माला-1025: क्या श्राद्ध, तर्पण आदि के लिए नाम जप पर्याप्त है?, श्री प्रेमानंद जी महाराज की अमृत वाणी से

1. निर्णय लेने पर प्रतिकूल परिणाम क्यों आते हैं?

श्री प्रेमानंद जी महाराज बताते हैं कि यदि बुरा प्रारब्ध साथ चल रहा हो, तो चाहे कितना भी सोच-समझकर निर्णय लें, फिर भी परिणाम असफलता भरा हो सकता है। और कभी-कभी बिना सोचे समझे किया गया कार्य भी सफल हो सकता है — यदि पुण्य साथ हो।

मूल मंत्र यही है:

“कर्म करते हुए भगवान का नाम जपो। नाम जप करते हुए कर्म करोगे तो असफलता भी सफलता में बदल जाएगी।”

यह संसार प्रारब्ध और नवीन कर्मों का खेल है। यदि किसी ने पूर्व जन्मों में पाप किए हैं, तो आज के अच्छे कर्मों के बावजूद कष्ट मिल सकते हैं। लेकिन यही प्रारब्ध अच्छे कर्मों और नाम जप से धीरे-धीरे जलकर नष्ट हो जाता है।


2. ईश्वर की इच्छा बनाम साधना और पुरुषार्थ

महाराज जी स्पष्ट करते हैं —

“यह कहां लिखा है कि सब कुछ ईश्वर की इच्छा से होता है?”

हम अपनी इच्छा से कर्म करते हैं। शुभ या अशुभ कर्मों का फल ईश्वर देते हैं, लेकिन कर्म की प्रेरणा हमारे मन, हमारी वासना, हमारी बुद्धि से आती है। भगवान केवल फलदाता हैं, कर्त्ता नहीं।

हमारे पास कर्म करने की स्वतंत्रता है —

  • आम बोओगे तो आम मिलेगा
  • बबूल बोओगे तो कांटे मिलेंगे
  • भजन करोगे तो भगवान मिलेंगे

निष्कर्ष:
साधना और पुरुषार्थ का महत्व अत्यंत है। ईश्वर प्रेरणा तभी देता है जब चित्त भगवदाकार होता है। जब तक हमारी वासनाएँ प्रधान हैं, प्रेरणा मन से ही आती है।


3. उद्योग के जीवन में पूजा और नाम जप कैसे करें?

महाराज जी कहते हैं —

“जब आंख खुले, राधा नाम जपते हुए दिनचर्या में लग जाओ। जब समय मिले, स्नान करके ठाकुर जी की पूजा कर लो।”

गृहस्थ जीवन में सब कार्य के बीच भी नाम जप संभव है। खेत जोतते समय, दुकान पर बैठते समय, ऑफिस जाते समय — हर जगह नाम ही पूजा बन सकता है।

भक्ति का भाव यह होना चाहिए —

“एक-एक फावड़ा चलाओ — राम राम। लैपटॉप चलाओ — राधा राधा।”

नहाने-धोने की शुद्धता नाम जप में बाधा नहीं है। कलियुग में भाव और नाम स्मरण ही मुख्य साधना है।


4. क्या जीवों की भी पुनरावृत्ति होती है?

प्रेमानंद जी महाराज की वाणी स्पष्ट करती है —

“भगवान की प्राप्ति के बिना जन्म और मरण की पुनरावृत्ति होती रहती है।”

जब तक आत्मा मोक्ष को प्राप्त नहीं करती, तब तक यह चक्र चलता रहता है:

  • पुनरपि जननं
  • पुनरपि मरणं
  • पुनरपि जननी जठरे शयनम्

यह सृष्टि आरंभ से चली आ रही है। अनंत काल से जीव भटक रहा है। एक बार भगवान की कृपा और शरणागति से मोक्ष प्राप्त हो जाए, तो फिर यह चक्र रुक जाता है।

लेकिन यदि भजन में भी मन विचलित हो गया, जैसे भरत जी का मन हिरण में फंसा, तो अगला जन्म भी उसी दिशा में चला जाता है।


5. कार्य की चर्चा करने से वह अधूरा क्यों रह जाता है?

प्रेमानंद जी महाराज कहते हैं —

“यह केवल मानसिक भ्रम है कि चर्चा कर देने से कार्य रुक जाता है।”

हाँ, आध्यात्मिक कार्यों में जब तक पूर्ण न हों, तब तक उन्हें गुप्त रखना श्रेयस्कर होता है। लेकिन व्यवहारिक कार्यों में चर्चा, सलाह और योजना जरूरी होती है।

“कार्य तभी पूरा होता है जब पुण्य और अच्छे कर्म साथ देते हैं। यदि प्रारब्ध में बाधा है, तो वह बिना चर्चा के भी रुक जाएगा।”

इसलिए किसी को बताने से नहीं, नाम जप और अच्छे कर्मों से कार्य की सिद्धि होती है।


6. हम जो भक्ति करते हैं, वह सच्ची है या केवल रीति-रिवाज?

प्रेमानंद जी महाराज कहते हैं —

“यदि भाव नहीं भी है, फिर भी नाम जप परम मंगलकारी है।”

रीति-रिवाज या परंपरा में किए गए कर्मों का फल अवश्य होता है, लेकिन जब वही कार्य श्रद्धा और भाव से किए जाएँ, तो वे विशेष फलदायी हो जाते हैं।

नाम जप के संदर्भ में महाराज जी कहते हैं:

“नाम जप में भाव हो या न हो, वह परम मंगलकारी है।”

लेकिन यदि भक्ति केवल नियम या रीति के आधार पर चल रही है और उसमें श्रद्धा नहीं है, तो वह साधारण पुण्य देती है — परम मंगल नहीं


7. शरणागति के बाद भी वैदिक संध्या आदि विधि का पालन करना कैसा है?

महाराज जी मार्गदर्शन देते हैं कि —

“जब श्री जी की शरण मिल गई, तो अब नाम जप और भक्ति ही सर्वोच्च साधना है।”

यदि कोई वैदिक विधियाँ करता है, तो पवित्र अवस्था में ही करे, और धीरे-धीरे श्री जी के नाम और शरण में स्थिर हो जाए।

“अब श्री राधा वल्लभ की शरण में आए हो, तो उन्हीं की पद्धति को अपनाओ – यही महामंगल है।”


8. गुरु-संत अपराध और पाप आचरण के बाद प्रायश्चित का क्या मार्ग है?

प्रेमानंद जी महाराज की वाणी में असीम करुणा है। वे कहते हैं:

“गलती सबसे होती है, लेकिन उसे दोहराना पाप है।”

यदि कोई अपराध हो गया है, तो उसे स्वीकार कर भगवान की शरण में आ जाएं, डटकर नाम जप करें

“फिर कभी गलती न हो, यही संकल्प हो। माया का मार्ग फिसलन भरा है, परंतु नाम जप उसका एकमात्र उपाय है।”

कुसंग से बचो, पवित्र भोजन लो, दूरी बनाए रखो जहां गिरने की संभावना हो — यही प्रायश्चित है।


9. क्या श्राद्ध, तर्पण आदि के लिए नाम जप पर्याप्त है?

महाराज जी इस प्रश्न का उत्तर बहुत सरलता से देते हैं:

“यदि भगवान की शरण में होकर नाम जप किया जाए, तो समस्त दोषों से मुक्ति संभव है।”

श्राद्ध और तर्पण की विधियाँ आचार्यजन से सीखी जा सकती हैं, परंतु

“एक उपाय सर्वकालिक है — श्रीहरि की शरण और नाम जप।”

नाम जप करने वाला स्वयं तरता है, और दूसरों को भी तार देता है।


10. क्या नाम जप से बिगड़े हुए कार्य सफल हो सकते हैं?

“बिल्कुल!” – महाराज जी उत्साहपूर्वक उत्तर देते हैं।

“नाम जप ही एकमात्र उपाय है जो बिगड़ी को बना सकता है।”

परंतु महाराज जी यह भी बताते हैं कि:

“यदि बिगाड़ी 100 ग्राम है और भजन 1 ग्राम, तो असर नहीं दिखेगा। भजन का वजन बढ़ाओ।”

नाम जप से पाप नष्ट होते हैं। तभी कार्य सिद्धि संभव है। भजन कभी व्यर्थ नहीं जाता।


11. जब मन ईश्वर का प्रमाण माँगता है, तब क्या करें?

महाराज जी बहुत गहराई से समझाते हैं:

“तुमने स्वयं को देखा है? नहीं। फिर भी जानते हो कि तुम हो।”

ईश्वर का अस्तित्व ऐसा ही है — वह है, पर दिखाई नहीं देता।

“जो चेतना हममें है, वही परमात्मा है। जो ऊर्जा से सब चल रहा है, वही ईश्वर है।”

साक्षात्कार बिना साधना नहीं होता।
नाम जप और भजन से ही आत्मबोध होता है। जब तक साधना नहीं, तब तक प्रमाण की चाह बनी रहेगी।


12. मृत्यु की सच्चाई और आत्मा की अमरता

महाराज जी कहते हैं:

“कोई नहीं मरता, केवल परिवर्तन होता है।”

शरीर पंचतत्व में मिल जाता है, आत्मा अपने कर्मों के अनुसार नया शरीर धारण कर लेती है।

“यदि मोक्ष नहीं मिला, तो जन्म-मरण चलता रहेगा।”

हम शरीर नहीं हैं। यह केवल कर्म करने का यंत्र है। आत्मा अविनाशी है।


13. हमारे अंदर अमरता, सुख और प्रेम की प्यास का कारण क्या है?

महाराज जी कहते हैं:

“हमारे अंदर जो अमरता, सुख और प्रेम की प्यास है — वह हमारे परमात्म स्वरूप का प्रमाण है।”

  • हम अमर होना चाहते हैं क्योंकि परमात्मा अमर है।
  • हम केवल सुख चाहते हैं क्योंकि परमात्मा सुख-सिंधु है।
  • हम प्रेम चाहते हैं क्योंकि परमात्मा प्रेमस्वरूप है।

यह तीनों इच्छाएं प्रमाण हैं कि हम ब्रह्म अंश हैं।

“जब आत्मा अपने को पहचानती है, तब वह जान जाती है – ‘मैं ही परमात्मा हूं।’”

Credit:

यह लेख संत श्री प्रेमानंद जी महाराज के एकान्तिक वार्तालाप प्रवचन की अमृत वाणी पर आधारित है।

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