर सकता है। वास्तव में बाहरी वेष से अधिक महत्वपूर्ण व्यक्ति का आचरण, चरित्र और भगवान के प्रति उसका प्रेम है।
महाराज जी कहते हैं कि गृहस्थ व्यक्ति को अपने गृहस्थ धर्म का पालन करना चाहिए। अपनी पत्नी या पति के प्रति मर्यादित रहना चाहिए, मेहनत और ईमानदारी से कमाई करनी चाहिए तथा उसी से परिवार का पालन करना चाहिए। साथ ही भगवान का नाम जपते रहना चाहिए। यदि जीवन में कथा, सत्संग, नाम जप और परोपकार जुड़ जाएँ, तो गृहस्थ जीवन भी भगवत्-प्राप्ति का सुंदर मार्ग बन सकता है।
महाराज जी इस बात पर विशेष जोर देते हैं कि केवल संत का वेष धारण कर लेने से कोई भगवान को प्राप्त नहीं कर लेता। यदि कोई व्यक्ति बाहरी रूप से साधु बन जाए, लेकिन उसका मन धन, प्रतिष्ठा और संसार में ही लगा रहे तथा वह भगवान का भजन न करे, तो केवल उसका वेष किसी काम का नहीं है। इसके विपरीत, गृहस्थ व्यक्ति साधारण कपड़ों में रहकर भी सच्चे मन से नाम जप करे तो वह भगवान के निकट पहुँच सकता है।
इसलिए महाराज जी के अनुसार गृहस्थ जीवन कोई बाधा नहीं है। बाधा तब है जब हम संसार में रहकर भगवान को बिल्कुल भूल जाएँ। परिवार की जिम्मेदारी निभाते हुए, पवित्र आचरण रखते हुए और नियमित नाम जप करते हुए भी भगवान को प्रसन्न करने वाली भक्ति की जा सकती है।
प्रश्न 3. संत, महात्मा, ऋषि, मुनि और रसिक में क्या अंतर होता है?
उत्तर:
महाराज जी इन शब्दों का अंतर समझाते हुए बताते हैं कि आध्यात्मिक जीवन में इन सभी की अपनी अलग विशेषता है। केवल बाहरी वेश देखकर किसी को संत, महात्मा या रसिक नहीं कहा जा सकता। इनकी पहचान उनके भीतर की स्थिति, साधना और भगवान के प्रति उनके भाव से होती है।
महाराज जी के अनुसार, महात्मा वह है जिसकी दृष्टि में सब जगह भगवान का ही स्वरूप दिखाई देने लगता है। वह संसार को केवल स्त्री-पुरुष, अपना-पराया या जड़-चेतन के भेद से नहीं देखता, बल्कि हर जगह परमात्मा की उपस्थिति का अनुभव करता है। ऐसा महात्मा बहुत दुर्लभ होता है।
ऋषि वे हैं जो शास्त्रसम्मत आचरण और साधना करते हुए ब्रह्मबोध की ओर अग्रसर होते हैं। महाराज जी बताते हैं कि ऋषि गृहस्थ जीवन में रहते हुए भी उच्च आध्यात्मिक स्थिति प्राप्त कर सकते हैं। इसलिए गृहस्थ होना ऋषि होने के मार्ग में बाधा नहीं है।
मुनि शब्द मनन से जुड़ा है। जो व्यक्ति निरंतर मंत्रों और आध्यात्मिक तत्वों का मनन करता है, उसे मुनि कहा जाता है।
संत वह है जो सत्य और भगवान के मार्ग में स्थित होकर जीवन जीता है। उसके जीवन में भक्ति, सदाचार और भगवान की ओर ले जाने वाला आचरण दिखाई देता है।
और रसिक के विषय में महाराज जी कहते हैं कि रसिक बहुत दुर्लभ होते हैं। जिनके हृदय में श्री राधा-कृष्ण के प्रेम का रस निरंतर प्रकट होता रहता है, जिनके भीतर प्रिया-प्रीतम के प्रति प्रेम हर क्षण बढ़ता रहता है, उन्हें रसिक कहा जाता है। ऐसे प्रेमी संत का मिलना अत्यंत दुर्लभ बताया गया है।
इस प्रकार इन सभी में बाहरी रूप से अधिक, भगवान के प्रति उनकी आंतरिक स्थिति और साधना का अंतर मुख्य है।
प्रश्न 4. मैंने गुरु को ब्रह्म माना, पर कभी उसका अनुभव नहीं हुआ, क्यों?
उत्तर:
महाराज जी के अनुसार, केवल मुख से यह कह देना कि “मैं गुरु को ब्रह्म मानता हूँ” और वास्तव में हृदय से गुरु को उसी रूप में स्वीकार कर लेना, दोनों में अंतर है। हम अक्सर अपने गुरुदेव को संत, महात्मा या पूजनीय व्यक्ति तो मान लेते हैं, लेकिन उनके प्रति वह अटल श्रद्धा और विश्वास नहीं बन पाता कि वे हमारे लिए साक्षात परम तत्व के स्वरूप हैं। यही कारण है कि केवल मान्यता होने के बाद भी अनुभव नहीं हो पाता।
महाराज जी समझाते हैं कि अनुभव केवल कल्पना या विचार करने से नहीं होता। साधक को एक स्पष्ट मार्ग पर चलना पड़ता है। कभी ज्ञान मार्ग की बातें, कभी भक्ति की बातें और कभी अपनी इच्छा से अलग-अलग साधनाएँ करते रहने से मन स्थिर नहीं होता। महाराज जी कहते हैं कि गुरु जैसा मार्ग बताएं, साधक को उसी पर निष्ठा से चलना चाहिए। गुरु ज्ञान मार्ग बताएं तो उस मार्ग पर चले और प्रेम मार्ग बताएं तो उसी प्रेम मार्ग में स्थिर रहे। अपनी मनमानी से वास्तविक सिद्धि प्राप्त नहीं होती।
महाराज जी के अनुसार, अनुभव का संबंध गुरु-कृपा और सच्ची शरणागति से है। केवल यह अनुमान लगा लेना कि गुरु ब्रह्म हैं, पर्याप्त नहीं है। गुरु के चरणों का आश्रय लेकर, उनके बताए मार्ग पर चलकर और अपने भीतर के अहंकार को गलाने का प्रयास करना आवश्यक है। जब साधक वास्तव में गुरु की शरण स्वीकार करता है, तभी अनुभव का मार्ग खुलता है।
इसलिए महाराज जी की बात का सार यह है कि यदि अनुभव नहीं हो रहा, तो केवल अनुभव की चिंता करने के बजाय अपनी साधना और श्रद्धा को देखना चाहिए। क्या हम सचमुच गुरु के बताए मार्ग पर चल रहे हैं या अपनी सुविधा के अनुसार साधना कर रहे हैं? जब श्रद्धा, शरणागति और गुरु-वाणी के अनुसार चलने का भाव दृढ़ होता है, तब गुरु-कृपा से अनुभव भी प्रकट हो सकता है।
प्रश्न 5. कैसे पता चले कि हमें कब मन की बात माननी चाहिए?
उत्तर:
महाराज जी बताते हैं कि मन को पूरी तरह एक ही प्रकार का नहीं समझना चाहिए। हमारे भीतर सत मन और असत मन, दोनों प्रकार की प्रवृत्तियाँ होती हैं। उसी प्रकार बुद्धि में भी सुमति और कुमति होती है। मन अलग-अलग बातें हमारे सामने रखता है, लेकिन उन बातों को स्वीकार करना है या नहीं, इसका निर्णय बुद्धि को करना चाहिए।
महाराज जी मन को एक प्रकार का पेशकार बताते हैं। वह अच्छी और बुरी, दोनों तरह की बातें इतनी आकर्षक बनाकर बुद्धि के सामने रख सकता है कि बुद्धि तुरंत उसे स्वीकार कर ले। इसलिए केवल यह सोचकर कि “मन कह रहा है”, उसकी बात मान लेना उचित नहीं है। पहले यह देखना चाहिए कि मन जो बात कह रहा है, वह हमें भगवान की ओर ले जा रही है या विषयों और अधर्म की ओर।
यदि मन किसी अच्छे कार्य, भजन, सेवा, सत्य, दया या सदाचार की ओर प्रेरित करे, तो वह बात मानने योग्य हो सकती है। लेकिन यदि मन भोग, लोभ या गलत कार्यों के लिए बहाने बनाकर हमें आकर्षित कर रहा है, तो उस पर तुरंत विश्वास नहीं करना चाहिए। महाराज जी कहते हैं कि असली आवश्यकता बुद्धि को शुद्ध करने की है। जब बुद्धि शुद्ध होती है, तब वह मन के गलत संकल्पों को स्वीकार नहीं करती।
महाराज जी के अनुसार, भगवान का भजन करते रहने से बुद्धि पवित्र और समझदार होती जाती है। तब बुद्धि एक अच्छे सारथी की तरह मन रूपी लगाम को संभालती है और इंद्रियों को सही दिशा में रखती है।
इसलिए मन की बात कब माननी चाहिए, इसका सरल उत्तर यही है—जब शुद्ध बुद्धि यह स्वीकार करे कि मन की प्रेरणा हमें सही मार्ग पर ले जा रही है। मन के पीछे नहीं, बल्कि विवेकपूर्ण और भजन से शुद्ध हुई बुद्धि के अनुसार चलना चाहिए।
प्रश्न 6. जानते हुए भी कि सब छूट जाएगा, फिर भी हम छल-कपट क्यों नहीं छोड़ते?
उत्तर:
महाराज जी के अनुसार, इसका मुख्य कारण अविद्या अर्थात सही ज्ञान का अभाव है। हम ऊपर-ऊपर से तो जानते हैं कि एक दिन शरीर, धन, परिवार, प्रतिष्ठा और संसार की सारी वस्तुएँ यहीं छूट जाएँगी। लेकिन यह बात अभी हमारे भीतर वास्तविक रूप से उतरी नहीं है। जब तक यह समझ केवल सुनने और कहने तक रहती है, तब तक मनुष्य पुराने संस्कारों के अनुसार झूठ, फरेब और मक्कारी में लगा रहता है। महाराज जी कहते हैं कि जिस दिन सही अर्थ में जानकारी हो जाएगी, उस दिन अधर्म का आचरण अच्छा ही नहीं लगेगा।
मनुष्य संसार की वस्तुओं और संबंधों में इतनी आसक्ति बना लेता है कि उसके लिए सही और गलत का निर्णय भी उसी आसक्ति के अनुसार होने लगता है। धन बचाना है, प्रतिष्ठा चाहिए, अपना काम बनाना है या किसी को पीछे छोड़ना है—इन इच्छाओं के कारण व्यक्ति जानते हुए भी गलत रास्ता चुन लेता है।
महाराज जी संसार की आसक्ति को ही इस स्थिति का मूल कारण बताते हैं। जब मनुष्य को यह भय सताता है कि मेरा परिवार, मेरा घर, मेरा धन और मेरी कमाई हुई प्रतिष्ठा सब छूट जाएगी, तो इससे पता चलता है कि मन भीतर से इन्हीं वस्तुओं से बँधा हुआ है।
इसलिए केवल यह जान लेना पर्याप्त नहीं कि “सब कुछ छूट जाएगा।” उस ज्ञान को जीवन में उतारना आवश्यक है। जब भीतर सही समझ जागती है, तब व्यक्ति को अधर्म, छल और कपट में आनंद मिलना बंद हो जाता है।
महाराज जी की बात का सार यही है कि छल-कपट छोड़ने के लिए केवल मृत्यु और संसार की नश्वरता की जानकारी नहीं, बल्कि वास्तविक विवेक और अंतःकरण का परिवर्तन चाहिए। भगवान का भजन करते-करते बुद्धि शुद्ध होती है और जब सही ज्ञान दृढ़ होता है, तब मनुष्य स्वयं गलत आचरण से दूर होने लगता है।
प्रश्न 7. सब मरीजों को स्वस्थ नहीं कर पाती, तो दुखी हो जाती हूँ। क्या करूँ?
उत्तर:
महाराज जी के अनुसार, किसी मरीज को स्वस्थ करने का प्रयास करना हमारा कर्तव्य है, लेकिन हर व्यक्ति को स्वस्थ कर देना हमारे हाथ में नहीं है। विशेषकर जो व्यक्ति सेवा या चिकित्सा के कार्य से जुड़ा है, उसे पूरी निष्ठा और करुणा के साथ अपना प्रयास करना चाहिए, पर परिणाम को अपने हाथ में मानकर दुखी नहीं होना चाहिए।
हम अक्सर यह मान लेते हैं कि यदि हमने पूरी मेहनत की है, तो परिणाम भी हमारी इच्छा के अनुसार ही आना चाहिए। लेकिन महाराज जी की बातों का भाव यही है कि संसार में हर व्यक्ति अपने प्रारब्ध और परिस्थितियों के अनुसार जीवन जी रहा है। भगवान की शरण और भजन से कठिन परिस्थितियों को सहने की शक्ति और सही दृष्टि मिलती है, पर हर घटना हमारे मन के अनुसार ही घटे, यह आवश्यक नहीं है।
इसलिए यदि आपने किसी मरीज के लिए पूरी ईमानदारी, प्रेम और अपनी क्षमता के अनुसार प्रयास किया, तो उसके बाद स्वयं को दोषी मानकर दुख में डूब जाना उचित नहीं। सेवा करते समय यह भाव रखना चाहिए कि मैं अपना कर्तव्य कर रही हूँ, परिणाम भगवान के हाथ में है।
महाराज जी के अनुसार, भगवान का स्मरण मनुष्य को हर परिस्थिति में संभालता है। इसलिए मरीज की स्थिति देखकर करुणा होना अच्छी बात है, लेकिन उसकी पीड़ा को इतना अपने भीतर बैठा लेना कि स्वयं ही टूट जाएँ, यह उचित नहीं। जो सेवा कर रहा है, उसे भीतर से मजबूत भी रहना चाहिए, तभी वह आगे भी दूसरों की सहायता कर पाएगा।
इसलिए महाराज जी की शिक्षा के अनुसार, हर मरीज के लिए पूरी निष्ठा से प्रयास करें, उसके हित की कामना करें और भगवान से प्रार्थना करें। लेकिन यदि हर व्यक्ति स्वस्थ न हो सके, तो यह सोचकर स्वयं को दोष न दें कि सब कुछ मेरे ही हाथ में था। हमारा अधिकार प्रयास और सेवा पर है, परिणाम पर नहीं।
प्रश्न 8. क्या भगवत्-प्राप्ति के लिए वेष धारण करना आवश्यक है?
उत्तर:
महाराज जी के अनुसार, भगवत्-प्राप्ति के लिए किसी विशेष वेष को धारण करना आवश्यक नहीं है। भगवान को पाने के लिए सबसे महत्वपूर्ण है—मन की दिशा, चरित्र की पवित्रता और सच्चा भजन। केवल कपड़े बदल लेने से या बाहर से साधु जैसा दिखाई देने से भगवत्-प्राप्ति नहीं हो जाती।
महाराज जी बार-बार इस बात पर जोर देते हैं कि भजन करने वाले व्यक्ति का आचरण पवित्र होना चाहिए। यदि बाहर से व्यक्ति धार्मिक या संत जैसा दिखाई दे, लेकिन भीतर मन संसार, विषयों और गलत प्रवृत्तियों में लगा रहे, तो केवल वेष उसका कल्याण नहीं कर सकता।
इसके विपरीत, कोई गृहस्थ अपने घर-परिवार में रहते हुए भी भगवान का नाम जप सकता है, अपने धर्म का पालन कर सकता है और भगवान की भक्ति में आगे बढ़ सकता है। महाराज जी के अनुसार, भक्ति के लिए संसार छोड़ना या विशेष रूप धारण करना ही एकमात्र मार्ग नहीं है।
वेष का अपना स्थान हो सकता है, लेकिन उसे भगवत्-प्राप्ति का प्रमाण या आवश्यक शर्त मान लेना सही नहीं। असली बात यह है कि हमारा जीवन भगवान की ओर बढ़ रहा है या नहीं। क्या हमारा चरित्र सुधर रहा है? क्या हमारे भीतर नाम-जप की रुचि बढ़ रही है? क्या हम दूसरों की निंदा और बुरे संग से बचने का प्रयास कर रहे हैं? यही बातें साधना की वास्तविक पहचान हैं।
इसलिए महाराज जी के अनुसार, वेष बदलने से पहले मन को बदलना आवश्यक है। गृहस्थ हों या संन्यासी, यदि मन भगवान में लगा है और जीवन का आचरण पवित्र है, तो भक्ति का मार्ग खुला है।
प्रश्न 9. बच्चे को नाम सुनाया तो वह भगवान के पास चला गया, अब नाम सुनाने में डर लगता है।
उत्तर:
महाराज जी के अनुसार, किसी बच्चे के भगवान का नाम सुनने और उसके बाद उसके शरीर छूट जाने की घटना को आपस में जोड़कर भगवान के नाम से डरना उचित नहीं है। शरीर का छूटना अपने समय और प्रारब्ध के अनुसार होता है। भगवान का नाम किसी की मृत्यु का कारण नहीं है।
जब मनुष्य के जीवन में कोई दुखद घटना घटती है, तो मन उस घटना के साथ जुड़ी हुई बातों को कारण मान लेता है। यदि बच्चे को भगवान का नाम सुनाया और कुछ समय बाद उसका शरीर छूट गया, तो दुख के कारण मन में यह डर बैठ सकता है कि कहीं नाम सुनाने से ऐसा हुआ। लेकिन महाराज जी के अनुसार, नाम भगवान से जोड़ने वाला है, उससे भय नहीं करना चाहिए।
महाराज जी बताते हैं कि भगवान का नाम, कथा और भजन साधक को संभालते हैं। कठिन प्रारब्ध और दुखद परिस्थितियों में भी भगवान की शरण मनुष्य को सहारा देती है। इसलिए किसी दुखद घटना के कारण भगवान के नाम से दूरी बना लेना उचित नहीं है।
बच्चे का शरीर छूट जाना निस्संदेह माता-पिता के लिए बहुत गहरा दुख है। उस दुख के कारण नाम सुनाने से भय होना स्वाभाविक हो सकता है, लेकिन महाराज जी की शिक्षा के अनुसार इस भय को धीरे-धीरे भगवान के चरणों में समर्पित करना चाहिए। बच्चे को भगवान का नाम सुनाना कोई अशुभ कार्य नहीं है।
इसलिए नाम-जप और भगवान के स्मरण को बंद करने के बजाय भगवान से प्रार्थना करें कि वे इस दुख को सहने की शक्ति दें। जिस भगवान का नाम जीवन को पवित्र करने और मन को संभालने वाला है, उसी नाम से डरना नहीं चाहिए। श्रद्धा के साथ स्वयं भी नाम जपते रहें और बच्चे को भी प्रेमपूर्वक भगवान का नाम सुनाते रहें।
Credit:
“यह लेख संत श्री प्रेमानंद जी महाराज के एकान्तिक वार्तालाप प्रवचन की अमृत वाणी पर आधारित है।”
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