प्रश्न 1: संत महापुरुषों के दर्शन का वास्तविक फल क्या है?
उत्तर:
महाराज जी बताते हैं कि संत दर्शन कोई साधारण घटना नहीं है। संत मिलना ही दुर्लभ है। संत का वेश धारण करना आसान है, पर साधुता का आ जाना बहुत कठिन है। वास्तविक संत वह है जिसके भीतर काम, क्रोध, लोभ, दंभ का अंश न हो और जिसका चित्त केवल भगवान में स्थित हो।
ऐसे महापुरुषों का केवल दर्शन भी पापों का नाश कर देता है। “संत दरस जिम पातक टरें” — यह सहज फल है। लेकिन यदि श्रद्धा से चरणों में बैठ जाओ, विनम्र होकर उनके वचन सुनो, तो केवल पाप नाश नहीं होता — चित्त का परिवर्तन होता है।
संत का उपदेश व्यर्थ नहीं जाता। चाहे कितना भी नीच प्रवृत्ति वाला व्यक्ति हो, यदि सच्चे संत की वाणी कानों में पड़ जाए और वह हृदय से ग्रहण करे, तो उसमें भगवत प्रियता जागती है।
संत संग मोक्ष के लिए है, भगवत प्रेम के लिए है। इसलिए संत दर्शन का सर्वोच्च फल है — भगवान में प्रीति उत्पन्न होना।
प्रश्न 2: क्या संत दर्शन से प्रारब्ध बदल सकता है?
उत्तर:
महाराज जी स्पष्ट करते हैं — शास्त्र कहता है “अवश्यमेव भोक्तव्यम् कृतं कर्म शुभाशुभम्।” अर्थात प्रारब्ध भोगना पड़ता है। सामान्य नियम यही है।
हाँ, यदि संत अत्यंत द्रवित हो जाएँ, तपोबल से संकल्प कर लें, तो प्रारब्ध बदल भी सकता है। परंतु संत भगवान के विधान के विरुद्ध संकल्प क्यों करेंगे? वे भगवान के यंत्र हैं।
यदि शरणागति पूर्ण हो जाए, तन-मन-प्राण समर्पित हो जाएँ, तब स्थिति बदल जाती है। तब जीवन प्रारब्ध से नहीं, कृपा से चलने लगता है।
महाराज जी बताते हैं — शरणागति के बाद प्रारब्ध की धज्जियाँ उड़ जाती हैं, क्योंकि तब भगवान स्वयं रक्षा करते हैं।
इसलिए संत से प्रारब्ध बदलने की प्रार्थना मत करो। चित्त परिवर्तन की प्रार्थना करो। यही वास्तविक लाभ है।
प्रश्न 3: यदि गंभीर अपराध हो जाए और पश्चाताप हो तो क्या भगवान क्षमा करते हैं?
उत्तर:
महाराज जी अत्यंत करुणा से कहते हैं — यहाँ कौन बैठा है जिससे गलती नहीं हुई? हम सब माया से आच्छादित जीव हैं।
यदि अपराध के बाद सच्चा पश्चाताप हो, और संकल्प हो कि दोबारा ऐसा नहीं करेंगे, तो भगवान अवश्य क्षमा करते हैं। गीता में भगवान स्वयं कहते हैं — “मामेकं शरणं व्रज, अहं त्वां सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि।”
लेकिन महाराज जी एक गहरी बात कहते हैं — केवल पश्चाताप करते मत रहो, नाम जप करो। “नाम संकीर्तनम यस्य सर्व पाप प्रणाशनम्।”
मन से लड़ना कठिन है। दुर्वासनाएँ बार-बार खींचती हैं। इसलिए रोकर भगवान को पुकारो, नाम जपो।
भगवान बड़े कृपा सिंधु हैं। पर विजय नाम से होगी, केवल संकल्प से नहीं।
प्रश्न 4: “सब तज हरि भज” स्थिति स्वतः आती है या प्रयास से?
उत्तर:
महाराज जी कहते हैं — यह छोटी बात नहीं है। “सब तज” बहुत बड़ी अवस्था है।
यह केवल बातें करने से नहीं आती। निरंतर नाम जप, साधु संग, शास्त्र अध्ययन, पवित्र आहार, निंदा त्याग, सावधानी — इनसे धीरे-धीरे मन निर्मल होता है।
जब पाप का क्षय होता है और नाम में रुचि उत्पन्न होती है, तब यह स्थिति आती है।
भगवान कहते हैं — “तेषाम सततयुक्तानाम…” जो निरंतर प्रेमपूर्वक भजन करते हैं, उन्हें मैं बुद्धियोग देता हूँ। तब बुद्धि भगवदाकार हो जाती है।
इसलिए प्रयास करना ही होगा। यह साधना से आती है, स्वतः नहीं।
प्रश्न 5: वृंदावन में अन्य भक्तों को देखकर ईर्ष्या क्यों आती है? क्या करें?
उत्तर:
महाराज जी कहते हैं — ईर्ष्या नहीं, रोना आना चाहिए।
जब किसी को अधिक भजन करते देखें, तो यह भाव उठना चाहिए — “प्रभु, इन पर कृपा हो गई, मुझ पर कब होगी?”
वृंदावन कृपा धाम है। यहाँ एक से एक रसिक, भजनानंदी महात्मा हैं। उनके प्रति ईर्ष्या रखना अपने लिए हानिकारक है।
ईर्ष्या जलाएगी, फिर दोष दर्शन शुरू होगा, फिर निंदा, और पतन हो जाएगा।
सही मार्ग है — चरण रज लो, प्रणाम करो, प्रार्थना करो कि यत्किंचित भक्ति हममें भी आ जाए।
वृंदावन में ईर्ष्या नहीं, विनय शोभा देती है।
प्रश्न 6: बार-बार शपथ लेने के बाद भी गिर जाता हूँ, क्या करूँ?
उत्तर:
महाराज जी बहुत स्पष्ट कहते हैं — केवल आदेश या शपथ से कुछ नहीं होगा।
मन बड़ा हठी है। अभी आपकी बात मानेगा, दो महीने बाद फिर चढ़ बैठेगा।
जब तक अध्यात्म बल नहीं जागेगा, विजय नहीं होगी। अध्यात्म बल नाम जप से जागता है।
कलियुग में प्रधान साधन नाम है।
“बिनु हरि भजन न भव तरई” — बिना भजन के पार नहीं हो सकता।
इसलिए खूब नाम जप करो। कीर्तन करो। भगवान को चाहोगे तो भगवान मिलेंगे।
अंतिम विजय तब होती है जब भगवान स्वयं गले लगा लें।
प्रश्न 7: क्या केवल वेश से साधुता आती है?
उत्तर:
महाराज जी स्पष्ट कहते हैं — वेश धारण करना सहज है, पर साधुता आना कठिन है।
साधुता आंतरिक लक्षणों से है — काम, क्रोध, लोभ का अभाव, करुणा, सहनशीलता, भगवत चिंतन।
यदि वेश है पर उद्देश्य संसार है, तो वही पाखंड है।
यदि वेश और उद्देश्य दोनों भगवत प्राप्ति के हैं, तब वह वेश जगत पावन करता है।
इसलिए बाहरी रूप से अधिक भीतर की स्थिति महत्वपूर्ण है।
प्रश्न 8: क्या केवल संकल्प और कसम से मन पर विजय संभव है?
उत्तर:
नहीं। महाराज जी कहते हैं — मन से युद्ध सबसे बड़ा युद्ध है।
मन भोगों की स्मृति बार-बार प्रस्तुत करता है। विरोध करने पर व्यथा देता है।
साधक मन को दुलार करता है, इसलिए गिरता है।
मन का विरोध करना सीखो। धर्म के अनुसार मन को चलाओ। गुरु के अनुसार चलाओ।
और सबसे बड़ा उपाय — नाम जप।
नाम से बुद्धि शुद्ध होगी। सुबुद्धि भगवान में लगेगी।
बंध और मोक्ष मन से है। आत्मा तो सदैव मुक्त है।
इसलिए मन को भगवान में लगाओ — यही अंतिम समाधान है।
Credit:
“यह लेख संत श्री प्रेमानंद जी महाराज के एकान्तिक वार्तालाप प्रवचन की अमृत वाणी पर आधारित है।”
यह भी पढ़ें : माला-1190:मन पूर्ण समर्पण से क्यों डरता है? श्री प्रेमानंद महाराज जी के अमृत वचनों से नाम जप महिमा