माला-1211:क्रोध और आवेश में क्या अंतर है? श्री प्रेमानंद महाराज जी के अमृत वचनों से नाम जप महिमा

प्रश्न 1: नशे की लत में फंसे व्यक्ति को उससे बाहर निकलने के लिए क्या करना चाहिए?

उत्तर:
महाराज जी कहते हैं कि नशा मनुष्य के विवेक, स्वास्थ्य और परिवार—तीनों को नष्ट कर देता है। जो व्यक्ति शराब या किसी भी प्रकार के व्यसन में फंस जाता है, उसकी बुद्धि धीरे-धीरे भ्रष्ट हो जाती है। वह सही और गलत का निर्णय करने की क्षमता खोने लगता है। इसलिए सबसे पहले यह समझना जरूरी है कि नशा किसी समस्या का समाधान नहीं बल्कि समस्या की जड़ है।

महाराज जी बताते हैं कि नशे से बाहर निकलने का पहला उपाय है दृढ़ संकल्प। व्यक्ति को अपने मन में यह प्रतिज्ञा करनी चाहिए कि आज से वह उस व्यसन को हाथ नहीं लगाएगा। दूसरा उपाय है कुसंग से बचना। जिन लोगों के साथ बैठने से शराब या नशे की प्रेरणा मिलती है, उनसे दूरी बनाना आवश्यक है।

तीसरा और सबसे प्रभावशाली उपाय है भगवान का नाम-जप। महाराज जी कहते हैं कि हरि नाम में ऐसी अद्भुत शक्ति है कि वह मनुष्य के भीतर नया बल उत्पन्न कर देता है। जब साधक नियमित रूप से भगवान का नाम जपता है, तो उसका मन धीरे-धीरे पवित्र होने लगता है और बुरी आदतों से छुटकारा मिलने लगता है।

इसलिए व्यसन से मुक्ति केवल बाहरी प्रयास से नहीं बल्कि आध्यात्मिक शक्ति से संभव है।


प्रश्न 2: साधना में व्यभचार का क्या अर्थ है?

उत्तर:
महाराज जी बताते हैं कि साधना में व्यभचार का अर्थ सांसारिक अर्थ वाला व्यभचार नहीं बल्कि भक्ति में चंचलता है। जब साधक अपने इष्ट, गुरु या साधना के मार्ग में स्थिर नहीं रहता और बार-बार अपना मार्ग बदलता रहता है, तो यह भक्ति में व्यभचार कहलाता है।

सच्ची भक्ति का आधार अनन्यता है। साधक को अपने गुरु द्वारा दिए गए मंत्र, इष्ट और साधना में पूर्ण विश्वास रखना चाहिए। यदि वह आज एक देवता की पूजा करता है, कल किसी दूसरे की और परसों किसी तीसरे की, तो उसकी साधना स्थिर नहीं हो पाएगी।

महाराज जी कहते हैं कि भक्ति प्रेम का मार्ग है और प्रेम में स्थिरता आवश्यक है। जिस प्रकार सच्चे प्रेम में व्यक्ति अपने प्रिय के प्रति निष्ठावान रहता है, उसी प्रकार साधक को भी अपने इष्ट के प्रति अनन्य भाव रखना चाहिए।

जब साधक अपने गुरु, मंत्र और भगवान के नाम में दृढ़ श्रद्धा रखकर निरंतर साधना करता है, तभी उसकी भक्ति फल देती है।


प्रश्न 3: क्रोध और आवेश में क्या अंतर है?

उत्तर:
महाराज जी कहते हैं कि क्रोध और आवेश दोनों देखने में समान लग सकते हैं, लेकिन उनके स्वभाव और परिणाम बिल्कुल अलग होते हैं।

आवेश एक क्षणिक प्रतिक्रिया होती है। किसी घटना या परिस्थिति के कारण मन में थोड़ी देर के लिए तीव्र भाव उत्पन्न हो जाता है, लेकिन कुछ समय बाद वह शांत हो जाता है। इसमें व्यक्ति के हृदय में द्वेष नहीं रहता। कई बार संत और गुरु अपने शिष्यों को सुधारने के लिए आवेश का प्रदर्शन करते हैं, लेकिन उनके भीतर किसी के प्रति नफरत नहीं होती।

इसके विपरीत क्रोध एक स्थायी मानसिक अवस्था बन सकता है। क्रोध में व्यक्ति बार-बार उस घटना को याद करता है और उसके प्रति द्वेष तथा नफरत पाल लेता है। यह द्वेष धीरे-धीरे मनुष्य के मन को जलाता रहता है और उसे हिंसा तक पहुँचा सकता है।

महाराज जी कहते हैं कि क्रोध मनुष्य के लिए अत्यंत हानिकारक है। यह न केवल दूसरों को बल्कि स्वयं के हृदय को भी नुकसान पहुँचाता है। इसलिए साधक को क्रोध से बचना चाहिए और धैर्य तथा संयम का अभ्यास करना चाहिए।


प्रश्न 4: मन को निर्मल कैसे बनाया जा सकता है?

उत्तर:
महाराज जी कहते हैं कि मनुष्य के मन में जो अशुद्धि है, उसका कारण है मोह, ममता, छल, कपट और भोगों की वासनाएँ। जब मनुष्य का मन बार-बार संसार के विषयों में उलझता है, तो उसका मन मलिन हो जाता है।

मन को निर्मल करने का सबसे प्रभावी उपाय है भगवान का नाम-जप और सत्संग। जब साधक भगवान के नाम का निरंतर स्मरण करता है और संतों की वाणी सुनता है, तो उसके मन का मल धीरे-धीरे धुलने लगता है।

महाराज जी बताते हैं कि मन बहुत चंचल है। यदि एक क्षण के लिए भी सावधानी कम हो जाए तो मन तुरंत संसार की ओर भागने लगता है। इसलिए साधक को जीवन भर सतर्क रहना चाहिए और कभी भी अपने आप को पूर्ण सिद्ध नहीं मानना चाहिए।

जब साधक नाम-जप, सत्संग और भगवान की कथा का श्रवण करता है, तो उसका मन धीरे-धीरे निर्मल होने लगता है और उसी निर्मल मन में भगवान का निवास होता है।


प्रश्न 5: संचित कर्म केवल मनुष्य जन्म के ही होते हैं?

उत्तर:
महाराज जी बताते हैं कि संचित कर्म केवल मनुष्य जन्म में ही बनते हैं। अन्य योनियाँ जैसे पशु, पक्षी या कीट आदि भोग योनियाँ हैं। उन योनियों में जीव अपने पिछले कर्मों का फल भोगता है, लेकिन नए कर्म नहीं बनाता।

मनुष्य जीवन को इसलिए अत्यंत दुर्लभ कहा गया है क्योंकि यही वह अवस्था है जिसमें जीव को विवेक और निर्णय की शक्ति मिलती है। मनुष्य ही शुभ और अशुभ कर्म करने में सक्षम है। यही कारण है कि मनुष्य जीवन में किए गए कर्म भविष्य के जन्मों का कारण बनते हैं।

महाराज जी कहते हैं कि हम एक बार नहीं बल्कि अनगिनत बार मनुष्य जन्म ले चुके हैं। हर जन्म में यदि हम भोगों में उलझे रहे और भगवान का भजन नहीं किया, तो हमारे कर्मों का भंडार बढ़ता गया। यही संचित कर्म आगे चलकर हमें सुख और दुख के रूप में भोगने पड़ते हैं।

इसलिए मनुष्य जीवन का सही उपयोग भगवान के भजन में करना चाहिए।


प्रश्न 6: भोगों से विरक्ति होने का क्या अर्थ है?

उत्तर:
महाराज जी कहते हैं कि जब मनुष्य को संसार के भोगों में सुख दिखाई देना बंद हो जाता है, तब समझना चाहिए कि भगवान की विशेष कृपा हो रही है। सामान्य मनुष्य भोगों को ही सुख का साधन मानता है और उन्हीं में उलझा रहता है।

लेकिन जब साधक के भीतर वैराग्य उत्पन्न होता है, तो उसे समझ में आने लगता है कि संसार के भोग अस्थायी हैं। शरीर नश्वर है और उससे जुड़े हुए सुख भी क्षणिक हैं।

वैराग्य का अर्थ संसार से भागना नहीं बल्कि उसके वास्तविक स्वरूप को समझना है। जब साधक यह समझ लेता है कि भोगों में स्थायी सुख नहीं है, तब उसका मन भगवान के चिंतन की ओर मुड़ने लगता है।

महाराज जी कहते हैं कि जिस व्यक्ति के भीतर भोगों से विरक्ति उत्पन्न हो रही है, वह अत्यंत भाग्यशाली है। यह भगवान की कृपा का संकेत है।

प्रश्न 7: यदि कुसंग के कारण साधक से पाप या गलती हो जाए तो क्या करना चाहिए?

उत्तर:
महाराज जी बताते हैं कि साधक के जीवन में सबसे बड़ा खतरा कुसंग से होता है। कुसंग मनुष्य के विवेक को कमजोर कर देता है और वह वही काम कर बैठता है जिसे वह पहले गलत मानता था। कई बार साधक साधना के मार्ग पर चल रहा होता है, लेकिन गलत संगति में पड़कर उससे कोई अपराध या पाप बन जाता है।

ऐसी स्थिति में सबसे बड़ी भूल यह होती है कि साधक निराश हो जाए और यह सोच ले कि अब उसका कल्याण नहीं हो सकता। महाराज जी कहते हैं कि ऐसा नहीं सोचना चाहिए। यदि गलती हो जाए तो तुरंत भगवान का आश्रय लेना चाहिए और पुनः भजन में लग जाना चाहिए।

भगवान का नाम इतना शक्तिशाली है कि वह पाप को भी नष्ट कर देता है और पाप की प्रवृत्ति को भी समाप्त कर देता है। इसलिए साधक को चाहिए कि वह अपने अपराध के लिए भीतर से पश्चाताप करे और दृढ़ निश्चय करे कि आगे ऐसी गलती नहीं होगी।

निराश होने की बजाय भजन में दृढ़ता ही साधक का वास्तविक उपाय है।


प्रश्न 8: यदि साधक बार-बार गिर जाए तो क्या उसे भक्ति मार्ग छोड़ देना चाहिए?

उत्तर:
महाराज जी कहते हैं कि भक्ति मार्ग में गिरना कोई असामान्य बात नहीं है। साधक जब संसार के भोगों से लड़ते हुए भगवान की ओर बढ़ता है, तो कई बार उसकी पुरानी वासनाएँ उसे नीचे खींचने लगती हैं।

लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि साधक का मार्ग समाप्त हो गया। महाराज जी कहते हैं कि जो व्यक्ति भगवान की ओर चल पड़ा है, उसका पतन नहीं हो सकता। यदि वह गिर भी जाता है तो भी उसका भजन व्यर्थ नहीं जाता।

साधक को चाहिए कि वह निराश न होकर पुनः भगवान का नाम जप शुरू कर दे। जैसे कोई बच्चा चलना सीखते समय कई बार गिरता है, लेकिन अंततः चलना सीख ही जाता है, उसी प्रकार साधक भी अभ्यास से आगे बढ़ता है।

महाराज जी कहते हैं कि भगवान का मार्ग छोड़ देना सबसे बड़ी भूल है। जो व्यक्ति गिरकर भी फिर उठकर भगवान की ओर चलता है, अंततः वही भगवान को प्राप्त करता है।


प्रश्न 9: भगवान सबको मोक्ष देकर नरक से क्यों नहीं बचा लेते?

उत्तर:
महाराज जी बताते हैं कि भगवान करुणामय अवश्य हैं, लेकिन संसार एक दिव्य लीला है। इस लीला में जीव अपने कर्मों के अनुसार सुख और दुख का अनुभव करता है।

जब जीव भगवान से विमुख होकर स्वयं को कर्ता और भोगता मान लेता है, तब उसे अपने कर्मों का फल भोगना पड़ता है। यही कारण है कि स्वर्ग और नरक की अवस्थाएँ उत्पन्न होती हैं।

लेकिन यदि वही जीव भगवान की शरण में आ जाए और यह स्वीकार कर ले कि सब कुछ भगवान की इच्छा से हो रहा है, तब उसका बंधन समाप्त हो सकता है।

महाराज जी कहते हैं कि भगवान किसी को बाध्य नहीं करते। वे जीव को स्वतंत्रता देते हैं। जो जीव भगवान की ओर मुड़ता है, उसका कल्याण निश्चित हो जाता है।


प्रश्न 10: दूसरों की सकारात्मक या नकारात्मक बातों से प्रभावित होने से कैसे बचें?

उत्तर:
महाराज जी कहते हैं कि यदि हम संसार की बातों से प्रभावित होते रहेंगे तो जीवन भर शांति नहीं मिलेगी। संसार में हर व्यक्ति की अलग-अलग राय होती है। कोई हमें अच्छा कहेगा और कोई बुरा।

यदि हम हर किसी की बात को अपने मन पर लेने लगें, तो हमारा मन हमेशा अशांत रहेगा। इसलिए साधक को चाहिए कि वह दूसरों की बातों की चिंता छोड़कर भगवान के नाम में मन लगाए।

महाराज जी एक उदाहरण देते हैं कि संसार कभी भी किसी को संतुष्ट नहीं होने देता। यदि हम दूसरों की अपेक्षाओं के अनुसार चलना चाहें, तो भी आलोचना से नहीं बच सकते।

इसलिए सबसे अच्छा उपाय है कि मनुष्य अपने कर्तव्य को ईमानदारी से करे और भगवान का स्मरण करता रहे।


प्रश्न 11: प्रेम का आनंद क्या होता है?

उत्तर:
महाराज जी कहते हैं कि प्रेम का आनंद शब्दों में व्यक्त नहीं किया जा सकता। यह अनुभव का विषय है। जैसे किसी व्यक्ति को मिठाई का स्वाद समझाने के लिए हम शब्दों का उपयोग करते हैं, लेकिन जब तक वह स्वयं मिठाई नहीं चखेगा, तब तक उसकी वास्तविक मिठास को नहीं समझ सकता।

भगवत प्रेम भी ऐसा ही अनुभव है। इसे केवल वही समझ सकता है जिसके हृदय में भगवान के प्रति सच्चा प्रेम उत्पन्न हो गया हो।

महाराज जी बताते हैं कि यह प्रेम धीरे-धीरे भजन, सत्संग और भगवान के नाम के अभ्यास से उत्पन्न होता है। जब साधक निरंतर भगवान का नाम जपता है और संतों का संग करता है, तब उसके हृदय में प्रेम का अंकुर फूटने लगता है।

यह प्रेम धीरे-धीरे बढ़ता जाता है और अंततः साधक के जीवन को आनंद से भर देता है।


प्रश्न 12: यदि साधक भक्ति करते हुए भी भ्रष्ट हो जाए तो उसकी क्या गति होती है?

उत्तर:
महाराज जी कहते हैं कि भगवान का भजन करने वाला कभी भी पूर्ण रूप से पतित नहीं होता। यदि कोई साधक भजन करते-करते किसी कारणवश भ्रष्ट हो जाए, तो भी उसका भजन नष्ट नहीं होता।

भगवान का नाम जपने से जो पुण्य संचित होता है, वह उसके जीवन में बना रहता है। यदि वह साधक अपने लक्ष्य को प्राप्त नहीं कर पाया, तो भी अगले जन्म में उसे ऐसे वातावरण में जन्म मिलता है जहाँ भक्ति करना आसान हो।

महाराज जी बताते हैं कि उसका जन्म किसी पवित्र और समृद्ध परिवार में हो सकता है जहाँ उसे सत्संग और भक्ति का अवसर मिले।

इस प्रकार भगवान के मार्ग पर चलने वाला व्यक्ति कभी भी अधोगति को प्राप्त नहीं होता।


प्रश्न 13: शरणागति मार्ग और साधन मार्ग में क्या अंतर है?

उत्तर:
महाराज जी बताते हैं कि साधन मार्ग में साधक अपने प्रयासों के द्वारा भगवान तक पहुँचने का प्रयास करता है। वह नियम, तप, जप और साधना के द्वारा धीरे-धीरे आगे बढ़ता है।

लेकिन शरणागति मार्ग में साधक स्वयं को पूरी तरह भगवान को समर्पित कर देता है। वह यह मान लेता है कि उसके पास अपनी शक्ति से कुछ करने की क्षमता नहीं है और भगवान ही उसका कल्याण करेंगे।

महाराज जी कहते हैं कि दोनों मार्ग सही हैं, लेकिन शरणागति का मार्ग अत्यंत गहरा और दुर्लभ है। जब साधक सच्चे मन से भगवान की शरण में जाता है, तब भगवान स्वयं उसकी रक्षा करते हैं।


प्रश्न 14: भगवान शरणागत की रक्षा कैसे करते हैं?

उत्तर:
महाराज जी कहते हैं कि जो व्यक्ति सच्चे मन से भगवान की शरण में आता है, उसकी रक्षा स्वयं भगवान करते हैं।

कभी-कभी भगवान अपने भक्त को कठिन परिस्थितियों से भी गुजारते हैं, लेकिन उनका उद्देश्य भक्त को गिराना नहीं बल्कि उसके अहंकार को समाप्त करना होता है।

जब भक्त यह समझ लेता है कि वह स्वयं कुछ नहीं कर सकता और सब कुछ भगवान की कृपा से ही संभव है, तब उसका हृदय पूर्ण रूप से भगवान की ओर मुड़ जाता है।


प्रश्न 15: अंदर की शांति संघर्ष से आती है या स्वीकार करने से?

उत्तर:
महाराज जी कहते हैं कि वास्तविक शांति न तो संघर्ष से आती है और न केवल स्वीकार करने से। वास्तविक शांति ज्ञान से आती है।

जब मनुष्य यह समझ लेता है कि संसार की घटनाएँ उसके कर्मों के अनुसार घटित हो रही हैं और भगवान की इच्छा के बिना कुछ नहीं होता, तब उसके भीतर शांति उत्पन्न होती है।


प्रश्न 16: सिद्ध पुरुष और साधक में क्या अंतर है?

उत्तर:
महाराज जी बताते हैं कि साधक अपने विवेक और अभ्यास से मन को नियंत्रित करता है, जबकि सिद्ध पुरुष स्वाभाविक रूप से भगवान में स्थित रहता है।

सिद्ध पुरुष के लिए संसार की परिस्थितियाँ उसे विचलित नहीं करतीं।


प्रश्न 17: नाम जप में अलग-अलग स्वरूप क्यों दिखाई देते हैं?

उत्तर:
महाराज जी कहते हैं कि जिस नाम का जप किया जाता है, उसी के अनुरूप भगवान का स्वरूप प्रकट होता है।

यदि साधक “राम” नाम का जप करता है तो उसके ध्यान में भगवान राम का स्वरूप आता है और यदि “राधा” नाम का जप करता है तो राधा जी का स्वरूप प्रकट होता है।


प्रश्न 18: क्या नाम जप से रजोगुण और तमोगुण समाप्त हो सकते हैं?

उत्तर:
महाराज जी कहते हैं कि भगवान के नाम में इतनी शक्ति है कि वह मनुष्य को त्रिगुणातीत अवस्था तक पहुँचा सकता है।

निरंतर नाम जप से मनुष्य के भीतर के दोष धीरे-धीरे समाप्त होने लगते हैं।


प्रश्न 19: यदि साधक इस जन्म में भगवत प्राप्ति न कर पाए तो क्या होगा?

उत्तर:
महाराज जी कहते हैं कि भगवान के मार्ग पर चलने वाला प्रयास कभी व्यर्थ नहीं जाता। यदि वह इस जन्म में भगवान को प्राप्त नहीं कर पाया, तो अगले जन्म में उसे भक्ति के लिए अनुकूल परिस्थितियाँ मिलती हैं।


प्रश्न 20: यदि वीर्य का नाश स्वतः हो जाए तो क्या उसे ब्रह्मचर्य भंग माना जाएगा?

उत्तर:
महाराज जी बताते हैं कि यदि यह स्वाभाविक रूप से हो जाए और उसके पीछे कोई काम विचार या गलत आचरण न हो, तो उसे ब्रह्मचर्य भंग नहीं माना जाता।

लेकिन यदि यह गलत आदतों या काम विचारों के कारण हो रहा है, तो उससे बचने के लिए संयम, व्यायाम और शुद्ध जीवन आवश्यक है।

Credit:
“यह लेख संत श्री प्रेमानंद जी महाराज के एकान्तिक वार्तालाप प्रवचन की अमृत वाणी पर आधारित है।”

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