माला-1217:भय क्यों लगता है और निर्भय कैसे बनें? श्री प्रेमानंद महाराज जी के अमृत वचनों से नाम जप महिमा

प्रश्न 1: महाराज जी,लोगों की शरीर पर की गई टिप्पणियों से मन दुखी हो जाए तो क्या करें?

उत्तर:
महाराज जी कहते हैं कि यह शरीर हमारे कर्मों के अनुसार मिला हुआ है—कोई पतला है, कोई मोटा, कोई सुंदर है, कोई साधारण। इसमें दुखी होने की आवश्यकता नहीं है, क्योंकि यह शरीर हम नहीं हैं, बल्कि भगवान का दिया हुआ एक साधन है। यदि लोग कुछ कहते हैं तो हमें उसे गंभीरता से नहीं लेना चाहिए। संसार में हर व्यक्ति कुछ न कुछ कहता ही रहेगा, यदि हम हर बात पर ध्यान देंगे तो कभी भी शांत नहीं रह पाएंगे। महाराज जी समझाते हैं कि शरीर का रूप महत्वपूर्ण नहीं है, बल्कि मन और हृदय का अच्छा होना महत्वपूर्ण है। इसलिए हमें लोगों की बातों में न पड़कर भगवान का नाम जप करना चाहिए और अपने भीतर प्रसन्नता बनाए रखनी चाहिए। जो व्यक्ति अपने आप में संतुष्ट रहता है और भगवान की भक्ति करता है, वही वास्तव में सुखी रहता है।


प्रश्न 2: क्या अपना भजन किसी दूसरे दुखी व्यक्ति को दे देना उचित है?

उत्तर:
महाराज जी कहते हैं कि भजन का वास्तविक अर्थ समझना जरूरी है। भजन केवल माला जपना नहीं, बल्कि सबमें भगवान का दर्शन करना है। पहले स्तर पर साधक को अपना भजन भगवान को समर्पित करना चाहिए और स्वयं को शुद्ध करना चाहिए। जब तक भगवत प्राप्ति नहीं होती, तब तक साधक को अपने भजन को संभालकर रखना चाहिए। लेकिन उच्च अवस्था में संत जन अपने भजन का फल दूसरों के कल्याण के लिए समर्पित कर देते हैं। वे किसी से कुछ लेने की इच्छा नहीं रखते, केवल देना चाहते हैं। महाराज जी बताते हैं कि यदि हम किसी दुखी व्यक्ति के लिए भगवान से प्रार्थना करें, सेवा करें और उसे सुख देने का भाव रखें, तो यही सच्चा परमार्थ है। लेकिन “मैं दाता हूँ” ऐसा अहंकार नहीं होना चाहिए—सब कुछ भगवान का है और उन्हीं को अर्पित करना है।


प्रश्न 3: क्या भजन का दान करने से भजन बढ़ता है या कम होता है?

उत्तर:
महाराज जी कहते हैं कि भजन कोई भौतिक वस्तु नहीं है जो देने से घट जाए। भजन का वास्तविक स्वरूप है—भगवान में मन का लगना। जब हम दूसरों के कल्याण के लिए भजन करते हैं और सेवा भाव रखते हैं, तो हमारा भजन कम नहीं होता, बल्कि शुद्ध होता है। लेकिन इसमें एक सावधानी जरूरी है—हमारे भीतर लेने की भावना नहीं होनी चाहिए। यदि हम यह सोचें कि “मैं भजन दे रहा हूँ और बदले में मुझे कुछ मिलेगा”, तो यह सच्चा परमार्थ नहीं है। सच्चा भाव यह है कि सब कुछ भगवान का है और हम उसी को उसी को अर्पित कर रहे हैं। महाराज जी उदाहरण देते हैं कि दाता भगवान हैं, हम तो केवल माध्यम हैं। जब यह भावना आती है, तब भजन की पवित्रता बढ़ती है और साधक का हृदय निर्मल होता है।


प्रश्न 4: साधक को वरदान और श्राप देने से क्यों बचना चाहिए?

उत्तर:
महाराज जी कहते हैं कि जब तक साधक को भगवत प्राप्ति नहीं होती, तब तक उसे इन शक्तियों में नहीं पड़ना चाहिए। वरदान और श्राप देने की भावना अहंकार को बढ़ा सकती है और साधना से भटका सकती है। साधक का पहला लक्ष्य होना चाहिए—अपने मन को शुद्ध करना और भगवान में लगाना। यदि साधक बीच में ही दूसरों के जीवन में हस्तक्षेप करने लगे, तो उसका ध्यान अपने मार्ग से हट सकता है। महाराज जी बताते हैं कि जब साधक पूर्ण रूप से भगवान में स्थित हो जाता है, तब उसके लिए ये सब बातें महत्वहीन हो जाती हैं। इसलिए पहले स्वयं का कल्याण करना चाहिए। जब साधक पूर्ण हो जाता है, तब भगवान स्वयं उससे समाज का कार्य करवा लेते हैं। इसलिए साधना के प्रारंभिक चरण में इन चीजों से दूर रहना ही उचित है।


प्रश्न 5: क्या पहले अपना कल्याण करना जरूरी है या दूसरों का?

उत्तर:
महाराज जी कहते हैं कि सबसे पहले अपना कल्याण करना आवश्यक है। यदि हम स्वयं ही अस्थिर हैं, तो हम दूसरों का भला कैसे कर पाएंगे? जैसे कोई व्यक्ति स्वयं तैरना नहीं जानता, तो वह दूसरे को कैसे बचाएगा? इसलिए साधक को पहले अपने मन को शुद्ध करना चाहिए, भजन में स्थिर होना चाहिए और भगवान से जुड़ना चाहिए। जब साधक भीतर से मजबूत हो जाता है, तब वह स्वाभाविक रूप से दूसरों के लिए भी उपयोगी बनता है। महाराज जी बताते हैं कि पहले छुपकर भजन करो, अपने आप को भगवान में स्थिर करो, फिर भगवान स्वयं तुम्हें लोक कल्याण के कार्य में लगा देंगे। इसलिए प्राथमिकता हमेशा अपने आत्मिक उन्नति को देनी चाहिए।


प्रश्न 6: अंत समय में भगवान का स्मरण बना रहे, इसके लिए क्या करें?

उत्तर:
महाराज जी कहते हैं कि अंत समय में वही स्मरण आता है, जो जीवन भर किया गया हो। यदि जीवन भर मन संसार में लगा रहा, तो अंतिम समय भी वही विचार आएंगे। इसलिए यदि हम चाहते हैं कि अंत समय में भगवान का स्मरण हो, तो अभी से नाम जप और भजन की आदत डालनी होगी। महाराज जी बताते हैं कि भगवान के शरणागत को भय नहीं होता, क्योंकि उसे विश्वास होता है कि भगवान उसकी रक्षा करेंगे। यदि हम सच्चे मन से भगवान की शरण में आ जाते हैं, तो वे स्वयं हमारी रक्षा करते हैं और अंत समय में भी हमें संभाल लेते हैं। इसलिए जीवन का हर क्षण भगवान के स्मरण में बिताना ही सबसे बड़ा उपाय है।


प्रश्न 7: क्या भगवान अपने शरणागत भक्त की रक्षा करते हैं?

उत्तर:
महाराज जी कहते हैं कि भगवान अपने शरणागत भक्त की हर परिस्थिति में रक्षा करते हैं। जैसे माता अपने बच्चे को हर खतरे से बचाती है, वैसे ही भगवान भी अपने भक्त की रक्षा करते हैं। लेकिन इसके लिए सच्ची शरणागति आवश्यक है। यदि साधक केवल नाम मात्र का शरणागत है और भीतर से संसार में ही आसक्त है, तो वह भयभीत रहेगा। लेकिन जो पूर्ण रूप से भगवान को अपना मान लेता है, उसे किसी भी प्रकार का डर नहीं रहता। महाराज जी बताते हैं कि भगवान हर जगह उपस्थित हैं और अपने भक्त के साथ हमेशा रहते हैं। इसलिए सच्चा भक्त कभी भयभीत नहीं होता, क्योंकि उसे विश्वास होता है कि भगवान उसके साथ हैं।


प्रश्न 8: भय क्यों लगता है और निर्भय कैसे बनें?

उत्तर:
महाराज जी कहते हैं कि भय का मुख्य कारण है—भगवान पर विश्वास की कमी। जब तक हमें यह विश्वास नहीं होता कि भगवान हमारे साथ हैं, तब तक हम डरते रहते हैं। हम अपने आप को अकेला मानते हैं, इसलिए हर परिस्थिति में घबराते हैं। लेकिन जब साधक सच्चे मन से भगवान की शरण में आ जाता है, तब वह समझता है कि जो भी हो रहा है, भगवान की इच्छा से हो रहा है। इससे उसका भय समाप्त हो जाता है। महाराज जी बताते हैं कि निर्भय बनने का एक ही उपाय है—भगवान का नाम जप और शरणागति। जब मन भगवान में स्थिर हो जाता है, तब कोई भी परिस्थिति हमें डरा नहीं सकती।


प्रश्न 9: मन की आवाज और अंतरात्मा की आवाज में क्या अंतर है?

उत्तर:
महाराज जी कहते हैं कि लोग अक्सर “अंतरात्मा की आवाज” कहते हैं, लेकिन वास्तव में ऐसा नहीं है। आत्मा की कोई अलग आवाज नहीं होती। जो आवाज हमें सुनाई देती है, वह बुद्धि की होती है—जिसमें सुमति और कुमति दोनों होती हैं। सुमति हमें सही मार्ग पर चलने के लिए प्रेरित करती है, जबकि कुमति हमें गलत दिशा में ले जाती है। मन इन्हीं दोनों के प्रभाव में चलता है। जब कुमति प्रबल होती है, तो हम गलत कार्य कर बैठते हैं, और जब सुमति मजबूत होती है, तो हम सही निर्णय लेते हैं। इसलिए साधक को सुमति को मजबूत करना चाहिए, जो सत्संग, भजन और अच्छे आचरण से बढ़ती है। यही सही मार्ग है।


प्रश्न 10: सुमति और कुमति क्या होती है? कैसे पहचानें?

उत्तर:
महाराज जी बताते हैं कि सुमति और कुमति दोनों हमारी बुद्धि के ही भाग हैं। सुमति वह है जो हमें धर्म, सत्य और भगवान की ओर ले जाए, जबकि कुमति वह है जो हमें अधर्म, पाप और संसार की ओर खींचे। जब कोई विचार हमें भीतर से शांति, संतुलन और सही मार्ग की ओर ले जाए, तो समझना चाहिए कि यह सुमति है। और जब कोई विचार हमें लालच, क्रोध या गलत कार्य की ओर प्रेरित करे, तो वह कुमति है। महाराज जी कहते हैं कि सुमति को मजबूत करने के लिए सत्संग, नाम जप और अच्छे आचरण आवश्यक हैं। जितना अधिक हम भजन करेंगे, उतनी ही हमारी सुमति प्रबल होगी और हम गलत रास्ते से बच पाएंगे।

प्रश्न 11: क्या भगवान की प्राप्ति के लिए जप की संख्या जरूरी है?

उत्तर:
महाराज जी कहते हैं कि भगवान की प्राप्ति केवल संख्या पर निर्भर नहीं करती, बल्कि भावना पर निर्भर करती है। लोग अक्सर सोचते हैं कि यदि हम करोड़ों नाम जप लेंगे तो भगवान मिल जाएंगे, लेकिन यदि मन कहीं और भटक रहा है तो केवल संख्या से कोई विशेष लाभ नहीं होगा। दूसरी ओर, यदि कोई व्यक्ति सच्चे मन से, प्रेम और श्रद्धा के साथ एक बार भी भगवान का नाम लेता है, तो उसका प्रभाव बहुत गहरा होता है। संख्या का महत्व अनुशासन के लिए हो सकता है, लेकिन उसे लक्ष्य नहीं बनाना चाहिए। महाराज जी बताते हैं कि नाम जप का उद्देश्य भगवान से जुड़ना है, न कि केवल गिनती पूरी करना। इसलिए साधक को संख्या से अधिक भाव पर ध्यान देना चाहिए और हर नाम को पूरे मन से लेना चाहिए।


प्रश्न 12: भगवान जल्दी कैसे मिलते हैं—संख्या से या भाव से?

उत्तर:
महाराज जी स्पष्ट कहते हैं कि भगवान भाव से मिलते हैं, संख्या से नहीं। यदि केवल संख्या ही महत्वपूर्ण होती, तो हर वह व्यक्ति जिसने अधिक जप किया है, उसे तुरंत भगवान मिल जाते। लेकिन ऐसा नहीं होता। भगवान हृदय के भाव को देखते हैं—कितनी सच्चाई, प्रेम और समर्पण है। यदि साधक का मन शुद्ध और निष्कपट है, तो भगवान उसकी ओर शीघ्र आकर्षित होते हैं। महाराज जी कहते हैं कि जैसे किसी को सच्चे प्रेम से पुकारा जाए, तो वह तुरंत आता है, वैसे ही भगवान भी सच्चे भाव से पुकारने पर मिलते हैं। इसलिए भक्ति में गुणवत्ता (quality) महत्वपूर्ण है, न कि केवल मात्रा (quantity)। साधक को अपने भाव को शुद्ध करने पर ध्यान देना चाहिए।


प्रश्न 13: गृहस्थ जीवन में रहकर भगवत प्राप्ति कैसे संभव है?

उत्तर:
महाराज जी कहते हैं कि भगवत प्राप्ति केवल जंगल या आश्रम में ही संभव नहीं है, बल्कि गृहस्थ जीवन में भी संभव है। समस्या गृहस्थ जीवन में नहीं, बल्कि मन की आसक्ति में है। यदि साधक अपने कर्तव्यों को निभाते हुए भी मन को भगवान में लगाए रखता है, तो वह भक्ति के मार्ग पर आगे बढ़ सकता है। महाराज जी बताते हैं कि काम करते हुए भी नाम जप किया जा सकता है। यदि हम अपने हर कार्य को भगवान को समर्पित कर दें, तो वही कार्य भक्ति बन जाता है। परिवार की सेवा भी भगवान की सेवा हो सकती है, यदि उसमें समर्पण का भाव हो। इसलिए गृहस्थ जीवन कोई बाधा नहीं है, बल्कि सही दृष्टि से देखा जाए तो यह भी साधना का एक माध्यम है।


प्रश्न 14: क्या शादी के बाद भी भक्ति मार्ग पर आगे बढ़ा जा सकता है?

उत्तर:
महाराज जी कहते हैं कि शादी के बाद भी भक्ति मार्ग पर पूरी तरह आगे बढ़ा जा सकता है। विवाह कोई बाधा नहीं है, बल्कि यह जीवन का एक हिस्सा है। यदि पति-पत्नी दोनों समझदारी से जीवन जीते हैं और भगवान को प्राथमिकता देते हैं, तो वे एक-दूसरे के लिए सहायक बन सकते हैं। महाराज जी बताते हैं कि यदि एक व्यक्ति भी सच्चे मन से भजन करता है, तो उसका प्रभाव पूरे परिवार पर पड़ता है। इसलिए यह सोचना गलत है कि शादी के बाद भक्ति संभव नहीं है। समस्या केवल तब होती है जब हम पूरी तरह संसार में उलझ जाते हैं और भगवान को भूल जाते हैं। यदि संतुलन बना रहे, तो विवाह के बाद भी भक्ति में प्रगति हो सकती है।


प्रश्न 15: गुरु और भगवान में क्या अंतर है?

उत्तर:
महाराज जी कहते हैं कि गुरु और भगवान में कोई वास्तविक अंतर नहीं है। गुरु वही हैं जो हमें भगवान तक पहुँचने का मार्ग दिखाते हैं। भगवान अदृश्य हैं, लेकिन गुरु हमें प्रत्यक्ष रूप में मार्गदर्शन देते हैं। इसलिए गुरु को भगवान का स्वरूप माना जाता है। महाराज जी बताते हैं कि गुरु के बिना भगवान को समझना बहुत कठिन है, क्योंकि गुरु ही हमें सही दिशा देते हैं और भ्रम दूर करते हैं। गुरु का सम्मान और श्रद्धा अत्यंत आवश्यक है। यदि साधक गुरु की बातों को अपने जीवन में उतारता है, तो वह निश्चित रूप से भगवान तक पहुँच सकता है। इसलिए गुरु को भगवान का प्रतिनिधि मानकर उनका आदर करना चाहिए।


प्रश्न 16: भगवत प्राप्ति में गुरु की आवश्यकता क्यों है?

उत्तर:
महाराज जी कहते हैं कि गुरु के बिना मार्ग बहुत कठिन हो जाता है। शास्त्रों में ज्ञान है, लेकिन उसे सही तरीके से समझने और जीवन में उतारने के लिए गुरु की आवश्यकता होती है। गुरु हमें हमारी स्थिति के अनुसार मार्ग बताते हैं और हमें गलत दिशा में जाने से बचाते हैं। महाराज जी उदाहरण देते हैं कि जैसे डॉक्टर के बिना दवा का सही उपयोग नहीं हो सकता, वैसे ही गुरु के बिना शास्त्रों का सही अर्थ समझना कठिन है। गुरु हमारे जीवन के अंधकार को दूर करते हैं और हमें प्रकाश की ओर ले जाते हैं। इसलिए भगवत प्राप्ति के लिए गुरु का होना अत्यंत आवश्यक है।


प्रश्न 17: क्या धाम जाना प्रारब्ध है या भगवान की कृपा?

उत्तर:
महाराज जी कहते हैं कि धाम जाना केवल प्रारब्ध नहीं है, बल्कि भगवान की विशेष कृपा है। संसार में बहुत लोग हैं, लेकिन हर किसी को धाम जाने का अवसर नहीं मिलता। यह तभी संभव होता है जब भगवान की कृपा होती है। महाराज जी बताते हैं कि धाम में जाने से साधक को एक विशेष वातावरण मिलता है, जहाँ उसका मन भगवान की ओर जल्दी आकर्षित होता है। यह अवसर मिलना ही बहुत बड़ा सौभाग्य है। इसलिए धाम जाकर केवल घूमना नहीं, बल्कि भजन और साधना करना चाहिए। तभी उसका वास्तविक लाभ मिलता है।


प्रश्न 18: अहंकार की उत्पत्ति कैसे होती है और इसे कैसे समाप्त करें?

उत्तर:
महाराज जी कहते हैं कि अहंकार तब उत्पन्न होता है जब हम अपने आपको शरीर मान लेते हैं और “मैं” और “मेरा” की भावना बढ़ जाती है। हम अपने ज्ञान, धन, पद या रूप पर गर्व करने लगते हैं और यही अहंकार बन जाता है। यह साधना में सबसे बड़ा बाधक है। इसे समाप्त करने का उपाय है—भगवान का स्मरण और समर्पण। जब हम यह समझ लेते हैं कि सब कुछ भगवान का है और हम केवल एक माध्यम हैं, तब अहंकार धीरे-धीरे समाप्त होने लगता है। महाराज जी बताते हैं कि नाम जप से मन शुद्ध होता है और अहंकार कम होता है। इसलिए विनम्रता और भजन से ही अहंकार दूर होता है।


प्रश्न 19: शरणागति का सबसे सरल उपाय क्या है?

उत्तर:
महाराज जी कहते हैं कि शरणागति का सबसे सरल उपाय है—सब कुछ भगवान को समर्पित कर देना। इसका अर्थ है कि हम अपने जीवन की हर स्थिति को भगवान की इच्छा मान लें। जो भी हो रहा है, उसे स्वीकार करें और भगवान पर भरोसा रखें। जब हम अपने मन, बुद्धि और शरीर को भगवान को अर्पित कर देते हैं, तब चिंता समाप्त हो जाती है। महाराज जी बताते हैं कि शरणागत का भार भगवान स्वयं उठाते हैं। इसलिए साधक को केवल सच्चे मन से भगवान को पुकारना चाहिए और उन पर पूर्ण विश्वास रखना चाहिए। यही सबसे सरल और प्रभावी उपाय है।


प्रश्न 20: मन बार-बार विषयों में फंसता है—इससे कैसे बचें?

उत्तर:
महाराज जी कहते हैं कि मन का स्वभाव ही विषयों में भटकना है, क्योंकि वह जन्मों-जन्मों से उसी में लगा हुआ है। इसलिए उसे तुरंत रोकना कठिन होता है। लेकिन इसका उपाय है—नाम जप और सत्संग। जब मन को भगवान के नाम में लगाया जाता है, तो धीरे-धीरे उसकी रुचि बदलने लगती है। महाराज जी बताते हैं कि मन को खाली नहीं छोड़ना चाहिए, नहीं तो वह गलत दिशा में चला जाएगा। इसलिए उसे अच्छे कार्यों और भजन में लगाना जरूरी है। धैर्य और निरंतर अभ्यास से मन धीरे-धीरे नियंत्रित हो जाता है और विषयों का आकर्षण कम होने लगता है।


प्रश्न 21: मोह से छुटकारा कैसे पाया जाए?

उत्तर:
महाराज जी कहते हैं कि मोह का कारण है—अज्ञान और आसक्ति। जब हम किसी व्यक्ति या वस्तु को अपना मान लेते हैं, तो उससे मोह उत्पन्न होता है। लेकिन वास्तव में इस संसार में कुछ भी स्थायी नहीं है। यदि यह समझ आ जाए, तो मोह अपने आप कम होने लगता है। महाराज जी बताते हैं कि मोह को समाप्त करने का उपाय है—भगवान में प्रेम बढ़ाना। जब भगवान के प्रति प्रेम बढ़ता है, तो संसार की आसक्ति कम होने लगती है। इसलिए नाम जप और सत्संग के माध्यम से मन को भगवान की ओर लगाना चाहिए।


प्रश्न 22: युवावस्था में काम-विकार से कैसे बचें?

उत्तर:
महाराज जी कहते हैं कि युवावस्था में काम-विकार स्वाभाविक रूप से अधिक होता है, क्योंकि यह शरीर की अवस्था है। लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि हम इसके अनुसार चलें। इसे नियंत्रित करना आवश्यक है। महाराज जी बताते हैं कि मन को खाली नहीं रखना चाहिए और उसे भजन, सत्संग और अच्छे कार्यों में लगाना चाहिए। कुसंग से बचना बहुत जरूरी है, क्योंकि वही काम-विकार को बढ़ाता है। यदि साधक अपने जीवन में नियम और संयम लाता है, तो वह इन विकारों पर नियंत्रण पा सकता है। नाम जप से मन की शक्ति बढ़ती है और विकार धीरे-धीरे कम हो जाते हैं।


प्रश्न 23: जब कोई हमारे साथ छल-कपट करे तो क्या करें?

उत्तर:
महाराज जी कहते हैं कि यदि कोई हमारे साथ छल करता है, तो हमें प्रतिक्रिया में वैसा ही व्यवहार नहीं करना चाहिए। हमें यह समझना चाहिए कि यह भी हमारे कर्मों का फल है। यदि हम भी वैसा ही करेंगे, तो यह चक्र चलता रहेगा। महाराज जी बताते हैं कि साधक को धैर्य और क्षमा का मार्ग अपनाना चाहिए। इसका अर्थ यह नहीं कि हम गलत को सही मान लें, बल्कि यह कि हम अपने मन को खराब न होने दें। यदि हम शांत रहते हैं और भगवान का स्मरण करते हैं, तो भीतर शांति बनी रहती है। यही सच्चा मार्ग है।


प्रश्न 24: क्या हर दुख और अपमान प्रारब्ध का परिणाम है?

उत्तर:
महाराज जी कहते हैं कि जो भी दुख और अपमान हमें मिलता है, वह हमारे पूर्व कर्मों का परिणाम होता है। इसे समझकर हमें दुखी होने की बजाय स्वीकार करना चाहिए। यदि हम इसे भगवान की इच्छा मानकर सहन करते हैं, तो यह हमारे पापों को समाप्त कर देता है। महाराज जी बताते हैं कि जो व्यक्ति दुख में भी भगवान का नाम जपता है, वह जल्दी शुद्ध हो जाता है। इसलिए दुख को शत्रु नहीं, बल्कि एक अवसर समझना चाहिए। यह हमारे भीतर धैर्य और शक्ति को बढ़ाता है।


प्रश्न 25: भगवान की कृपा का वास्तविक अर्थ क्या है?

उत्तर:
महाराज जी कहते हैं कि भगवान की कृपा का अर्थ केवल सुख मिलना नहीं है। कई बार दुख भी भगवान की कृपा हो सकता है, क्योंकि वह हमें सही दिशा में ले जाता है। यदि किसी व्यक्ति को भजन की प्रेरणा मिलती है, भगवान का स्मरण होता है और वह सत्य मार्ग पर चलता है—यही सबसे बड़ी कृपा है। महाराज जी बताते हैं कि कृपा का अर्थ है—भगवान का हमें अपनी ओर खींचना। इसलिए हमें हर परिस्थिति को कृपा मानकर स्वीकार करना चाहिए। यही सच्ची समझ है।

Credit:
“यह लेख संत श्री प्रेमानंद जी महाराज के एकान्तिक वार्तालाप प्रवचन की अमृत वाणी पर आधारित है।”

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