माला-1214:विवेक व्यवहार में क्यों नहीं उतरता? श्री प्रेमानंद महाराज जी के अमृत वचनों से नाम जप महिमा

प्रश्न 1: महाराज जी,संतों के बिना मार्ग कैसे चले?

उत्तर:
महाराज जी कहते हैं कि केवल शास्त्र पढ़ने से पूर्ण लाभ नहीं मिलता, जब तक कोई प्रगट संत न मिले। शास्त्र दवा है, लेकिन संत वैद्य हैं। संत ही हमारे स्वभाव और स्थिति के अनुसार मार्ग बताते हैं। इसलिए यदि प्रगट संत न मिले तो उनकी वाणी को जीवन में उतारना चाहिए और नाम जप करते रहना चाहिए।


प्रश्न 2: क्या केवल शास्त्र से कल्याण होगा?

उत्तर:
केवल शास्त्र पढ़ना पर्याप्त नहीं है। जैसे मेडिकल स्टोर में दवा होती है लेकिन डॉक्टर के बिना रोग ठीक नहीं होता, वैसे ही शास्त्र समझने के लिए गुरु आवश्यक हैं। गुरु के बिना हम गलत समझ सकते हैं, इसलिए संत का मार्गदर्शन जरूरी है।


प्रश्न 3: विवेक व्यवहार में क्यों नहीं उतरता?

उत्तर:
महाराज जी इस प्रश्न का बहुत स्पष्ट और गहरा उत्तर देते हैं कि विवेक का व्यवहार में न उतरने का कारण ज्ञान की कमी नहीं, बल्कि भजन बल की कमी है। हम सबको यह जानकारी होती है कि क्या सही है और क्या गलत, क्या करना चाहिए और क्या नहीं करना चाहिए। लेकिन फिर भी मनुष्य वही गलत काम कर बैठता है, क्योंकि उसके पास उस ज्ञान को लागू करने की शक्ति नहीं होती।

महाराज जी समझाते हैं कि केवल जानकारी (information) होना पर्याप्त नहीं है। जब तक नाम जप से अंदर शक्ति (आध्यात्मिक बल) उत्पन्न नहीं होती, तब तक मन इंद्रियों को खींचकर गलत दिशा में ले जाता रहता है। मन बहुत चंचल और पुराना बिगड़ा हुआ है, वह हमारी सुनी हुई अच्छी बातों को टिकने नहीं देता।

वे कहते हैं कि जैसे घड़े में छेद हो और हम पानी भरते रहें, तो वह कभी नहीं भरेगा। पहले छेद बंद करने पड़ेंगे। उसी तरह हमारे अंदर के दोष—कुसंग, गंदी आदतें, विकार—इनको रोके बिना विवेक टिक नहीं सकता।

इसलिए समाधान केवल एक है—ईमानदारी से नाम जप। जब नाम जप बढ़ता है, तब अंदर शक्ति आती है और वही विवेक को व्यवहार में उतारती है। तब मन भी धीरे-धीरे नियंत्रण में आने लगता है और जीवन सही दिशा में चलने लगता है।


प्रश्न 4: केवल ज्ञान से परिवर्तन क्यों नहीं होता?

उत्तर:
ज्ञान केवल दिशा देता है, लेकिन चलने की शक्ति भजन देता है। बिना नाम जप के मन बार-बार गलत कार्य करा देता है। इसलिए केवल जानना पर्याप्त नहीं, भजन करना आवश्यक है।


प्रश्न 5: ईश्वर का स्वरूप क्या है?

उत्तर:
ईश्वर का स्वरूप अनिर्वचनीय है, जिसे पूरी तरह शब्दों में नहीं बताया जा सकता। फिर भी संत कहते हैं कि वह सच्चिदानंद रूप है और संपूर्ण सृष्टि उसी का विस्तार है। उसके अलावा कुछ भी नहीं है।


प्रश्न 6: क्या सब कुछ भगवान ही है?

उत्तर:
हाँ, महाराज जी कहते हैं कि सब कुछ भगवान ही है। जो हमें अलग-अलग दिख रहा है, वह भी उसी का रूप है। जब ज्ञान होता है तो सबमें भगवान का दर्शन होने लगता है।


प्रश्न 7: अभिमान और स्वाभिमान में अंतर क्या है?

उत्तर:
अभिमान वह है जो शरीर, धन, पद, जाति आदि से जुड़ा है। जबकि स्वाभिमान आत्मा से जुड़ा है—“मैं भगवान का अंश हूँ।” लोग जिसे स्वाभिमान कहते हैं, वह वास्तव में अभिमान ही होता है।


प्रश्न 8: क्या धन, पद आदि का गर्व स्वाभिमान है?

उत्तर:
नहीं, यह सब अभिमान है। स्वाभिमान केवल आत्मा और परमात्मा से जुड़ा होता है। बाकी सब झूठा अहंकार है जो पतन का कारण बनता है।


प्रश्न 9: मृत्यु होने पर भगवान से दूरी क्यों लगती है?

उत्तर:
महाराज जी कहते हैं कि यह मृत्यु लोक है, यहाँ सबको मरना है। मृत्यु हमारे कर्मों के अनुसार होती है। भगवान इसमें दोषी नहीं हैं। हमें इसे समझकर स्वीकार करना चाहिए और भजन में लगना चाहिए।


प्रश्न 10: मृत्यु को कैसे समझें?

उत्तर:
मृत्यु निश्चित है। कोई गर्भ में मरता है, कोई बुढ़ापे में। इसलिए डरने की बजाय नाम जप करना चाहिए ताकि अंतिम समय भगवान का स्मरण हो और जीवन सफल हो।


प्रश्न 11: क्या सब पहले से तय है?

उत्तर:
नहीं, केवल सुख-दुख प्रारब्ध से तय हैं। लेकिन वर्तमान कर्म करने की स्वतंत्रता मनुष्य के पास है। वही भविष्य बनाता है।


प्रश्न 12: क्या नाम जप से भाग्य बदल सकता है?

उत्तर:
हाँ, नाम जप से पाप कर्म नष्ट हो सकते हैं। लेकिन जितना अधिक नाम जप होगा, उतना प्रभाव पड़ेगा। इसलिए निरंतर भजन आवश्यक है।


प्रश्न 13: मन को कैसे रोके?

उत्तर:
मन को रोकने का उपाय केवल नाम जप है। मन को समय मत दो, नहीं तो वह भटका देगा। लगातार भगवान का स्मरण करो।


प्रश्न 14: शरणागति कैसे बढ़े?

उत्तर:
सब कुछ भगवान को समर्पित कर दो—मन, बुद्धि, शरीर। फिर चिंता मत करो। भगवान स्वयं संभाल लेंगे।


प्रश्न 15: मन को अपना मानना दुख क्यों देता है?

उत्तर:
जब हम मन को अपना मानते हैं तो उसके विकार हमें दुख देते हैं। जब उसे भगवान को समर्पित कर देते हैं तो हम निश्चिंत हो जाते हैं।


प्रश्न 16: समर्पण के बाद चिंता क्यों नहीं रहती?

उत्तर:
क्योंकि शरणागत का भार भगवान पर होता है। जब हम अपने को भगवान को दे देते हैं तो वह हमारी जिम्मेदारी ले लेते हैं।


प्रश्न 17: 13 करोड़ नाम जप का महत्व?

उत्तर:
संख्या महत्वपूर्ण नहीं, भावना महत्वपूर्ण है। एक नाम से भी मोक्ष हो सकता है यदि वह पूर्ण भाव से लिया जाए।


प्रश्न 18: क्या पंडित से नाम जप करवाना चाहिए?

उत्तर:
नहीं, भजन स्वयं करना चाहिए। मन को भगवान में लगाना जरूरी है, किसी और से करवाने से लाभ नहीं।


प्रश्न 19: जल्दी भगवत प्राप्ति कैसे?

उत्तर:
हर समय नाम जप करो। वर्तमान क्षण को भगवान में लगाओ। यही सबसे सरल मार्ग है।


प्रश्न 20: सत्य मार्ग पर विरोध क्यों होता है?

उत्तर:
कलयुग में लोग असत्य को स्वीकार करते हैं। इसलिए सत्य पर चलने वालों का विरोध होता है।


प्रश्न 21: क्या परिवार का विरोध सहना चाहिए?

उत्तर:
हाँ, यदि सत्य के लिए विरोध सहना पड़े तो सहना चाहिए। सत्य मार्ग अकेला होता है।


प्रश्न 22: माता-पिता भी गलत हों तो?

उत्तर:
यदि वे धर्म से हटाते हैं तो सत्य का पालन करना चाहिए। अंत में उनका भी कल्याण होगा।


प्रश्न 23: कमाई का कितना हिस्सा धर्म में दें?

उत्तर:
निश्चित प्रतिशत जरूरी नहीं। जहाँ जरूरत हो वहाँ सेवा करो।


प्रश्न 24: दान और सेवा में अंतर?

उत्तर:
दान अहंकार से होता है, सेवा प्रेम से। हमें सेवा भाव रखना चाहिए।


प्रश्न 25: गोपियों को विरह क्यों हुआ?

उत्तर:
क्योंकि वे तत्व नहीं, भगवान के रूप से प्रेम करती थीं। प्रेमी भगवान को साक्षात चाहता है।


प्रश्न 26: प्रेम और ज्ञान अलग हैं?

उत्तर:
हाँ, ज्ञान से भगवान सर्वत्र दिखते हैं, लेकिन प्रेम में भगवान का साक्षात रूप चाहिए।


प्रश्न 27: परमात्मा की प्राप्ति कैसे पहचाने?

उत्तर:
जब सबमें भगवान दिखने लगें और मन शांत हो जाए, तब समझो कि प्राप्ति हो गई।


प्रश्न 28: क्या आत्मा ही परमात्मा है?

उत्तर:
हाँ, आत्मा ही परमात्मा का अंश है, वास्तव में दोनों अलग नहीं हैं।


प्रश्न 29: बाधाएँ क्यों आती हैं?

उत्तर:
क्योंकि मन प्रकृति से जुड़ा है। भजन से यह सब समाप्त हो जाता है।


प्रश्न 30: भजन से द्वंद कैसे मिटता है?

उत्तर:
नाम जप से बुद्धि भगवान से जुड़ती है और द्वंद समाप्त हो जाते हैं।


प्रश्न 31: क्या कुसंग भजन नष्ट करता है?

उत्तर:
हाँ, कुसंग भजन को नष्ट कर देता है जैसे छलनी में दूध डालना।


प्रश्न 32: भाग्य या भजन?

उत्तर:
भजन से भाग्य बदलता है। भाग्य भजन से नहीं बनता, भजन से भाग्य बनता है।


प्रश्न 33: जवानी में भजन क्यों?

उत्तर:
क्योंकि यही समय नियंत्रण का है। बुढ़ापे में शक्ति नहीं रहती।


प्रश्न 34: बिना भजन मनुष्य कैसा?

उत्तर:
महाराज जी कहते हैं कि बिना भजन के मनुष्य राक्षस समान हो जाता है।


प्रश्न 35: समाधान क्या है?

उत्तर:
हर समस्या का समाधान भगवान हैं। नाम जप ही उपाय है।


प्रश्न 36: सही मार्ग कैसे पहचानें?

उत्तर:
जो भजन, सत्य और शांति की ओर ले जाए वही सही मार्ग है।


प्रश्न 37: गुरु बदलना चाहिए?

उत्तर:
नहीं, जिस मार्ग पर हो उसी पर स्थिर रहो। केवल मार्गदर्शन लो।


प्रश्न 38: क्या सभी नाम एक हैं?

उत्तर:
हाँ, राम, कृष्ण, राधा, वाहेगुरु—all एक ही परम तत्व हैं।


प्रश्न 39: संत से संबंध क्या?

उत्तर:
भिक्षा और शिक्षा का संबंध—संत शिक्षा देते हैं और हम सेवा करते हैं।


प्रश्न 40: सच्ची सेवा क्या है?

उत्तर:
जहाँ जरूरत हो वहाँ तन, मन, धन से सहायता करना ही सच्ची सेवा है।

Credit:
“यह लेख संत श्री प्रेमानंद जी महाराज के एकान्तिक वार्तालाप प्रवचन की अमृत वाणी पर आधारित है।”

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