प्रश्न 1: क्या इस कलयुग में भगवान अवतार लेंगे?
उत्तर:
श्री प्रेमानंद महाराज जी बताते हैं कि शास्त्रों में स्पष्ट वर्णन है कि कलयुग के अंत में भगवान कल्कि अवतार लेकर प्रकट होंगे। लेकिन अभी जो समय चल रहा है, वह कलयुग की प्रारंभिक अवस्था है। कलयुग की आयु 4,32,000 वर्ष बताई गई है और अभी तो लगभग पाँच हजार वर्ष ही हुए हैं। आगे चलकर जब पापाचार इतना बढ़ जाएगा कि राम-नाम सुनाई नहीं देगा, जब भाई-बहन और माता-पिता के संबंधों की मर्यादा टूट जाएगी, तब भगवान अवतार लेंगे।
लेकिन महाराज जी कहते हैं कि कलयुग का एक महान गुण भी है — जो फल पहले हजारों वर्षों की तपस्या से मिलता था, वह अब नाम-जप से मिल सकता है। इसलिए अवतार की प्रतीक्षा करने से अधिक आवश्यक है कि हम अभी से नाम-जप करें। “कलयुग केवल नाम आधार” — यही इस युग की महिमा है।
प्रश्न 2: काम, क्रोध, लोभ, मोह जैसे विकारों पर विजय कैसे मिले?
उत्तर:
महाराज जी स्पष्ट कहते हैं कि ये विकार अत्यंत बलवान हैं। भगवान शंकर की समाधि को भी कामदेव विचलित कर सकते हैं, तो सामान्य मनुष्य की क्या बात! इसलिए अपनी शक्ति से इन पर विजय संभव नहीं है। केवल भगवान की कृपा से ही इन पर विजय मिलती है।
महाराज जी समझाते हैं कि हर विकार के पीछे “सुख बुद्धि” छिपी होती है। हमें लगता है कि इसमें सुख है, इसलिए हम हार जाते हैं। जब विवेक जागता है और यह समझ आता है कि इन विषयों में स्थायी सुख नहीं है, तब वैराग्य उत्पन्न होता है।
इसलिए उपाय है — नाम जप, सत्संग और सात्त्विक भोजन। धीरे-धीरे मन की प्रवृत्ति बदलती है और भोगों से अरुचि होने लगती है। महाराज जी कहते हैं, “हारना नहीं है, भगवान की शरण में रहकर लड़ते रहो।”
प्रश्न 3: अध्यात्म क्या स्वतः प्रकट होता है या प्रयास का मार्ग है?
उत्तर:
महाराज जी कहते हैं कि अध्यात्म अपने आप प्रकट नहीं होता। यदि स्वतः प्रकट होता तो हर व्यक्ति अध्यात्म में स्थित हो जाता। विषयों में गिरना स्वाभाविक है, लेकिन अध्यात्म की ओर चढ़ना पड़ता है।
अध्यात्म उर्ध्वगामी है और विषय अधोगामी। विषयों में मन स्वयं चला जाता है, पर भगवान की ओर मन को ले जाना पड़ता है। इसके लिए जिद्दी स्वभाव चाहिए — “मर जाऊँगा पर भजन नहीं छोड़ूँगा।”
महाराज जी अपने जीवन का उदाहरण देते हैं कि कठिन तप, त्याग और निरंतर साधना के बाद अध्यात्म में स्थिरता आती है। यह मार्ग सुखद परिणाम देता है, पर यात्रा कठिन है। इसलिए प्रयास, सहनशीलता और गुरु-कृपा अनिवार्य हैं।
प्रश्न 4: गुरु आज्ञा में दृढ़ निष्ठा कैसे आए?
उत्तर:
महाराज जी कहते हैं कि जब लक्ष्य भगवत प्राप्ति का दृढ़ हो जाता है, तब गुरु आज्ञा का पालन सहज हो जाता है। जैसे किसी को बांके बिहारी जी के दर्शन की तीव्र लालसा हो, तो वह मार्गदर्शक के बताए रास्ते पर बिना तर्क किए चलता है।
जो व्यक्ति भोग और ऐश्वर्य में आसक्त है, वह गुरु की आज्ञा का पालन नहीं कर सकता। पर जिसने सत्संग से मुमुक्षता प्राप्त की है, वह गुरु वचन को जीवन बना लेता है।
गुरु की आज्ञा शास्त्र-सम्मत होती है। भीतर की आत्मा भी संकेत देती है कि क्या उचित है। यदि हम अंतर्मुख होकर सुनें, तो तुरंत उत्तर मिल जाता है। लेकिन मनमानी करने से भ्रम होता है। इसलिए गुरु की आज्ञा ही मार्ग है।
प्रश्न 5: जब मन हठी होकर किसी विषय को पकड़ ले तो क्या करें?
उत्तर:
महाराज जी कहते हैं कि मन बहुत हठीला है। यदि उसने विषय पकड़ लिया तो छोड़ता नहीं। लेकिन इसी स्वभाव का उपयोग भजन में किया जा सकता है।
मन अंधा बलवान है, बुद्धि उसकी आँख है। यदि बुद्धि विवेकपूर्ण हो जाए तो मन को भगवान की ओर मोड़ा जा सकता है। सत्संग से विवेक जागता है और नाम-जप से मन शुद्ध होता है।
महाराज जी कहते हैं — “मन को राधा नाम पकड़ाओ।” एक बार मन भगवान में लग गया तो वही हठ उसे छोड़ने नहीं देगा। इसलिए निरंतर नाम-स्मरण ही उपाय है।
प्रश्न 6: बच्चों के पालन-पोषण में कब तक टोकें और कब प्रभु पर छोड़ दें?
उत्तर:
महाराज जी स्पष्ट कहते हैं कि गृहस्थ का कर्तव्य है अपने बच्चों को सही मार्ग पर चलाना। यह कहना कि “सब प्रभु पर छोड़ दिया” — यह विरक्त संतों के लिए हो सकता है, गृहस्थ के लिए नहीं। जिस कथा का उदाहरण दिया जाता है कि संत ने डंडा उठा लिया तो भगवान शांत हो गए — वह संत की स्थिति अलग थी।
गृहस्थ माता-पिता का धर्म है कि वे बच्चों को अनुशासन सिखाएँ, उन्हें पढ़ाएँ, डाँटें भी यदि आवश्यक हो, और उन्हें समाज व राष्ट्र का योग्य नागरिक बनाएँ। महाराज जी कहते हैं कि प्रेम और अधिकार दोनों से बच्चों का निर्माण करना चाहिए।
कर्तव्य से भागना भक्ति नहीं है। जो जिम्मेदारी भगवान ने दी है, उसका पालन करना ही सच्ची पूजा है। इसलिए बच्चों को सुधारना, समझाना और सतमार्ग में लगाना माता-पिता का धर्म है।
प्रश्न 7: भगवान अपने भक्त का भरोसा नहीं तोड़ते — ऐसा अटूट विश्वास कैसे आए?
उत्तर:
महाराज जी कहते हैं कि विश्वास का मूल है शरणागति। भाव यह होना चाहिए — “प्रभु, मुझे नहीं पता मेरे लिए क्या अच्छा है, आप जानते हैं। जैसा मेरा मंगल हो, वैसा कर दीजिए।”
चरित्र पवित्र होना चाहिए। यदि आचरण दूषित है और हम केवल मुख से भक्ति करते हैं, तो विश्वास दृढ़ नहीं होगा। सात्त्विक भोजन, शुद्ध व्यवहार और नाम-जप से भीतर शांति आती है।
महाराज जी समझाते हैं कि विश्वास कोई तर्क से नहीं आता, वह अनुभव से आता है। जब हम बार-बार देखेंगे कि भगवान विपत्ति में भी संभाल लेते हैं, तब भरोसा अटूट हो जाएगा।
प्रश्न 8: मुक्ति भगवान देते हैं या कर्म से मिलती है?
उत्तर:
महाराज जी किसान का उदाहरण देते हैं। भगवान ने हमें मनुष्य जन्म दिया, पाप और पुण्य के बीज दिए। अब क्या बोना है, यह हमारी स्वतंत्रता है।
अन्य योनियों में जीव केवल फल भोगता है, लेकिन मनुष्य योनि में कर्म करने की स्वतंत्रता है। यदि हम पाप करेंगे तो फल भोगना पड़ेगा, पुण्य करेंगे तो भी फल मिलेगा।
परंतु जब हम पूर्ण शरणागत हो जाते हैं और अहंकार भगवान को समर्पित कर देते हैं, तब कर्म भागवत कर्म बन जाते हैं। तब मुक्ति की दिशा खुलती है। इसलिए निर्णय हमारा है — संसार में घूमना है या भगवान को पाना है।
प्रश्न 9: क्या सभी शिष्यों को गुरु साधना से भगवत प्राप्ति हो जाती है?
उत्तर:
महाराज जी कहते हैं कि सच्चा भजन कभी व्यर्थ नहीं जाता। यदि इस जन्म में सिद्धि न मिले, तो अगला जन्म अनुकूल मिलता है।
योगभ्रष्ट साधक दो प्रकार के होते हैं — एक जो भोगों में गिर जाते हैं, दूसरे जो प्रयासरत रहते हुए भी पूर्ण सिद्धि नहीं पाते। दोनों का कल्याण होता है।
अंतिम समय में भगवान करुणा करते हैं। यदि साधक ने जीवन भर प्रयास किया है, तो भगवान उसका हाथ पकड़ लेते हैं। इसलिए प्रयास कभी व्यर्थ नहीं जाता।
प्रश्न 10: आपको लक्ष्य की प्राप्ति कैसे हुई?
उत्तर:
महाराज जी अत्यंत विनम्रता से कहते हैं — “मेरी कोई साधना नहीं, सब गुरु-कृपा है।”
वे स्वयं को तिनके के समान बताते हैं जिसे कृपा रूपी वायु जहाँ चाहती है, उड़ा देती है। जो भी गुण दिखते हैं, वे गुरुदेव की कृपा से हैं।
अहंकार मिटे बिना कुछ नहीं होता। गुरु हमारे अभिमान को तोड़ते हैं। जब अभिमान नष्ट हो जाता है, तब जन्म-मरण का चक्र भी समाप्त हो जाता है।
प्रश्न 11: गुरु वचन बड़ा या शास्त्र वचन?
उत्तर:
महाराज जी कहते हैं कि शास्त्र का रहस्य समझना कठिन है। गुरु वही रहस्य सरल करके जीवन में उतारते हैं।
यदि गुरु में निष्ठा है, तो गुरु वचन ही मार्ग है। संतों से तुलना या पुष्टिकरण की इच्छा श्रद्धा को कमजोर कर सकती है।
सच्चा समर्पण वही है जहाँ प्रश्न समाप्त हो जाए। “मैं बिक गया हूँ” — यह भाव ही वास्तविक शिष्यत्व है।
प्रश्न 12: साधन कभी सरल, कभी कठिन क्यों बताया जाता है?
उत्तर:
महाराज जी कहते हैं कि प्रारंभिक साधक को प्रोत्साहन चाहिए, इसलिए कहा जाता है कि एक बार नाम लेने से भी मंगल है।
मध्य साधक को कसौटी पर कसा जाता है — मनोनिग्रह और इंद्रियनिग्रह आवश्यक है।
उत्तम साधक के लिए 24 घंटे स्मरण आवश्यक है। इसलिए उपदेश अधिकारी के अनुसार होता है।
प्रश्न 13: आत्मभाव में स्थिर कैसे रहें?
उत्तर:
महाराज जी जड़ भरत जी का उदाहरण देते हैं। उन्होंने राज्य त्याग दिया, फिर हिरण से आसक्ति हुई और गिर गए।
भजन के बिना आत्मभाव स्थिर नहीं होता। संत संग, शास्त्र अध्ययन और नाम-जप से मन शुद्ध होता है।
स्थिति ऊँची है, पर मार्ग स्पष्ट है — निरंतर भजन।
प्रश्न 14: वृंदावन वास के लिए पात्रता क्या है?
उत्तर:
महाराज जी कहते हैं कि दो प्रकार के अधिकारी हैं — सिद्ध पुरुष और शरणागत बच्चे।
वृंदावन भव रोग का अस्पताल है। जैसे माँ मलिन बच्चे को भी गोद में उठा लेती है, वैसे ही वृंदावन अधमों को भी स्वीकार करता है।
अधिकार से वास करना अलग है, शरणागत बनकर रहना अलग। दोनों मार्ग पूर्ण हैं।
प्रश्न 15: जीवन भर ब्रह्मचर्य व्रत उचित है?
उत्तर:
महाराज जी कहते हैं कि ब्रह्मचर्य उत्तम है, पर उसका फल तभी है जब भगवान का स्मरण निरंतर हो।
यदि स्मरण नहीं, तो व्रत केवल पुण्य देगा, भगवत प्राप्ति नहीं।
हर साधन का सार भगवान का नाम है।
प्रश्न 16: गुरु के सानिध्य में कब तक रहें?
उत्तर:
दो स्थितियाँ हैं — या तो गुरु आज्ञा दें कि जाओ, या गुरु-शिष्य का भेद मिट जाए।
गुरु आज्ञा सर्वोपरि है। बिना आज्ञा के अलग होना अहंकार का खेल है।
गुरु-कृपा ही साधना को पचाती है और सुरक्षित रखती है।
प्रश्न 17: क्या मंत्र मिल जाने के बाद गुरु अधीनता आवश्यक है?
उत्तर:
महाराज जी कहते हैं कि मंत्र मिल जाना पर्याप्त नहीं। गुरु अधीनता न हो तो अहंकार साधना को भ्रष्ट कर देता है।
गुरु-कृपा से ही माया के खेल से बचाव होता है।
प्रश्न 18: मानसिक पाप का क्या प्रभाव है?
उत्तर:
महाराज जी कहते हैं कि कलयुग में मानसिक पाप का उतना फल नहीं जब तक वह क्रिया में न उतरे।
लेकिन संतों के प्रति दोष अत्यंत गंभीर है। वैष्णव अपराध भक्ति को नष्ट कर देता है।
इसलिए सावधान रहना चाहिए — नाम जप ही रक्षा है।
Credit:
“यह लेख संत श्री प्रेमानंद जी महाराज के एकान्तिक वार्तालाप प्रवचन की अमृत वाणी पर आधारित है।”
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