प्रश्न 1: महाराज जी पहली बार कब सच्ची शरणागति का अनुभव हुआ? क्या शरणागति भी धीरे-धीरे पुष्ट होती है?
उत्तर:
श्री प्रेमानंद महाराज जी बताते हैं कि सच्ची शरणागति तब प्रकट होती है जब मनुष्य का अहंकार पूरी तरह टूट जाता है और उसे चारों ओर से निराशा ही दिखाई देती है। उन्होंने अपने जीवन की वह घटना सुनाई जब डॉक्टरों ने कह दिया कि दोनों किडनी फेल हो रही हैं। न धन था, न सहारा, न कोई व्यवस्था। उस समय भीतर से एक तीव्र वेदना उठी — “अभी तो श्रीजी के मार्ग में कदम रखा है, अभी अनुभव भी नहीं हुआ और यदि मृत्यु आ गई तो जीवन व्यर्थ हो जाएगा।”
वह रो पड़े। एकांत में केवल पुकार थी — “प्रभु, मैं अयोग्य हूँ, पर आपकी शरण में हूँ।” उसी क्षण भीतर से कृपा का अनुभव हुआ। ऐसा लगा मानो हृदय पर बर्फ की शीतल सिल्ली रख दी गई हो। महारानी जी की करुणा प्रकट हुई — “तू मेरा है।” बस उसी दिन से भय, चिंता, शोक सब मिट गए।
महाराज जी कहते हैं — शरणागति शब्दों से नहीं आती। जब तक मन को कहीं और सहारा दिखता है, तब तक पूर्ण शरणागति नहीं होती। जैसे द्रौपदी ने जब दोनों हाथ छोड़ दिए तब भगवान प्रकट हुए। जैसे गजेंद्र ने जब सब साथ छोड़ दिया तब पुकार सच्ची हुई।
हाँ, शरणागति पुष्ट होती जाती है। जैसे-जैसे अनुभव होता है कि प्रभु कृपा कर रहे हैं, वैसे-वैसे मन, प्राण, अहंकार सब समर्पित होते जाते हैं। अंत में प्रेम की अवस्था आती है जहाँ भगवान भक्त के पीछे-पीछे डोलते हैं।
प्रश्न 2: ब्रह्म ज्ञानी और प्रेमी भक्त की स्थिति में क्या अंतर है?
उत्तर:
महाराज जी अत्यंत सरल शब्दों में अंतर बताते हैं। ब्रह्म ज्ञानी की स्थिति में “मैं” बना रहता है — पर वह “मैं” शुद्ध हो जाता है। वह अनुभव करता है — “सब ब्रह्म है, सब मैं हूँ।” वह कह सकता है “शिवोऽहम”, “अहं ब्रह्मास्मि।” उसे सबमें एक ही अखंड तत्व दिखाई देता है।
लेकिन प्रेमी भक्त की स्थिति भिन्न है। वहाँ “मैं” ही मिट जाता है। केवल “तू” रह जाता है। प्रेमी की दशा ऐसी होती है — “अपनी हो सुधि ना रही, एक रहो नंदलाल।” उसे अपनी भी स्मृति नहीं रहती। वह जिधर देखता है, अपने इष्ट का ही दर्शन करता है।
ब्रह्म ज्ञानी अखंड तत्व का अनुभव करता है, प्रेमी रस का अनुभव करता है। ज्ञानी में ब्रह्माकार वृत्ति है, प्रेमी में इष्टाकार वृत्ति है। ज्ञानी कहे — “सब मैं हूँ।” प्रेमी कहे — “मैं कुछ नहीं, सब तू है।”
महाराज जी कहते हैं — दोनों चरम अवस्था हैं। ज्ञान की चरम अवस्था ब्रह्म बोध है। भक्ति की चरम अवस्था प्रेम है। पर प्रेम में मधुरता है, रस है, समर्पण है। प्रेमी देह, मन, बुद्धि सब भूलकर केवल अपने प्रियतम में डूब जाता है।
प्रश्न 3: विवेक कैसे जागृत होता है?
उत्तर:
महाराज जी स्पष्ट कहते हैं — “बिन सत्संग विवेक न होई।” विवेक कोई बाजार की वस्तु नहीं है, न वह केवल अभ्यास से उत्पन्न होता है। वह संत संग से जागता है।
जब हम भगवत आराधक संतों का संग करते हैं, शास्त्रों का स्वाध्याय करते हैं और कुसंग का त्याग करते हैं, तब धीरे-धीरे मोह और ममता का जाल कटने लगता है। विवेक का अर्थ है — क्या शाश्वत है और क्या नश्वर, इसका स्पष्ट बोध।
महाराज जी कहते हैं — पहले सत्संग मिलेगा, फिर विवेक जागेगा। विवेक जागेगा तो मोह का नाश होगा। मोह का नाश होगा तो भगवान में अनुराग दृढ़ होगा। बिना विवेक मोह नहीं छूटेगा, बिना मोह छूटे प्रेम दृढ़ नहीं होगा।
इसलिए साधक को संतों का संग करना चाहिए, उनके वचनों को जीवन में उतारना चाहिए और संसार के कुसंग से दूर रहना चाहिए। यही विवेक जागरण का मार्ग है।
प्रश्न 4: संत दुख में भी डगमगाते क्यों नहीं? ऐसी स्थिति कैसे आए?
उत्तर:
महाराज जी कहते हैं — जब तक मन देह में लगा है, तब तक दुख का अनुभव होगा। पर जब मन भगवान के चरणों में लग जाता है, तब शरीर दुखी हो सकता है, पर मन आनंद में रहता है।
उन्होंने एक महापुरुष का उदाहरण दिया जिनके पैर में कीड़े पड़ गए थे। शरीर सड़ रहा था, पर वे मुस्कुरा रहे थे और “राधे” पुकार रहे थे। क्यों? क्योंकि उनका मन शरीर में नहीं था, आनंद सिंधु भगवान में था।
यह स्थिति केवल भजन से आती है। बातों से नहीं। जितना भजन, उतना भगवत आश्रय दृढ़। जब मन कृष्णाकार हो जाता है, तब शरीर की पीड़ा मन को नहीं छूती।
महाराज जी चेतावनी देते हैं — अभी शरीर स्वस्थ है, तभी भजन कर लो। नहीं तो अंत समय में मन दुख में उलझ जाएगा। बिना भजन के संसार दुखालय है।
प्रश्न 5: सच्ची शरणागति अनुकूलता में होती है या प्रतिकूलता में?
उत्तर:
महाराज जी कहते हैं — सिद्धांत रूप से भगवान कभी भी किसी के चित्त को खींच सकते हैं। पर व्यवहार में सच्ची शरणागति प्रायः प्रतिकूलता में होती है।
जब चारों ओर से ठोकर मिलती है, जब कोई साथ देने वाला नहीं रहता, जब अपनी सामर्थ्य भी जवाब दे देती है — तब जो पुकार निकलती है, वही हृदय को चीरकर भगवान तक पहुँचती है।
अनुकूल परिस्थिति में पुकार में वह तीव्रता नहीं होती। प्रतिकूलता अहंकार तोड़ देती है। और जहाँ अहंकार टूटता है, वहीं शरणागति जन्म लेती है।
प्रश्न 6: क्या 84 जी की एक पंक्ति बार-बार चलना भी नाम-जप के बराबर है?
उत्तर:
महाराज जी कहते हैं — बिल्कुल बराबर है। चौरासी जी की प्रत्येक पंक्ति, प्रत्येक अक्षर में श्यामा-श्याम विराजमान हैं।
यदि एक ही पंक्ति सौ बार दोहराई जाए, तो वह भी मंत्र के समान फल देती है। मंत्र और वाणी में कोई अंतर नहीं। यदि मन बार-बार उसी पंक्ति में अटक रहा है, तो समझो वही साधना चल रही है।
साधक को चिंतित नहीं होना चाहिए। मानसिक जप अत्यंत उच्च साधना है। यदि मन में चौरासी जी का पाठ चल रहा है, तो यह निकुंज की तैयारी है।
प्रश्न 7: जीते-जी मरना क्या है?
उत्तर:
महाराज जी कहते हैं — जीते-जी मरना मतलब अपने अहंकार को गुरु चरणों में समर्पित कर देना।
गुरु जो कहें, वैसा करना। चाहे समझ में आए या न आए। मन विरोध करे, बुद्धि तर्क करे, फिर भी गुरु आज्ञा न टालना।
उन्होंने रामानंदाचार्य जी का उदाहरण दिया — शिष्य ने प्राण की परवाह न कर गुरु आज्ञा मानी और भगवान का साक्षात्कार हुआ।
जीते-जी मरना है — “मैं” को मिटा देना। मैं गुरु का यंत्र हूँ, जैसा चाहें वैसा नचाएँ। यही अवस्था भगवत साक्षात्कार का द्वार खोलती है।
प्रश्न 8: सच्चा आज्ञाकारी शिष्य कौन? गुरु आज्ञा में बुद्धि लगाने से क्या पतन है?
उत्तर:
महाराज जी कहते हैं — सच्चा शिष्य वही है जिसने अपना अहंकार गुरु चरणों में अर्पित कर दिया।
गुरु वचन ब्रह्म वाक्य है। उस पर तर्क करना, बुद्धि लगाना, यह पतन का कारण बन सकता है। हमारी बुद्धि सीमित है, गुरुदेव की दृष्टि दिव्य है।
संसार में बिना विचार कार्य करो तो पछतावा होगा। पर गुरु वाणी में बिना विचार अमल करो तो कल्याण होगा।
मन और बुद्धि ही हमें बाँध रहे हैं। यदि इन्हें गुरु को दे दिया, तो जीवन बन जाएगा। तन-मन समर्पित कर दो — यही सस्ता और सच्चा सौदा है।
Credit:
“यह लेख संत श्री प्रेमानंद जी महाराज के एकान्तिक वार्तालाप प्रवचन की अमृत वाणी पर आधारित है।”
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