प्रश्न 1: गुणों और विषयों में डूबा हुआ चित्त संसार से पार होकर मुक्ति कैसे प्राप्त करे?
उत्तर:
महाराज जी बताते हैं कि चित्त का स्वभाव स्वयं में शुद्ध और वासुदेव स्वरूप है, परंतु जब वह विषयों का चिंतन करने लगता है तब वह विषयाकार प्रतीत होने लगता है। वास्तव में विषय चित्त में प्रवेश नहीं करते, बल्कि निरंतर चिंतन के कारण ऐसा प्रतीत होता है कि चित्त और विषय एक हो गए हैं। यही भ्रम जीव को संसार में बाँध देता है।
सनकादि ऋषियों ने भी ब्रह्मा जी से यही प्रश्न किया था कि जब चित्त निरंतर विषयों का चिंतन करता है तो मुक्ति कैसे संभव है। भगवान के हंस स्वरूप ने इसका उत्तर दिया कि चित्त और विषय दोनों ही जीव के वास्तविक स्वरूप से अलग हैं। जीव का सच्चा स्वरूप तो परमात्मा का अंश है।
इसलिए मुक्ति का मार्ग यह है कि चित्त को विषय चिंतन से हटाकर भगवान के स्मरण में लगाया जाए। जब चित्त धीरे-धीरे भगवत चिंतन में स्थिर होने लगता है, तब वह अपने मूल स्वरूप को पहचानने लगता है। यही अवस्था मुक्ति की ओर ले जाती है।
महाराज जी कहते हैं कि संसार से पार होना कठिन नहीं है, कठिन यह है कि मन को विषय चिंतन से हटाया जाए। यदि मन भगवान के नाम और स्मरण में लग जाए तो वही चित्त मुक्ति का साधन बन जाता है।
प्रश्न 2: चित्त और विषयों को अलग कैसे किया जाए?
उत्तर:
महाराज जी बताते हैं कि चित्त और विषयों का संबंध वास्तव में स्वाभाविक नहीं बल्कि आदत के कारण बना हुआ है। मनुष्य बार-बार विषयों का चिंतन करता है, इसलिए चित्त उन्हीं विषयों में लिप्त हो जाता है।
जैसे पानी को छोड़ दिया जाए तो वह स्वाभाविक रूप से नीचे की ओर बहता है, उसी प्रकार चित्त को यदि बिना साधना के छोड़ दिया जाए तो वह विषयों की ओर ही भागेगा। इसलिए चित्त को विषयों से अलग करने के लिए साधना आवश्यक है।
भगवान ने स्पष्ट कहा कि विषयों का चिंतन और विषयों का संयोग – ये दोनों जीव के बंधन का कारण हैं। जब तक मन बार-बार विषयों को सोचता रहेगा, तब तक उससे छुटकारा संभव नहीं है। इसलिए साधक को सावधान रहना चाहिए कि मन में विषयों का बार-बार चिंतन न हो।
महाराज जी समझाते हैं कि यह कार्य केवल प्रयास से नहीं होता, बल्कि भगवान की कृपा और साधना से होता है। यदि मन को निरंतर भगवत स्मरण, भजन और नाम-जप में लगाया जाए तो धीरे-धीरे विषयों की पकड़ कमजोर हो जाती है।
इस प्रकार साधक का चित्त धीरे-धीरे विषयों से हटकर भगवान में स्थिर होने लगता है।
प्रश्न 3: जब तक चित्त निर्विषय नहीं होता तब तक भगवत प्राप्ति क्यों नहीं होती?
उत्तर:
महाराज जी कहते हैं कि भगवान की प्राप्ति का अर्थ है चित्त का पूर्ण रूप से भगवान में लग जाना। यदि चित्त में अभी भी विषयों का आकर्षण बना हुआ है तो वह एकाग्र होकर भगवान का अनुभव नहीं कर सकता।
जब मन बार-बार विषयों की ओर जाता है तो साधक की चेतना बिखर जाती है। यही कारण है कि विषय चिंतन भगवत प्राप्ति में सबसे बड़ा बाधक माना गया है।
महाराज जी बताते हैं कि विषय चिंतन का परिणाम यह होता है कि मनुष्य पहले विषयों में आसक्ति करता है, फिर काम उत्पन्न होता है, और उसके बाद क्रोध, मोह और लोभ पैदा होते हैं। धीरे-धीरे बुद्धि भ्रमित हो जाती है और साधक का मार्ग भटक जाता है।
इसलिए संतों ने हमेशा कहा कि साधना का मुख्य उद्देश्य मन को विषयों से हटाना है। योग मार्ग में इसे चित्तवृत्ति का निरोध कहा गया है और भक्ति मार्ग में इसे भगवान के नाम और स्मरण में लगाना कहा गया है।
जब चित्त पूर्ण रूप से भगवान के चिंतन में स्थिर हो जाता है, तब साधक को भगवत अनुभव होने लगता है। इसलिए चित्त का निर्विषय होना ही भगवत प्राप्ति की पहली शर्त है।
प्रश्न 4: भोगों में सुख नहीं जानते हुए भी मन भोगों की ओर क्यों भागता है?
उत्तर:
महाराज जी बताते हैं कि केवल बुद्धि से यह समझ लेना कि भोगों में सुख नहीं है, वास्तविक ज्ञान नहीं है। यह केवल शास्त्रों या सत्संग से प्राप्त जानकारी होती है।
जब तक यह ज्ञान साधक के जीवन में अनुभव के रूप में प्रकट नहीं होता, तब तक मन पर उसका प्रभाव नहीं पड़ता। इसलिए मन बार-बार विषयों की ओर भागता रहता है।
महाराज जी कहते हैं कि वास्तविक ज्ञान तब प्रकट होता है जब मनुष्य अपनी इंद्रियों पर विजय प्राप्त कर लेता है। जब इंद्रियां विषयों से हटकर भगवान की ओर लगती हैं, तब शुद्ध ज्ञान प्रकट होता है।
इस ज्ञान के साथ साधक को परम शांति मिलती है और वह अपने आत्म स्वरूप का अनुभव करता है।
लेकिन यह सब तभी संभव है जब साधक के अंदर अध्यात्म बल हो। यदि अध्यात्म बल कमजोर है तो मनुष्य जानकर भी वही करता है जो मन चाहता है।
इसलिए महाराज जी बार-बार कहते हैं कि भगवान का नाम-जप करना चाहिए। नाम-जप से अध्यात्म बल बढ़ता है और वही शक्ति मनुष्य को विषयों से दूर ले जाती है।
प्रश्न 5: क्या पूर्ण शरणागत भक्तों में भी काम-क्रोध जैसे विकार उत्पन्न हो सकते हैं?
उत्तर:
महाराज जी कहते हैं कि यह संभव है। बड़े-बड़े सिद्ध पुरुषों में भी कभी-कभी विकार प्रकट हो जाते हैं। इसका अर्थ यह नहीं कि वे साधक नहीं हैं, बल्कि यह भगवान की माया का प्रभाव है।
उन्होंने उदाहरण देते हुए बताया कि सनकादि ऋषि अत्यंत उच्च कोटि के सिद्ध महापुरुष थे, लेकिन वैकुंठ के द्वारपाल जय-विजय को देखकर उन्हें क्रोध आ गया और उन्होंने उन्हें श्राप दे दिया।
इसी प्रकार नारद जी जैसे महान भक्त भी एक प्रसंग में काम के प्रभाव में आ गए और भगवान को श्राप तक दे दिया।
इससे यह समझना चाहिए कि भगवान की माया अत्यंत शक्तिशाली है। यदि भगवान की कृपा न हो तो बड़े-बड़े सिद्ध भी उससे प्रभावित हो सकते हैं।
इसलिए महाराज जी कहते हैं कि सबसे सुरक्षित मार्ग भगवान की शरणागति है। जो व्यक्ति भगवान की शरण में रहता है, उसकी रक्षा स्वयं भगवान करते हैं।
भगवान की कृपा से साधारण साधक भी विकारों से बच सकता है, और यदि कृपा न हो तो बड़े-बड़े सिद्ध भी विचलित हो सकते हैं।
प्रश्न 6: कलियुग में चित्त को विषयों से बचाने और भगवान की प्राप्ति का सबसे सरल उपाय क्या है?
उत्तर:
महाराज जी कहते हैं कि कलियुग में मन को विषयों से हटाना अत्यंत कठिन कार्य है। मनुष्य का चित्त इतना चंचल हो गया है कि वह बार-बार विषयों की ओर ही भागता है। इसलिए इस युग में कठिन योग साधनाएँ सबके लिए संभव नहीं हैं।
इसी कारण संत महापुरुषों ने एक अत्यंत सरल उपाय बताया है — भगवान का नाम-जप। महाराज जी बताते हैं कि जब मनुष्य भगवान का नाम जपता है तो उसका चित्त धीरे-धीरे विषयों से हटने लगता है।
यदि किसी साधक के मन में विषयों का चिंतन भी चल रहा हो और साथ ही भगवान का नाम-जप भी चलता रहे, तो विषय चिंतन उसका कुछ भी बिगाड़ नहीं सकता। क्योंकि भगवान का नाम धीरे-धीरे उस विषय चिंतन को नष्ट कर देता है।
लेकिन यदि केवल विषय चिंतन ही चलता रहे और भगवान का नाम न हो, तो वही विषय मनुष्य को संसार के बंधन में और गहराई से बाँध देता है।
इसलिए महाराज जी कहते हैं कि नाम-जप ही वह साधन है जो चित्त को सुरक्षित रखता है। नाम-जप से वैराग्य भी उत्पन्न होता है, ज्ञान भी प्रकट होता है और भगवान के चरणों में प्रेम भी बढ़ता है। यही कारण है कि संतों ने कहा है कि कलियुग में भगवान के नाम से बढ़कर कोई दूसरा सहारा नहीं है।
प्रश्न 7: माँ को कैसे प्रसन्न किया जा सकता है?
उत्तर:
महाराज जी बताते हैं कि माँ को प्रसन्न करने के लिए कोई कठिन साधना आवश्यक नहीं है। माँ का स्वभाव ही वात्सल्य का होता है। जैसे एक माता अपने बच्चे से बिना किसी अपेक्षा के प्रेम करती है, उसी प्रकार दिव्य माँ भी अपने भक्तों से प्रेम करती हैं।
महाराज जी कहते हैं कि यदि कोई भक्त सच्चे भाव से माँ को पुकारे — “माँ, माँ, माँ” — तो माँ अवश्य प्रसन्न होती हैं। माँ को अपने बच्चे से कोई वस्तु नहीं चाहिए। उन्हें केवल प्रेम और पुकार चाहिए।
भक्त को ऐसा भाव रखना चाहिए कि माँ हर समय उसके साथ हैं। वह उसकी रक्षा कर रही हैं, उसे संभाल रही हैं और उसे अपने वात्सल्य में रख रही हैं।
महाराज जी यह भी बताते हैं कि साधक को पूरे जगत में माँ के स्वरूप को देखने का प्रयास करना चाहिए। चराचर जगत में वही शक्ति विभिन्न रूपों में विराजमान है।
यदि कोई भक्त निरंतर माँ का स्मरण करता है, उनके मंत्र का जप करता है और प्रेम से उन्हें पुकारता है, तो धीरे-धीरे माँ की कृपा प्रकट होने लगती है।
महाराज जी कहते हैं कि माँ अत्यंत करुणामयी हैं। जो भक्त सच्चे हृदय से उन्हें पुकारता है, उसे उनका स्नेह और संरक्षण अवश्य प्राप्त होता है।
प्रश्न 8: क्या भगवान की प्राप्ति में देवी माँ की कृपा आवश्यक होती है?
उत्तर:
महाराज जी बताते हैं कि भगवान की प्राप्ति में देवी माँ की कृपा का अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान है। जगत में जो भी आध्यात्मिक शक्ति कार्य करती है, वह उसी आद्याशक्ति की कृपा से होती है।
उन्होंने अनेक उदाहरण देते हुए समझाया कि जब-जब किसी को भगवान की प्राप्ति हुई है, उसके पीछे माँ की कृपा अवश्य रही है।
जैसे गोपियों ने भगवान श्रीकृष्ण को प्राप्त करने के लिए कात्यायनी देवी की उपासना की थी। उसी प्रकार माता सीता ने भी भगवान राम को पति रूप में प्राप्त करने के लिए देवी की आराधना की थी।
महाराज जी बताते हैं कि देवी ही वह शक्ति हैं जो माया के आवरण को हटा सकती हैं। जब तक उनकी कृपा नहीं होती, तब तक जीव माया के जाल में ही उलझा रहता है।
यदि देवी प्रसन्न हो जाएँ तो वही माया हट जाती है और भगवान का साक्षात्कार संभव हो जाता है।
इसलिए महाराज जी कहते हैं कि माँ की आराधना करना, उनका स्मरण करना और उनके प्रति श्रद्धा रखना अत्यंत आवश्यक है। उनकी कृपा से ही साधक को भगवत मार्ग में आगे बढ़ने की शक्ति मिलती है।
प्रश्न 9: क्या संतों के जीवन में माँ की कृपा के विशेष अनुभव होते हैं?
उत्तर:
महाराज जी बताते हैं कि जिन लोगों का जीवन माँ की उपासना से जुड़ा होता है, उन्हें अपने जीवन में बार-बार माँ की कृपा का अनुभव होता है।
उन्होंने अपने जीवन का एक अनुभव बताते हुए कहा कि बचपन से ही उनकी उपासना देवी माँ की रही है। उन्हें हमेशा ऐसा अनुभव होता रहा कि माँ हर कदम पर उनके साथ हैं।
महाराज जी कहते हैं कि जीवन में अनेक अवसर ऐसे आए जब उन्हें स्पष्ट रूप से लगा कि माँ ने ही उनकी रक्षा की और मार्ग दिखाया।
एक प्रसंग बताते हुए उन्होंने कहा कि एक बार वे एक संत के दर्शन के लिए जा रहे थे, लेकिन समय निकल चुका था। तब उन्होंने मन ही मन माँ से प्रार्थना की। जब वे वहाँ पहुँचे तो देखा कि संत अभी भी उनका इंतजार कर रहे थे।
संत ने स्वयं कहा कि तुम्हारी माँ ने मुझे रोके रखा है।
महाराज जी बताते हैं कि इस प्रकार माँ अपने भक्तों की रक्षा करती हैं और उन्हें अपने वात्सल्य से ढक लेती हैं।
उनके अनुसार वही शक्ति कभी दुर्गा के रूप में, कभी राधा के रूप में और कभी अन्य दिव्य रूपों में भक्तों का मार्गदर्शन करती रहती है।
प्रश्न 10: क्या पूर्ण शरणागत भक्तों में भी काम, क्रोध आदि विकार उत्पन्न हो सकते हैं?
उत्तर:
महाराज जी कहते हैं कि यह संभव है। बड़े-बड़े सिद्ध महापुरुषों में भी कभी-कभी विकार उत्पन्न हो जाते हैं। इसका कारण यह है कि भगवान की माया अत्यंत शक्तिशाली है।
उन्होंने उदाहरण दिया कि सनकादि जैसे महान सिद्धों को भी क्रोध आ गया था जब वैकुंठ के द्वारपालों ने उन्हें रोक दिया था। उसी क्रोध के कारण उन्होंने जय-विजय को श्राप दे दिया।
इसी प्रकार नारद जी जैसे महान भक्त भी एक प्रसंग में काम के प्रभाव में आ गए थे।
महाराज जी बताते हैं कि यह सब भगवान की लीला और माया का प्रभाव है। यदि भगवान की कृपा बनी रहे तो साधारण साधक भी सुरक्षित रह सकता है, और यदि कृपा न हो तो बड़े-बड़े सिद्ध भी विचलित हो सकते हैं।
इसलिए सबसे महत्वपूर्ण बात है भगवान की शरण में रहना।
जो व्यक्ति सच्चे भाव से भगवान की शरण में रहता है, उसकी रक्षा स्वयं भगवान करते हैं और उसे संसार के विकारों से बचाते हैं।
प्रश्न 11: क्या काम, क्रोध जैसे विकार भी साधक की उन्नति में सहायक बन सकते हैं?
उत्तर:
महाराज जी बताते हैं कि वास्तविकता में काम, क्रोध और लोभ तभी उत्पन्न होते हैं जब मनुष्य के अंदर अहंकार का अंश मौजूद होता है।
यदि साधक पूर्ण रूप से अहंकार से मुक्त हो जाए तो ये विकार उस पर प्रभाव नहीं डाल सकते।
लेकिन भगवान की माया इतनी शक्तिशाली है कि कभी-कभी महान ज्ञानी भी उसके प्रभाव में आ जाते हैं। महाराज जी ने उदाहरण दिया कि भगवान शिव जैसे महान योगी भी मोहिनी रूप के दर्शन से विचलित हो गए थे।
इससे यह समझना चाहिए कि संसार में किसी को भी अपने बल पर सुरक्षित होने का अहंकार नहीं करना चाहिए।
साधक के लिए सबसे सुरक्षित मार्ग है — भगवान की शरणागति।
जब साधक विनम्र होकर भगवान की शरण में रहता है, तब भगवान स्वयं उसकी रक्षा करते हैं।
महाराज जी कहते हैं कि मनुष्य को हमेशा यह स्मरण रखना चाहिए कि भगवान की कृपा के बिना कोई भी साधना सफल नहीं हो सकती। इसलिए हर समय भगवान का नाम जपते हुए उनकी शरण में रहना ही सच्ची साधना है।
Credit:
“यह लेख संत श्री प्रेमानंद जी महाराज के एकान्तिक वार्तालाप प्रवचन की अमृत वाणी पर आधारित है।”
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