माला-1296: बच्चों से मोह या भगवान से प्रेम? श्री प्रेमानंद महाराज जी के अमृत वचनों से नाम जप महिमा

प्रश्न 1: महाराज जी, हम अपने बच्चों से मोह का त्याग कैसे करें? क्या बच्चों में भगवत भाव करके उनका पालन-पोषण करना उचित है?

उत्तर:

महाराज जी ने इस प्रश्न का अत्यंत मार्मिक उत्तर देते हुए कहा कि बच्चों से मोह त्यागने की आवश्यकता नहीं है, बल्कि मोह को भगवत भाव में परिवर्तित करने की आवश्यकता है। सामान्यतः माता-पिता अपने बच्चों को केवल अपना पुत्र या पुत्री मानकर उनसे प्रेम करते हैं। इसी कारण जब बच्चे अपेक्षा के अनुसार व्यवहार नहीं करते, तब दुख, चिंता और मोह बढ़ जाता है।

महाराज जी ने समझाया कि यदि माता-पिता अपने बच्चों में भगवान का स्वरूप देखने लगें, तो जीवन की दिशा बदल सकती है। जैसे हम मंदिर में किसी विग्रह को भगवान मानकर उसकी सेवा करते हैं, वैसे ही यदि अपने पुत्र-पुत्री को भगवान का दिया हुआ स्वरूप मानकर उनकी सेवा करें, तो वह मोह नहीं बल्कि भक्ति बन जाती है।

उन्होंने कहा कि भगवान के बिना किसी शरीर का कोई मूल्य नहीं है। जिस शरीर से भगवान का अंश निकल जाता है, उसी शरीर को लोग कुछ समय बाद अग्नि को समर्पित कर देते हैं। इसका अर्थ है कि वास्तव में प्रेम शरीर से नहीं, उसमें स्थित परमात्मा से होता है।

महाराज जी ने कहा कि माता का कर्तव्य है कि वह बच्चों को केवल आधुनिक शिक्षा ही न दे, बल्कि उन्हें धर्म, संस्कार, नाम जप और भगवान की भक्ति का मार्ग भी दिखाए। यदि माता-पिता बच्चों में भगवत भाव रखकर सेवा करेंगे, तो उनके भीतर मोह के स्थान पर प्रेम उत्पन्न होगा।

उनके अनुसार बच्चों में भगवान को देखकर प्रेम करना ही गृहस्थ जीवन की सबसे सुंदर साधना है। इससे परिवार भी प्रेममय बनेगा और भगवान की प्राप्ति का मार्ग भी प्रशस्त होगा।


प्रश्न 2: प्रेम भक्ति और वैराग्य (त्याग) के बीच क्या संबंध है? क्या बिना वैराग्य के प्रेम भक्ति प्राप्त हो सकती है?

उत्तर:

महाराज जी ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि बिना वैराग्य के वास्तविक प्रेम भक्ति संभव नहीं है। लेकिन वैराग्य का अर्थ घर छोड़ देना, वस्त्र बदल लेना या जंगल में चले जाना नहीं है। वैराग्य का वास्तविक अर्थ है—भगवान के अतिरिक्त किसी भी वस्तु, व्यक्ति या स्थान में अंतिम आश्रय न मानना।

उन्होंने गोस्वामी तुलसीदास जी की पंक्ति का भाव समझाते हुए कहा कि जब मनुष्य संसार की सभी ममताओं को समेटकर भगवान के चरणों में बाँध देता है, तभी प्रेम भक्ति का प्रारंभ होता है। जब तक मनुष्य धन, परिवार, प्रतिष्ठा, शरीर और भोगों को सबसे अधिक प्रिय मानता रहेगा, तब तक प्रेम भक्ति नहीं जाग सकती।

महाराज जी ने मीरा जी का उदाहरण देते हुए कहा कि उन्होंने कहा था—“मेरे तो गिरधर गोपाल, दूसरो न कोई।” यही प्रेम भक्ति का स्वरूप है। जब भगवान के अतिरिक्त कोई दूसरा प्रिय न रह जाए, तब प्रेम प्रकट होता है।

उन्होंने बताया कि प्रेम के दो स्वरूप होते हैं—विरह और मिलन। विरह में साधक भगवान के दर्शन के लिए तड़पता है और मिलन में भगवान के प्रेम से अभिभूत होकर आनंद के आँसू बहाता है। यह स्थिति तभी आती है जब संसार के आकर्षण समाप्त हो जाते हैं।

महाराज जी के अनुसार प्रेम कोई बाहरी प्रदर्शन नहीं है। यह हृदय का विषय है। कोई गृहस्थ भी प्रेमी हो सकता है और कोई साधु वेश में रहकर भी प्रेम से दूर हो सकता है। इसलिए वास्तविक वैराग्य भीतर का होना चाहिए, तभी प्रेम भक्ति जागृत होती है।


प्रश्न 3: महाराज जी, आप भीतर से भगवान के चिंतन में स्थित रहते हुए भी बाहरी व्यवहार, सेवाएँ और वार्तालाप इतनी सहजता से कैसे कर लेते हैं?

उत्तर:

महाराज जी ने इस प्रश्न का उत्तर अत्यंत विनम्रता से दिया। उन्होंने कहा कि यह किसी मनुष्य की क्षमता नहीं है। यह केवल भगवान की सामर्थ्य से संभव होता है। जब तक मनुष्य अपने बल पर कार्य करता है, तब तक वह एक समय में एक ही विषय पर ध्यान दे सकता है। लेकिन जब भगवान की कृपा होती है, तब भगवान स्वयं साधक के माध्यम से कार्य करने लगते हैं।

महाराज जी ने कहा कि उस अवस्था में मन, बुद्धि, चित्त और अहंकार सब भगवान के अधीन हो जाते हैं। बाहर से देखने पर लगता है कि व्यक्ति बोल रहा है, चल रहा है, सेवा कर रहा है और लोगों से बातचीत कर रहा है, लेकिन भीतर से सब कुछ भगवान ही करा रहे होते हैं।

उन्होंने उदाहरण देकर समझाया कि जैसे किसी व्यक्ति पर किसी शक्ति का प्रभाव हो जाता है और वह उसी के अनुसार कार्य करता है, वैसे ही भगवत प्रेम की अवस्था में भगवान का प्रभाव इतना प्रबल हो जाता है कि साधक अपने अस्तित्व को भूलने लगता है।

महाराज जी ने कहा कि यह कोई अभ्यास से प्राप्त होने वाली सामान्य स्थिति नहीं है। यह भगवान की विशेष कृपा से आती है। जब साधक पूरी तरह भगवान को समर्पित हो जाता है, तब भगवान उसके जीवन की बागडोर अपने हाथ में ले लेते हैं।

उन्होंने यह भी कहा कि गृहस्थ व्यक्ति भी इस दिशा में आगे बढ़ सकता है। यदि वह अपने सभी कार्य भगवान को समर्पित कर दे और निरंतर नाम जप करता रहे, तो धीरे-धीरे उसके भीतर भी भगवत स्मरण स्थायी होने लगता है।

प्रश्न 4: मानसिक सेवा करते समय देहाभिमान के कारण भगवान के प्रति कभी-कभी अशुद्ध या गंदे विचार आ जाते हैं। क्या ऐसे में मानसिक सेवा करनी चाहिए या नहीं?

उत्तर:

महाराज जी ने इस प्रश्न का उत्तर बहुत स्पष्टता और करुणा के साथ दिया। उन्होंने कहा कि यदि मानसिक सेवा करते समय बार-बार विकार, अशुद्ध विचार या देहभाव उत्पन्न हो रहा है, तो इसका अर्थ है कि साधक अभी उस अवस्था के लिए पूरी तरह तैयार नहीं हुआ है। इसका मतलब यह नहीं कि वह अयोग्य है, बल्कि अभी उसे आधारभूत साधना को और मजबूत करने की आवश्यकता है।

महाराज जी ने समझाया कि वास्तविक मानसिक सेवा तब प्रारंभ होती है जब भगवान का स्वरूप मन के भीतर स्पष्ट रूप से जागृत होने लगे। जब मन वास्तव में भगवान के रूप में स्थिर हो जाता है, तब गंदे विचार टिक नहीं सकते। यदि विकार बार-बार उठ रहे हैं, तो समझना चाहिए कि अभी मन, बुद्धि और चित्त का पर्याप्त शुद्धिकरण नहीं हुआ है।

उन्होंने कहा कि साधक को निराश नहीं होना चाहिए। मानसिक सेवा छोड़कर भटकने की भी आवश्यकता नहीं है। बल्कि अभी प्राथमिक साधनों पर अधिक ध्यान देना चाहिए—नाम जप, सत्संग, भगवान की लीलाओं का श्रवण, शास्त्र अध्ययन, माता-पिता की सेवा, संत सेवा और सदाचार।

महाराज जी ने विशेष रूप से कहा कि नाम जप ही मन की दुर्वासनाओं को समाप्त करता है। जितना अधिक नाम जप होगा, उतना ही मन पवित्र होगा। जब मन पवित्र हो जाएगा, तब मानसिक सेवा स्वतः शुद्ध होने लगेगी।

उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि जैसे किसी गंदे बर्तन में अमृत नहीं रखा जा सकता, वैसे ही अशुद्ध मन में उच्च कोटि की मानसिक सेवा स्थिर नहीं रह सकती। पहले पात्रता बनानी होगी, फिर सेवा अपने आप सफल होगी।

महाराज जी के अनुसार अभी साधक को “राधा नाम” का अधिकाधिक जप करना चाहिए। नाम ही अंततः रूप, गुण और लीला का द्वार खोलता है।


प्रश्न 5: साक्षी भाव (आत्मज्ञान) और भक्ति में कौन श्रेष्ठ है? पहले ज्ञान प्राप्त करना चाहिए या पहले भक्ति करनी चाहिए?

उत्तर:

महाराज जी ने बताया कि ज्ञान और भक्ति को एक-दूसरे का विरोधी नहीं समझना चाहिए। दोनों मार्ग भगवान तक ही पहुँचाते हैं, लेकिन उनकी यात्रा का तरीका अलग होता है।

उन्होंने कहा कि ज्ञान मार्ग में साधक स्वयं को शरीर, मन, बुद्धि और संसार से अलग मानने का अभ्यास करता है। वह बार-बार चिंतन करता है कि “मैं शरीर नहीं हूँ, मैं मन नहीं हूँ, मैं शुद्ध आत्मा हूँ।” इस प्रकार वह साक्षी भाव में स्थित होकर धीरे-धीरे अपने आत्मस्वरूप का अनुभव करता है।

दूसरी ओर भक्ति मार्ग में साधक स्वयं को भगवान के चरणों में समर्पित कर देता है। यहाँ साक्षी भाव नहीं, बल्कि तादात्म्य भाव होता है। भक्त इतना भगवान में डूब जाता है कि उसे अपने अस्तित्व का भी विस्मरण होने लगता है। वह केवल अपने प्रियतम भगवान को ही अनुभव करता है।

महाराज जी ने कहा कि ज्ञान मार्ग में आरंभ से ही अभेद का चिंतन होता है, जबकि भक्ति में पहले भक्त और भगवान का भेद रहता है। लेकिन प्रेम की पराकाष्ठा में वही भेद भी मिट जाता है और साधक भगवान में तन्मय हो जाता है।

उन्होंने यह भी कहा कि भगवान शंकराचार्य ने भी स्वरूपानुसंधान को भक्ति कहा है। इसलिए वास्तविकता में दोनों एक-दूसरे के पूरक हैं।

महाराज जी के अनुसार भक्ति को अधिक सरल और मधुर इसलिए माना गया है क्योंकि बिना गुरु कृपा और भगवान की कृपा के ज्ञान भी स्थिर नहीं हो सकता। भक्ति हृदय को पवित्र करती है और वही अंततः ज्ञान का द्वार भी खोल देती है।


प्रश्न 6: जैसे राजा परीक्षित, धुंधकारी और नारद जी का उद्धार हुआ, क्या वैसे ही केवल भागवत कथा सुनने से हमें भी मोक्ष की प्राप्ति हो सकती है?

उत्तर:

महाराज जी ने इस प्रश्न का उत्तर देते हुए कहा कि केवल बाहरी रूप से कथा सुन लेने से वही परिणाम नहीं मिल जाता जो राजा परीक्षित या धुंधकारी को मिला था। हमें उनके जीवन की गहराई को समझना होगा।

उन्होंने बताया कि राजा परीक्षित ने सात दिनों तक न अन्न ग्रहण किया और न जल। वे पूर्ण एकाग्रता के साथ श्री शुकदेव जी महाराज की वाणी का श्रवण करते रहे। उनका मन एक क्षण के लिए भी संसार की ओर नहीं गया। इसी कारण उन्हें मोक्ष की प्राप्ति हुई।

इसी प्रकार धुंधकारी ने भी अत्यंत तन्मयता के साथ भागवत कथा का श्रवण किया। उनकी एकाग्रता और ग्रहणशीलता सामान्य व्यक्ति जैसी नहीं थी। नारद जी की बात करें तो उन्होंने पूर्व जन्मों में संतों की सेवा, भजन और तपस्या के द्वारा स्वयं को पात्र बनाया था।

महाराज जी ने कहा कि यदि हम उनकी तुलना स्वयं से करेंगे तो कठिनाई होगी। लेकिन यदि हम उनकी चरणरज का आश्रय लें, उनके आदर्शों का अनुसरण करें और श्रद्धा से कथा सुनें, तो निश्चित रूप से हमारा भी कल्याण होगा।

उन्होंने समझाया कि भागवत कथा केवल सुनने की वस्तु नहीं है। उसे मनन करना, जीवन में उतारना और उसके अनुसार चलना भी आवश्यक है। कथा का वास्तविक फल तब मिलता है जब वह हमारे व्यवहार और जीवन को बदलने लगे।

महाराज जी के अनुसार श्रद्धा, नाम जप, सत्संग और कथा श्रवण मिलकर साधक को धीरे-धीरे भगवान की ओर ले जाते हैं। मोक्ष कोई एक दिन की उपलब्धि नहीं, बल्कि निरंतर साधना का परिणाम है।

प्रश्न 7: सहचरी भाव के उपासक होने पर क्या हमें भागवत कथा और गीता का श्रवण करना चाहिए, या केवल राधा-कृष्ण की सेवा-भावना ही पर्याप्त है?

उत्तर:

महाराज जी ने इस प्रश्न का उत्तर देते हुए कहा कि चाहे साधक किसी भी भाव का उपासक हो—दास्य भाव, सखा भाव, वात्सल्य भाव या सहचरी भाव—उसे भगवान की महिमा जानने के लिए भागवत, गीता और संत वाणी का श्रवण अवश्य करना चाहिए। केवल भाव का अभ्यास पर्याप्त नहीं है, क्योंकि बिना भगवान के वास्तविक स्वरूप को जाने प्रेम दृढ़ नहीं हो सकता।

महाराज जी ने समझाया कि जब तक हमें यह ज्ञात नहीं होगा कि हमारे आराध्य कितने महान हैं, तब तक उनके प्रति प्रेम भी गहरा नहीं होगा। श्रीमद्भागवत भगवान की महिमा का वर्णन करती है, गीता भगवान के ज्ञान का प्रकाश देती है और संतों की वाणी उस ज्ञान को जीवन में उतारने का मार्ग दिखाती है।

उन्होंने कहा कि पहले भगवत तत्व को समझना आवश्यक है, फिर प्रेम तत्व की ओर बढ़ना चाहिए। यदि भगवान की महिमा का ज्ञान नहीं होगा, तो प्रेम केवल कल्पना बनकर रह सकता है। लेकिन जब साधक जान लेता है कि वही परमब्रह्म राधा-कृष्ण रूप में लीला कर रहे हैं, तब उसके हृदय में प्रेम और अधिक दृढ़ हो जाता है।

महाराज जी ने बताया कि भागवत कथा सुनने से श्रीकृष्ण की महिमा प्रकट होती है और उसी महिमा के आधार पर राधा-कृष्ण के प्रति अनुराग बढ़ता है। इसलिए सहचरी भाव के साधक को भी भागवत, गीता और संत वाणी का श्रवण अवश्य करना चाहिए।

उनके अनुसार श्रवण, नाम जप और सेवा—ये तीनों साधन मिलकर साधक को प्रेम की ऊँचाइयों तक पहुँचाते हैं।


प्रश्न 8: व्यवहार करते समय, व्यापार या किसी गंभीर चर्चा के दौरान भगवान का नाम स्मरण छूट जाता है। ऐसे में निरंतर नाम जप कैसे बनाए रखें?

उत्तर:

महाराज जी ने कहा कि यदि व्यापार, नौकरी, परिवार या किसी अन्य विषय की चर्चा करते समय भगवान का स्मरण छूट जाता है, तो इसका अर्थ है कि उस समय हमारे मन में उस विषय का महत्व भगवान से अधिक हो गया। जहाँ महत्व होगा, मन वहीं जाएगा।

उन्होंने समझाया कि निरंतर नाम जप का अर्थ केवल जिह्वा से नाम लेना नहीं है। वास्तविक भजन भीतर की स्मृति है। जैसे कोई व्यक्ति कहीं जाने की जल्दी में हो, तो बाहर चाहे कुछ भी करता रहे, लेकिन भीतर उसका ध्यान अपने लक्ष्य पर ही रहता है। उसी प्रकार साधक को भगवान को अपने जीवन का सबसे महत्वपूर्ण लक्ष्य बनाना चाहिए।

महाराज जी ने कहा कि जब कोई ग्राहक दुकान पर आए, तो पहले उसे भगवान का स्वरूप मानो। फिर उससे व्यवहार करो। यदि आधे घंटे तक व्यापार की बात हुई और नाम जप नहीं हुआ, लेकिन पूरे समय यह भावना रही कि भगवान ग्राहक के रूप में आए हैं, तो वह समय भी भजन बन गया।

उन्होंने रसखान जी के भाव का उदाहरण देते हुए कहा कि जैसे सिर पर मटकी रखकर चलने वाली ब्रज की गोपियाँ आपस में बातें भी करती हैं, हँसती भी हैं, लेकिन उनका ध्यान मटकी पर बना रहता है। वैसे ही साधक को व्यवहार करते हुए भी भीतर भगवान की स्मृति बनाए रखनी चाहिए।

महाराज जी के अनुसार निरंतर अभ्यास, कर्म समर्पण और भगवत भावना से धीरे-धीरे ऐसी अवस्था आती है जहाँ काम करते हुए भी भगवान का विस्मरण नहीं होता। यही कर्मयोग और नाम स्मरण का सुंदर संगम है।


प्रश्न 9: क्या गृहस्थ व्यक्ति भी भगवान के प्रेम में स्थित होकर सभी सांसारिक कार्य कर सकता है?

उत्तर:

महाराज जी ने स्पष्ट कहा कि भगवान का प्रेम केवल विरक्तों या संन्यासियों का अधिकार नहीं है। गृहस्थ भी भगवान के प्रेम में स्थित होकर अपने सभी कार्य कर सकता है। वास्तव में प्रेम हृदय का विषय है, बाहरी वेशभूषा या जीवन शैली का नहीं।

उन्होंने बताया कि कोई व्यक्ति साधु वस्त्र पहनकर भी संसार में आसक्त हो सकता है और कोई गृहस्थ सामान्य वस्त्रों में रहकर भी भगवान का प्रेमी हो सकता है। इसलिए प्रेम की पहचान बाहर से नहीं, भीतर से होती है।

महाराज जी ने उदाहरण दिया कि जैसे एक पतिव्रता स्त्री अपने परिवार के सभी कार्य करती है, सास-ससुर की सेवा करती है, घर संभालती है, लेकिन उसके हृदय में अपने प्रिय पति का स्मरण बना रहता है। उसी प्रकार एक गृहस्थ भी संसार के कार्य करते हुए भीतर-ही-भीतर भगवान का चिंतन कर सकता है।

उन्होंने कहा कि खेत में काम करना, व्यापार करना, नौकरी करना, परिवार की सेवा करना—ये सब भगवान को समर्पित कर दिए जाएँ तो साधना बन जाते हैं। समस्या कार्य में नहीं, आसक्ति में है।

महाराज जी के अनुसार गृहस्थ को चाहिए कि वह धर्मपूर्वक कमाए, परिवार की सेवा करे, नाम जप करे और हर संबंध में भगवान का स्वरूप देखे। ऐसा गृहस्थ भी भगवान को उतना ही प्रिय हो सकता है जितना कोई विरक्त संत।


प्रश्न 10: भगवत प्रेम (प्रीति) की वास्तविक पहचान क्या है और उसे कैसे प्राप्त किया जा सकता है?

उत्तर:

महाराज जी ने कहा कि भगवत प्रेम संसार का सबसे गुप्त और सबसे दुर्लभ अनुभव है। यह कोई बाहरी प्रदर्शन की वस्तु नहीं है। प्रेम हृदय में रहता है और वही उसे जान सकता है जिसके भीतर वह जागृत हुआ हो।

उन्होंने बताया कि प्रेम की पहचान यह है कि भगवान के अतिरिक्त कोई दूसरा प्रिय न रहे। संसार की वस्तुएँ, धन, मान, प्रतिष्ठा और भोग फीके लगने लगें तथा भगवान का स्मरण सबसे मधुर लगने लगे—यही प्रेम का प्रारंभ है।

महाराज जी ने कहा कि प्रेम के दो स्वरूप हैं—विरह और मिलन। विरह में साधक भगवान के दर्शन के लिए तड़पता है, उनके बिना जीना कठिन लगता है। मिलन में वह भगवान के प्रेम और आनंद से भर जाता है। दोनों अवस्थाएँ प्रेम की ही अभिव्यक्तियाँ हैं।

उन्होंने समझाया कि प्रेम कोई बुद्धि का विषय नहीं है। यह भगवान की कृपा से हृदय में प्रकट होता है। लेकिन उस कृपा को पाने के लिए साधक को निरंतर नाम जप, सत्संग, भगवत कथा श्रवण और निष्काम सेवा करनी होती है।

महाराज जी के अनुसार जब भगवान की कृपा से प्रेम जागता है, तब मनुष्य का जीवन पूरी तरह बदल जाता है। भगवान उसके लिए सबसे प्रिय बन जाते हैं और वह हर समय उन्हीं के स्मरण में आनंद अनुभव करता है। यही भगवत प्रेम की वास्तविक पहचान है।

Credit:
“यह लेख संत श्री प्रेमानंद जी महाराज के एकान्तिक वार्तालाप प्रवचन की अमृत वाणी पर आधारित है।”

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