माला-2001:संत किसे कहते हैं? सच्चे संत के लक्षण क्या हैं? श्री प्रेमानंद महाराज जी के अमृत वचनों से नाम जप महिमा

प्रश्न 1: संत किसे कहते हैं? सच्चे संत के लक्षण क्या हैं?

उत्तर:
महाराज जी कहते हैं — संत को वेश से मत पहचानो। वेश वैष्णव का हो सकता है, सन्यासी का हो सकता है, गृहस्थ का भी हो सकता है। भगवान ने कहीं भी वेश को संत की पहचान नहीं बताया। संत की पहचान भीतर के लक्षणों से होती है।

पहला लक्षण — अनपेक्षा। संत किसी वस्तु, व्यक्ति या स्थान से कोई अपेक्षा नहीं रखता। जिसके हृदय में अपेक्षा आ गई, वहाँ चूक हो गई। संत को कोई आशा नहीं — न सम्मान की, न सुविधा की, न मान्यता की। वह जो प्रभु दें, जहाँ रखें, जैसे रखें — उसी में संतुष्ट।

दूसरा — मत्‍चित्त। उसका चित्त केवल भगवान में लगा रहता है। यह बोलने की बात नहीं, परीक्षा की बात है। एकांत में बैठो और मन को छोड़ दो — जहाँ मन भागता है, वहीं तुम्हारा चित्त समर्पित है। यदि मन धन, व्यक्ति, मान, रूप, संबंध में भागता है, तो चित्त भगवान में नहीं है।

तीसरा — प्रशांतता। कोई निंदा करे या स्तुति, अपमान करे या सम्मान — संत का चित्त डगमगाता नहीं। उसके भीतर अगाध शांति होती है। समुद्र की तरह — ऊपर लहरें उठें, पर गहराई में स्थिरता रहती है।

चौथा — समदर्शन। संत सबमें भगवान को देखता है। पर व्यवहार विवेकपूर्ण होता है। दर्शन एक है, व्यवहार अलग-अलग। गाय, कुत्ता, ब्राह्मण, चांडाल — सबमें ब्रह्म दर्शन; पर व्यवहार परिस्थिति अनुसार।

पाँचवाँ — निर्ममता और निरहंकारिता। किसी से ममता नहीं, सबमें प्रेम है पर आसक्ति नहीं। “सबकी ममता ताग बटोरी, मम पद मन बाँध बर डोरी।”

छठा — निष्परिग्रह। कुछ भी अपना नहीं — न वस्तु, न प्रतिष्ठा, न संबंध।

महाराज जी कहते हैं — ऐसे संत का संग मिल जाए तो शरीर का मोह टूट जाता है और भगवत मिलन की चाह जागती है।


प्रश्न 2: यदि साधक में ये लक्षण नहीं हों तो क्या करे?

उत्तर:
महाराज जी अत्यंत करुणा से कहते हैं — यदि तुम्हें लगे कि एक भी लक्षण तुम्हारे भीतर नहीं है, तो निराश मत हो। उल्टा समझो कि अभी आशा बाकी है।

जो कहे कि “सब लक्षण मुझमें हैं” — वही सबसे अधिक अभिमानी है और वही गिर चुका है। और जो कहे “मुझमें कुछ नहीं” — वही आश्रय लेने योग्य है।

महाराज जी सुंदर उदाहरण देते हैं — डिब्बा कभी इंजन नहीं बन सकता, पर यदि डिब्बा इंजन से जुड़ जाए तो वह भी वहीं पहुँच जाएगा जहाँ इंजन पहुँचता है।

हम साधक डिब्बा हैं। आचार्य और गुरु इंजन हैं। यदि हम उनसे जुड़ गए — सच्चे आश्रय में आ गए — तो उनकी शक्ति हमें खींच ले जाएगी।

इस मार्ग में अपनी सामर्थ्य से कुछ नहीं होता। यह गुरु और इष्ट की कृपा से होता है। यदि लक्षण नहीं हैं तो क्या करें?

  • अहंकार छोड़ो।
  • गुरु का आश्रय लो।
  • संत संग करो।
  • दुसंग छोड़ो — शरीर से मोह, इंद्रियों का दुलार, भोग चिंतन — ये सब दुसंग हैं।

महाराज जी कहते हैं — “कनेक्शन कर लो।”
बस कनेक्शन सच्चा हो जाए, फिर इंजन खींचता जाएगा।


प्रश्न 3: मन जड़ है या चैतन्य?

उत्तर:
महाराज जी कहते हैं — मन न केवल जड़ है, न केवल चैतन्य है। वह उभय रूप है।

एक ओर भगवान ने कहा — “इंद्रियाणां मनश्चास्मि” — इंद्रियों में मैं मन हूँ। इसका अर्थ है कि मन में चैतन्य तत्व है। मन सच्चिदानंद स्वरूप से जुड़ा है।

पर दूसरी ओर, अष्टधा प्रकृति में मन, बुद्धि और अहंकार का वर्णन हुआ है। प्रकृति जड़ है। इसलिए मन जड़ भी है।

यही कारण है कि मन एक ओर भगवान में लग सकता है और दूसरी ओर भोगों में फँस सकता है।

महाराज जी कहते हैं — सारा साधना का खेल मन को सुधारने का है। यदि मन जड़ संबंधों से हटकर अपने शुद्ध स्वरूप में स्थित हो जाए, तो वही मन कृष्ण रूप हो जाता है।

भगवत साक्षात्कार बाहर नहीं, मन में होता है। मन यदि शुद्ध हो जाए तो वही भगवान का दर्पण बन जाता है।

इसलिए मन को न केवल दोष दो, न केवल महिमा करो। उसे दिशा दो।


प्रश्न 4: क्या भगवान को पाने की इच्छा भी छोड़नी पड़ती है?

उत्तर:
महाराज जी कहते हैं — यह तो बड़ी दुर्लभ इच्छा है। यदि सच्ची भगवत मिलन की इच्छा जाग जाए, तो ब्रह्मलोक तक के भोग तुच्छ लगने लगते हैं।

जब तक भगवान की इच्छा नहीं जागती, तब तक मनुष्य हजार इच्छाओं में भटकता है — धन, मान, संबंध, भोग।

पर जिस दिन सच्ची भगवत मिलन की लालसा जागती है — हृदय में हाहाकार मच जाता है। भोजन अच्छा नहीं लगता, नींद नहीं आती, विषय खारे लगते हैं।

“दरश बिन दुखन लागे नैन…”

महाराज जी कहते हैं — जब भगवत मिलन की इच्छा होती है तो त्रिभुवन के भोग भी भगवान का विस्मरण नहीं करा सकते।

आज हम कहते हैं कि भगवान चाहिए, पर थोड़ा धन, थोड़ा सम्मान, थोड़ा सुख भी चाहिए। यह सच्ची इच्छा नहीं।

सच्ची इच्छा तब है जब एक ही पुकार हो —
“हाय प्रभु, कब मिलोगे?”

और जब वह इच्छा जागती है, तब बाकी सब इच्छाएँ अपने आप जलकर राख हो जाती हैं।

Credit:
“यह लेख संत श्री प्रेमानंद जी महाराज के एकान्तिक वार्तालाप प्रवचन की अमृत वाणी पर आधारित है।”

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