प्रश्न 1.महाराज जी, हमारे अंदर श्रीजी के लिए आपके जैसा भाव कैसे आए?
उत्तर:
श्री प्रेमानंद महाराज जी बताते हैं कि श्रीजी के प्रति गहरा प्रेम केवल विरक्त लोगों के लिए नहीं है। गृहस्थ जीवन जीने वाला व्यक्ति भी उसी प्रेम को प्राप्त कर सकता है, यदि वह अपने जीवन की दिशा बदल दे। समस्या गृहस्थ होने में नहीं है, बल्कि इस बात में है कि हमारा प्रेम अनेक जगह बँटा हुआ है। कभी परिवार में, कभी धन में, कभी मान-सम्मान में और कभी संसार के दूसरे आकर्षणों में। जब तक प्रेम बिखरा रहेगा, तब तक भगवान के प्रति पूर्ण प्रेम जागना कठिन रहेगा।
महाराज जी समझाते हैं कि साधक को अपने परिवार से प्रेम छोड़ना नहीं है, बल्कि उस प्रेम का आधार बदलना है। पत्नी की सेवा करते समय यह भाव रहे कि भगवान इस रूप में मेरे सामने हैं। माता-पिता की सेवा करते समय भी यही भावना हो कि मैं भगवान की सेवा कर रहा हूँ। पुत्र, परिवार और समाज के प्रत्येक व्यक्ति में भगवान का अंश देखकर सेवा की जाए। जब यह दृष्टि विकसित होने लगती है, तब धीरे-धीरे मन का सारा प्रेम भगवान की ओर मुड़ने लगता है। यही भाव अंततः श्रीजी के प्रति प्रेम में बदल जाता है।
महाराज जी आगे कहते हैं कि भगवान को पाने के लिए केवल पूजा-पाठ पर्याप्त नहीं है। भगवान को सबसे अधिक प्रेम प्रिय है। यदि आरती करते समय मन कहीं और भटक रहा हो, तो बाहरी क्रिया का पूरा लाभ नहीं मिल पाता। इसलिए आवश्यक है कि भगवान का नाम जीवन के प्रत्येक कार्य के साथ जुड़ जाए। चलते समय, काम करते समय, भोजन बनाते समय, लोगों की सेवा करते समय और खाली समय में भी भगवान का स्मरण चलता रहे। धीरे-धीरे यही अभ्यास मन को भगवान में स्थिर कर देता है और फिर साधक को हर स्थान पर भगवान की उपस्थिति का अनुभव होने लगता है।
अंत में महाराज जी कहते हैं कि यह भाव एक दिन में नहीं आता। इसके लिए नियमित सत्संग सुनना, नाम-जप करना, सभी के प्रति सद्भाव रखना और किसी में दोष देखने के बजाय भगवान का स्वरूप देखने का अभ्यास करना आवश्यक है। जब नाम-जप से मन शुद्ध होने लगता है, तब प्रेम अपने आप प्रकट होता है। उसी प्रेम से श्रीजी का अनुभव होने लगता है और साधक का जीवन भगवान के प्रेम से भर जाता है। यही श्रीजी के प्रति सच्चा भाव प्राप्त करने का सरल और वास्तविक मार्ग है।
प्रश्न 2. भगवान को जब किसी लीला में विरह और कष्ट होता है, तो क्या उन्हें सचमुच कष्ट होता है?
उत्तर:
श्री प्रेमानंद महाराज जी बताते हैं कि भगवान की लीलाएँ केवल अभिनय या कल्पना नहीं हैं। भगवान जब किसी लीला में विरह, प्रेम या करुणा का अनुभव कराते हैं, तो वह लीला पूर्णतः सत्य होती है। इसलिए जब भगवान किसी विशेष भाव में प्रकट होते हैं, तब उस लीला के अनुसार वही भाव भी प्रकट होता है। भगवान सच्चिदानंद स्वरूप हैं, इसलिए उनकी प्रत्येक लीला भी सत्य और दिव्य होती है। उसे मनुष्य के सामान्य अभिनय की तरह नहीं समझना चाहिए।
महाराज जी आगे समझाते हैं कि भगवान की नित्य लीलाएँ आज भी चल रही हैं। वे केवल त्रेता या द्वापर तक सीमित नहीं हैं। अंतर केवल इतना है कि सामान्य मनुष्य उन्हें देख नहीं पाता। हमारे पास संसार को देखने वाले नेत्र हैं, लेकिन भगवान की लीला देखने के लिए प्रेममय दिव्य दृष्टि चाहिए। यह दृष्टि केवल भजन, नाम-जप और भगवान की कृपा से प्राप्त होती है। जब साधक का हृदय शुद्ध होता है, तब उसे भगवान की लीला का अनुभव होने लगता है।
महाराज जी यह भी बताते हैं कि यदि भगवान की लीला का स्मरण करते हुए साधक के हृदय में करुणा, विरह या प्रेम के भाव जागते हैं, तो यह साधना के लिए शुभ संकेत है। लेकिन ऐसे भावों का प्रदर्शन नहीं करना चाहिए। उन्हें अपने हृदय में सुरक्षित रखना चाहिए। जितना साधक इन भावों को भीतर सँभालकर रखता है, उतने ही वे गहरे होते जाते हैं। धीरे-धीरे भगवान की लीला का चिंतन बढ़ता है और साधक का मन संसार से हटकर भगवान में रमने लगता है।
अंत में महाराज जी कहते हैं कि भगवान की लीला को समझने का मार्ग केवल तर्क नहीं, बल्कि प्रेम है। जब हृदय में भगवान के प्रति निष्कपट प्रेम जागता है, तब उनके सुख-दुःख, विरह और मिलन के भाव भी साधक के हृदय में उतरने लगते हैं। यही प्रेम आगे चलकर भगवान की नित्य लीला में प्रवेश का माध्यम बनता है। इसलिए भगवान की लीलाओं को केवल कथा न समझकर, प्रेमपूर्वक उनका स्मरण और नाम-जप करते रहना चाहिए। यही साधक को भगवान के और निकट ले जाता है।
प्रश्न 3. भोगों में लिप्त हूँ; कभी पूजा करता हूँ, कभी नहीं कर पाता हूँ।
उत्तर:
श्री प्रेमानंद महाराज जी बताते हैं कि यदि किसी साधक का मन बार-बार भोगों की ओर चला जाता है और पूजा-पाठ में नियमितता नहीं बन पाती, तो सबसे पहले उसे निराश नहीं होना चाहिए। यह स्वीकार करना ही आध्यात्मिक जीवन की अच्छी शुरुआत है कि अभी मन भगवान में पूरी तरह स्थिर नहीं हुआ है। जब तक मन में विषयों का आकर्षण बना रहेगा, तब तक कभी भजन में रुचि होगी और कभी संसार की ओर मन भागेगा। इसलिए इस स्थिति से घबराने के बजाय धैर्यपूर्वक अभ्यास करना आवश्यक है।
महाराज जी कहते हैं कि भगवान को पाने के लिए केवल कुछ समय पूजा कर लेना पर्याप्त नहीं है। जीवन की दिशा भगवान की ओर मोड़नी पड़ती है। यदि दिन भर मन संसार में ही लगा रहे और केवल कुछ मिनट भगवान को दिए जाएँ, तो मन जल्दी स्थिर नहीं होगा। इसलिए जहाँ भी अवसर मिले, भगवान का नाम लेते रहना चाहिए। काम करते हुए, चलते हुए, बैठते हुए और खाली समय में भी नाम-जप का अभ्यास करते रहना चाहिए। धीरे-धीरे भगवान का स्मरण बढ़ने लगेगा और भोगों का आकर्षण अपने आप कम होने लगेगा।
महाराज जी यह भी समझाते हैं कि साधना में गिरना या रुक जाना असफलता नहीं है। यदि किसी दिन पूजा न हो पाए, तो अपराधबोध में डूबने के बजाय अगले ही क्षण फिर से भगवान की ओर लौट आना चाहिए। भगवान अपने भक्त के प्रयास को देखते हैं। जो व्यक्ति बार-बार उठकर भगवान का आश्रय लेता है, भगवान उसकी सहायता अवश्य करते हैं। इसलिए अपने दोषों को देखकर हिम्मत नहीं हारनी चाहिए, बल्कि उन्हें दूर करने का प्रयास करना चाहिए।
अंत में महाराज जी कहते हैं कि भोगों का आकर्षण केवल तब तक रहता है, जब तक भगवान के नाम का वास्तविक आनंद अनुभव नहीं होता। जैसे-जैसे नाम-जप में प्रेम बढ़ता है, वैसे-वैसे संसार की आसक्ति कम होने लगती है। इसलिए साधक को नियमित नाम-जप, सत्संग और भगवान के स्मरण को अपने जीवन का हिस्सा बना लेना चाहिए। यही धीरे-धीरे मन को भोगों से हटाकर भगवान की ओर ले जाता है और जीवन को स्थिर भक्ति की ओर अग्रसर करता है।
प्रश्न 4. मेरा मन लोगों के कपड़े, रुपये और प्रसिद्धि देखकर उन्हें जज करता है, क्या करूँ?
उत्तर:
श्री प्रेमानंद महाराज जी बताते हैं कि दूसरों को उनके कपड़ों, धन, पद या प्रसिद्धि के आधार पर आँकना मन की एक पुरानी आदत है। जब मन संसार के बाहरी रूपों में उलझा रहता है, तब वह हर व्यक्ति की तुलना करने लगता है। लेकिन साधक का उद्देश्य तुलना करना नहीं, बल्कि अपनी दृष्टि को शुद्ध बनाना होना चाहिए। यदि मन बार-बार दूसरों के बाहरी रूप पर जाता है, तो उसे तुरंत भगवान की ओर मोड़ने का अभ्यास करना चाहिए।
महाराज जी समझाते हैं कि भगवान की ओर बढ़ने वाला व्यक्ति धीरे-धीरे हर जीव में एक ही परम तत्व को देखना सीखता है। ज्ञानी की दृष्टि सभी में एक ही तत्व को देखती है, जबकि प्रेमी भक्त हर स्थान पर अपने प्रभु का स्वरूप अनुभव करता है। इसलिए साधक को यह अभ्यास करना चाहिए कि सामने वाला व्यक्ति अमीर है या गरीब, प्रसिद्ध है या साधारण—इन बातों से अधिक महत्वपूर्ण यह है कि वह भी भगवान का अंश है। जब यह दृष्टि विकसित होने लगती है, तब मन अपने आप दूसरों का मूल्यांकन करना छोड़ देता है।
महाराज जी आगे कहते हैं कि दूसरों में दोष देखने की आदत वास्तव में अपने मन की अशुद्धि का संकेत है। इसलिए बार-बार अपने मन को टोकना चाहिए। जैसे ही किसी के प्रति तुलना या निर्णय का भाव आए, उसी समय भगवान का नाम लेकर यह स्मरण करना चाहिए कि वास्तविक महत्व बाहरी वस्तुओं का नहीं, बल्कि भगवान से जुड़े रहने का है। ऐसा अभ्यास धीरे-धीरे मन को विनम्र बनाता है और ईर्ष्या, तुलना तथा अहंकार जैसी प्रवृत्तियाँ कम होने लगती हैं।
अंत में महाराज जी बताते हैं कि भगवान के प्रेम का मार्ग सबमें भगवान को देखने की दृष्टि सिखाता है। जब साधक का मन भगवान के नाम में स्थिर होने लगता है, तब वह लोगों के कपड़ों, धन या प्रसिद्धि को नहीं, बल्कि उनके भीतर स्थित भगवान के अंश को देखने लगता है। यही शुद्ध दृष्टि है और यही भक्ति की वास्तविक पहचान है। इसलिए तुलना छोड़कर भगवान के नाम और स्मरण में मन लगाना ही इस समस्या का सबसे सरल और स्थायी समाधान है।
प्रश्न 5. नामजप से पापों का नाश हो जाता है, पर आपने कहा है कि कर्म भोगना पड़ेगा, इसका क्या अर्थ है?
उत्तर:
श्री प्रेमानंद महाराज जी बताते हैं कि नामजप की महिमा अत्यंत महान है, लेकिन इसका सही अर्थ समझना भी आवश्यक है। कई लोगों के मन में यह प्रश्न आता है कि यदि भगवान का नाम सभी पापों का नाश कर देता है, तो फिर कर्मों का फल क्यों भोगना पड़ता है? महाराज जी इस भ्रम को बहुत सरल शब्दों में दूर करते हैं। वे बताते हैं कि मनुष्य के कर्म तीन प्रकार के होते हैं—संचित, क्रियमाण और प्रारब्ध। भगवान का नाम इन तीनों पर अलग-अलग प्रकार से प्रभाव डालता है।
महाराज जी समझाते हैं कि जो कर्म पहले से प्रारब्ध के रूप में फल देने के लिए तैयार हो चुके हैं, उन्हें सामान्यतः भोगना ही पड़ता है। जैसे कोई तीर धनुष से निकल चुका हो, तो उसे बीच रास्ते में रोकना कठिन होता है। उसी प्रकार प्रारब्ध का फल शरीर को प्राप्त होता है। लेकिन भगवान का भजन करने वाला व्यक्ति उन परिस्थितियों में टूटता नहीं है। भगवान उसे दुःख सहने की शक्ति, धैर्य और मानसिक शांति प्रदान करते हैं। इसलिए भजन करने वाला व्यक्ति कठिन परिस्थितियों में भी निराश नहीं होता।
इसके साथ ही महाराज जी बताते हैं कि भगवान का नाम संचित कर्मों को भस्म करने की शक्ति रखता है। अर्थात अनेक जन्मों से संचित कर्म धीरे-धीरे समाप्त होने लगते हैं। वहीं यदि साधक भगवान का स्मरण करते हुए धर्ममय जीवन जीता है, तो वर्तमान में बनने वाले क्रियमाण कर्म भी बंधन का कारण नहीं बनते। इस प्रकार नामजप केवल भविष्य को ही नहीं, बल्कि पूरे जीवन की दिशा को बदल देता है। इसलिए यह कहना कि भजन का कोई प्रभाव नहीं होता, बिल्कुल गलत है। वास्तव में भजन मनुष्य को कर्मबंधन से मुक्त होने की दिशा में आगे बढ़ाता है।
अंत में महाराज जी कहते हैं कि साधक का लक्ष्य केवल दुःख से बचना नहीं होना चाहिए, बल्कि भगवान की प्राप्ति होना चाहिए। यदि प्रारब्ध का कुछ फल शरीर को भोगना भी पड़े, तो भगवान का नाम उसे सहज बना देता है। इसलिए परिस्थिति कैसी भी हो, नामजप कभी नहीं छोड़ना चाहिए। यही नाम मनुष्य को निराशा से बचाता है, कर्मों का भार हल्का करता है और अंततः भगवान के चरणों तक पहुँचा देता है। यही इस प्रश्न का वास्तविक अर्थ है।
प्रश्न 6. मैं 14 साल का हूँ और अखंड ब्रह्मचारी रहना चाहता हूँ, क्या करूँ?
उत्तर:
श्री प्रेमानंद महाराज जी बताते हैं कि यदि कम उम्र में किसी बालक के मन में भगवान की प्राप्ति और ब्रह्मचर्य का संकल्प जागता है, तो यह अत्यंत शुभ बात है। लेकिन केवल इच्छा कर लेने से यह मार्ग पूरा नहीं होता। इसके लिए जीवन में अनुशासन, सत्संग और निरंतर भगवान का स्मरण आवश्यक है। ब्रह्मचर्य केवल शरीर का संयम नहीं, बल्कि मन, वाणी और इंद्रियों का भी संयम है। इसलिए सबसे पहले अपने मन को भगवान की ओर लगाना चाहिए।
महाराज जी समझाते हैं कि इस आयु में संगति का बहुत बड़ा प्रभाव पड़ता है। यदि मित्र, मोबाइल, मनोरंजन या अन्य विषय मन को भटकाने लगें, तो ब्रह्मचर्य की रक्षा कठिन हो जाती है। इसलिए ऐसे वातावरण से जितना संभव हो, बचना चाहिए जो मन में विषय-वासनाएँ बढ़ाए। इसके स्थान पर भगवान का नाम, सत्संग, अच्छे संस्कार और महापुरुषों का संग अपनाना चाहिए। यही मन को शुद्ध और दृढ़ बनाते हैं।
महाराज जी आगे कहते हैं कि ब्रह्मचर्य का पालन डर या दबाव से नहीं, बल्कि भगवान के प्रति प्रेम से होना चाहिए। यदि मन भगवान के नाम में आनंद लेने लगे, तो विषयों का आकर्षण धीरे-धीरे कम होने लगता है। इसलिए केवल यह न सोचें कि क्या छोड़ना है, बल्कि यह सोचें कि भगवान के साथ अपना संबंध कैसे मजबूत करना है। जब नाम-जप, प्रार्थना और भजन जीवन का हिस्सा बन जाते हैं, तब संयम भी सहज होने लगता है। यही स्थायी मार्ग है।
अंत में महाराज जी कहते हैं कि जो बालक अभी से भगवान का आश्रय ले लेता है और नियमित भजन करता है, उसका जीवन सही दिशा में आगे बढ़ता है। यदि कभी मन डगमगाए भी, तो निराश नहीं होना चाहिए। तुरंत भगवान का नाम लेकर फिर से अपने लक्ष्य की ओर लौट आना चाहिए। भगवान का आश्रय, सत्संग और पवित्र आचरण ही अखंड ब्रह्मचर्य की सबसे मजबूत नींव हैं। इन्हीं के सहारे साधक अपने संकल्प को जीवन भर सुरक्षित रख सकता है।
प्रश्न 7. जॉब (Job) करते समय उसी में डूब जाती हूँ, जिससे नाम-जप छूट जाता है!
उत्तर:
श्री प्रेमानंद महाराज जी बताते हैं कि गृहस्थ जीवन में नौकरी, व्यापार और परिवार की जिम्मेदारियाँ निभाना कोई दोष नहीं है। समस्या तब होती है, जब मन पूरी तरह काम में ही डूब जाता है और भगवान का स्मरण छूट जाता है। मनुष्य को अपने कर्तव्य अवश्य निभाने चाहिए, लेकिन यह नहीं भूलना चाहिए कि जीवन का अंतिम उद्देश्य केवल काम करना नहीं, बल्कि भगवान से जुड़ना भी है। इसलिए ऐसा अभ्यास करना चाहिए कि काम भी चलता रहे और भीतर भगवान का स्मरण भी बना रहे।
महाराज जी समझाते हैं कि भगवान का नाम लेने के लिए हमेशा अलग से समय और स्थान की आवश्यकता नहीं होती। जिस प्रकार मनुष्य काम करते हुए भी अनेक बातों का ध्यान रख सकता है, उसी प्रकार धीरे-धीरे भगवान का नाम भी मन के भीतर चलता रह सकता है। शुरुआत में यह कठिन लग सकता है, लेकिन नियमित अभ्यास से यह स्वाभाविक बन जाता है। इसलिए साधक को यह नहीं सोचना चाहिए कि नौकरी के कारण भजन नहीं हो सकता, बल्कि यह प्रयास करना चाहिए कि नौकरी करते हुए भी भगवान को न भूले।
महाराज जी आगे कहते हैं कि यदि काम की व्यस्तता के कारण कभी नाम-जप छूट भी जाए, तो निराश नहीं होना चाहिए। जैसे ही अवसर मिले, तुरंत भगवान का स्मरण कर लेना चाहिए। सुबह उठते ही, काम शुरू करने से पहले, भोजन से पहले, यात्रा के समय और रात को सोने से पहले कुछ समय भगवान के नाम के लिए अवश्य निकालना चाहिए। धीरे-धीरे यही छोटे-छोटे प्रयास पूरे दिन भगवान की याद बनाए रखने में सहायता करते हैं। भगवान बाहरी दिखावे से अधिक भक्त की सच्ची भावना देखते हैं। इसलिए ईमानदारी से किया गया छोटा-सा प्रयास भी आध्यात्मिक प्रगति का कारण बनता है।
अंत में महाराज जी कहते हैं कि नौकरी और भजन एक-दूसरे के विरोधी नहीं हैं। यदि मनुष्य अपने प्रत्येक कार्य को भगवान को समर्पित भाव से करे और भीतर भगवान का नाम बनाए रखे, तो वही नौकरी भी साधना बन सकती है। इसलिए काम छोड़ने की आवश्यकता नहीं है, बल्कि काम करते हुए भगवान को याद रखने की आदत विकसित करनी चाहिए। यही गृहस्थ साधक के लिए सबसे सरल और सफल मार्ग है।
प्रश्न 8. भगवद्-बोध और भगवत्-प्राप्त महापुरुषों में क्या अंतर होता है?
उत्तर:
श्री प्रेमानंद महाराज जी बताते हैं कि भगवद्-बोध और भगवत्-प्राप्ति दोनों अत्यंत उच्च आध्यात्मिक अवस्थाएँ हैं, लेकिन इनमें सूक्ष्म अंतर है। भगवद्-बोध संपन्न महापुरुष वह हैं, जिन्हें भगवान के तत्व का साक्षात्कार हो चुका है। उनकी दृष्टि में सभी जीवों और समस्त सृष्टि में एक ही परम तत्व दिखाई देता है। वे किसी में ऊँच-नीच या भेदभाव नहीं देखते। उनके लिए हर प्राणी में वही दिव्य सत्य विद्यमान होता है।
महाराज जी आगे समझाते हैं कि भगवत्-प्राप्त महापुरुष की अनुभूति इससे भी अलग प्रकार की होती है। यदि उनका इष्ट भगवान श्रीकृष्ण हैं, तो उन्हें चारों ओर श्रीकृष्ण का ही स्वरूप दिखाई देता है। यदि उनका प्रेम भगवान श्रीराम में है, तो वे संपूर्ण जगत में श्रीराम का ही दर्शन करते हैं। अर्थात ज्ञानी महापुरुष जहाँ सर्वत्र एक ही ब्रह्मतत्त्व का अनुभव करते हैं, वहीं प्रेममय भक्त अपने आराध्य भगवान के सजीव स्वरूप का अनुभव करता है। दोनों की अनुभूति दिव्य है, लेकिन उनकी दृष्टि का भाव अलग होता है।
महाराज जी यह भी स्पष्ट करते हैं कि इन अवस्थाओं को फिल्मों या कल्पनाओं की तरह नहीं समझना चाहिए। भगवान का साक्षात्कार किसी चमत्कार या केवल प्रकाश दिखाई देने तक सीमित नहीं है। यह शास्त्रसम्मत अनुभूति है, जो दीर्घकालीन साधना, भगवान की कृपा और शुद्ध भक्ति से प्राप्त होती है। इसलिए साधक को बाहरी चमत्कारों के पीछे नहीं भागना चाहिए, बल्कि अपने भजन, नाम-जप और आचरण को शुद्ध बनाने पर ध्यान देना चाहिए। यही वास्तविक आध्यात्मिक प्रगति का मार्ग है।
अंत में महाराज जी कहते हैं कि साधक का लक्ष्य किसी विशेष अनुभव की इच्छा करना नहीं होना चाहिए। उसे भगवान का नाम लेकर, सत्संग सुनकर और अपने जीवन को पवित्र बनाकर निरंतर आगे बढ़ते रहना चाहिए। जब भगवान की कृपा होगी, तब उचित समय पर स्वयं ही वह अनुभूति प्राप्त होगी जो शब्दों से परे है। इसलिए साधना में धैर्य, विनम्रता और भगवान पर पूर्ण विश्वास बनाए रखना ही सबसे बड़ा साधन है।
Credit:
“यह लेख संत श्री प्रेमानंद जी महाराज के एकान्तिक वार्तालाप प्रवचन की अमृत वाणी पर आधारित है।”
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