माला-1197:क्या भक्ति केवल विपत्ति में आती है? श्री प्रेमानंद महाराज जी के अमृत वचनों से नाम जप महिमा

1️⃣ प्रश्न: महाराज जी, क्या हमारा भी चरित्र गाया जाए — यह भावना उचित है?

उत्तर:

महाराज जी इस भावना को बहुत सूक्ष्मता से पकड़ते हैं। जब हम मीरा, शबरी, कर्माबाई जैसे भक्तों की कथा सुनते हैं तो भीतर एक चाह उठती है कि “कभी हमारा भी चरित्र गाया जाए।” पर महाराज जी कहते हैं — यह भावना भक्ति की नहीं, देहाभिमान की गंध लिए हुए है।

यह शरीर नाशवान है। आज लोग वाहवाही करेंगे, कल सब मिट्टी में मिल जाएगा। बड़े-बड़े सम्राट, वीर, विद्वान हुए — आज केवल कागज़ों में नाम रह गया। यदि हमारा चरित्र गाया भी गया तो उससे क्या लाभ? क्या उससे भगवान मिल जाएंगे?

सच्चे भक्त कभी अपने को भक्त नहीं मानते। हनुमान जी अपने को अधम कहते हैं। शबरी स्वयं को अति नीच मानती हैं। जहाँ दैन्य है, वहीं भगवान का दरबार है।

इसलिए प्रार्थना यह होनी चाहिए — “हे प्रभु! मेरा देहाभिमान मिटा दो। भक्तों का चरित्र सुनकर मेरे हृदय में भक्ति जागे, मैं आपके लिए रो सकूँ।”

जब देहाभिमान पूर्णतः गल जाता है, तब व्यक्ति चरित्र गाने योग्य होता है। जब तक “मेरा नाम हो” यह भाव है, तब तक पात्रता नहीं। इस दरबार में दीन को आदर है, अभिमानी को नहीं।


2️⃣ प्रश्न: महाराज जी,“आपो त्याग जगत में बैठे…” — इसका क्या अर्थ है?

उत्तर:

महाराज जी बताते हैं कि “आपो त्याग” का अर्थ है — देहाभिमान का पूर्ण त्याग। जब व्यक्ति के भीतर से “मैं करता हूँ”, “मैं भोगता हूँ” यह भाव समाप्त हो जाता है, तब वह कठपुतली की तरह भगवान के संकेत पर चलता है।

ऐसे संत जगत में रहते हुए भी किसी से कोई काम नहीं रखते। उनका अपना कोई स्वार्थ नहीं रहता। वे न कर्ता हैं, न भोक्ता। वे केवल भगवान की इच्छा के अनुसार चल रहे हैं।

ऐसी अवस्था में संत और भगवान में भेद नहीं रहता। संत का मन, बुद्धि, चित्त सब भगवान में लीन हो जाता है। बाहर से वे साधारण दिखते हैं, पर भीतर निरंतर भगवत प्रकाश चमकता है।

लोक में लोग अहंकार को सुख मानते हैं — सम्मान, प्रतिष्ठा, पद। पर यह सब अंत में शोक देता है। जिसने अपनी हस्ती मिटा दी, वही सच्चिदानंद को प्राप्त करता है।

ऐसे निराभिमानी संत दुर्लभ हैं। उनका संग महा सौभाग्य है। उनमें और भगवान में अंतर नहीं कहा गया — क्योंकि उनका अस्तित्व भगवान में लीन हो चुका है।


3️⃣ प्रश्न: महाराज जी, क्या भक्ति केवल विपत्ति में आती है?

उत्तर:

महाराज जी स्पष्ट करते हैं — यह कोई नियम नहीं कि केवल दुखी व्यक्ति ही भगवान की शरण में जाए। अमरीश जी जैसे भक्तों को कौन-सी विपत्ति थी? वे ऐश्वर्यवान थे, फिर भी महान भक्त थे।

हाँ, कभी-कभी ऐसा होता है कि जब व्यक्ति संसार में ठोकरें खाता है, कोई सहारा नहीं मिलता, तब उसे भगवान की शरण याद आती है। बिल्वमंगल जी का उदाहरण इसी प्रकार है।

पर भक्ति का मूल कारण दुख नहीं, सत्संग है। “बिनु सत्संग न पावे प्राणी।” सत्संग से ही हृदय में भगवत प्रेम का बीज पड़ता है।

विपत्ति एक अवसर हो सकती है, पर अनिवार्य कारण नहीं। सुख में भी भक्ति हो सकती है, यदि सत्संग मिले।

अंततः भक्ति स्वतंत्र है। वह किसी एक परिस्थिति पर निर्भर नहीं। उसका मूल है — संतों का संग, नाम जप और भगवान का आश्रय।


4️⃣ प्रश्न: यदि प्रकट गुरु न हो तो क्या करें?

उत्तर:

महाराज जी कहते हैं — भगवान ही जगतगुरु हैं। यदि किसी को अभी तक प्रकट गुरु नहीं मिला, तो भगवान को ही गुरु मान ले।

श्री कृष्ण से प्रार्थना करो — “हे नाथ! यदि मुझे प्रकट गुरु की आवश्यकता है तो आप ही किसी रूप में आ जाएँ। या मुझे अपने पास बुला लें। मैं मन, वचन, कर्म से आपका आश्रित हूँ।”

जब यह सच्ची पुकार होती है, तब भगवान स्वयं गुरु का संयोग करा देते हैं।

वास्तव में व्यक्ति गुरु नहीं होता, परमात्मा ही गुरु हैं। वे ही मोक्ष देते हैं। कोई व्यक्ति केवल भगवान की बात बता सकता है, पर अंतिम कल्याण भगवान ही करते हैं।

इसलिए निराश न हों। भगवान का आश्रय लें। वे स्वयं मार्ग बना देंगे।


5️⃣ प्रश्न: आंतरिक विरह की अवस्था कैसे आए?

उत्तर:

महाराज जी कहते हैं — यह अवस्था नाम जप से आती है। जितना अधिक नाम जप करेंगे, उतनी ही भीतर से एकांत की चाह बढ़ेगी।

धीरे-धीरे मन को लोगों से मिलने, बात करने में रुचि कम होगी और प्रभु से मिलने की तड़प बढ़ेगी।

यह तड़प कोई कृत्रिम नहीं होती। यह भीतर से उठती है। जैसे भोरी सखी के पद में कहा गया — ऐसा दुख दो कि आपके सिवा कुछ अच्छा न लगे।

यह महा प्रेमियों की अवस्था है। पर उसका मूल भी नाम ही है।

कलियुग में अन्य साधन कठिन हैं। न ध्यान टिकता है, न यज्ञ शुद्धता से संभव है। पर नाम जप हर समय संभव है।

नाम ही वह शक्ति है जो प्रेम, विरह, आनंद सब देता है। इसलिए महाराज जी बार-बार कहते हैं — खूब नाम जप करो।


6️⃣ प्रश्न: मृत्यु का भय क्यों और निर्भयता कैसे?

उत्तर:

महाराज जी कहते हैं — मृत्यु का भय इसलिए है क्योंकि हम शरीर से प्रेम करते हैं। जबकि हमारा वास्तविक स्वरूप अविनाशी है।

भगवान कहते हैं — “मम अंश।” हम अविनाशी के अंश हैं, इसलिए विनाश पसंद नहीं करते। पर शरीर पंचभूतों का बना है, वह नष्ट होगा ही।

मृत्यु वास्तव में परिवर्तन है। जीवात्मा को कोई मार नहीं सकता।

जब तक देहाभिमान है, भोगों में आसक्ति है, तब तक मृत्यु का भय रहेगा।

निर्भयता ज्ञान से आती है, और ज्ञान शुद्ध बुद्धि से। शुद्ध बुद्धि नाम जप से आती है।

जितना अधिक नाम जप करेंगे, उतनी ही बुद्धि निर्मल होगी। निर्मल बुद्धि में ज्ञान प्रकट होगा। तब मृत्यु भयावह नहीं लगेगी, बल्कि महोत्सव बन जाएगी।

भगवान का आश्रय लेने से, नाम जप करने से, मृत्यु का भय मिट सकता है।

Credit:
“यह लेख संत श्री प्रेमानंद जी महाराज के एकान्तिक वार्तालाप प्रवचन की अमृत वाणी पर आधारित है।”

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