प्रश्न 1.महाराज जी, क्या मनुष्य को अपने कर्मों का फल केवल अगले जन्म में मिलता है, या कुछ पापों का दंड इसी जन्म में भी मिल सकता है? भगवान के भजन से कर्मों का प्रभाव कैसे समाप्त होता है?
उत्तर:
श्री प्रेमानंद महाराज जी बताते हैं कि यह मान लेना उचित नहीं है कि हर कर्म का फल केवल अगले जन्म में ही मिलता है। कर्मों का विधान अत्यंत सूक्ष्म और व्यापक है। कुछ सामान्य कर्मों का फल समय आने पर अगले जन्मों में मिलता है, लेकिन जब कोई पाप अत्यंत गंभीर हो जाता है, तब उसका दंड इसी जीवन में भी दिखाई देने लगता है। ऐसे व्यक्ति के जीवन में अशांति, भय, चिंता, उद्विग्नता, असुरक्षा और अनेक प्रकार के दुःख उत्पन्न हो जाते हैं। महाराज जी स्पष्ट करते हैं कि भगवान का न्याय कभी अन्यायपूर्ण नहीं होता। जैसे सांसारिक न्याय व्यवस्था में भी हर अपराध का निर्णय तुरंत नहीं होता, उसी प्रकार ईश्वर के न्याय में भी उचित समय पर कर्मों का फल अवश्य प्राप्त होता है।
महाराज जी आगे बताते हैं कि मनुष्य के जीवन में तीन प्रकार के कर्म कार्य करते हैं—संचित, क्रियमाण और प्रारब्ध। भगवान का भजन इन तीनों पर प्रभाव डाल सकता है। निरंतर नाम-जप और भगवान की शरण से संचित कर्म धीरे-धीरे भस्म होने लगते हैं। वर्तमान में किए जाने वाले कर्म यदि भगवान को समर्पित होकर किए जाएँ, तो वे बंधन का कारण नहीं बनते। वहीं प्रारब्ध का प्रभाव शरीर पर तो आ सकता है, लेकिन भगवान का भजन साधक को इतना बल देता है कि वह उन परिस्थितियों से टूटता नहीं और भगवान से विमुख भी नहीं होता। यही भजन की वास्तविक शक्ति है।
अंत में महाराज जी प्रेरणा देते हैं कि मनुष्य को पाप करने के बाद दंड से बचने की आशा नहीं रखनी चाहिए। यदि कर्मों के बंधन से मुक्त होना है, तो भगवान के नाम का आश्रय लेना ही एकमात्र उपाय है। मनुष्य जन्म केवल सुख-दुःख भोगने के लिए नहीं, बल्कि भगवान का भजन करके कर्मबंधन से मुक्त होने के लिए मिला है। इसलिए जीवन को भगवान के नाम, परोपकार और पवित्र आचरण से जोड़कर ऐसा बनाना चाहिए कि कर्म बंधन समाप्त हों और भगवान की प्राप्ति का मार्ग प्रशस्त हो जाए।
प्रश्न 2. गुरु के प्रकट (स्थूल) शरीर का शिष्यों के जीवन में क्या महत्व है? क्या गुरु के प्रति प्रेम और प्रार्थना से उनकी आयु बढ़ सकती है?
उत्तर:
श्री प्रेमानंद महाराज जी बताते हैं कि गुरु का प्रकट स्वरूप साधकों के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण होता है। गुरु के दर्शन, उनके साथ बैठकर सत्संग सुनना और उनके सान्निध्य में रहना केवल ज्ञान प्राप्त करने का माध्यम नहीं है, बल्कि उससे साधक को ऐसी आध्यात्मिक शक्ति प्राप्त होती है, जो केवल पुस्तकों या रिकॉर्ड किए गए प्रवचनों से नहीं मिलती। महाराज जी कहते हैं कि गुरु की वाणी सुनना लाभदायक है, लेकिन प्रत्यक्ष सान्निध्य का प्रभाव अलग होता है। भगवत्प्रेमी महापुरुषों की उपस्थिति से साधक के भीतर भजन की शक्ति, श्रद्धा और आध्यात्मिक सामर्थ्य बढ़ती है।
महाराज जी यह भी बताते हैं कि संसार में प्रत्येक शरीर की आयु निश्चित है और वह भगवान की इच्छा के अधीन है। फिर भी भक्तों का प्रेम, शुभ भावना और सच्ची प्रार्थना अत्यंत प्रभावशाली होती है। वे अपने जीवन का उदाहरण देते हुए कहते हैं कि अनेक भक्त उनके दीर्घायु होने की प्रार्थना करते हैं और उन्हें ऐसा अनुभव होता है कि भक्तों की निष्कपट भावना तथा गुरुजनों का आशीर्वाद उन्हें निरंतर सेवा और सत्संग करने की शक्ति प्रदान करता है। किंतु वे यह भी स्पष्ट करते हैं कि अंतिम निर्णय भगवान की इच्छा से ही होता है। यदि भगवान चाहें, तो असंभव भी संभव हो सकता है, और यदि उनकी इच्छा न हो, तो कोई भी उपाय सफल नहीं हो सकता।
अंत में महाराज जी कहते हैं कि साधक का उद्देश्य केवल गुरु के स्थूल शरीर से जुड़े रहना नहीं होना चाहिए, बल्कि उनके सान्निध्य का भरपूर लाभ उठाकर अपने जीवन को इतना दृढ़ बनाना चाहिए कि माया उसे विचलित न कर सके। गुरु का प्रकट स्वरूप जब तक उपलब्ध है, तब तक उनके दर्शन, सत्संग और उपदेशों का लाभ लेना चाहिए। साथ ही यह भाव रखना चाहिए कि गुरु की प्रत्येक श्वास भगवान की इच्छा से चल रही है। इसलिए उनके लिए प्रेम, श्रद्धा और मंगलकामना अवश्य रखें, लेकिन अंतिम भरोसा केवल भगवान की इच्छा पर ही होना चाहिए। यही गुरु-भक्ति का संतुलित और शुद्ध स्वरूप है।
प्रश्न 3. भगवत्प्राप्ति के लिए घर छोड़ने वाले साधक को प्रारंभ में एकांत भजन करना चाहिए या साधु-संग में रहकर साधना करनी चाहिए?
उत्तर:
श्री प्रेमानंद महाराज जी बताते हैं कि जो साधक घर-परिवार छोड़कर केवल भगवान की प्राप्ति के उद्देश्य से निकलता है, उसे साधना के प्रारंभिक चरण में एकांत के बजाय साधु-संग का आश्रय लेना चाहिए। प्रारंभिक अवस्था में साधक का मन अभी पूरी तरह स्थिर नहीं होता। उसके भीतर पुराने संस्कार, विषय-वासनाएँ और अनेक प्रकार के मानसिक आक्रमण आते रहते हैं। यदि ऐसे समय में वह अकेला रहने लगे, तो उसके विचलित होने की संभावना बढ़ जाती है। इसलिए नए साधक के लिए संतों के बीच रहना ही सबसे सुरक्षित मार्ग है।
महाराज जी समझाते हैं कि साधु-संग साधक के चारों ओर एक सुरक्षा कवच की तरह कार्य करता है। जिस प्रकार किसी छोटे पौधे के चारों ओर बाड़ लगा दी जाती है ताकि पशु उसे नष्ट न कर दें, उसी प्रकार साधना के प्रारंभिक चरण में संतों का संग साधक को विकारों से बचाता है। संतों की संगति में भगवान की चर्चा, नाम-जप, सेवा और पवित्र वातावरण निरंतर मिलता रहता है। इससे मन बार-बार भगवान की ओर लौटता है और गलत विचारों को बढ़ने का अवसर नहीं मिलता। यदि यह सुरक्षा प्रारंभ में न मिले, तो साधक का उत्साह भी कम हो सकता है और साधना में गिरावट आने की आशंका रहती है।
महाराज जी आगे बताते हैं कि वास्तविक एकांत केवल जंगल या किसी निर्जन स्थान में रहने का नाम नहीं है। यदि मन भगवान में स्थिर नहीं है, तो जंगल में बैठकर भी मन संसार में भटकता रहेगा। इसके विपरीत यदि हृदय भगवान के चिंतन में डूबा है, तो भीड़-भाड़ के बीच भी साधक एकांत का अनुभव कर सकता है। इसलिए पहले मन को भगवदाकार बनाना आवश्यक है। जब साधक का मन भगवान में टिकने लगे, तब उसके लिए हर स्थान साधना का स्थान बन जाता है।
अंत में महाराज जी वर्तमान समय की परिस्थितियों का उल्लेख करते हुए कहते हैं कि आज के युग में अकेले घूमते हुए साधना करना पहले की अपेक्षा अधिक कठिन है। इसलिए साधकों को तीर्थों, धामों और संतों के सान्निध्य में रहकर भजन करना चाहिए। वहीं रहकर अपने जीवन को सुरक्षित रखते हुए नाम-जप, सत्संग और भगवान के चिंतन में आगे बढ़ना ही सबसे उचित मार्ग है। यही साधना को स्थिर बनाता है और भगवत्प्राप्ति की दिशा में साधक को दृढ़ करता है।
प्रश्न 4. जीवन में बार-बार आने वाली प्रतिकूल परिस्थितियों में मन को शांत रखते हुए भगवान के नाम में कैसे लगाया जाए?
उत्तर:
श्री प्रेमानंद महाराज जी बताते हैं कि यह कहना उचित नहीं है कि किसी व्यक्ति के जीवन में केवल प्रतिकूलताएँ ही आती हैं। मनुष्य का जीवन शुभ और अशुभ कर्मों का मिश्रण है, इसलिए उसमें अनुकूल और प्रतिकूल दोनों प्रकार की परिस्थितियाँ आती रहती हैं। कई बार मन प्रतिकूल घटनाओं को अधिक महत्व देता है, इसलिए वे अधिक बड़ी दिखाई देती हैं। साधक को सबसे पहले यह समझना चाहिए कि ये परिस्थितियाँ स्थायी नहीं हैं। सुख और दुःख दोनों ही अस्थायी हैं और समय के साथ बदल जाते हैं।
महाराज जी कहते हैं कि प्रतिकूल परिस्थितियाँ भगवान से दूर जाने का नहीं, बल्कि उनके और निकट आने का अवसर होती हैं। जैसे कोई बच्चा संकट आने पर अपनी माँ या पिता की शरण में भागता है, वैसे ही साधक को भी दुःख, भय या अशांति के समय भगवान के नाम का आश्रय लेना चाहिए। भगवान का नाम मन को शांति देता है और भीतर ऐसा साहस उत्पन्न करता है कि कठिन परिस्थितियाँ भी साधक को भगवान से विमुख नहीं कर पातीं। वास्तव में प्रतिकूल समय में किया गया नाम-जप अधिक गहरा और प्रभावशाली होता है।
महाराज जी आगे बताते हैं कि गृहस्थ जीवन में भी अनेक प्रकार की कठिनाइयाँ आती हैं, विशेषकर पति-पत्नी के संबंधों में। ऐसे समय में साधक को अपने अधिकारों की अपेक्षा अपने कर्तव्य पर ध्यान देना चाहिए। यदि वह धर्म, प्रेम, धैर्य और संयम के साथ अपना व्यवहार बनाए रखे, तो धीरे-धीरे संबंधों में भी परिवर्तन आने लगता है। क्रोध, कटुता और प्रतिक्रिया से प्रतिकूलता बढ़ती है, जबकि प्रेम और धर्म से वह कम होने लगती है। इसलिए कठिन परिस्थितियों में भी धर्म का मार्ग नहीं छोड़ना चाहिए।
अंत में महाराज जी कहते हैं कि प्रतिकूलता से घबराने के बजाय उसे भगवान की ओर बढ़ने का साधन बना लेना चाहिए। निरंतर नाम-जप, सत्संग, पवित्र भोजन, धर्ममय आचरण और भगवान की शरण—ये साधक को भीतर से इतना मजबूत बना देते हैं कि परिस्थितियाँ चाहे जैसी हों, उसका मन भगवान के चरणों में स्थिर बना रहता है। यही प्रतिकूलता पर विजय पाने का वास्तविक उपाय है।
प्रश्न 5. भगवत्प्राप्ति की पात्रता कैसे प्राप्त करें? शरीर के रोग और कष्टों के बीच स्थितप्रज्ञ रहकर भगवान का भजन कैसे करें?
उत्तर:
श्री प्रेमानंद महाराज जी बताते हैं कि भगवत्प्राप्ति की सबसे बड़ी पात्रता किसी विशेष योग्यता, विद्वत्ता या बाहरी साधनों से नहीं बनती, बल्कि भगवान के नाम में दृढ़ विश्वास और निरंतर नाम-जप से बनती है। वे कहते हैं कि यदि मनुष्य भगवान के गुणों का स्मरण करे, उनकी कथा सुने और श्रद्धा के साथ नाम-जप करता रहे, तो धीरे-धीरे उसके भीतर आध्यात्मिक शक्ति का विकास होने लगता है। भगवान का नाम ही ऐसा आधार है जिसके साथ अन्य सभी साधन सार्थक बनते हैं। यदि नाम-जप नहीं है, तो बाकी साधन भी अपने पूर्ण फल तक नहीं पहुँचा पाते। इसलिए साधक को सबसे पहले अपने जीवन में भगवान के नाम को प्रमुख स्थान देना चाहिए।
महाराज जी आगे समझाते हैं कि शरीर में रोग और कष्ट आना कोई असामान्य बात नहीं है। यह शरीर स्वयं परिवर्तनशील और नश्वर है, इसलिए इसमें किसी भी समय कोई भी रोग उत्पन्न हो सकता है। लेकिन शरीर की पीड़ा से अधिक कष्ट उस मन को होता है जो भगवान से दूर है। यदि मन भगवान के नाम में लग जाए, तो शरीर का दुःख भी उतना भारी अनुभव नहीं होता। वे अपने जीवन का उदाहरण देते हुए बताते हैं कि शारीरिक कष्ट होने पर भी यदि चित्त भगवान में स्थित रहे, तो मनुष्य भीतर से प्रसन्न और शांत रह सकता है। यही स्थितप्रज्ञता का प्रारंभिक स्वरूप है।
महाराज जी यह भी बताते हैं कि नाम-जप की साधना धीरे-धीरे विकसित होती है। पहले वाचिक जप, फिर उपांशु जप और उसके बाद मानसिक जप की अवस्था आती है। जब साधक का अभ्यास परिपक्व हो जाता है, तब नाम का स्मरण बिना प्रयास के भी चलता रहता है। उस समय मन को विशेष शांति और विश्राम का अनुभव होता है, क्योंकि नाम साधक का स्वभाव बन जाता है। इसलिए साधक को धैर्यपूर्वक अभ्यास करते रहना चाहिए और नाम-जप की प्रत्येक अवस्था का आदर करना चाहिए।
अंत में महाराज जी कहते हैं कि शरीर की बीमारी को जीवन का सबसे बड़ा संकट नहीं मानना चाहिए। वास्तविक संकट भगवान को भूल जाना है। यदि रोग के समय भी भगवान का नाम, उनकी शरण और उनके प्रति विश्वास बना रहे, तो साधक कठिन से कठिन परिस्थिति में भी आध्यात्मिक रूप से आगे बढ़ता रहता है। इसलिए शरीर की चिंता से अधिक मन को भगवान में लगाने का प्रयास करना चाहिए। यही भगवत्प्राप्ति की पात्रता है और यही जीवन का वास्तविक कल्याण है।
प्रश्न 6. यदि सब कुछ भगवान की लीला और प्रारब्ध के अनुसार होता है, तो मनुष्य की साधना और भजन का क्या महत्व है? क्या भगवत्प्राप्ति भी प्रारब्ध से होती है?
उत्तर:
श्री प्रेमानंद महाराज जी बताते हैं कि यह सत्य है कि मनुष्य के जीवन में अनेक परिस्थितियाँ प्रारब्ध के अनुसार आती हैं, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि भगवत्प्राप्ति भी केवल प्रारब्ध से हो जाएगी। प्रारब्ध का कार्य केवल मनुष्य को शुभ और अशुभ परिस्थितियों का अनुभव कराना है। किस परिवार में जन्म होगा, जीवन में कौन-से सुख-दुःख मिलेंगे और किन परिस्थितियों का सामना करना पड़ेगा—यह प्रारब्ध के अंतर्गत आता है। लेकिन भगवान की प्राप्ति केवल प्रारब्ध के भरोसे नहीं होती। उसके लिए साधक को स्वयं भगवान का भजन करना पड़ता है।
महाराज जी जय-विजय और सनकादि ऋषियों के प्रसंग का उल्लेख करते हुए समझाते हैं कि भगवान की दिव्य लीलाएँ सामान्य जीवों के कर्मों जैसी नहीं होतीं। भगवान जब अवतार लेकर कोई विशेष लीला करना चाहते हैं, तब उनके पार्षद भी उसी उद्देश्य से भूमिका निभाते हैं। इसलिए उन घटनाओं को अपने जीवन के प्रारब्ध से जोड़कर नहीं देखना चाहिए। साधारण मनुष्य का जीवन कर्म और प्रारब्ध के अधीन होता है, जबकि भगवान की लीलाएँ उनके दिव्य संकल्प से संचालित होती हैं।
महाराज जी आगे स्पष्ट करते हैं कि मनुष्य जन्म केवल सुख-दुःख भोगने के लिए नहीं मिला है। यदि साधक यह सोचकर बैठ जाए कि जो होना है, वह अपने आप हो जाएगा, तो वह अपने जीवन के उद्देश्य से दूर हो जाएगा। भगवान ने मनुष्य को इसलिए जन्म दिया है कि वह भजन करके कर्मबंधनों से मुक्त हो और भगवान की प्राप्ति करे। प्रारब्ध केवल सांसारिक परिस्थितियाँ देता है, लेकिन मोक्ष और भगवत्प्राप्ति साधना, नाम-जप और भगवान की शरण से ही संभव होती है।
अंत में महाराज जी कहते हैं कि साधक को प्रारब्ध का बहाना बनाकर आलस्य नहीं करना चाहिए। परिस्थितियाँ जैसी भी हों, भगवान का नाम, सत्संग और भजन कभी नहीं छोड़ना चाहिए। यही साधना धीरे-धीरे प्रारब्ध के प्रभाव से ऊपर उठने की शक्ति देती है और अंततः भगवान की प्राप्ति का मार्ग खोलती है। इसलिए जीवन का भरोसा प्रारब्ध पर नहीं, बल्कि भगवान के नाम और उनकी कृपा पर रखना चाहिए। यही महाराज जी का इस प्रश्न पर स्पष्ट संदेश है।
प्रश्न 7. भजन, सेवा और दान को गुप्त रखने का क्या महत्व है? यदि मन में अपनी साधना और सेवा का प्रचार कराने की इच्छा आए, तो अहंकार से कैसे बचें?
उत्तर:
श्री प्रेमानंद महाराज जी बताते हैं कि भजन, सेवा और दान का वास्तविक मूल्य तब तक बना रहता है, जब तक उनमें अहंकार और प्रसिद्धि की इच्छा नहीं जुड़ती। साधक कई बार भगवान के लिए सेवा करता है, लेकिन उसके मन में यह इच्छा भी रहती है कि लोग उसकी प्रशंसा करें, गुरु उसकी सेवा को जानें या समाज उसके त्याग की चर्चा करे। महाराज जी कहते हैं कि यही भावना साधना की सबसे बड़ी बाधा है। यह अहंकार का सूक्ष्म रूप है, जो साधक को भीतर से कमजोर कर देता है। इसलिए भजन और सेवा जितनी गुप्त रहेगी, उतनी ही अधिक फलदायी होगी।
महाराज जी समझाते हैं कि सच्चे गुरु को यह बताने की आवश्यकता नहीं होती कि शिष्य कितना जप कर रहा है या कितनी सेवा कर रहा है। गुरु केवल बाहरी व्यक्ति नहीं हैं, वे साधक के हृदय में स्थित भगवान के स्वरूप हैं। यदि उन्होंने मंत्र दिया है, तो वे साधक की साधना से अनभिज्ञ नहीं हो सकते। इसलिए बार-बार अपनी सेवा या भजन का उल्लेख करना यह दर्शाता है कि साधक अभी भी वाहवाही चाहता है। यह भाव भगवान की ओर नहीं, बल्कि अपने सम्मान की ओर ले जाता है।
महाराज जी आगे बताते हैं कि दान, सेवा और पुण्य का प्रचार करने से उनका आध्यात्मिक प्रभाव कम हो जाता है। वे अनेक उदाहरणों के माध्यम से समझाते हैं कि जिसने अपने पुण्य का स्वयं बखान किया, उसका पुण्य क्षीण हो गया। इसके विपरीत जो व्यक्ति चुपचाप सेवा करता है और किसी को पता भी नहीं चलने देता, उसकी साधना भगवान के निकट पहुँचती है। इसलिए साधक को यह प्रयास करना चाहिए कि उसके अच्छे कार्यों का प्रदर्शन न हो। यदि कोई पूछे भी, तो विनम्रता से बात टाल दे और स्वयं को भगवान का सेवक ही माने।
अंत में महाराज जी कहते हैं कि सेवा का फल कभी माँगना नहीं चाहिए। यदि साधक सेवा और भजन के बदले यश, सम्मान या किसी सांसारिक लाभ की इच्छा नहीं करता, तो भगवान स्वयं उसे शुद्ध भक्ति, शुद्ध ज्ञान और अपना प्रेम प्रदान करते हैं। इसलिए साधना का सबसे सुरक्षित मार्ग यही है कि भजन, दान और सेवा को जितना संभव हो गुप्त रखा जाए, अपने भीतर दीनता बनाए रखी जाए और हर कार्य भगवान को समर्पित करके किया जाए। यही अहंकार से बचने और भगवत्प्राप्ति की दिशा में आगे बढ़ने का वास्तविक उपाय है।
प्रश्न 8. मृत्यु के बाद आत्मा किस शरीर से स्वर्ग या नरक की यात्रा करती है? स्थूल, सूक्ष्म, कारण, देव और यातना देह का क्या स्वरूप है?
उत्तर:
श्री प्रेमानंद महाराज जी बताते हैं कि मृत्यु के समय केवल स्थूल शरीर पंचमहाभूतों में विलीन होता है। आत्मा उसके साथ सूक्ष्म और कारण शरीर लेकर आगे की यात्रा करती है। इसलिए मृत्यु के बाद जीव का अस्तित्व समाप्त नहीं होता, बल्कि वह अपने कर्मों के अनुसार आगे का अनुभव प्राप्त करता है। स्थूल शरीर यहीं रह जाता है, जबकि आत्मा अपने सूक्ष्म और कारण शरीर के साथ अगले चरण की ओर बढ़ती है।
महाराज जी आगे समझाते हैं कि यदि जीव को अपने कर्मों के अनुसार नरक का भोग करना होता है, तो उसे एक विशेष यातना देह प्राप्त होती है। उस देह में जीव अनेक प्रकार की पीड़ाएँ अनुभव करता है, लेकिन उसकी मृत्यु नहीं होती। उसी प्रकार यदि शुभ कर्मों के कारण स्वर्ग का सुख भोगना हो, तो जीव को देव देह प्राप्त होती है, जिसके द्वारा वह स्वर्ग के सुखों का अनुभव करता है। अर्थात प्रत्येक लोक के अनुसार भगवान जीव को उसी प्रकार का शरीर प्रदान करते हैं, जिससे वह वहाँ के सुख या दुःख का अनुभव कर सके।
महाराज जी बताते हैं कि इन सबका अंतिम उद्देश्य केवल सुख या दुःख भोगना नहीं है। मनुष्य जन्म इसलिए मिला है कि वह भगवान का नाम जपकर इस जन्म-मरण के चक्र से मुक्त हो जाए। यदि जीव भगवान की प्राप्ति कर लेता है, तो उसे फिर संसार के भोगों के लिए शरीर धारण नहीं करना पड़ता। भगवान की कृपा से उसे भगवत् स्वरूप की प्राप्ति होती है और वह भगवान के धाम को प्राप्त हो जाता है। यही मनुष्य जीवन का सर्वोच्च लक्ष्य है।
अंत में महाराज जी पूरी वार्ता का सार बताते हुए कहते हैं कि मनुष्य को मृत्यु के बाद मिलने वाले शरीर की चिंता करने के बजाय वर्तमान जीवन को सुधारने का प्रयास करना चाहिए। भगवान का नाम-जप, पवित्र आचरण, दूसरों के प्रति सद्व्यवहार, परोपकार और धर्ममय जीवन ही ऐसा मार्ग है जो भविष्य को मंगलमय बनाता है। जो व्यक्ति दूसरों को कष्ट देता है, छल-कपट करता है और अधर्म का जीवन जीता है, वह अंततः दुःख ही पाता है। इसलिए अभी से भगवान का नाम, सेवा और सदाचार अपनाकर जीवन को सफल बनाना ही सबसे बड़ी बुद्धिमानी है। यही महाराज जी का अंतिम संदेश है।
Credit:
“यह लेख संत श्री प्रेमानंद जी महाराज के एकान्तिक वार्तालाप प्रवचन की अमृत वाणी पर आधारित है।”
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