माला-1194:क्या आत्मा को कुछ पाना है या आत्मा पूर्ण है?श्री प्रेमानंद महाराज जी के अमृत वचनों से नाम जप महिमा

1️⃣ प्रश्न: क्या आत्मा को कुछ पाना है या आत्मा पूर्ण है? फिर उसे करना क्या है?

उत्तर:
महाराज जी बहुत स्पष्ट कहते हैं — आत्मा को कुछ पाना नहीं है। आत्मा स्वयं पूर्ण है, निर्विकार है, आनंद का समुद्र है। वह चैतन्य घन है। उसे किसी क्रिया, किसी फल, किसी उपलब्धि की आवश्यकता नहीं।

समस्या आत्मा में नहीं, हमारी भूल में है। हम आत्मा होते हुए भी अपने को देह मान बैठे। पंचभूत से बने इस शरीर को “मैं” मान लिया और शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गंध — इन विषयों में सुख खोजने लगे। यही भूल है।

आत्मा को करना कुछ नहीं है, पर हमें करना है — भूल को मिटाना। इच्छा का त्याग करना। “मुझे यह चाहिए, मुझे वह चाहिए” — यही बंधन है।

जब यह भाव आ जाए कि “मुझे कुछ नहीं चाहिए, जो प्रारब्ध है वही होगा, मैं तो आनंद स्वरूप हूँ” — तब आत्मस्वरूप की ओर बढ़ना प्रारंभ होता है।

पर यह केवल कहने की बात नहीं है। विषयों का आकर्षण बहुत गहरा है। इसलिए गुरु चरणों का आश्रय लेकर, नाम जप करके, बुद्धि शुद्ध करके ही आत्मानुभूति संभव है।


2️⃣ प्रश्न: यदि आत्मा कभी बंधन में थी ही नहीं, तो बंधन अनुभव क्यों होता है?

उत्तर:
महाराज जी कहते हैं — आत्मा का कभी बंधन हुआ ही नहीं। न पहले था, न अभी है, न आगे होगा। बंधन केवल भ्रम है।

जैसे सूर्य बादलों से ढक जाता है तो लगता है सूर्य छिप गया, जबकि सूर्य वहीं है। ऐसे ही आत्मा शुद्ध है, पर गुणों का आवरण पड़ गया।

इच्छा ही बंधन है। भोगों की चाह ही बंधन है। विषयों में आसक्ति ही बंधन है।

निर्विकार का विकारयुक्त हो जाना — यही बंधन है।

जब हम कहते हैं “मैं कर्ता हूँ, मैं भोगता हूँ” — यही अज्ञान है।

इस भ्रम को मिटाने के लिए गुरु की आराधना आवश्यक है। ज्ञान रूपी अंजन से आँख खुलती है। तभी समझ में आता है — बंधन कभी था ही नहीं।


3️⃣ प्रश्न: रजोगुण, तमोगुण और सतोगुण का जीवन पर क्या प्रभाव है?

उत्तर:
महाराज जी त्रिगुणों की बहुत सूक्ष्म व्याख्या करते हैं।

रजोगुण प्रवृत्ति में लगाता है। “यह करूँ, वह करूँ” — यह चंचलता, लोभ, कामना, क्रोध — सब रजोगुण से आते हैं। यही जीव को कर्म में बाँधता है।

तमोगुण अज्ञान, आलस्य, प्रमाद, विपरीत बुद्धि देता है। जो ठीक है वह गलत लगे, जो गलत है वह ठीक लगे — यह तमोगुण है। भजन को टालना, अच्छे कार्यों को कल पर रखना — यह तमोगुण है।

सतोगुण शांति देता है। निर्मलता देता है। सत्य, ब्रह्मचर्य, श्रद्धा, नियम — यह सतोगुण के लक्षण हैं।

महाराज जी कहते हैं — रजोगुण और तमोगुण त्याज्य हैं, सतोगुण ग्राह्य है।

पर अंत में सतोगुण का भी अतिक्रमण करना है। सतोगुण सीढ़ी है, अंतिम मंज़िल नहीं।


4️⃣ प्रश्न: क्या भोजन का साधना पर प्रभाव पड़ता है?

उत्तर:
महाराज जी स्पष्ट कहते हैं — भोजन का बहुत गहरा प्रभाव पड़ता है।

राजसिक और तामसिक भोजन मन को विक्षिप्त करता है। काम, क्रोध, लोभ, ईर्ष्या बढ़ाता है।

बाजारू भोजन, अत्यधिक तीखा, बासी, हिंसात्मक भोजन — ये सब गुणों को प्रभावित करते हैं।

भोजन केवल पेट भरने की वस्तु नहीं, संस्कारों को गढ़ने वाली शक्ति है।

सात्विक भोजन मन को शांत करता है। भजन में स्थिरता लाता है।

यदि आप चाहते हैं कि मन शांत रहे, तो आहार सुधारना होगा।


5️⃣ प्रश्न: गृहस्थ जीवन और अध्यात्म में संतुलन कैसे बने?

उत्तर:
महाराज जी कहते हैं — समस्या संतुलन की नहीं, विभाजन की है।

हमने जीवन को बाँट दिया — यह काम, यह परिवार, यह भगवान। इसलिए अशांति है।

यदि सब भगवान के लिए कर दो तो समस्या समाप्त।

कार्य भी भगवान के लिए, परिवार भी भगवान का, भजन भी भगवान का।

आठ घंटे नौकरी की — कृष्णार्पणमस्तु। परिवार की सेवा की — भगवत सेवा।

जब भाव बदलता है, कर्म बदल जाता है।


6️⃣ प्रश्न: क्या कार्य करते समय भी स्मरण संभव है?

उत्तर:
महाराज जी सुंदर उदाहरण देते हैं — यदि गुरु आपको बंबई भेजें वस्तु लाने, तो आप यात्रा में भी गुरु को नहीं भूलते।

वैसे ही कर्म करते समय भी मूल भाव होना चाहिए — “मैं भगवान की आज्ञा का पालन कर रहा हूँ।”

स्मरण हर क्षण जप करना नहीं है। भाव स्मरण है।

यदि कर्म भगवतार्थ है, तो वह स्मरण है।


7️⃣ प्रश्न: शास्त्रों की गलत व्याख्या क्यों बढ़ रही है?

उत्तर:
महाराज जी कहते हैं — उद्देश्य बदल गया है।

जब उद्देश्य मोक्ष नहीं, भगवत प्रेम नहीं, बल्कि धन, मान, लोकप्रियता हो जाए — तब शास्त्रों को तोड़ा-मरोड़ा जाता है।

शास्त्र की व्याख्या का अधिकार ब्रह्मबोध सम्पन्न महापुरुषों को है।

अहंकार से की गई व्याख्या केवल मनोरंजन बन जाती है।


8️⃣ प्रश्न: शास्त्रार्थ का वास्तविक उद्देश्य क्या होना चाहिए?

उत्तर:
शास्त्र बोलना लोक वाहवाही के लिए नहीं।

शास्त्र का उद्देश्य है — अज्ञान का नाश, आत्मोन्नति, भगवत प्रेम।

यदि उद्देश्य बदल गया तो सब बदल गया।


9️⃣ प्रश्न: ज्ञान और भक्ति में संतुलन कैसे?

उत्तर:
महाराज जी कहते हैं — अंतिम निर्णय अद्वैत ही है।

पर ज्ञान मार्ग अत्यंत कठिन है। कृपाण की धार पर चलना है।

भक्ति में भगवान का सहारा है।

भक्ति से भी अद्वैत की प्राप्ति होती है।


🔟 प्रश्न: क्या भक्त भी अद्वैत को प्राप्त करता है?

उत्तर:
हाँ। भक्त और ज्ञानी की अंतिम स्थिति एक है।

ज्ञानी में “मैं” ब्रह्म में लीन होता है।

भक्त में “मैं” और जगत सहित सब प्रभु में लीन हो जाता है।

दोनों अद्वैत में स्थित होते हैं।

इसलिए महाराज जी कहते हैं — नाम जप करते रहो।

नाम की डोरी मत छोड़ो।

Credit:
“यह लेख संत श्री प्रेमानंद जी महाराज के एकान्तिक वार्तालाप प्रवचन की अमृत वाणी पर आधारित है।”

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