1️⃣ प्रश्न: महाराज जी, गुरु निष्ठा और गुरु कृपा कैसे प्राप्त होती है? जब गुरु कठोर व्यवहार करें तब क्या करें?
उत्तर:
महाराज जी स्पष्ट कहते हैं — गुरु निष्ठा अपने आप नहीं आती, गुरु कृपा से आती है। और गुरु कृपा तब मिलती है जब शिष्य अपने अहंकार को मिट्टी में मिलाने के लिए तैयार हो जाए। जब तक देहाभिमान और अपनी बुद्धि का अहंकार है, तब तक सच्ची निष्ठा नहीं आती।
गुरु का कठोर व्यवहार दंड नहीं, दवा है। जैसे डॉक्टर शरीर को चीरता है, तो रोग काटने के लिए काटता है, न कि कष्ट देने के लिए। उसी प्रकार गुरु जब शिष्य के साथ प्रतिकूल व्यवहार करते हैं — अपमान, तिरस्कार, उपेक्षा, डाँट — तो वह शिष्य के अहंकार पर चोट करने के लिए होता है।
महाराज जी अपने जीवन का उदाहरण देते हैं — कभी महीनों तक भीतर आने नहीं दिया गया, कभी कठोर वृत्ति दिखाई गई। उस समय भीतर यही भाव था — “जो गुरुदेव कर रहे हैं, मंगल के लिए कर रहे हैं।” यही विश्वास निष्ठा है।
सबसे बड़ा शत्रु अहंकार है। “संस्कृति मूल शूल प्रदनाना, सकल शोकदायक अभिमाना” — अभिमान ही समस्त दुखों की जड़ है। गुरु उसी पर वार करते हैं। पर प्रश्न है — कौन चाहता है कि उसके अहंकार पर चोट पड़े?
अनुकूलता में “जी गुरुदेव” कहना सरल है। प्रतिकूलता में भी “जय हो प्रभु आपकी” कह देना — यही शिष्यत्व है। सेवा करने पर सम्मान मिले, यह सब चाहते हैं। पर सेवा के बाद तिरस्कार मिले और फिर भी मन न बदले — यह विरला है।
गुरु और गोविंद में अभेद भाव रखना, तन-मन-प्राण-धन समर्पित कर देना — यही निष्ठा है। जैसे कुम्हार मिट्टी को गूँधता, पीटता, तपाता है, तब पात्र बनता है। वैसे ही गुरु शिष्य को तपाते हैं।
यदि अहंकार पर चोट पड़ी और शिष्य टिक गया — वही पात्र बनता है। यदि अहंकार तिलमिला गया, गुरु की निंदा शुरू हो गई — समझो परीक्षा में गिर गए।
गुरु कृपा का अर्थ है — अहंकार का नाश। और अहंकार का नाश ही आध्यात्मिक उन्नति का प्रारंभ है।
2️⃣ प्रश्न:महाराज जी, संसार में रहते हुए स्थितप्रज्ञ कैसे बनें?
उत्तर:
महाराज जी कहते हैं — स्थितप्रज्ञ होना अंतिम अवस्था है। पहले मन की स्थिति देखो। मन विषयों में भाग रहा है, संकल्प-विकल्प कर रहा है, इंद्रियों के साथ मिलकर शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गंध में सुख खोज रहा है। इस मन को सुधारे बिना स्थितप्रज्ञ की बात करना केवल कल्पना है।
आप आत्मा हैं — यह सत्य है। पर अंतःकरण को सुधारना साधना है। बिना महापुरुष के आश्रय मन सुधरता नहीं।
गुरु बना लेना आसान है, पर गुरु की मानना कठिन है। लाखों लोग गुरु बनाते हैं, पर गुरु की आज्ञा पर चलने वाले कितने हैं?
जब ऐसा समर्पण हो जाए कि “आप जो कहें वही सत्य है” — तब मन उर्ध्वगामी होने लगता है।
राग-आशा ही बंधन है। वेद-पुराण पढ़ लेने से कुछ नहीं, यदि भोगों की आशा शेष है।
महाराज जी बार-बार कहते हैं — नाम जप करो। कलियुग में सर्व स्थिति प्रदान करने वाला भगवान का नाम है।
मन को सुधारो। बुद्धि को राग रहित करो। चित्त को भगवत चिंतन में लगाओ। अहंकार को गलाओ।
भोगों की कामना जब जलाती है, तब भीतर व्यथा होती है। जो उस व्यथा को सह गया, वही परम पद का अधिकारी बना।
स्थितप्रज्ञ होना कोई नई वस्तु पाना नहीं है। जो आप हैं, उसी में स्थित हो जाना है। पर उसके लिए साधना, नाम जप, पवित्र आहार, पवित्र संग आवश्यक है।
3️⃣ प्रश्न: एकांत और कर्तव्य में संतुलन कैसे?
उत्तर:
महाराज जी कहते हैं — मन तो चाहता है कि कोई न देखे, हम किसी को न देखें, बस अपने इष्ट में डूबे रहें। यह स्वाभाविक है।
पर एकांत हमारा सुख है। कर्तव्य समाज का सुख है।
यदि लाखों लोगों को सुख मिल रहा है और मेरा व्यक्तिगत सुख त्यागना पड़े — तो वह त्याग श्रेष्ठ है।
प्रभु की आज्ञा जैसी होती है, वैसे ही रहना चाहिए। “प्रभु आज्ञा जे का जस आई, सो तेहि भाँति रहे सुख लाई।”
यदि भगवान हमसे प्रवचन करा रहे हैं, सेवा करा रहे हैं, तो यह भी उनकी लीला है।
मन एकांत चाहता है — यह कृपा है। पर कर्तव्य पालन भी भगवान की आज्ञा है।
संसार में रहकर भी साधना करनी पड़ेगी। कपड़ा बदलने से मन नहीं बदलता। अभ्यास से बदलता है।
अंततः चलना प्रभु के इशारे पर है, मन के इशारे पर नहीं।
4️⃣ प्रश्न: संत स्वभाव कैसे आए? क्या बिना साधु संग संभव है?
उत्तर:
महाराज जी बहुत स्पष्ट कहते हैं — बिना साधु संग साधुता नहीं आती। भगवान मिल सकते हैं, पदवी मिल सकती है, पर साधुता नहीं।
चित्रकेतु का उदाहरण देते हैं — भगवान मिले, पर साधु संग न होने से उदंडता आई।
साधुता का अर्थ है — दैन्यता, परहित भावना, मान-अपमान में समता, अभिमान का अभाव।
यह सब केवल मंत्र जप से नहीं आता। संतों की चरण रज, उनकी अधीनता, उनके वचनों पर चलना — इससे स्वभाव बदलता है।
स्वभाव बदलना कठिन है। पर संतों के संग से धीरे-धीरे परिवर्तन आता है।
जब बड़े-बड़े संत भी दीनता से प्रणाम करते दिखते हैं, तो अपने भीतर का अभिमान टूटता है।
अहंकार में ही सारे दोष हैं। अहंकार गया तो जीव अपने स्वरूप को प्राप्त होता है।
इसलिए प्रार्थना करो — हमें संतों का संग मिले। यही साधुता की जड़ है।
Credit:
“यह लेख संत श्री प्रेमानंद जी महाराज के एकान्तिक वार्तालाप प्रवचन की अमृत वाणी पर आधारित है।”
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