1. भोग की इच्छा कम नहीं हो रही, क्या करें?
Premanand Maharaj जी कहते हैं –
“भैया, भोग की इच्छा छोड़ देने से नहीं छूटती, भजन से ही छूटती है। जब तक मन राधे-राधे में नहीं लगेगा, तब तक ये इच्छाएँ तुम्हें घेरती रहेंगी। बार-बार उठेंगी। पर तुम डरो मत, उलझो मत। बस जपो। नाम-जप ही वह अग्नि है जो भीतर की सारी कामनाओं को भस्म कर देती है। तुम भजन करते रहो। भले मन भागे, पर तुम फिर से पकड़ो और फिर राधे-राधे जपो। एक दिन ऐसा आएगा कि जिस चीज़ की इतनी चाह थी, वह भी तुच्छ लगने लगेगी। नाम ही वह दवा है जो भीतर बैठी वासना रूपी बीमारी को धीरे-धीरे समाप्त करती है। नाम जप, नाम जप, नाम जप – यही उपाय है।”
2. मांसाहारी वातावरण में भजन कैसे करें?
महाराज जी कहते हैं – विभीषण ने लंका में भजन किया, तो चेन्नई में क्यों नहीं? किसी के बगल में मांस है तो हमें क्या फर्क? हमारी थाली अलग है, हमारी निष्ठा अलग है। राधा-राधा करते जाओ, भीतर से पवित्रता आएगी। बाहर का असर तब होता है जब भीतर कमजोरी हो। भीतर से दृढ़ बनो।
3. प्रेम और सम्मान में क्या श्रेष्ठ है?
Premanand Maharaj जी कहते हैं – प्रेम सबसे बड़ा है। सम्मान देह-अहंकार को बढ़ाता है और पापों की सृष्टि करता है। जबकि अपमान भी कल्याण कर सकता है। सम्मान की अपेक्षा छोड़कर प्रेम करना सीखो। सच्चा प्रेम स्वयं को मिटाकर दूसरों को मान देना सिखाता है। यही मार्ग है भक्ति का, यही प्रभु की ओर ले जाता है।
4. लाखों साधक फिर भी भगवत प्राप्ति विरले क्यों?
महाराज जी स्पष्ट करते हैं – लाखों में एक साधक भगवान को चाहता है, बाकी भगवान से कुछ चाहते हैं। भगवान से चाहना होती है, भगवान की चाहत बिरलों को होती है। सच्चा साधक वही है जो भगवान को प्रेम करता है, न कि उनसे वरदान मांगता है। नाम-जप ही उस प्रेम की शुरुआत है।
5. “मैं परमात्मा का अंश हूँ” – यह भाव स्थिर कैसे हो?
यह स्मृति भजन से ही टिकेगी। जब नाम-जप से हृदय परिपक्व होगा, तो संसार की असलियत अपने आप दिखने लगेगी। तब हर भोग में असंगता आएगी। यह अभ्यास का विषय है। आप जितना अधिक भजन में मन को लगाएंगे, उतना यह ज्ञान स्थिर होगा कि “मैं देह नहीं, आत्मा हूँ।”
6. गृहस्थ में रहकर भी भगवत प्राप्ति कैसे संभव?
Premanand Maharaj जी कहते हैं – गृहस्थ में रहते हुए भी यदि भजन में लगे रहो तो भगवत प्राप्ति होती है। तुम सेवा करते हुए, घर संभालते हुए भी राधे-राधे जपो। नाम-जप ही वह साधन है जो साधक को सांसारिक बंधनों से ऊपर उठाकर प्रभु प्रेम में स्थिर करता है।
7. नाम-जप में आनंद न आये तो क्या करें?
महाराज जी समझाते हैं – आनंद की प्रतीक्षा मत करो, नाम-जप करते रहो। पहले हठपूर्वक जपो, फिर जब समय आएगा तो आनंद का सागर अपने आप तुम्हें डुबो देगा। आनंद आना या न आना महत्वपूर्ण नहीं, नाम-जप बना रहना चाहिए। यही भक्ति है, यही समर्पण है।
8. नाम-जप करते समय मन में कौन सी मूर्ति लाएँ?
नाम-जप करते समय पहले नाम में ही ध्यान दो। जब नाम स्थिर हो जाएगा, तब वही नाम से भगवान प्रकट हो जाते हैं। मन को भटकने मत दो, बस नाम सुनो, नाम में डूबो। वही नाम एक दिन साक्षात श्री राधा-कृष्ण रूप में हृदय में विराजमान हो जाएगा।
9. एकांतिक वार्तालाप सुनते हुए जप – उचित है?
Premanand Maharaj जी कहते हैं – जब नाम-जप कर रहे हो, तो केवल नाम में तल्लीन रहो। एकांतिक वार्तालाप बाद की चीज है। पहला स्थान नाम-जप को दो, और जब मन नहीं लगे तो सहायता के लिए एकांतिक वार्तालाप सुनो। लेकिन प्राथमिकता नाम को दो।
10. नाम अपराधों से कैसे बचें?
महाराज जी कहते हैं – यदि हम सच में नहीं चाहते कि अपराध हो, तो फिर नहीं होंगे। संतों की निंदा न करें, शास्त्रों का अनादर न करें, भगवान के नाम का दुरुपयोग न करें। और यदि भूल हो जाए, तो उसी नाम का कीर्तन करें, वह अपराध को भी नष्ट कर देता है।
11. अपमान को सहज कैसे लें?
जब नाम हृदय में बस जाएगा, तो अपमान भी सुख लगेगा। Maharaj Ji कहते हैं – अपमान में भी प्रभु कृपा छिपी है। जब तुम्हारा नाम छूटने का भय सबसे बड़ा हो जाएगा, तब तुम गाली को भी हँसी में टाल दोगे। नाम-जप इतना दृढ़ करो कि कुछ भी विचलित न कर सके।
12. हर स्वास में प्रभु-स्मरण कैसे स्थिर हो?
नाम ही वह नौका है जो अज्ञान और भ्रम के समुद्र से पार ले जाती है। महाराज जी कहते हैं – हर श्वास में नाम जप करो। जब तक नाम हर समय नहीं जुड़ता, तब तक अनुभव नहीं होगा। अभ्यास से ही यह भाव स्थिर होता है कि “सर्वत्र वही परमात्मा है।”
13. तीन देहों से परे भक्ति – कैसे?
Premanand Maharaj जी कहते हैं – भक्ति तीनों देहों को त्यागकर नहीं होती, बल्कि उन्हें भगवान में समर्पित करने से होती है। स्थूल देह सेवा में, सूक्ष्म देह चिंतन में, कारण देह भजन-स्वभाव में लगे – यही सही तरीका है। जब सब कुछ प्रभु के लिए हो जाए, तब वही आत्मा भाव-देह में प्रवेश कर जाती है।
14. आत्मा रूपी भक्ति की पहचान कैसे करें?
जब न स्मरण करने पर भी हमें आत्मा की स्मृति बनी रहे, जैसे शरीर की बनी रहती है, तब समझो आत्म स्वरूप में स्थित हो गए। न पुरुष भाव बचे, न स्त्री। यह स्थिति तभी आती है जब भजन बहुत गाढ़ा हो। संसार का विस्मरण होना ही आत्मा रूपी भक्ति की पहचान है।
15. समाधि की स्थिति व्यवहार में कैसे लाएँ?
महाराज जी बताते हैं – अगर हम चार घंटे गहरे भजन में रहें, तो आधे घंटे व्यवहार में भी वह भाव बना रहता है। जैसे समाधि में हो, वैसे ही व्यवहार में भी वही नशा हो। साधना इतनी गाढ़ी होनी चाहिए कि वह मन और जीवन दोनों में उतर जाए। यही अवस्था स्थायी बनती है।
16. साधन का बल छोड़ आत्म समर्पण कैसे करें?
भक्ति में “मैं कर रहा हूँ” यह भाव नहीं आना चाहिए। Premanand Maharaj जी कहते हैं – सब कुछ प्रभु की कृपा से हो रहा है, ऐसा मानो। साधन का बल मत रखो, वह शरीर के अधीन है। यदि शरीर न चले तो साधना नहीं रुकनी चाहिए। समर्पण ही भगवत प्राप्ति का मूल है।
17. शरणागति का वास्तविक अर्थ क्या है?
महाराज जी कहते हैं – जब एक पल के लिए भी भगवान का स्मरण छूटे और व्याकुलता हो, तब समझो शरणागति हो गई। तन, मन, वाणी – सब भगवान को समर्पित हो जाएँ। आचरण पवित्र हो, वाणी से गलत शब्द न निकले, और मन में किसी के लिए अपकार न हो – यही सच्ची शरणागति है।
18. आत्मा और परमात्मा में क्या अंतर है?
Premanand Maharaj जी बड़ी सहजता से समझाते हैं – आत्मा और परमात्मा में कोई भेद नहीं है, माया रूपी दर्पण ही दो प्रतीत कराता है। जैसे शीशा हटाते ही सिर्फ “एक” रह जाता है, वैसे ही माया हटते ही आत्मा और परमात्मा एक ही दिखते हैं। ब्रह्म सत्य है, द्वैत केवल भ्रम है।
19. नाम-जापक संतों की महिमा क्या है?
Premanand Maharaj जी कहते हैं – नाम-जप करने वाले संत स्वयं धर्मस्वरूप होते हैं। उनके दर्शन मात्र से पापों का नाश होता है और पुण्य का उदय होता है। जो भी नाम-जप में लगा है, वह साक्षात भगवत सेवा कर रहा है। ऐसे संतों से जुड़ना बहुत बड़ा सौभाग्य है।
20. भक्ति के साथ वैभव की कामना उचित है?
हाँ, यदि वह कामना पवित्र है और परिवार, समाज, सेवा के लिए हो – तो उचित है। Premanand Maharaj जी कहते हैं – प्रभु से यह प्रार्थना करो कि हमें ऐसा मार्ग दो जहाँ भजन के साथ हमारी आवश्यकताएँ भी पूर्ण हों। लेकिन सब कुछ धर्म और पवित्रता से अर्जित होना चाहिए।
21. समाज से दूरी और प्रभु को मित्र बनाना – कैसे?
महाराज जी कहते हैं – प्रभु को मित्र बनाओ, क्योंकि सांसारिक मित्र बदल जाते हैं। श्रीकृष्ण को अपना सच्चा मित्र मानो, वही साथ देंगे। जब सब में प्रभु देखोगे, तब किसी से न द्वेष होगा, न लगाव। सब अपने आप संतुलित हो जाएगा। यही सच्चा मित्रभाव है।
22. भोज में प्याज-लहसुन से कैसे बचें?
बुद्धिमानी से व्यवहार करो। महाराज जी कहते हैं – अगर पूरी पंगत में मांस या प्याज है, तो तुम खीर, रोटी जैसी वस्तु ले लो। कह दो – हमें ये चाहिए। भक्त के लिए खाना भी साधना है। इसलिए विवेक से चयन करो, और अपने भोजन में सात्त्विकता बनाए रखो।
23. सामने वाले को सुधारने की अपेक्षा छोड़ें कैसे?
Premanand Maharaj जी स्पष्ट कहते हैं – जिसे खुद बदलना न हो, उसे भगवान भी नहीं बदल सकते। तुम केवल स्वयं को संभालो। खुद नाम-जप में दृढ़ रहो। सामने वाले के व्यवहार से प्रभावित होकर भजन मत छोड़ो। तुम्हारा लक्ष्य भगवान हैं, न कि किसी को सुधारना।
24. गुस्सा कैसे रोकेँ?
गुस्सा स्वयं को भी जलाता है और दूसरे को भी। महाराज जी कहते हैं – गुस्से में मौन रहो। दाँत दबा लो, शब्द न निकलने दो। उस समय वहाँ से हट जाओ। यदि गुस्से में बोल दोगे तो भजन का प्रभाव नष्ट हो जाएगा। मौन ही सबसे बड़ा उपाय है।
25. दांपत्य संघर्ष में भजन कैसे बनाए रखें?
पति और पत्नी को प्रभु भाव से देखो। Maharaj Ji कहते हैं – गुस्से में कुछ बोलना नहीं चाहिए। तुम ही पहले शांत हो जाओ। अगर सामने वाला सत्संग में नहीं है, तो तुम्हें और अधिक भजन करना चाहिए। प्रेमपूर्ण जीवन ही गृहस्थ जीवन की सफलता है।
26. सत्य और असत्य – दोनों ईश्वर?
महाराज जी कहते हैं – पहले असत्य का त्याग करो, फिर सत्य को पकड़ो। जब सत्य में स्थित हो जाओगे तब अनुभव होगा कि सब कुछ ब्रह्म ही है। लेकिन शुरुआत सिद्धांत से करनी होती है। अभी के लिए अच्छा-बुरा अलग रखो और सच्चे को पकड़कर भजन में लगो।
27. गौ सेवा का महत्व क्या है?
गौ माता स्वयं धर्म स्वरूप हैं। महाराज जी कहते हैं – भगवान श्रीकृष्ण ने स्वयं गायों की सेवा की। गौमूत्र से बाल गोपाल को स्नान कराया गया। जो गायों की सेवा करता है, वह साक्षात धर्म की सेवा कर रहा है। यह केवल पुण्य नहीं, भगवत प्रेम की अनुभूति है।
🕉️ Credit
“यह लेख संत श्री Premanand Maharaj ji के एकान्तिक वार्तालाप प्रवचन की अमृत वाणी पर आधारित है।”
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