प्रश्न 1. महाराज जी,भजन करने के बाद जो प्रसन्नता और आनंद अनुभव होता है, उससे अहंकार आने लगे तो क्या करें?
उत्तर:
श्री प्रेमानंद महाराज जी बताते हैं कि भजन के बाद मिलने वाली प्रसन्नता साधक के लिए अंतिम लक्ष्य नहीं है। यदि भजन के बाद मन में यह विचार आने लगे कि “मेरा भजन बहुत अच्छा हो रहा है” या “मैंने इतनी माला कर ली”, तो यही भावना धीरे-धीरे अहंकार का रूप ले सकती है। इसलिए सबसे पहले यह स्वीकार करना चाहिए कि जो कुछ भी हो रहा है, वह केवल गुरु और भगवान की कृपा से हो रहा है। यदि अपनी सामर्थ्य से भजन संभव होता, तो पहले ही हो जाता। इसलिए किसी भी आध्यात्मिक अनुभव का श्रेय स्वयं को नहीं, बल्कि भगवान की कृपा को देना चाहिए।
महाराज जी आगे समझाते हैं कि साधना के प्रारंभ में जो आनंद अनुभव होता है, वह अभी परमात्मा के अनंत आनंद का अनुभव नहीं है। वह केवल आनंदमय कोश से मिलने वाला सीमित सुख है। वास्तविक भगवद्-रस तो तब प्राप्त होता है, जब भगवान स्वयं हृदय में प्रकट होकर अपने आनंद का अनुभव कराते हैं। उस आनंद की विशेषता यह है कि वह कभी समाप्त नहीं होता, बल्कि निरंतर बढ़ता रहता है। इसलिए साधक को प्रारंभिक सुख में रुकना नहीं चाहिए, बल्कि अपने लक्ष्य को भगवान की प्राप्ति बनाए रखना चाहिए।
वे यह भी कहते हैं कि साधक को अपने से बड़े भजनानंदी महापुरुषों का जीवन देखकर प्रेरणा लेनी चाहिए। जब उनके त्याग, भक्ति और भगवान के प्रति प्रेम का चिंतन होगा, तब अपने भीतर दीनता और विनम्रता आएगी। इससे यह अनुभव होगा कि अभी साधना बहुत शेष है और आगे बढ़ना है। छोटे-छोटे आध्यात्मिक अनुभवों में संतुष्ट होकर रुक जाना साधक की प्रगति में बाधा बन सकता है।
महाराज जी अंत में सावधान करते हैं कि साधना से प्राप्त आनंद, सिद्धि या विशेष अनुभूतियों का प्रदर्शन नहीं करना चाहिए। सच्चा साधक अपने अनुभवों को छिपाकर रखता है, दैन्य भाव बनाए रखता है और निरंतर भगवान की ओर बढ़ता रहता है। यही भाव अहंकार से रक्षा करता है और साधक को भगवत् प्रेम की दिशा में आगे ले जाता है।
प्रश्न 2. यदि अपने से बड़े लोग कटु वचन बोलें या गलत व्यवहार करें और हमसे भी प्रतिक्रिया में गलती हो जाए, तो ऐसे समय में क्या करना चाहिए?
उत्तर:
श्री प्रेमानंद महाराज जी कहते हैं कि जब परिवार या समाज में अपने से बड़े लोग कटु वचन बोल दें या उनके व्यवहार से मन को दुःख पहुँचे, तब साधक का पहला कर्तव्य विनम्रता बनाए रखना है। यदि प्रतिक्रिया में हम भी कटु वचन बोलने लगें, तो इससे स्थिति और बिगड़ती है तथा हमारी साधना भी प्रभावित होती है। इसलिए ऐसे समय में धैर्य और नम्रता का आश्रय लेना चाहिए। महाराज जी बताते हैं कि यदि बड़े-बुज़ुर्ग कभी कठोर शब्द कह भी दें, तो उसे सहन करने का अभ्यास करना चाहिए, क्योंकि यही भक्ति की परीक्षा है।
वे विभीषण का उदाहरण देते हुए बताते हैं कि जब रावण ने उन्हें अपमानित किया, तब भी उन्होंने कटु उत्तर नहीं दिया। उसी सहनशीलता ने उन्हें भगवान की शरण तक पहुँचाया। इसी प्रकार यदि साधक अपमान, निंदा या कठोर व्यवहार के समय संयम रखता है, तो उसका हृदय भगवान के और निकट होता है। महाराज जी स्पष्ट कहते हैं कि भक्ति की ऊँची अवस्था वही है, जहाँ मान-अपमान, निंदा-स्तुति और सुख-दुःख से मन अधिक विचलित नहीं होता।
महाराज जी यह भी बताते हैं कि मनुष्य में सहन करने की पूरी सामर्थ्य है। जैसे दुर्घटना या शारीरिक पीड़ा को हम सह लेते हैं, वैसे ही कटु वचनों को भी सह सकते हैं। यदि क्रोध का वेग अधिक हो, तो उस समय मौन रहना बेहतर है। यदि वहाँ रुकना कठिन लगे, तो शांतिपूर्वक उस स्थान से हट जाना चाहिए, लेकिन किसी भी स्थिति में बड़ों का अपमान नहीं करना चाहिए। यही विनय और सत्संग का वास्तविक फल है।
साथ ही महाराज जी एक महत्वपूर्ण बात भी स्पष्ट करते हैं कि सहनशीलता का अर्थ अन्याय को स्वीकार करना नहीं है। यदि किसी महिला, बच्चे या किसी भी व्यक्ति के साथ शोषण, अत्याचार या अनैतिक व्यवहार हो रहा हो, तो उसे चुप नहीं रहना चाहिए। ऐसी स्थिति में कानून की सहायता लेनी चाहिए और अपराध का विरोध करना चाहिए। इसलिए जहाँ केवल कटु वचन हों, वहाँ सहनशीलता उचित है; लेकिन जहाँ अन्याय और शोषण हो, वहाँ धर्म और कानून के अनुसार उचित कदम उठाना आवश्यक है।
प्रश्न 3. क्या प्रारंभिक साधकों को भी भगवान की लीला या स्वरूप का ऐसा दिव्य आनंद मिल सकता है कि हृदय भर जाए? यह कृपा है या केवल सत्त्वगुण का प्रभाव?
उत्तर:
श्री प्रेमानंद महाराज जी बताते हैं कि साधना के प्रारंभिक चरण में साधक को जो विशेष आनंद, भाव या भगवान की लीला का अनुभव होता है, उसे तुरंत परम भगवत् कृपा या अंतिम आध्यात्मिक अवस्था नहीं मान लेना चाहिए। भगवान की कृपा का पहला प्रभाव यह होता है कि साधक के भीतर विषय-भोगों के प्रति वैराग्य उत्पन्न होने लगता है। जिन बातों, आदतों और भोगों में पहले मन लगता था, उनसे धीरे-धीरे अरुचि होने लगती है और भगवान के नाम तथा भजन में रुचि बढ़ने लगती है। यही कृपा के प्रकट होने का वास्तविक प्रारंभिक लक्षण है।
महाराज जी आगे बताते हैं कि साधना की प्रगति केवल आनंद अनुभव करने से नहीं होती, बल्कि साधक के भीतर क्रमशः कई परिवर्तन आते हैं। पहले विषयों से वैराग्य, फिर परलोक की इच्छा का त्याग, उसके बाद यश, सम्मान और प्रतिष्ठा के प्रति आसक्ति का समाप्त होना और अंत में सिद्धियों का भी उपयोग न करना—ये सब साधना की उन्नति के संकेत हैं। यदि साधक बीच में मिलने वाली सिद्धियों या विशेष अनुभूतियों में उलझ जाए, तो उसकी आगे की प्रगति रुक सकती है। इसलिए भगवान की ओर बढ़ते समय इन सबको भी छोड़ने की आवश्यकता होती है।
महाराज जी यह भी स्पष्ट करते हैं कि प्रारंभ में जो आनंद मिलता है, वह अभी आनंदमय कोश का अनुभव है, आनंद के वास्तविक स्रोत का नहीं। इसलिए वह कुछ समय बाद कम हो जाता है और फिर मन संसार की ओर भी जा सकता है। लेकिन जब भगवान का वास्तविक आनंद प्रकट होता है, तब वह कभी समाप्त नहीं होता। उस अवस्था में साधक का मन निरंतर भगवान में लगा रहता है, आँखों से प्रेमाश्रु बहते हैं, रोमांच होता है और भगवान के दर्शन की तीव्र लालसा जागृत होती है। यह कोई कल्पना नहीं, बल्कि साधना की वास्तविक अवस्था है।
अंत में महाराज जी कहते हैं कि साधक को अनुभवों के पीछे नहीं, बल्कि भजन के पीछे चलना चाहिए। यदि भजन निरंतर चलता रहेगा और जीवन में शुद्ध आचरण बना रहेगा, तो भगवान की कृपा से उचित समय पर वही दिव्य आनंद स्वयं प्रकट होगा। इसलिए प्रारंभिक अनुभवों में रुकने के बजाय निरंतर साधना करते रहना ही साधक के लिए सबसे उचित मार्ग है।
प्रश्न 4. नाम-जप ही जीवन की सभी समस्याओं का समाधान है, लेकिन प्रारंभिक साधक नाम-जप में निरंतरता लाने के लिए किन-किन सावधानियों का पालन करें?
उत्तर:
श्री प्रेमानंद महाराज जी बताते हैं कि नाम-जप को निरंतर और स्थिर बनाने के लिए सबसे पहले अपनी वाणी पर नियंत्रण आवश्यक है। जो व्यक्ति बिना आवश्यकता के अधिक बोलता है, उसका मन बार-बार बाहर की ओर भागता है और नाम-जप में स्थिर नहीं हो पाता। इसलिए आवश्यक कार्यों में ही बोलना चाहिए और अनावश्यक बातचीत से बचना चाहिए। महाराज जी इसे “विचार मौन” कहते हैं, अर्थात जहाँ आवश्यकता हो वहाँ बोलें, लेकिन व्यर्थ की चर्चा में समय और मन दोनों को न लगाएँ।
वे आगे बताते हैं कि भोजन का भी नाम-जप पर गहरा प्रभाव पड़ता है। साधक को सात्त्विक, पवित्र और सीमित भोजन करना चाहिए। आवश्यकता से अधिक भोजन आलस्य और प्रमाद को बढ़ाता है, जिससे भजन में मन नहीं लगता। भोजन हमेशा भगवान को अर्पित करके प्रसाद रूप में ग्रहण करना चाहिए। साथ ही भोजन को अच्छी तरह चबाते हुए भगवान के नाम का स्मरण करना चाहिए। इससे भोजन भी पवित्र बनता है और मन भी धीरे-धीरे निर्मल होने लगता है।
महाराज जी बाहरी और भीतरी दोनों प्रकार के कुसंग से बचने की शिक्षा देते हैं। बाहरी कुसंग में बुरे लोगों का साथ, अशुद्ध दृश्य, मोबाइल का दुरुपयोग और अनुचित वातावरण आता है। वहीं भीतरी कुसंग का अर्थ है मन में गंदे विचारों को स्थान देना। यदि ऐसे विचार आते ही साधक नाम-जप शुरू कर दे, तो नाम की शक्ति उन विचारों को धीरे-धीरे नष्ट कर देती है। इसलिए हर परिस्थिति में नाम का आश्रय लेना चाहिए और किसी भी प्रकार के पापपूर्ण आचरण से बचना चाहिए।
महाराज जी नाम-जप की एक सरल विधि भी बताते हैं। वे कहते हैं कि जीभ के अग्रभाग को तालु के ऊपरी भाग पर टिकाकर, शांत भाव से श्वास के साथ नाम-जप करने से मन स्वतः स्थिर होने लगता है। साथ ही साधक को अपने भजन का प्रदर्शन नहीं करना चाहिए। गृहस्थ जीवन के सभी आवश्यक कार्य करते हुए भीतर-ही-भीतर भगवान का नाम चलता रहे, यही श्रेष्ठ साधना है। इस प्रकार पवित्र भोजन, संयमित वाणी, कुसंग का त्याग, निरंतर नाम-स्मरण और विनम्र जीवन से नाम-जप में धीरे-धीरे स्थिरता और निरंतरता आने लगती है।
प्रश्न 5. रसना (स्वाद) की तृष्णा और स्वादिष्ट भोजन की इच्छा पर नियंत्रण कैसे पाया जाए?
उत्तर:
श्री प्रेमानंद महाराज जी बताते हैं कि केवल रसना ही नहीं, बल्कि सभी इन्द्रियाँ अपने-अपने विषयों की ओर आकर्षित होती हैं। कोई स्वाद में अधिक आसक्त होता है, कोई देखने, सुनने या अन्य विषय-भोगों में। इन इच्छाओं की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इन्हें पूरा करने पर भी मन को कभी स्थायी तृप्ति नहीं मिलती। मन बार-बार उसी सुख को फिर से पाना चाहता है। इसलिए स्वाद की तृष्णा को केवल भोजन बदलकर समाप्त नहीं किया जा सकता। वास्तविक तृप्ति केवल भगवान से संबंध जोड़ने पर ही प्राप्त होती है।
महाराज जी समझाते हैं कि साधक को यह समझना चाहिए कि वह शरीर नहीं, बल्कि परमात्मा का अंश है। शरीर और इन्द्रियाँ प्रकृति का भाग हैं, जबकि हमारा वास्तविक स्वरूप उनसे अलग है। जब यह समझ धीरे-धीरे दृढ़ होने लगती है, तब इन्द्रियों की माँगों पर नियंत्रण करना भी सरल होने लगता है। इस ज्ञान को स्थिर करने के लिए सत्संग सुनना, नाम-जप करना और सेवा की भावना रखना आवश्यक है। यही साधना मन को विषयों से हटाकर भगवान की ओर ले जाती है।
महाराज जी स्वाद की आसक्ति कम करने का अत्यंत सरल उपाय भी बताते हैं। वे कहते हैं कि जो वस्तु हमें सबसे अधिक प्रिय लगती हो, पहले उसे भगवान को भोग लगाना चाहिए और फिर प्रसाद मानकर ग्रहण करना चाहिए। यदि संभव हो तो उसी प्रिय वस्तु का कुछ भाग किसी भूखे या जरूरतमंद व्यक्ति को प्रेम से दे देना चाहिए। ऐसा करने से मन की आसक्ति धीरे-धीरे कम होती है और भोजन केवल स्वाद का साधन न रहकर सेवा और प्रसाद का माध्यम बन जाता है। वे यह भी कहते हैं कि साधक को निषिद्ध और अपवित्र पदार्थों से दूर रहना चाहिए तथा पवित्र भोजन को ही भगवान का प्रसाद समझकर ग्रहण करना चाहिए।
अंत में महाराज जी बताते हैं कि प्रसाद में विशेष आध्यात्मिक प्रभाव होता है। भगवान को अर्पित किया हुआ भोजन मन को शुद्ध करता है और आसक्ति को कम करता है। इसलिए प्रत्येक भोजन से पहले भगवान का स्मरण करके उसे अर्पित करना चाहिए। साथ ही नाम-जप, चरणामृत और प्रसाद का नियमित सेवन साधक को इन्द्रियों पर विजय पाने की शक्ति देता है। इस प्रकार स्वाद पर नियंत्रण केवल त्याग से नहीं, बल्कि भगवान से जुड़कर और प्रसाद की भावना से जीवन जीने पर सहज रूप से आने लगता है।
प्रश्न 6. जिन भगवान को हमने देखा नहीं, उन पर विश्वास कैसे करें? क्या केवल तर्क से भगवान को जाना जा सकता है?
उत्तर:
श्री प्रेमानंद महाराज जी बताते हैं कि भगवान को केवल तर्क और बुद्धि के आधार पर नहीं जाना जा सकता। वे सबसे पहले साधक से प्रश्न करते हैं कि जिस प्रकार मनुष्य ने स्वयं अपनी आत्मा को प्रत्यक्ष नहीं देखा, फिर भी वह अपने अस्तित्व को स्वीकार करता है, उसी प्रकार परमात्मा भी प्रत्यक्ष दिखाई न देने पर भी सत्य हैं। शरीर दिखाई देता है, लेकिन हमारा वास्तविक स्वरूप शरीर नहीं है। जैसे मन दिखाई नहीं देता, फिर भी उसके अस्तित्व को सभी स्वीकार करते हैं, उसी प्रकार परमात्मा का अनुभव भी श्रद्धा और साधना से होता है, केवल तर्क से नहीं।
महाराज जी आगे कहते हैं कि जिस प्रकार बच्चे को अपने पिता का ज्ञान उसकी माता के विश्वास से होता है, उसी प्रकार भगवान के वास्तविक स्वरूप का परिचय गुरु के माध्यम से मिलता है। गुरु जिस सत्य को अनुभव करके बताते हैं, उस पर श्रद्धा रखने से साधक धीरे-धीरे उसी सत्य का अनुभव करने लगता है। केवल प्रश्न करते रहना या हठपूर्वक प्रमाण माँगते रहना भगवान की प्राप्ति का मार्ग नहीं है। भगवान को जानने के लिए उनके बताए मार्ग पर चलना आवश्यक है।
महाराज जी स्पष्ट करते हैं कि भगवान की प्राप्ति के लिए पात्रता बनानी पड़ती है। जैसे किसी बड़े पदाधिकारी से मिलने के लिए भी अनेक प्रक्रियाओं से गुजरना पड़ता है, वैसे ही अनंत ब्रह्मांडों के स्वामी परमात्मा का अनुभव भी साधना, शुद्ध आचरण और भगवान की कृपा से होता है। वे बताते हैं कि भगवान हर समय हमारे साथ हैं, लेकिन हमारा मन संसार में उलझा होने के कारण उन्हें अनुभव नहीं कर पाता। जब साधक नाम-जप, विनम्रता और निष्काम भक्ति के द्वारा अपने हृदय को निर्मल बनाता है, तब भगवान स्वयं अपने दर्शन कराते हैं।
अंत में महाराज जी कहते हैं कि परमात्मा की महिमा बुद्धि की सीमा से परे है। इसलिए केवल तर्क करते रहने से सत्य की प्राप्ति नहीं होगी। श्रद्धा, विश्वास, नाम-जप और पवित्र आचरण ही इस मार्ग की वास्तविक नींव हैं। साधक यदि पाप कर्मों से बचते हुए भगवान के नाम का आश्रय ले और विश्वासपूर्वक साधना करता रहे, तो भगवान की कृपा से उसका भ्रम दूर होता है और धीरे-धीरे परमात्मा का अनुभव होने लगता है। यही भगवान को जानने का वास्तविक मार्ग है।
Credit:
“यह लेख संत श्री प्रेमानंद जी महाराज के एकान्तिक वार्तालाप प्रवचन की अमृत वाणी पर आधारित है।”
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