माला-1325: लोग हमारी अच्छाई का फायदा क्यों उठाते हैं? श्री प्रेमानंद महाराज जी के अमृत वचनों से नाम जप महिमा

प्रश्न 1. महाराज जी,यदि हमारे अच्छे व्यवहार का लोग गलत फायदा उठाएँ, तब भी क्या हमें अच्छा व्यवहार बनाए रखना चाहिए?

उत्तर:

श्री प्रेमानंद महाराज जी बताते हैं कि किसी के साथ अच्छा व्यवहार करने का उद्देश्य सामने वाले से धन्यवाद, सम्मान या बदले में अच्छा व्यवहार प्राप्त करना नहीं होना चाहिए। यदि हमारा व्यवहार इस अपेक्षा से जुड़ा है कि सामने वाला भी हमारे साथ वैसा ही व्यवहार करेगा, तो वह निस्वार्थ सदाचार नहीं रह जाता, बल्कि एक प्रकार का स्वार्थ बन जाता है। इसलिए साधक को अपना व्यवहार केवल भगवान की प्रसन्नता के लिए रखना चाहिए। जब हमारा प्रत्येक कर्म भगवान को समर्पित हो जाता है, तब सामने वाला उसका कैसा उत्तर देता है, इससे हमारे कर्तव्य में कोई परिवर्तन नहीं आना चाहिए।

महाराज जी समझाते हैं कि यदि कोई व्यक्ति हमारे अच्छे व्यवहार का अनुचित लाभ उठाता है, हमारा अपमान करता है या हमारे साथ कठोर व्यवहार करता है, तब भी हमें अपने कर्तव्य से पीछे नहीं हटना चाहिए। साधक का धर्म दूसरों के आचरण को नियंत्रित करना नहीं, बल्कि अपने आचरण को भगवान के अनुकूल बनाए रखना है। यदि कोई हमें अपशब्द कहे और अगले दिन फिर मिले, तब भी हमें उसके प्रति पहले की तरह ही शिष्ट और विनम्र व्यवहार करना चाहिए। क्योंकि हमारा व्यवहार उसके स्वभाव के अनुसार नहीं, बल्कि भगवान के प्रति हमारी निष्ठा के अनुसार होना चाहिए। यही सच्ची साधना है।

महाराज जी आगे कहते हैं कि जो व्यक्ति दूसरों के व्यवहार से प्रभावित होकर अपना स्वभाव बदल लेता है, वह भीतर से अभी स्थिर नहीं हुआ है। यदि किसी के गलत व्यवहार से हमारे भीतर क्रोध, पीड़ा या बदले की भावना पैदा हो जाए, तो समझना चाहिए कि हम अभी भी अपेक्षाओं से बँधे हुए हैं। लेकिन यदि हम अपने कर्तव्य का पालन करते हुए शांत बने रहें और यह मानें कि सामने वाले के कर्मों की जिम्मेदारी उसी की है, तो हमारे भीतर सहनशीलता और तितिक्षा विकसित होने लगती है। यही गुण साधक को आध्यात्मिक रूप से मजबूत बनाते हैं।

अंत में महाराज जी कहते हैं कि सच्चा साधक वही है जो परिस्थितियों के अनुसार नहीं, बल्कि अपने सिद्धांतों के अनुसार जीवन जीता है। यदि अच्छा व्यवहार केवल अच्छे लोगों के साथ ही किया जाए, तो वह साधारण व्यवहार है। लेकिन यदि अपमान, आलोचना या गलत व्यवहार मिलने पर भी मनुष्य भगवान को साक्षी मानकर अपने सदाचार पर अडिग रहे, तो वही वास्तविक साधना है। ऐसा व्यक्ति केवल अच्छा सैनिक या अच्छा गृहस्थ ही नहीं, बल्कि भगवान का सच्चा साधक भी बन जाता है।


प्रश्न 2. शिष्येषणा, वित्तेषणा और लोकेषणा (कंचन, कामिनी और कीर्ति) से कैसे मुक्त हों और अहंकार का नाश कैसे करें?

उत्तर:

श्री प्रेमानंद महाराज जी बताते हैं कि शिष्येषणा, वित्तेषणा और लोकेषणा अर्थात कंचन, कामिनी और कीर्ति का आकर्षण साधक के लिए अत्यंत बड़ी परीक्षा है। इन्हें साधारण विषय समझने की भूल नहीं करनी चाहिए। महाराज जी अनेक महापुरुषों के उदाहरण देकर समझाते हैं कि यदि साधक सावधान न रहे, तो धन, विषय-वासना या यश की इच्छा उसे भगवान के मार्ग से भी विचलित कर सकती है। इसलिए इनसे मुक्त होने का पहला उपाय है—अपने जीवन का लक्ष्य केवल भगवान को बनाना। जब तक मन में किसी अन्य वस्तु की चाह बनी रहेगी, तब तक भगवत् प्राप्ति का मार्ग कठिन बना रहेगा।

महाराज जी कहते हैं कि इन तीनों आकर्षणों का मूल कारण अहंकार और देहाभिमान है। जब मनुष्य स्वयं को केवल शरीर मानता है, तब उसे भोगों की इच्छा होती है, धन का आकर्षण होता है और सम्मान पाने की लालसा भी बनी रहती है। लेकिन जैसे-जैसे साधक स्वयं को भगवान का सेवक मानने लगता है, वैसे-वैसे इन इच्छाओं का प्रभाव कम होने लगता है। वे बताते हैं कि अहंकार घटने का सबसे बड़ा लक्षण यह है कि मनुष्य को दूसरों में सद्गुण दिखाई देने लगें और अपने भीतर दोष दिखाई दें। यदि इसके विपरीत दूसरों में केवल दोष और अपने भीतर केवल गुण दिखाई दें, तो समझना चाहिए कि अहंकार अभी भी जीवित है।

महाराज जी आगे बताते हैं कि साधक को अपनी जिह्वा के स्वाद पर भी नियंत्रण रखना चाहिए। जब स्वाद की आसक्ति कम होती है, तब भोगों की चाह भी धीरे-धीरे घटने लगती है। इसी प्रकार यदि साधक अपने तन, मन और प्राण को भगवान का मान ले, तो यश और सम्मान की इच्छा भी कम होने लगती है। यदि कोई सम्मान करे, तो यह भाव रखना चाहिए कि सम्मान भगवान का हो रहा है, मेरा नहीं। और यदि अपमान मिले, तो उसे भी भगवान की कृपा मानकर सहन करना चाहिए। यही अभ्यास धीरे-धीरे अहंकार को गलाने लगता है।

अंत में महाराज जी स्पष्ट करते हैं कि कंचन, कामिनी और कीर्ति पर विजय अपने बल से नहीं मिलती। यह केवल भगवान के आश्रय, निरंतर नाम-जप, सत्संग और शरणागति से संभव होती है। जो साधक भगवान को अपना सब कुछ मानकर उनके नाम का आश्रय लेता है और किसी भी परिस्थिति में धर्म के विरुद्ध आचरण न करने का दृढ़ संकल्प रखता है, भगवान स्वयं उसकी रक्षा करते हैं। उनकी कृपा से ही अहंकार, विषय-विकार और संसार के आकर्षण धीरे-धीरे समाप्त होने लगते हैं और साधक भगवत् मार्ग पर स्थिर हो जाता है।

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प्रश्न 3. मोक्ष की इच्छा रखने वाले साधक को कुसंग, मोबाइल और इन्द्रिय-विकारों से स्वयं की रक्षा कैसे करनी चाहिए?

उत्तर:

श्री प्रेमानंद महाराज जी बताते हैं कि जो साधक वास्तव में मोक्ष चाहता है, उसे सबसे पहले कुसंग से सावधान रहना चाहिए। कुसंग केवल बुरे लोगों का साथ ही नहीं, बल्कि ऐसा हर दृश्य, विचार और वातावरण है जो मन को भगवान से हटाकर विषयों की ओर ले जाए। महाराज जी कहते हैं कि यदि किसी व्यक्ति, वस्तु या परिस्थिति के संपर्क से भजन में बाधा आने लगे, तो उससे दूरी बना लेना ही साधक की बुद्धिमानी है। भगवान के मार्ग पर आगे बढ़ने के लिए संगति का सीधा प्रभाव मन और बुद्धि पर पड़ता है, इसलिए कुसंग का त्याग और सत्संग का ग्रहण साधना की पहली आवश्यकता है।

महाराज जी विशेष रूप से मोबाइल के विषय में सावधान करते हैं। वे बताते हैं कि मोबाइल अपने आप में न अच्छा है और न बुरा। उसका उपयोग जिस उद्देश्य से किया जाए, वैसा ही परिणाम मिलता है। यदि उसका उपयोग संतों का सत्संग सुनने, आवश्यक कार्य करने या भगवान से जुड़े विषयों के लिए किया जाए, तो वह उपयोगी है। लेकिन यदि उसी माध्यम से अशुद्ध दृश्य, विषय-विकार या अनुचित सामग्री देखी जाए, तो वही साधना के पतन का कारण बन जाता है। क्योंकि मन जो देखता, सुनता और बार-बार सोचता है, वही आगे चलकर आचरण बन जाता है। इसलिए साधक को अपनी आँखों, कानों और वाणी—तीनों की पवित्रता का विशेष ध्यान रखना चाहिए।

महाराज जी आगे बताते हैं कि इन्द्रिय-विकारों से बचने के लिए केवल बाहरी नियंत्रण पर्याप्त नहीं है। मन को भगवान के नाम में लगाना भी उतना ही आवश्यक है। यदि मन खाली रहेगा, तो वह पुराने संस्कारों और विषयों की ओर भागेगा। इसलिए नियमित नाम-जप, भगवान का स्मरण और सत्संग साधक को भीतर से शक्ति देते हैं। वे कहते हैं कि जानकारी सबके पास होती है कि क्या सही है और क्या गलत, लेकिन उस सही जानकारी पर चलने की शक्ति केवल भजन से आती है। नाम-जप से आध्यात्मिक बल बढ़ता है और वही बल इन्द्रियों तथा मन पर विजय दिलाता है।

अंत में महाराज जी कहते हैं कि साधक को अपने जीवन में एक दृढ़ संकल्प रखना चाहिए कि वह किसी भी परिस्थिति में भगवान को नहीं छोड़ेगा। कुसंग का त्याग, सत्संग का सेवन, मोबाइल का संयमित उपयोग, इन्द्रियों की पवित्रता और निरंतर नाम-जप—इन पाँच बातों का पालन करने वाला साधक भगवान की कृपा से धीरे-धीरे विषय-विकारों पर विजय प्राप्त कर लेता है। तब उसका मन संसार के आकर्षणों से हटकर भगवान के प्रेम में स्थिर होने लगता है और मोक्ष का मार्ग सहज बन जाता है।


प्रश्न 4. किसी भी कार्य से पहले जब दिल और दिमाग अलग-अलग निर्णय दें, तब सही निर्णय कैसे लें?

उत्तर:

श्री प्रेमानंद महाराज जी बताते हैं कि जब किसी निर्णय के समय मनुष्य के भीतर दुविधा उत्पन्न हो जाए और दिल तथा दिमाग अलग-अलग दिशा में ले जाने लगें, तब सबसे पहले भगवान का स्मरण करना चाहिए। वे कहते हैं कि उस समय केवल मन या बुद्धि के आधार पर निर्णय लेना उचित नहीं है, क्योंकि दोनों ही अनेक बार वासनाओं, स्वार्थ और पुरानी आदतों से प्रभावित हो जाते हैं। इसलिए निर्णय लेने से पहले भगवान का नाम लेकर उनसे प्रार्थना करनी चाहिए कि वे सही मार्ग दिखाएँ। भगवान का स्मरण मन को शांत करता है और विवेक को जागृत करता है।

महाराज जी समझाते हैं कि सामान्य भाषा में जिसे लोग “दिल” कहते हैं, शास्त्रीय दृष्टि से वह अंतःकरण का भाग है, जबकि मन, बुद्धि, चित्त और अहंकार मिलकर अंतःकरण का निर्माण करते हैं। मन संकल्प-विकल्प करता है, चित्त उसी विषय का चिंतन करता है, अहंकार उसे अपना मान लेता है और बुद्धि अंतिम निर्णय करती है। यदि बुद्धि में विवेक नहीं है, तो वह गलत निर्णय भी दे सकती है। इसलिए बुद्धि को शुद्ध और विवेकपूर्ण बनाने के लिए सत्संग और भगवान के नाम का आश्रय आवश्यक है।

महाराज जी आगे बताते हैं कि अधिकांश लोगों को सही और गलत का ज्ञान पहले से होता है, लेकिन उस ज्ञान के अनुसार चलने की शक्ति नहीं होती। यही कारण है कि मनुष्य कई बार जानते हुए भी गलत कार्य कर बैठता है। वे कहते हैं कि इस शक्ति का स्रोत केवल भगवान का नाम है। जितना अधिक नाम-जप होगा, उतनी ही अधिक आंतरिक शक्ति प्राप्त होगी और मन तथा इन्द्रियाँ साधक को गलत दिशा में नहीं ले जा पाएँगी। भजन के अभाव में मन और बुद्धि मनुष्य के सबसे बड़े शत्रु बन जाते हैं, जबकि भगवान का स्मरण उन्हें नियंत्रित करने की शक्ति देता है।

अंत में महाराज जी एक सरल पहचान भी बताते हैं। वे कहते हैं कि यदि नाम-जप करते हुए किसी निर्णय को सोचने पर हृदय में शांति, शीतलता और संतोष का अनुभव हो, तो वह मार्ग उचित है। लेकिन यदि भीतर बेचैनी, जलन या अशांति अनुभव होने लगे, तो समझना चाहिए कि निर्णय सही नहीं है और रुककर पुनः भगवान का स्मरण करना चाहिए। इस प्रकार भगवान का नाम, सत्संग से प्राप्त विवेक और शांत अंतःकरण ही सही निर्णय लेने के सबसे विश्वसनीय आधार हैं।

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प्रश्न 5. क्या इसी जीवन में भगवान के स्वरूप का दर्शन संभव है? भगवान की अनन्य भक्ति कैसे प्राप्त करें?

उत्तर:

श्री प्रेमानंद महाराज जी बताते हैं कि भगवान के स्वरूप का दर्शन इसी जीवन में संभव है, लेकिन इसके लिए केवल इच्छा या जिज्ञासा पर्याप्त नहीं है। भगवान स्वयं कहते हैं कि उनके वास्तविक स्वरूप का अनुभव यज्ञ, तप या केवल बाहरी धार्मिक क्रियाओं से नहीं, बल्कि अनन्य भक्ति से होता है। इसलिए साधक का लक्ष्य केवल भगवान के दर्शन की इच्छा रखना नहीं, बल्कि ऐसा जीवन जीना होना चाहिए जिसमें उसका हृदय धीरे-धीरे भगवान के प्रति पूर्ण समर्पित हो जाए।

महाराज जी समझाते हैं कि अनन्य भक्ति का अर्थ है—अपने जीवन की सभी ममताओं को समेटकर केवल भगवान में लगाना। इसका अर्थ परिवार का त्याग करना नहीं, बल्कि परिवार के प्रत्येक सदस्य में भगवान का ही स्वरूप देखना है। माता-पिता, पत्नी, पुत्र या अन्य संबंधों की सेवा भी इस भाव से करनी चाहिए कि इन सब रूपों में भगवान ही विराजमान हैं। जब साधक का यह दृष्टिकोण विकसित होने लगता है, तब उसकी आसक्ति संसार से हटकर भगवान में स्थिर होने लगती है। यही अनन्य भक्ति की शुरुआत है।

महाराज जी आगे बताते हैं कि भगवान का विराट स्वरूप किसी एक विशेष दृश्य तक सीमित नहीं है। यह सम्पूर्ण चराचर जगत ही भगवान का विराट स्वरूप है। यदि साधक सबमें भगवान को देखने का अभ्यास करे और यह अनुभव विकसित करे कि भगवान के अतिरिक्त कुछ भी नहीं है, तो उसका दृष्टिकोण बदलने लगता है। लेकिन यह अनुभव केवल पढ़ लेने या सुन लेने से नहीं आता। इसके लिए निरंतर नाम-जप, सत्संग और अभ्यास आवश्यक है। भगवान का नाम ही धीरे-धीरे इस ज्ञान को अनुभव में बदलता है।

महाराज जी साधना के पाँच प्रमुख आधार भी बताते हैं—स्वाध्याय, सत्संग, सुमिरन, सेवा और समाधि। वे कहते हैं कि यदि साधक अपनी दिनचर्या में इन पाँचों को स्थान दे दे, तो उसका जीवन भगवान की ओर तेजी से बढ़ने लगता है। प्रतिदिन शास्त्रों का अध्ययन, संतों का सत्संग, निरंतर नाम-जप, अपने अधिकार के अनुसार सेवा और कुछ समय केवल भगवान के चिंतन में बिताना—ये पाँच साधन साधक के भीतर वह पात्रता उत्पन्न करते हैं, जिसके द्वारा भगवान का अनुभव संभव होता है। इसलिए भगवान के दर्शन की चिंता करने के बजाय इन साधनों में निरंतर लगे रहना ही वास्तविक अनन्य भक्ति का मार्ग है।


प्रश्न 6. यदि कोई व्यक्ति स्वयं को भगवत्-प्राप्त घोषित करता है, तो उसकी पहचान कैसे करें? सच्चे भगवत्प्राप्त महापुरुष के क्या लक्षण हैं?

उत्तर:

श्री प्रेमानंद महाराज जी स्पष्ट कहते हैं कि जो व्यक्ति स्वयं यह घोषणा करता फिरता है कि उसे भगवान की प्राप्ति हो चुकी है, वह सच्चे अर्थों में भगवत्प्राप्त नहीं माना जा सकता। वास्तविक भगवत्प्राप्त महापुरुष के भीतर गहरी विनम्रता होती है। वे स्वयं को कभी महान नहीं मानते, बल्कि भगवान की कृपा का पात्र समझते हैं। महाराज जी शबरी माता और हनुमान जी का उदाहरण देते हुए बताते हैं कि भगवान के साक्षात् दर्शन प्राप्त होने के बाद भी उन्होंने स्वयं को अत्यंत छोटा और अधम ही माना। यही सच्ची भगवत्प्राप्ति का पहला लक्षण है।

महाराज जी आगे बताते हैं कि भगवत्प्राप्ति का प्रमाण शब्दों से नहीं, बल्कि जीवन से मिलता है। यदि किसी के भीतर काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद, मान और द्वेष जैसे दोष बने हुए हैं और वह स्वयं को सिद्ध घोषित करता है, तो साधक को सावधान रहना चाहिए। वास्तविक संत के जीवन में दंभ, पाखंड और दिखावा नहीं होता। उसका स्वभाव सरल, विनम्र और भगवान के प्रति पूर्ण समर्पित होता है। वह कभी अपने अनुभवों का प्रदर्शन नहीं करता और न ही लोगों से अपनी महिमा मनवाने का प्रयास करता है।

महाराज जी यह भी कहते हैं कि आज के समय में भक्ति के नाम पर दिखावा और पाखंड बहुत बढ़ गया है। इसलिए साधक को बाहरी आकर्षण से प्रभावित होने के बजाय संतों की वाणी और उनके आचरण को देखना चाहिए। यदि कोई व्यक्ति लोगों को भगवान के नाम की ओर प्रेरित करता है, स्वयं चरित्रवान जीवन जीता है और अपने बारे में बड़ी-बड़ी बातें नहीं करता, तो उसके जीवन से सीख लेनी चाहिए। इसके विपरीत यदि कोई व्यक्ति स्वयं की महिमा का प्रचार करता रहे, तो उससे सावधान रहना ही उचित है।

अंत में महाराज जी कहते हैं कि साधक का ध्यान दूसरों की परीक्षा लेने में नहीं, बल्कि अपनी साधना में होना चाहिए। चुपचाप नाम-जप, सत्संग, पवित्र चरित्र और भगवान का स्मरण करते हुए आगे बढ़ना ही सबसे सुरक्षित मार्ग है। जो वास्तव में भगवान के निकट पहुँचता है, उसके भीतर अहंकार नहीं, बल्कि दास्य भाव और विनम्रता बढ़ती जाती है। यही सच्चे भगवत्प्राप्त महापुरुष की सबसे बड़ी पहचान है।

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प्रश्न 7. क्या कर्म, शरीर और संसार का भगवत् प्राप्ति में कोई महत्व है? रोग, प्रारब्ध और प्रतिकूल परिस्थितियों को साधक किस दृष्टि से देखे?

उत्तर:

श्री प्रेमानंद महाराज जी बताते हैं कि कर्म, शरीर और संसार को महत्वहीन समझना उचित नहीं है। साधना के प्रारंभिक चरण में ये तीनों ही भगवान की प्राप्ति के साधन बनते हैं। यदि मनुष्य को यह पंचभौतिक शरीर न मिला होता, तो वह न सत्संग सुन पाता, न भगवान के नाम का जप कर पाता और न ही आत्मज्ञान की दिशा में आगे बढ़ पाता। इसलिए शरीर का सम्मान भोग के साधन के रूप में नहीं, बल्कि भगवान की सेवा और साधना के माध्यम के रूप में करना चाहिए। जब तक साधक लक्ष्य तक नहीं पहुँचता, तब तक शरीर उसके लिए उसी प्रकार आवश्यक है जैसे किसी यात्री के लिए वाहन।

महाराज जी आगे समझाते हैं कि संसार भी साधक के लिए बाधा नहीं, बल्कि सही दृष्टि होने पर साधना का क्षेत्र बन जाता है। यदि मनुष्य अपने सुख के लिए संसार का उपयोग करता है, तो वही संसार बंधन बन जाता है। लेकिन यदि वही संसार भगवान का स्वरूप मानकर सेवा, करुणा और निष्काम भाव से कर्म किए जाएँ, तो वही भगवत् प्राप्ति का साधन बन जाता है। साधक को अपने कर्तव्यों से भागना नहीं चाहिए, बल्कि भगवान का स्मरण करते हुए उन्हें ईमानदारी से निभाना चाहिए। धीरे-धीरे शरीर और संसार के प्रति आसक्ति कम होती है और भगवान के प्रति प्रेम बढ़ने लगता है।

महाराज जी रोग, प्रारब्ध और कठिन परिस्थितियों के विषय में भी महत्वपूर्ण शिक्षा देते हैं। वे कहते हैं कि जब तक देहाभिमान बना हुआ है, तब तक शरीर के सुख-दुःख का अनुभव होना स्वाभाविक है। इसलिए साधारण साधक को रोग आने पर विचलित नहीं होना चाहिए। उसे नाम-जप का इतना अभ्यास करना चाहिए कि सुख-दुःख, मान-अपमान, लाभ-हानि और निंदा-स्तुति जैसी परिस्थितियों में भी भगवान का स्मरण न छूटे। प्रारब्ध अपने अनुसार फल देगा, लेकिन भगवान का नाम साधक को उसके प्रभाव से ऊपर उठने की शक्ति देता है। यही आध्यात्मिक अभ्यास का उद्देश्य है।

अंत में महाराज जी स्पष्ट करते हैं कि साधना की शुरुआत में शरीर का उपयोग भगवान की प्राप्ति के लिए करना चाहिए और धीरे-धीरे उसके प्रति आसक्ति का त्याग करना चाहिए। जब साधक का मन पूर्ण रूप से भगवान में स्थित हो जाता है, तब शरीर, संसार और परिस्थितियाँ उसे पहले की तरह बाँध नहीं पातीं। इसलिए रोग, प्रारब्ध या कठिनाइयों से घबराने के बजाय भगवान का आश्रय लेकर निरंतर नाम-जप करते रहना ही वास्तविक साधना है। यही मार्ग साधक को अंततः भगवत् प्राप्ति की ओर ले जाता है।


प्रश्न 8. यदि सद्गुरु साकार रूप में हमारे सामने न हों, तो उनका मार्गदर्शन कैसे मिले और अहंकार कैसे कम हो?

उत्तर:

श्री प्रेमानंद महाराज जी बताते हैं कि सद्गुरु का साकार स्वरूप एक समय के बाद आँखों से ओझल हो सकता है, लेकिन उनका वास्तविक स्वरूप कभी दूर नहीं होता। गुरु केवल शरीर नहीं हैं। उनका दूसरा स्वरूप उनके द्वारा दिया गया नाम, मंत्र, उपदेश और ज्ञान है, जो नित्य और शाश्वत है। इसलिए यदि गुरु प्रत्यक्ष सामने न भी हों, तब भी साधक उनके बताए हुए मार्ग पर चलते हुए उसी प्रकार उनकी कृपा का अनुभव कर सकता है। गुरु की वाणी ही साधक के जीवन का मार्गदर्शन करती रहती है और समय-समय पर उसके भीतर सही निर्णय लेने की प्रेरणा देती है।

महाराज जी आगे कहते हैं कि गुरु का अमूर्त स्वरूप साधक के भीतर ज्ञान के रूप में कार्य करता है। जब भी मन में कोई विकार, अहंकार या भ्रम उत्पन्न होता है, तब गुरु का दिया हुआ ज्ञान भीतर से उसे रोकता है और सही मार्ग की ओर ले जाता है। यदि साधक नियमित नाम-जप करता है, गुरु के उपदेशों का पालन करता है और भगवान का स्मरण बनाए रखता है, तो वही ज्ञान धीरे-धीरे उसके अहंकार को गलाने लगता है। इस प्रकार गुरु बाहर से नहीं, बल्कि भीतर से भी साधक का मार्गदर्शन करते रहते हैं।

महाराज जी विशेष रूप से सावधान करते हैं कि साधक को ज्ञान का प्रदर्शन नहीं करना चाहिए। यदि थोड़ा-सा ज्ञान मिलते ही अहंकार आ जाए या दूसरों को उपदेश देने की इच्छा बढ़ जाए, तो वही ज्ञान पाखंड और दंभ का कारण बन सकता है। इसलिए जो कुछ भी संतों से सुनें, उसे पहले अपने जीवन में उतारें। बिना पूछे किसी को उपदेश देने के बजाय भगवान पर भरोसा रखें कि वे स्वयं प्रत्येक जीव को उचित समय पर सही मार्ग दिखाएँगे। सच्चा साधक स्वयं को ज्ञानी नहीं, बल्कि भगवान का सेवक मानता है।

अंत में महाराज जी कहते हैं कि अहंकार कम करने का सबसे सरल उपाय है—नाम-जप, दैन्य भाव और सेवा। जब साधक यह अनुभव करने लगता है कि जो भी ज्ञान मिला है, वह भगवान और गुरु की कृपा से मिला है, तब “मैं” का भाव स्वतः कम होने लगता है। गुरु और शिष्य के बीच का भेद भी धीरे-धीरे मिटने लगता है, क्योंकि दोनों का लक्ष्य एक ही परमात्मा होता है। इसलिए सद्गुरु की अनुपस्थिति का शोक करने के बजाय उनके दिए हुए नाम, उपदेश और मार्ग पर दृढ़ता से चलते रहना ही सच्ची गुरु-भक्ति और अहंकार से मुक्ति का मार्ग है।

Credit:
“यह लेख संत श्री प्रेमानंद जी महाराज के एकान्तिक वार्तालाप प्रवचन की अमृत वाणी पर आधारित है।”

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