माला-1358: भागवत कराने की सोचते ही घर में मृत्यु क्यों होती है?,श्री प्रेमानंद महाराज जी के अमृत वचनों से नाम जप महिमा

प्रश्न 1. महाराज जी,जब भी भागवत कराने की सोचते हैं, तो घर पर कोई मर जाता है। क्या करें?

उत्तर:

श्री प्रेमानंद महाराज जी इस प्रकार के भय को एक भ्रम बताते हैं। यदि किसी परिवार में भागवत कथा का आयोजन करने की तैयारी के समय किसी व्यक्ति की मृत्यु हो गई, तो इसका अर्थ यह नहीं है कि भागवत कराने के कारण उसकी मृत्यु हुई। महाराज जी समझाते हैं कि यह संसार ही मृत्युलोक है और जिसका शरीर जिस समय छूटना निश्चित है, उसका संयोग किसी भी घटना के साथ बन सकता है। कार्ड छपने या धार्मिक आयोजन की तैयारी होने को मृत्यु का कारण मान लेना सही नहीं है।

कई बार एक-दो घटनाएँ लगातार एक जैसी हो जाती हैं और मनुष्य के भीतर भय बैठ जाता है। फिर वह हर अगली घटना को उसी से जोड़ने लगता है। महाराज जी कहते हैं कि इसी प्रकार का भ्रम साधक को धार्मिक कार्यों से रोक देता है। यदि एक बार कथा की तैयारी के समय किसी की मृत्यु हो गई, फिर दूसरी बार भी ऐसा संयोग बन गया, तो परिवार यह मान बैठता है कि भागवत कराने से मृत्यु हो रही है। लेकिन यह केवल मन का बैठा हुआ डर है।

महाराज जी विशेष रूप से कहते हैं कि श्रीमद्भागवत मृत्यु देने वाली नहीं, बल्कि अमृत प्रदान करने वाली है। वे राजा परीक्षित के प्रसंग का भाव बताते हैं कि मृत्यु निश्चित होने के बाद भी भागवत का श्रवण कराया गया और वही कथा उनके कल्याण का मार्ग बनी। इसलिए भगवान की कथा से डरना या उसे अशुभ मानना उचित नहीं है।

इसलिए परिवार के लोगों को प्रेम से समझाना चाहिए कि मृत्यु और भगवान की कथा का आपस में ऐसा संबंध नहीं है। भय के कारण भागवत का आयोजन रोक देना उचित नहीं। महाराज जी के अनुसार, भ्रम को छोड़कर भगवान का नाम जपना चाहिए और श्रद्धा से कथा का आयोजन करना चाहिए। धार्मिक कार्य में आने वाली किसी घटना को अपशकुन मानकर भगवान की कथा से दूर होना ही वास्तविक भूल है।


प्रश्न 2. क्या बिना राधारानी की भक्ति के श्रीकृष्ण की प्राप्ति नहीं होगी?

उत्तर:

श्री प्रेमानंद महाराज जी इस विषय में बहुत सरल बात कहते हैं कि किसी की बात सुनकर भ्रम में पड़ने की आवश्यकता नहीं है। यदि किसी का मन सीधे ठाकुर जी यानी श्रीकृष्ण में लगता है, तो वह प्रेमपूर्वक श्रीकृष्ण का भजन करे। महाराज जी बताते हैं कि श्रीराधा और श्रीकृष्ण में वास्तविक रूप से कोई भेद नहीं है। जो श्रीकृष्ण हैं, वही श्रीराधा हैं और जो श्रीराधा हैं, वही श्रीकृष्ण हैं।

महाराज जी इसे एक ही चादर के उदाहरण से समझाते हैं। चादर को किसी भी स्थान से पकड़कर खींचो, पूरी चादर साथ आती है। उसी प्रकार कोई राधा नाम में प्रेम रखता है या कृष्ण नाम में, दोनों का संबंध उसी परम तत्व से है। इसलिए साधक को यह सोचकर परेशान नहीं होना चाहिए कि यदि मैंने पहले राधारानी का नाम नहीं लिया तो श्रीकृष्ण की प्राप्ति नहीं होगी।

महाराज जी के अनुसार, मुख्य बात यह है कि साधक का मन जिस नाम और स्वरूप में प्रेम से लगता है, उसी में निष्ठा रखे। कृष्ण-कृष्ण कहने पर राधारानी अलग नहीं हो जातीं और राधा-राधा कहने पर श्रीकृष्ण दूर नहीं हो जाते। दोनों को अलग-अलग मानकर विवाद या भ्रम में पड़ना साधना के लिए आवश्यक नहीं है।

इसलिए साधक को दूसरों की बातों से अपने मन को विचलित नहीं करना चाहिए। जिस भगवान के नाम में प्रेम जागे, उसका जप करते रहना चाहिए। महाराज जी की बात का सार यही है कि राधा और कृष्ण को अलग मानकर चिंता करने की बजाय प्रेमपूर्वक भगवान के नाम में लगे रहना चाहिए। जहाँ सच्चा नाम-स्मरण और प्रेम है, वहीं भक्ति का मार्ग आगे बढ़ता है।


प्रश्न 3. अगर आत्मा सत्य-चैतन्य स्वरूप है, तो संसार में आते ही उसका विस्मरण क्यों हो जाता है?

उत्तर:

श्री प्रेमानंद महाराज जी बताते हैं कि आत्मा वास्तव में अपने सत्य स्वरूप को खोती नहीं है, बल्कि मनुष्य अपने वास्तविक स्वरूप को भूल जाता है। जिस आत्मा को सत्य, चैतन्य और आनंद स्वरूप कहा गया है, वह वास्तव में कभी बंधती नहीं है। लेकिन मनुष्य अपने आपको शरीर, मन और इंद्रियों के साथ जोड़ लेता है और यहीं से बंधन तथा विस्मृति की स्थिति उत्पन्न होती है।

महाराज जी कहते हैं कि मन जब निरंतर विषयों का चिंतन करता है, तब मनुष्य स्वयं को मन और शरीर ही मानने लगता है। वह भूल जाता है कि उसका वास्तविक स्वरूप इन सबका साक्षी है। धीरे-धीरे यह भूल इतनी गहरी हो जाती है कि व्यक्ति अपने आपको केवल पुरुष, स्त्री, पुत्र, पति या शरीर के रूप में ही देखने लगता है।

महाराज जी के अनुसार, इस विस्मृति को दूर करने के लिए साधना आवश्यक है। जब अंतःकरण शुद्ध होता है और बुद्धि निर्मल होती है, तब अपने वास्तविक स्वरूप की स्मृति पुनः जागने लगती है। वे अर्जुन के प्रसंग का भाव बताते हैं कि मोह दूर होने पर उसकी स्मृति जागृत हुई। इसी प्रकार साधना से मनुष्य की भूली हुई वास्तविक पहचान फिर से प्रकट हो सकती है।

महाराज जी यह भी समझाते हैं कि संसार के संबंध व्यवहार में आवश्यक हैं, लेकिन उन्हें अंतिम सत्य मान लेना ही बंधन है। ज्ञानी व्यक्ति भी पिता, पुत्र या पति के कर्तव्य निभाता है, लेकिन भीतर से जानता है कि उसका वास्तविक स्वरूप शरीर और संबंधों से परे है।

इसलिए महाराज जी के अनुसार, आत्मा का स्वरूप नष्ट नहीं हुआ है। केवल उसे पहचानने की स्मृति ढक गई है। साधना, भगवत्-चिंतन और मन की शुद्धि से यह विस्मृति दूर हो सकती है।


प्रश्न 4. बिना गुरु के भगवत्-प्राप्ति संभव नहीं है, तो क्या सिर्फ नाम-जप से भगवत्-प्राप्ति हो जाएगी?

उत्तर:

श्री प्रेमानंद महाराज जी बताते हैं कि नाम-जप को छोड़ना नहीं चाहिए। यदि अभी सद्गुरु की प्राप्ति नहीं हुई है, तब भी भगवान का नाम लेते रहना चाहिए। महाराज जी के अनुसार, नाम-जप करते-करते ही साधक के भीतर भगवान को पाने की व्याकुलता बढ़ती है और वही व्याकुलता उसे गुरु की खोज तथा गुरु की शरण तक ले जाती है।

महाराज जी नामदेव जी के प्रसंग के माध्यम से समझाते हैं कि भगवान के अत्यंत प्रिय भक्त होने के बाद भी गुरु की आवश्यकता बनी रही। नामदेव जी भगवान से संवाद करते थे, फिर भी संतों ने उन्हें बताया कि गुरु के बिना साधना की परिपक्वता अधूरी रह सकती है। इसके बाद उन्हें गुरु की शरण में जाना पड़ा और गुरु-कृपा से उनके भीतर नया दृष्टिकोण प्रकट हुआ।

इससे महाराज जी समझाते हैं कि नाम-जप और गुरु-कृपा विरोधी नहीं हैं। नाम-जप करते-करते हृदय में भगवान की प्राप्ति की तीव्र इच्छा जागती है। जब यह व्याकुलता बढ़ती है, तब साधक को मार्गदर्शन की आवश्यकता अनुभव होती है और भगवान स्वयं उसे उचित गुरु तक पहुँचा सकते हैं।

महाराज जी का कहना है कि साधक को भगवान से प्रार्थना करते हुए नाम-जप करना चाहिए—हे प्रभु, मुझे सद्गुरु की प्राप्ति कराइए। जब गुरु की शरण मिलती है, तब गुरु साधक को मंत्र, उपासना और साधना की उचित पद्धति देते हैं।

इसलिए केवल यह सोचकर नाम-जप बंद नहीं करना चाहिए कि अभी गुरु नहीं मिले हैं। महाराज जी के अनुसार, नाम-जप साधक को गुरु तक ले जाने वाला भी बन सकता है और गुरु की कृपा से वही साधना आगे भगवत्-प्राप्ति के मार्ग को प्रशस्त करती है।


प्रश्न 5. महाराज जी के जीवन का वह कौन-सा क्षण था जिसमें उन्हें श्रीजी का अनुभव हुआ?

उत्तर:

श्री प्रेमानंद महाराज जी अपने जीवन के बारे में बताते हैं कि प्रारंभ में वे केवल भक्तिभाव से ही नहीं, बल्कि एक जिज्ञासु और खोजी के रूप में आध्यात्मिक मार्ग पर निकले थे। वे अपने स्वरूप और परमात्मा को जानना चाहते थे। लेकिन उनके जीवन में एक ऐसा कठिन समय आया जिसने उनके भीतर गहरी शरणागति का भाव उत्पन्न कर दिया।

महाराज जी बताते हैं कि जब उन्हें पता चला कि उनकी दोनों किडनियाँ खराब हो चुकी हैं, तब उनके जीवन की परिस्थितियाँ अत्यंत कठिन हो गईं। उस समय न उनके पास धन था, न अपना कोई स्थान और न कोई सहारा। बीमारी के कारण कई स्थानों पर रहने में भी कठिनाई हुई। उस समय तक वे साधना, तपस्या और संयम के बल पर आगे बढ़ते रहे थे, लेकिन इस परिस्थिति ने उन्हें भीतर से पूरी तरह भगवान की शरण में पहुँचा दिया।

महाराज जी बताते हैं कि बीमारी और असहाय स्थिति ने उनके भीतर ऐसा भाव जगाया कि अब उनका वास्तविक सहारा केवल भगवान ही हैं। एक आश्रम से निकलने की बात हुई तो उन्होंने यह भाव रखा कि यदि कोई ठेकेदार है तो वह भगवान हैं। उसी पूर्ण शरणागति के साथ वे वहाँ से निकल पड़े और आगे परिस्थितियाँ स्वयं बदलती चली गईं।

महाराज जी इस अनुभव को किसी साधारण चमत्कार के रूप में नहीं, बल्कि पूर्ण आश्रय और शरणागति के क्षण के रूप में बताते हैं। उनके अनुसार, स्वस्थ और समर्थ रहने पर साधना का अभिमान बना रह सकता था, लेकिन बीमारी और असहायता ने उन्हें पूरी तरह भगवान के चरणों में पहुँचा दिया।

इसलिए महाराज जी के जीवन में वह विशेष मोड़ बाहरी सुविधा या किसी चमत्कारी घटना से अधिक, वह क्षण था जब चारों ओर से निराशा दिखाई देने पर उनका हृदय पूरी तरह भगवान और श्रीजी के आश्रय में समर्पित हो गया।

Credit:
“यह लेख संत श्री प्रेमानंद जी महाराज के एकान्तिक वार्तालाप प्रवचन की अमृत वाणी पर आधारित है।”

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