माला-1213:कर्म क्या है? क्या भगवान ही कर्मों का फल तय करते हैं? श्री प्रेमानंद महाराज जी के अमृत वचनों से नाम जप महिमा

प्रश्न 1: महाराज जी, मैं ईमानदारी से जीवन जीता हूँ और दूसरों की मदद करता हूँ, फिर भी मुझे दुख क्यों मिलता है?

उत्तर:
महाराज जी कहते हैं कि संसार में जो भी सुख और दुख हमें प्राप्त होते हैं, वे केवल इस जन्म के कर्मों से नहीं आते, बल्कि हमारे पूर्व जन्मों के कर्मों का भी परिणाम होते हैं। कई बार मनुष्य बहुत अच्छे आचरण से जीवन जीता है, किसी का बुरा नहीं करता, फिर भी उसे कष्ट सहने पड़ते हैं। इसका कारण यह नहीं कि उसके वर्तमान कर्म गलत हैं, बल्कि यह कि पूर्व जन्मों में किए गए कर्मों का फल अभी भोगना पड़ रहा है।

कर्म का एक अटल नियम है कि कोई भी कर्म बिना भोगे नष्ट नहीं होता। चाहे वह पाप कर्म हो या पुण्य कर्म, उसका फल अवश्य मिलता है। बड़े-बड़े संतों और महापुरुषों को भी अपने पूर्व कर्मों का फल भोगना पड़ा है। इसलिए जब जीवन में कष्ट आए तो यह नहीं सोचना चाहिए कि अच्छे कर्म करने का फल दुख क्यों मिला। वास्तव में वह पुराने कर्मों का परिणाम होता है।

महाराज जी समझाते हैं कि ऐसे समय में व्यक्ति को अच्छाई छोड़नी नहीं चाहिए। यदि हम सत्कर्म करते रहें, दूसरों की भलाई करते रहें और भगवान का नाम जप करते रहें तो धीरे-धीरे हमारे पुराने पाप कर्म नष्ट हो जाते हैं। जैसे किसान खेत में बीज बोता है तो फसल तुरंत नहीं मिलती, समय लगता है। उसी प्रकार अच्छे कर्मों का फल भी समय आने पर अवश्य मिलता है।

इसलिए मनुष्य को धैर्य रखना चाहिए, भगवान के नाम का सहारा लेना चाहिए और परोपकार करते रहना चाहिए। जो व्यक्ति दुख में भी धर्म का मार्ग नहीं छोड़ता, उसका भविष्य अवश्य मंगलमय होता है।


प्रश्न 2:यदि पति-पत्नी दोनों भक्ति मार्ग पर चलना चाहते हैं तो क्या संतान होना आवश्यक है?

उत्तर:
महाराज जी कहते हैं कि संतान होना या न होना मनुष्य के हाथ में नहीं होता, यह भगवान के विधान और योग पर निर्भर करता है। संसार में ऐसे अनेक दंपत्ति हैं जो लाखों रुपये खर्च करते हैं, डॉक्टरों के पास जाते हैं, फिर भी उन्हें संतान नहीं होती। वहीं कई लोगों के यहाँ बिना किसी विशेष प्रयास के संतान उत्पन्न हो जाती है। इसलिए यह मानना चाहिए कि संतान भी भगवान की इच्छा से ही प्राप्त होती है।

यदि कोई दंपत्ति भक्ति मार्ग पर चल रहा है तो उसे इस बात की अधिक चिंता नहीं करनी चाहिए कि संतान करनी चाहिए या नहीं। यदि भगवान की इच्छा होगी तो संतान अवश्य होगी। और यदि संतान होगी तो उसका पालन-पोषण करना भी भगवान की सेवा का ही एक रूप बन सकता है। कई बार भगवान ऐसे घर में महान आत्मा या महापुरुष को जन्म देते हैं जो आगे चलकर समाज और राष्ट्र के लिए महान कार्य करते हैं।

महाराज जी यह भी बताते हैं कि भगवत प्राप्ति केवल संसार त्याग देने से नहीं होती। इतिहास में ऐसे अनेक महान संत हुए हैं जो गृहस्थ जीवन में रहते हुए भी परम ज्ञान और भक्ति को प्राप्त हुए। जैसे राजा जनक और महाराज अंबरीश, जिनके पास परिवार भी था और फिर भी वे महान भक्त और ज्ञानी बने।

इसलिए साधक को भगवान से प्रार्थना करनी चाहिए कि हे प्रभु, मेरे जीवन में जो भी आचरण आपको प्रिय हो वही मुझसे करवा दीजिए। यदि संतान के माध्यम से आपकी प्राप्ति हो सकती है तो वह भी स्वीकार है और यदि नहीं तो वह भी स्वीकार है। साधक का मुख्य लक्ष्य केवल भगवान की प्राप्ति होना चाहिए।


प्रश्न 3: कर्म क्या है? क्या भगवान ही कर्मों का फल तय करते हैं?

उत्तर:
महाराज जी बताते हैं कि कर्म वह है जो हमारे मन में संकल्प के रूप में उत्पन्न होता है, फिर बुद्धि उसे स्वीकार करती है और उसके बाद इंद्रियों द्वारा वह कार्य किया जाता है। यही कर्म कहलाता है। कर्म दो प्रकार के होते हैं—शुभ कर्म और अशुभ कर्म। शुभ कर्म को पुण्य कहा जाता है और अशुभ कर्म को पाप कहा जाता है।

इस संसार का नियम है कि प्रत्येक कर्म का फल अवश्य मिलता है। कोई भी कर्म ऐसा नहीं है जो बिना फल दिए समाप्त हो जाए। चाहे मनुष्य कितना ही बड़ा ऋषि या संत क्यों न हो, उसे भी अपने कर्मों का फल भोगना पड़ता है। इसलिए मनुष्य को बहुत सावधानी और जागरूकता से कर्म करना चाहिए।

महाराज जी उदाहरण देते हैं कि यदि कोई व्यक्ति अपराध करता है, किसी को चोट पहुँचाता है या गलत कार्य करता है, तो उसे दंड मिलता है। उसी प्रकार अच्छे कर्म करने वाले व्यक्ति को सम्मान, सुख और शांति प्राप्त होती है। यह सब कर्मों का ही परिणाम है।

भगवान की व्यवस्था में किसी प्रकार का अन्याय नहीं होता। वहाँ किसी वकील या गवाही की आवश्यकता नहीं होती। मनुष्य के प्रत्येक कर्म का लेखा उसके भीतर ही सुरक्षित रहता है। समय आने पर वही कर्म फल बनकर सामने आता है। कई बार कर्म का फल तुरंत नहीं मिलता, बल्कि कई वर्षों या जन्मों के बाद मिलता है।

इसलिए महाराज जी कहते हैं कि मनुष्य को भगवान का नाम जप करना चाहिए, परोपकार करना चाहिए और अच्छे कर्म करने चाहिए। इससे पाप कर्म नष्ट होते हैं और जीवन मंगलमय बनता है।


प्रश्न 4: यदि गुरु या संत हमारे बीच न रहें तो हमें शक्ति कहाँ से मिलेगी?

उत्तर:
महाराज जी बताते हैं कि यह शरीर नश्वर है और एक दिन न एक दिन समाप्त होने वाला है। किसी भी महापुरुष का शरीर सदा के लिए इस संसार में नहीं रहता। इसलिए यह स्वाभाविक है कि भक्तों के मन में यह चिंता आती है कि जब गुरु या संत हमारे सामने नहीं रहेंगे तो हमें शक्ति और मार्गदर्शन कैसे मिलेगा।

महाराज जी कहते हैं कि जब तक संत प्रकट रूप में रहते हैं, तब तक उनका प्रभाव बहुत अधिक होता है। उनके सान्निध्य में रहने से भक्तों को आध्यात्मिक ऊर्जा और प्रेरणा मिलती है। यह अनुभव प्रत्यक्ष संग में अधिक गहरा होता है। इसलिए संतों का प्रकट संग बहुत बड़ा सौभाग्य माना गया है।

लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि संत के शरीर के जाने के बाद उनका प्रभाव समाप्त हो जाता है। यदि कोई भक्त श्रद्धा और विश्वास के साथ संत की वाणी को मानता है, उनके बताए मार्ग पर चलता है और उनके उपदेशों को अपने जीवन में उतारता है, तो वह आजीवन उनके संरक्षण का अनुभव करता है।

महाराज जी समझाते हैं कि संत वास्तव में शरीर नहीं हैं। उनका वास्तविक स्वरूप भगवान से जुड़ा हुआ होता है। यदि भक्त प्रेम और श्रद्धा से उन्हें स्मरण करता है तो वे उसकी भावना में प्रकट होते हैं और उसे मार्गदर्शन देते हैं।

इसलिए भक्त को भय करने की आवश्यकता नहीं है। श्रद्धा और भक्ति से जुड़ा हुआ संबंध कभी समाप्त नहीं होता। जो संत की वाणी को अपने जीवन में धारण करता है, उसे सदा उनकी कृपा और शक्ति मिलती रहती है।

प्रश्न 5: यदि विवाह की इच्छा न हो तो क्या परिवार के कहने पर विवाह करना चाहिए?

उत्तर:
महाराज जी कहते हैं कि यदि किसी व्यक्ति की सच्चे मन से विवाह करने की इच्छा नहीं है, तो उसे केवल समाज या परिवार के दबाव में विवाह नहीं करना चाहिए। विवाह केवल एक सामाजिक व्यवस्था नहीं है, बल्कि दो व्यक्तियों के जीवन का गहरा संबंध है। जब कोई व्यक्ति विवाह करता है तो वह केवल अपने लिए नहीं, बल्कि दूसरे व्यक्ति के जीवन के प्रति भी जिम्मेदारी लेता है।

यदि किसी व्यक्ति की रुचि विवाह में नहीं है और वह फिर भी विवाह कर लेता है, तो इससे दूसरे व्यक्ति के जीवन में पीड़ा उत्पन्न हो सकती है। क्योंकि विवाह के बाद पत्नी अपने पति से प्रेम, सहयोग और साथ की अपेक्षा करती है। यदि पति के मन में विवाह की इच्छा ही नहीं है, तो वह उस अपेक्षा को पूरा नहीं कर पाएगा। ऐसे में पत्नी का जीवन भी बाधित हो जाएगा और उसका जीवन दुखमय हो सकता है।

महाराज जी स्पष्ट कहते हैं कि किसी के जीवन के साथ खिलवाड़ करना उचित नहीं है। केवल माता-पिता को प्रसन्न करने के लिए किसी दूसरे व्यक्ति के जीवन को दुख में डाल देना धर्म नहीं है। यदि किसी व्यक्ति का मन ब्रह्मचर्य जीवन में है या वह अपने जीवन को भक्ति, साधना या किसी अन्य उद्देश्य में लगाना चाहता है, तो उसे अपने माता-पिता से विनम्रता से अपनी भावना स्पष्ट करनी चाहिए।

सच्चा धर्म वही है जिसमें किसी को पीड़ा न हो। इसलिए यदि विवाह की इच्छा नहीं है तो स्पष्ट रूप से अपनी बात कह देना ही उचित है।


प्रश्न 6:क्यों कई बार जीवन के दुख से बाहर आने में बहुत समय लग जाता है?

उत्तर:
महाराज जी कहते हैं कि जीवन के दुख से बाहर न निकल पाने का मुख्य कारण विवेक की कमी और मन की मलिनता है। जब मनुष्य का मन शुद्ध नहीं होता और उसमें नकारात्मक विचार भरे होते हैं, तब वह किसी भी दुख, अपमान या विपत्ति को पकड़कर बैठ जाता है। ऐसा व्यक्ति महीनों और वर्षों तक उसी दुख में उलझा रहता है।

लेकिन यदि साधक के भीतर विवेक जाग्रत हो जाता है, तो वह दुख को तुरंत काट देता है। जो साधक थोड़ा जागरूक होता है वह कुछ समय में दुख से बाहर निकल जाता है, और जो अत्यंत विवेकी होता है वह दुख को स्वीकार ही नहीं करता।

महाराज जी बताते हैं कि विवेक सत्संग से उत्पन्न होता है। जब मनुष्य संतों की वाणी सुनता है, भगवान का नाम जप करता है और सत्संग में रहता है, तब उसके भीतर समझ विकसित होती है कि संसार के सुख और दुख दोनों अस्थायी हैं। जब यह समझ आती है तो मनुष्य दुख को अधिक महत्व नहीं देता।

संसार का सुख और दुख वास्तव में हमारी मान्यता पर निर्भर करता है। एक ही घटना किसी के लिए सुख हो सकती है और किसी के लिए दुख। इसलिए जो व्यक्ति भगवान का स्मरण करता है और अपने मन को भगवान में लगाता है, वह परिस्थितियों से ऊपर उठ जाता है।

इसलिए महाराज जी कहते हैं कि यदि मनुष्य नाम जप और सत्संग को अपने जीवन में स्थान दे, तो उसका मन पवित्र हो जाता है और वह दुख के प्रभाव से मुक्त हो सकता है।


प्रश्न 7:यदि साधक इंद्रियों को रोक ले लेकिन विषयों की रुचि बनी रहे तो क्या करें?

उत्तर:
महाराज जी कहते हैं कि जब तक मनुष्य को भगवान का वास्तविक आनंद अनुभव नहीं होता, तब तक विषयों की रुचि पूरी तरह समाप्त नहीं होती। लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि विषयों से विरक्ति केवल भगवान के प्रत्यक्ष दर्शन के बाद ही होती है।

महाराज जी समझाते हैं कि जैसे सूर्य निकलने से पहले ही प्रातःकाल में अंधकार धीरे-धीरे समाप्त होने लगता है, उसी प्रकार भगवान के साक्षात्कार से पहले ही साधक के भीतर विषयों से विरक्ति आने लगती है। जब साधक का भजन बढ़ता है और उसे भगवान के नाम में रस आने लगता है, तब संसार के भोग अपने आप कम आकर्षक लगने लगते हैं।

इसलिए साधक को चिंता करने की आवश्यकता नहीं है कि उसके भीतर अभी भी विषयों की रुचि क्यों है। भजन का मार्ग धीरे-धीरे मन को शुद्ध करता है। जैसे-जैसे नाम जप बढ़ता है, वैसे-वैसे मन की वासनाएँ और विकार समाप्त होते जाते हैं।

महाराज जी यह भी बताते हैं कि नाम जप में अत्यंत महान शक्ति है। यदि मनुष्य निरंतर भगवान का नाम जप करता है तो उसके भीतर वैराग्य, ज्ञान और भगवान के प्रति प्रेम तीनों एक साथ उत्पन्न होते हैं।

इसलिए साधक को धैर्य रखना चाहिए और अधिक से अधिक नाम जप करना चाहिए। धीरे-धीरे भगवान की कृपा से मन निर्विषय हो जाता है और साधक को वास्तविक शांति प्राप्त होती है।


प्रश्न 8: क्या अपना भजन किसी दूसरे दुखी व्यक्ति को दे देना उचित है?

उत्तर:
महाराज जी कहते हैं कि जब तक साधक को भगवत प्राप्ति नहीं होती, तब तक उसे अपने भजन को दूसरों को देने का अधिकार नहीं है। क्योंकि साधना का मुख्य उद्देश्य स्वयं भगवान को प्राप्त करना है। यदि साधक बीच मार्ग में ही अपना भजन दूसरों को बाँटने लगे, तो वह स्वयं अपने लक्ष्य तक पहुँचने से पहले ही कमजोर हो सकता है।

महाराज जी बताते हैं कि जब हम किसी दुखी व्यक्ति को देखते हैं तो हमारे मन में करुणा उत्पन्न होती है। यह करुणा बहुत अच्छी भावना है। लेकिन इसका सही उपयोग करना चाहिए। साधक को अपने भजन को भगवान के चरणों में समर्पित करना चाहिए और दुखी व्यक्ति के लिए भगवान से प्रार्थना करनी चाहिए।

यदि संभव हो तो उस व्यक्ति की सहायता तन और धन से करनी चाहिए। उसे भोजन, सहायता या सहयोग देकर उसकी पीड़ा को कम करने का प्रयास करना चाहिए। लेकिन भजन का फल भगवान को अर्पित करना चाहिए, क्योंकि वही हमारी साधना का लक्ष्य है।

जब साधक भगवान को प्राप्त कर लेता है, तब उसकी स्थिति बदल जाती है। तब उसे यह अनुभव होता है कि पूरे संसार में वही परमात्मा विभिन्न रूपों में उपस्थित है। उस अवस्था में दुख और सुख का भेद समाप्त हो जाता है।

इसलिए महाराज जी कहते हैं कि पहले अपने जीवन का परम लक्ष्य—भगवत प्राप्ति—प्राप्त करने का प्रयास करना चाहिए। उसके बाद ही साधक का कल्याण और दूसरों का भी कल्याण पूर्ण रूप से संभव होता है।


प्रश्न 9: यदि हम भगवान के अंश हैं तो भगवान हमें सीधे सही मार्ग पर क्यों नहीं ले जाते?

उत्तर:
महाराज जी बताते हैं कि भगवान ने मनुष्य को पहले से ही सीधा मार्ग बता दिया है। भगवान स्वयं कहते हैं कि मनुष्य उनका अंश है और यदि वह भगवान का स्मरण और भक्ति करे तो भगवान उसका कल्याण स्वयं कर लेते हैं।

भगवान ने मनुष्य को बुद्धि, विवेक और स्वतंत्रता दी है। उन्होंने यह भी बताया है कि कौन सा मार्ग हमें सुख देगा और कौन सा मार्ग हमें दुख की ओर ले जाएगा। लेकिन मनुष्य स्वयं अपनी इच्छा से मार्ग चुनता है। जब मनुष्य भगवान के मार्ग को छोड़कर संसार के भोगों में सुख खोजने लगता है, तब वह दुख में फँस जाता है।

महाराज जी उदाहरण देते हैं कि जैसे किसी बाजार में अनेक वस्तुएँ होती हैं, वैसे ही भगवान की सृष्टि में भी अच्छे और बुरे दोनों मार्ग मौजूद हैं। भगवान ने मनुष्य को यह स्वतंत्रता दी है कि वह अपनी इच्छा से जो चाहे वह मार्ग चुन सकता है। यदि वह अच्छे मार्ग को चुनता है तो उसे आनंद प्राप्त होता है और यदि बुरे मार्ग को चुनता है तो उसे दुख भोगना पड़ता है।

इसमें भगवान का दोष नहीं है। भगवान ने मार्ग भी बताया और चेतावनी भी दी। अब मनुष्य का कर्तव्य है कि वह विवेक से निर्णय करे।

जब मनुष्य भगवान का स्मरण करता है, सत्संग में रहता है और भक्ति का मार्ग अपनाता है, तब वह धीरे-धीरे सही दिशा में चलने लगता है और अंततः भगवान की कृपा से परम शांति और आनंद को प्राप्त करता है।

Credit:
“यह लेख संत श्री प्रेमानंद जी महाराज के एकान्तिक वार्तालाप प्रवचन की अमृत वाणी पर आधारित है।”

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