माला-1266:कर्म करते हुए भी निर्लिप्त कैसे रहा जाए? श्री प्रेमानंद महाराज जी के अमृत वचनों से नाम जप महिमा

प्रश्न 1:महाराज जी, “पानी में मीन प्यासी” का वास्तविक भावार्थ क्या है?

उत्तर:
महाराज जी बताते हैं कि “पानी में मीन प्यासी” का अर्थ है कि जिस आनंद की खोज मनुष्य बाहर संसार में कर रहा है, वह आनंद वास्तव में उसके भीतर ही मौजूद है। जैसे मछली पानी में रहते हुए भी यदि प्यास महसूस करे तो यह कितना आश्चर्य की बात है, वैसे ही जीव परमात्मा के भीतर स्थित होने के बाद भी संसार के भोगों में सुख खोजता फिरता है।

महाराज जी कहते हैं कि भगवान स्वयं हमारे हृदय में विराजमान हैं और वही सच्चिदानंद स्वरूप हैं। लेकिन अज्ञान के कारण मनुष्य संसार की वस्तुओं, व्यक्तियों और भोगों में सुख खोजता रहता है। यह ठीक वैसा ही है जैसे रेगिस्तान में मृग मरीचिका देखकर पानी का भ्रम होना। दूर से जल दिखाई देता है, लेकिन पास जाने पर कुछ नहीं मिलता।

संसार का सुख क्षणिक और भ्रममय है। एक इच्छा पूरी होती है तो दूसरी खड़ी हो जाती है। लेकिन परमात्मा का आनंद स्थायी है।

महाराज जी कहते हैं कि यदि साधक नाम-जप, सत्संग और शास्त्र स्वाध्याय करे, तो धीरे-धीरे उसका मन बाहरी भोगों से हटकर भीतर के आनंद की ओर मुड़ने लगता है।

इसलिए वास्तविक आनंद संसार में नहीं, बल्कि भगवान के नाम और स्मरण में है। वही मनुष्य जीवन को सार्थक बनाता है।


प्रश्न 2: कर्म करते हुए भी निर्लिप्त कैसे रहा जाए?

उत्तर:
महाराज जी बताते हैं कि कर्म करते हुए निर्लिप्त रहना तभी संभव है जब साधक के भीतर “दृष्टा भाव” जागृत हो जाए। सामान्यतः मनुष्य हर कर्म में अपने को कर्ता मानता है, इसलिए वह कर्मफल, सुख-दुख और बंधन में फंस जाता है।

निर्लिप्तता केवल बाहरी कर्म छोड़ देने से नहीं आती, बल्कि भीतर के देहाभिमान के मिटने से आती है।

महाराज जी कहते हैं कि जब साधक हर कर्म को “कृष्णार्पणमस्तु” भाव से भगवान को समर्पित करता है और निरंतर भगवान का स्मरण करता है, तब धीरे-धीरे उसके भीतर ज्ञान प्रकट होने लगता है।

वह अनुभव करता है कि वास्तव में कर्म प्रकृति और त्रिगुण माया द्वारा हो रहे हैं, मैं केवल देखने वाला हूं।

यही “दृष्टा भाव” है।

जब यह भाव स्थिर हो जाता है, तब साधक कर्म करता हुआ भी उनसे बंधता नहीं। वह अपने कर्तव्य निभाता है, लेकिन भीतर से स्वतंत्र रहता है।

महाराज जी कहते हैं कि इसके लिए सद्गुरु की शरण, शास्त्र सम्मत जीवन और निरंतर नाम-जप आवश्यक है।

धीरे-धीरे कर्ता-भोक्ता भाव समाप्त होता है और साधक कर्म करते हुए भी निर्लिप्त हो जाता है।


प्रश्न 3: अद्वैत सिद्धि कैसे होती है और उसके बाद जीवन कैसा रहता है?

उत्तर:
महाराज जी बताते हैं कि अद्वैत सिद्धि का अर्थ है—नानात्व का समाप्त हो जाना और केवल एक परमात्मा का अनुभव होना।

उन्होंने रस्सी और सांप का उदाहरण दिया। अंधेरे में रस्सी को सांप समझने से भय उत्पन्न होता है, लेकिन जैसे ही सही ज्ञान होता है कि यह रस्सी है, भय समाप्त हो जाता है। रस्सी वही रहती है, केवल भ्रम मिट जाता है।

इसी प्रकार जब साधक को अपने वास्तविक आत्मस्वरूप का अनुभव होता है, तब संसार का भेदभाव और द्वैत समाप्त होने लगता है।

महाराज जी कहते हैं कि अद्वैत सिद्धि के बाद बाहरी व्यवहार सामान्य दिखाई दे सकता है। महापुरुष खाते-पीते, चलते-फिरते दिखाई देते हैं, लेकिन भीतर से वे जानते हैं कि वे शरीर नहीं, केवल साक्षी हैं।

उनकी दृष्टि में सब अपनी ही आत्मा का विस्तार होता है।

वे करते हुए भी नहीं करते, सुनते हुए भी नहीं सुनते—क्योंकि उनका तादात्म्य शरीर से नहीं रहता।

यह अवस्था केवल तर्क से नहीं, बल्कि गहन साधना, आत्मबोध और भगवान के अनुभव से आती है।

अद्वैत सिद्धि के बाद जीवन बाहर से सामान्य, लेकिन भीतर से पूर्णतः दिव्य और निर्लिप्त हो जाता है।


प्रश्न 4: महापुरुष प्रतिकूलता या अपमान में कैसी प्रतिक्रिया देते हैं?

उत्तर:
महाराज जी बताते हैं कि सच्चा महात्मा वही है जिसके भीतर प्रतिकूलता, अपमान या हिंसा के समय भी द्वेष उत्पन्न न हो।

उन्होंने एक घटना का वर्णन किया जिसमें एक दिगंबर संत को किसी युवक ने पीछे से कई बार लात मारी, लेकिन संत ने पलटकर देखा तक नहीं। वे शांत भाव से वहां से चले गए।

यह इसलिए संभव हुआ क्योंकि उनका शरीर से तादात्म्य समाप्त हो चुका था।

महाराज जी कहते हैं कि जब साधक ब्रह्मबोध को प्राप्त कर लेता है, तब वह सबमें अपनी ही आत्मा को देखता है। उस समय कोई यदि अपमान भी करे, तो वह उसे अपने ही कर्मों का परिणाम मानता है।

साधक अवस्था में व्यक्ति सोचता है—“यह व्यक्ति केवल निमित्त है, वास्तव में मेरे कर्म ही मुझे यह फल दे रहे हैं।”

लेकिन पूर्ण ज्ञानी तो ऐसा भी नहीं सोचता। उसकी दृष्टि सम हो जाती है।

महाराज जी कहते हैं कि यदि प्रतिकूलता आने पर भीतर क्रोध और द्वेष उठे, तो समझना चाहिए कि अभी पूर्ण ब्रह्मबोध नहीं हुआ।

सच्चा महात्मा वही है जो अपमान में भी मंगल भाव रखे और किसी के प्रति द्वेष न करे।


प्रश्न 5: सांसारिक सुख वास्तव में क्या है?

उत्तर:
महाराज जी बताते हैं कि संसार का सुख वास्तविक सुख नहीं, बल्कि भ्रम है। मनुष्य को लगता है कि यदि उसे अमुक वस्तु, व्यक्ति या पद मिल जाए तो वह सुखी हो जाएगा, लेकिन प्राप्त होने के बाद भी तृप्ति नहीं होती।

एक इच्छा पूरी होते ही दूसरी इच्छा जन्म ले लेती है। यही तृष्णा मनुष्य को जीवन भर दौड़ाती रहती है।

महाराज जी कहते हैं कि भगवान ने गीता में संसार को “दुःखालयम् अशाश्वतम्” कहा है—अर्थात यह दुखमय और नाशवान है।

यदि संसार में स्थायी सुख होता, तो कोई व्यक्ति पूर्ण संतुष्ट हो जाता। लेकिन ऐसा कभी नहीं होता।

वास्तविक आनंद केवल भगवान के नाम, स्मरण और भगवत प्रेम में है।

महाराज जी बताते हैं कि जब साधक भगवान से जुड़ता है, तब उसके भीतर संतोष, शांति और निश्चिंतता आने लगती है।

संसार का सुख बाहर खोजने पर नहीं मिलता, बल्कि भगवान से संबंध जोड़ने पर वही संसार आनंदमय लगने लगता है।

इसलिए सांसारिक सुख मृग मरीचिका की तरह है—दिखाई बहुत देता है, लेकिन वास्तव में स्थायी नहीं होता।

प्रश्न 6: नाम-जप में निरंतरता कैसे लाएं?

उत्तर:
महाराज जी बताते हैं कि नाम-जप में निरंतरता का सबसे बड़ा आधार है—सत्संग। साधक कई बार उत्साह में भजन शुरू करता है, लेकिन कुछ दिन बाद संसार फिर आकर्षित करने लगता है। इसका कारण है कि भीतर आध्यात्मिक शक्ति अभी स्थिर नहीं हुई होती।

महाराज जी कहते हैं कि सत्संग साधक को बार-बार “चार्ज” करता है। जैसे मोबाइल को बार-बार चार्ज करना पड़ता है, वैसे ही मन को भी सत्संग और भगवान की वाणी से शक्ति मिलती रहती है।

आजकल मोबाइल के माध्यम से भी सत्संग उपलब्ध है। यदि साधक रोज थोड़ी देर संतों की वाणी सुने, शास्त्र पढ़े और नाम-जप करे, तो उसका मन धीरे-धीरे स्थिर होने लगता है।

साथ ही, गलत संग, गंदे दृश्य और व्यर्थ के मनोरंजन से दूरी आवश्यक है। क्योंकि वही मन को संसार की ओर खींचते हैं।

महाराज जी कहते हैं कि नाम-जप को केवल पूजा के समय तक सीमित न रखें। चलते-फिरते, काम करते हुए भी भगवान का नाम लेते रहें।

धीरे-धीरे नाम जीवन का स्वभाव बन जाएगा और संसार का आकर्षण कम होने लगेगा।

यही निरंतरता का वास्तविक मार्ग है।


प्रश्न 7: आज के समय में सच्चा संत-संग और संत-सेवा कैसे मिले?

उत्तर:
महाराज जी बताते हैं कि संत-संग केवल किसी संत के सामने बैठने तक सीमित नहीं है। महापुरुषों की वाणी पढ़ना, उनके चरित्रों का चिंतन करना और उनके बताए मार्ग पर चलना भी सच्चा सत्संग है।

यदि कोई व्यक्ति श्रीमद्भागवत पढ़ता है, तो वह व्यास जी और श्रीकृष्ण का संग कर रहा है। यदि रामचरितमानस पढ़ता है, तो गोस्वामी तुलसीदास जी का संग कर रहा है।

महाराज जी कहते हैं कि आज के समय में मोबाइल और पुस्तकों के माध्यम से भी सत्संग सहज उपलब्ध है। इसलिए यह कहना कि “संत मिलते नहीं” पूरी तरह सही नहीं है।

वास्तविक संत-सेवा केवल भोजन या वस्त्र देना नहीं, बल्कि संतों की बात मानना है।

यदि साधक महापुरुषों की वाणी को जीवन में उतार ले, तो वही सबसे बड़ी सेवा और पूजा है।

महाराज जी कहते हैं कि संतों के लिखे ग्रंथ घर में रखें, उनका पाठ करें, उनके पदों का गायन करें और उनके अनुसार आचरण बनाएं।

यही सत्संग धीरे-धीरे साधक के जीवन को बदल देता है और भगवान की ओर ले जाता है।


प्रश्न 8: माता-पिता या परिवार के प्रति मोह को कैसे संभालें?

उत्तर:
महाराज जी बताते हैं कि माता-पिता या परिवार से प्रेम करना गलत नहीं है। समस्या तब होती है जब वह प्रेम केवल देह तक सीमित मोह बन जाता है।

यदि साधक अपने माता-पिता में भगवान का स्वरूप देखने लगे, तो वही मोह भगवत प्रेम में बदल सकता है।

महाराज जी कहते हैं—“मातृ देवो भव, पितृ देवो भव।” माता-पिता को भगवान मानकर उनकी सेवा करना भी भक्ति का मार्ग है।

जब साधक अपनी मां, पिता, पत्नी या पुत्र को भगवान का स्वरूप मानकर प्रेम करता है, तब वह प्रेम शुद्ध हो जाता है।

मोह में बिछड़ने का दुख होता है, लेकिन भगवत प्रेम में नहीं। क्योंकि भगवान कभी दूर नहीं होते।

महाराज जी बताते हैं कि यदि हम परिवार में भगवान का अनुभव करने लगें, तो बिछोह का भय भी कम होने लगता है।

लेकिन इसके लिए सत्संग, पवित्र आचरण और नाम-जप आवश्यक है।

जब जीवन में भगवत दृष्टि आ जाती है, तब परिवार भी साधना का माध्यम बन जाता है, बंधन नहीं।


प्रश्न 9: विवेक क्या है? बुद्धि और विवेक में क्या अंतर है?

उत्तर:
महाराज जी बताते हैं कि बुद्धि और विवेक दोनों अलग हैं। बुद्धि त्रिगुण माया से प्रभावित होकर निर्णय करती है, जबकि विवेक शास्त्र और सत्य के आधार पर “सार” और “असार” का निर्णय करता है।

बुद्धि कभी-कभी गलत मार्ग भी सुझा सकती है। जैसे कोई चोरी करने की योजना बनाए, तो बुद्धि उसे बचने के तरीके भी बता सकती है। लेकिन विवेक तुरंत चेतावनी देगा कि यह अधर्म है और इसका परिणाम दुखद होगा।

महाराज जी कहते हैं कि विवेक मन और बुद्धि को नियंत्रित करता है। जब विवेक जागृत होता है, तब मनुष्य गलत निर्णय लेने से बच जाता है।

विवेक सत्संग और शास्त्र स्वाध्याय से विकसित होता है।

साधारण बुद्धि संसार के लाभ-हानि तक सीमित रहती है, लेकिन विवेक जीवन के परम कल्याण की ओर ले जाता है।

महाराज जी बताते हैं कि विवेक होने पर मनुष्य अपने आचरण, संग और निर्णयों में सावधान हो जाता है।

इसलिए भक्ति मार्ग में विवेक अत्यंत आवश्यक है। बिना विवेक के बुद्धि माया में उलझ सकती है, लेकिन विवेक साधक को भगवान की ओर ले जाता है।


प्रश्न 10: सकारात्मक आध्यात्मिक ऊर्जा को कैसे बनाए रखें?

उत्तर:
महाराज जी बताते हैं कि सकारात्मक आध्यात्मिक ऊर्जा बनाए रखने का सबसे सरल उपाय है—नियमित सत्संग, नाम-जप और समय का सदुपयोग।

मनुष्य जब खाली बैठता है, तब व्यर्थ के विचार, चिंता और प्रपंच उसके मन में प्रवेश करने लगते हैं। इसलिए समय को व्यर्थ न जाने देना अत्यंत आवश्यक है।

महाराज जी कहते हैं कि रोज थोड़ी देर सत्संग सुनना चाहिए। आजकल मोबाइल के माध्यम से भी संतों की वाणी हर समय उपलब्ध है।

यदि साधक प्रतिदिन भगवान का नाम जपे, शास्त्रों का स्वाध्याय करे और परोपकार या सेवा में समय लगाए, तो उसका मन धीरे-धीरे सकारात्मक और स्थिर होने लगता है।

उन्होंने यह भी कहा कि मनुष्य को यह नहीं कहना चाहिए कि “हमारे पास समय नहीं है।” वास्तव में समय की कमी नहीं, बल्कि प्राथमिकताओं की समस्या है।

यदि 24 घंटे में केवल 24 मिनट भी भगवान को दे दिए जाएं, तो जीवन बदल सकता है।

महाराज जी कहते हैं कि यही समय भविष्य में सबसे बड़ा सहारा बनेगा, क्योंकि शरीर, धन और पद साथ नहीं जाएंगे—केवल नाम-जप और शुभ कर्म साथ जाएंगे।


प्रश्न 11: नाम-जप में रुचि कैसे बढ़े?

उत्तर:
महाराज जी बताते हैं कि प्रारंभ में नाम-जप में रुचि न लगना स्वाभाविक है। मन वर्षों से संसार और भोगों में लगा हुआ है, इसलिए उसे तुरंत भगवान के नाम में आनंद नहीं आता।

उन्होंने उदाहरण दिया कि जिस व्यक्ति को पित्त रोग हो, उसे मिश्री भी कड़वी लगती है। लेकिन यदि वही मिश्री नियमित रूप से खाई जाए, तो रोग शांत होने पर वह मीठी लगने लगती है।

इसी प्रकार भगवान का नाम अमृत स्वरूप है, लेकिन माया और वासनाओं के कारण वह साधक को प्रारंभ में “कड़वा” लगता है।

महाराज जी कहते हैं कि नाम-जप को नियमपूर्वक करते रहना चाहिए—चाहे मन लगे या न लगे।

धीरे-धीरे पाप और वासनाएं कम होने लगती हैं और नाम में ऐसी रुचि उत्पन्न होती है कि साधक चाहकर भी नाम छोड़ नहीं पाता।

जब नाम में प्रेम जागृत हो जाता है, तब संसार का आकर्षण अपने आप कम हो जाता है।

इसलिए समाधान यही है—नियमित नाम-जप, सत्संग और पवित्र आचरण। यही नाम को “रस” में बदल देता है।

Credit:
“यह लेख संत श्री प्रेमानंद जी महाराज के एकान्तिक वार्तालाप प्रवचन की अमृत वाणी पर आधारित है।”

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