1️⃣ प्रश्न: आपका जन्म क्यों हुआ है?
उत्तर:
महाराज जी बड़ी सरलता से कहते हैं — “मेरा जन्म हुआ ही नहीं।” जन्म तो स्वप्न है। जैसे स्वप्न में हम शरीर मान लेते हैं और सुख-दुख भोगते हैं, वैसे ही यह जागृत जीवन भी एक स्वप्न के समान है। वास्तविकता में आत्मा अजन्मा है, निर्विकार है।
जो जन्म दिखाई दे रहा है, वह अज्ञान के कारण भास रहा है। परम सत्य में न पहले जन्म था, न आगे रहेगा। यह बीच में लीला की तरह प्रकट है।
महाराज जी बताते हैं — यह बाह्य जन्म केवल अज्ञान मिटाने के लिए है। वास्तव में आत्मा कभी जन्म नहीं लेती, न मरती है। जो जन्म-मरण वाला शरीर है, वह स्वप्निक है।
जब साधक इस बात को अनुभव से जान लेता है, तब प्रश्न ही समाप्त हो जाता है। तब “मैं” और “तुम” का भेद भी मिट जाता है।
2️⃣ प्रश्न: क्या जन्म वास्तविक है या सब स्वप्न मात्र है?
उत्तर:
महाराज जी कहते हैं — जन्म स्वप्न है। जैसे हजार घड़ों में हजार सूर्य दिखते हैं, पर सूर्य एक ही है। घड़ा टूट जाए तो सूर्य का कुछ नहीं बिगड़ता।
ऐसे ही शरीर के अनुसार जीव अलग-अलग प्रतीत होते हैं, पर चेतन सत्ता एक ही है।
जब तक हम स्वप्निक अवस्था में हैं, तब तक जन्म, मरण, सुख-दुख सब वास्तविक लगते हैं। लेकिन जागृति होते ही सब मिट जाता है।
इसलिए जन्म की बात पूछना स्वप्न में प्रश्न पूछना है। जागो — तब प्रश्न नहीं रहेगा।
3️⃣ प्रश्न: आत्म सुख क्या है? कैसे प्राप्त करें?
उत्तर:
महाराज जी बताते हैं — आत्म सुख कोई बाहरी वस्तु से मिलने वाला सुख नहीं है। आत्म सुख हमारा अपना स्वरूप है।
जब हम भक्ति से चलते हैं, तो नाम-रूप-लीला-धाम के माध्यम से उसी सुख को पाते हैं।
कर्मयोग से निष्काम सेवा द्वारा,
ज्ञानयोग से शरीर-कोषों का अतिक्रमण करके,
और भक्ति से प्रेम द्वारा।
पर सबसे कठिन है — व्यक्ति, वस्तु, स्थान और भोग से आशा छोड़ना। जब तक भोगों की आशा है, आत्म सुख ढका रहेगा।
आशा ही परम दुख है। नैराश्य ही परम सुख है।
4️⃣ प्रश्न: भोगों से आशा क्यों बाधक है?
उत्तर:
महाराज जी कहते हैं — हम वस्तु से सुख चाहते हैं, व्यक्ति से सुख चाहते हैं, मान से सुख चाहते हैं। यही आशा हमें आत्मानंद से दूर कर देती है।
मन बड़ा हठी है। लाख समझाओ कि भोग में सुख नहीं, फिर भी दौड़ता है।
जब भोगों की आस छूट जाती है, तब अंतःकरण निर्मल होता है। निर्मल चित्त में आत्म स्वरूप प्रकट होता है।
इसलिए आशा त्याग ही आत्मानंद की कुंजी है।
5️⃣ प्रश्न: “सब मुझमें हैं, पर मैं उनमें नहीं” — इसका अर्थ?
उत्तर:
महाराज जी कहते हैं — परमात्मा ही सब रूपों में विराजमान हैं। जैसे बर्फ जल ही है। जल अलग से प्रवेश नहीं करता।
भगवान ही समस्त भूतों के रूप में हैं। इसलिए उनमें प्रवेश करने का प्रश्न ही नहीं।
विराट स्वरूप में सब उनमें स्थित हैं, और सूक्ष्म रूप में वही सब हैं।
यह भगवान की गुप्त बात है। समझने के लिए दृष्टि बदलनी होगी।
6️⃣ प्रश्न: क्या सब साधकों को समान फल मिलता है?
उत्तर:
नहीं। महाराज जी स्पष्ट कहते हैं — मंत्र एक हो सकता है, स्थान एक हो सकता है, पर भाव अलग होते हैं।
50 लोग जप करें, तो 50ों का फल अलग होगा।
फल भाव, तन्मयता, एकाग्रता और समर्पण पर निर्भर है।
भगवान भाव के भूखे हैं।
7️⃣ प्रश्न: स्वभाव बदला जा सकता है?
उत्तर:
हाँ। मनुष्य जीवन स्वभाव बदलने के लिए ही मिला है।
तीन गुणों से युक्त स्वभाव बदलता रहता है। पर निरंतर भजन से गुणातीत स्वभाव आता है।
नाम लेने का स्वभाव बन जाए — यही लक्ष्य है।
8️⃣ प्रश्न: क्रोध, ईर्ष्या, अभिमान क्यों आते हैं?
उत्तर:
क्रोध का मूल कामना है। इच्छा पूरी न हो तो क्रोध आता है।
ईर्ष्या मत्सर से आती है।
महाराज जी उपाय बताते हैं —
क्रोध के समय सोचो — “यह भगवान का विधान है।”
ईर्ष्या के समय सबमें भगवत भाव देखो।
लोभ बढ़ाना है तो नाम जप का बढ़ाओ।
नाम ही समाधान है।
9️⃣ प्रश्न: क्या निंदा-स्तुति से ऊपर उठना आवश्यक है?
उत्तर:
हाँ। जब तक द्वंद्व से ऊपर नहीं उठोगे, मोक्ष नहीं मिलेगा।
मान-अपमान, सुख-दुख, लाभ-हानि — सबमें समभाव चाहिए।
त्रिगुणातीत होना पड़ेगा।
🔟 प्रश्न: स्वधर्म क्या है?
उत्तर:
शरीर धर्म परधर्म है।
स्वधर्म है — भगवत भावना से जीवन जीना।
पति में भगवान देखना, पुत्र में भगवान देखना।
नाम जप करना।
भगवत भावना रहित कर्म मोक्षदायी नहीं।
1️⃣1️⃣ प्रश्न: वृंदावन में वैराग्य कैसे?
उत्तर:
प्रेम समस्त रागों का नाश कर देता है।
लौकिक राग में भी लोग सब त्याग देते हैं।
तो यदि परमात्मा से प्रेम हो जाए, तो संसार से वैराग्य होना स्वाभाविक है।
वृंदावन प्रेम देश है।
1️⃣2️⃣ प्रश्न: त्याग, वैराग्य, उपरति में अंतर?
उत्तर:
त्याग — भोग की इच्छा है, पर भोगता नहीं।
वैराग्य — भोग की इच्छा ही नहीं।
उपरति — भोग का स्मरण भी नहीं।
साधक पहले त्याग में होता है।
वैराग्य आए तो जीत गया।
1️⃣3️⃣ प्रश्न: लौकिक लाभ के लिए नाम जप करें तो?
उत्तर:
महाराज जी कहते हैं — किसी भी भाव से नाम लो, मंगल होगा।
भाव-कुभाव, आलस्य से भी नाम जपो — कल्याण होगा।
नाम में अपार शक्ति है।
1️⃣4️⃣ प्रश्न: पहले विकार छोड़ें या नाम जप करें?
उत्तर:
पहले नाम जप करो।
विकार अपने आप छूटेंगे।
यदि हम कहें — पहले सब छोड़ो फिर भजन करो — तो कोई नहीं कर पाएगा।
नाम पकड़ लो।
नाम ही सब विकार नष्ट कर देगा।
Credit:
“यह लेख संत श्री प्रेमानंद जी महाराज के एकान्तिक वार्तालाप प्रवचन की अमृत वाणी पर आधारित है।”
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