माला-1189:आत्मज्ञान के बाद ‘मैं’ समाप्त हो जाता है या रहता है? श्री प्रेमानंद महाराज जी के अमृत वचनों से नाम जप महिमा

प्रश्न 1: महाराज जी की साधना-कालीन डायरी का सबसे महत्वपूर्ण सार क्या था?

उत्तर:
महाराज जी बताते हैं कि उनकी पूरी साधना-यात्रा का सार एक ही बात में समाहित है—मनुष्य को निरंतर भगवान की स्मृति में स्थित रहना चाहिए। विभिन्न सिद्ध महापुरुषों से जो वचन प्राप्त हुए, वे सब इसी दिशा में ले जाने वाले थे कि जीवन का प्रत्येक क्षण भगवान को समर्पित हो। नाम-जप, मंत्र-स्मरण, कथा-श्रवण, कीर्तन और सत्संग—ये सब साधन मिलकर साधक को भगवान से जोड़े रखते हैं। महाराज जी ने यह भी अनुभव किया कि मनुष्य जैसा सोचता है, वैसा ही बन जाता है, इसलिए विचारों की पवित्रता अत्यंत आवश्यक है। असंग रहने की शिक्षा ने उनके जीवन को ऐसा बना दिया कि सबके प्रति प्रेम रहा, पर किसी से व्यक्तिगत आसक्ति नहीं रही। गुरुदेव, आचार्य और प्रिय प्रभु के अतिरिक्त कोई अपना नहीं—यह भाव साधना की रक्षा करता है। यही उनकी डायरी की सबसे गहरी प्रेरणा है।


प्रश्न 2: आत्मज्ञान के बाद ‘मैं’ समाप्त हो जाता है या रहता है?

उत्तर:
महाराज जी समझाते हैं कि ‘मैं’ के दो स्तर होते हैं। एक शुद्ध आत्मस्वरूप का ‘मैं’, जो परमात्मा से अभिन्न है, और दूसरा अंतःकरण का ‘मैं’, जिसमें देह-अभिमान, बुद्धि-अभिमान, धन-बल-तपस्या आदि का गर्व जुड़ा रहता है। आत्मज्ञान होने पर अंतःकरण का यह मलिन अहंकार पूर्ण रूप से लय हो जाता है। कर्ता-भाव और भोगता-भाव समाप्त हो जाते हैं, इसलिए साधक अपने शुद्ध स्वरूप में स्थित हो जाता है। तब जीवन की क्रियाएँ प्रकृति में ही होती रहती हैं, पर भीतर शांति और समता बनी रहती है। यह स्थिति निरंतर समाधि समान होती है—चलते, बैठते, खाते-पीते भी भीतर परमात्म-स्थित भाव रहता है। इसलिए ‘मैं’ पूरी तरह नष्ट नहीं होता, बल्कि उसका शुद्ध स्वरूप प्रकट होता है, जिसे आत्मबोध कहा गया है।


प्रश्न 3: “उमा राम स्वभाव जे जाना…” का वास्तविक अर्थ क्या है?

उत्तर:
महाराज जी बताते हैं कि पहले भगवान के प्रभाव को समझना चाहिए—वे इतने कृपालु हैं कि भक्त की सेवा तक करते हैं। जब साधक भगवान की लीला, नाम और कृपा को जान लेता है, तब उसके हृदय में गहरा प्रेम जागता है और वह भगवान के अतिरिक्त किसी अन्य आश्रय की इच्छा नहीं करता। भगवान का स्वभाव अत्यंत करुणामय है—भक्त से लाख अपराध हो जाएँ, फिर भी वे त्यागते नहीं। केवल शरणागति ही उनका हृदय जीत लेती है। यही कारण है कि जो भगवान के स्वभाव को जान लेता है, वह भजन से कभी विमुख नहीं होता। महाराज जी यह भी कहते हैं कि भगवान का यह स्वभाव उनके अनन्य भक्तों में अंश मात्र उतरता है, क्योंकि निरंतर चिंतन से वैसा ही भाव बनता है। पूर्णता केवल भगवान में ही है।


प्रश्न 4: सच्चे संत की पहचान कैसे हो और उनका संग कैसे मिले?

उत्तर:
महाराज जी कहते हैं कि बाहरी लक्षणों से संत को पहचानना कठिन है, क्योंकि बाहरी आचरण साधारण भी हो सकता है। इसलिए मुख्य बात है—उनके संग से हमारे दोष छूटने लगें, भगवान में रुचि बढ़े और हृदय शांत होने लगे। जिनकी वाणी सुनकर भीतर नम्रता, वैराग्य और भगवत-प्रेम जागे—वे ही सच्चे संत हैं। हमें संत के बाहरी व्यवहार की परीक्षा नहीं करनी चाहिए, बल्कि उनके वचनों का पालन करना चाहिए। यदि हम संत में भगवत-भाव रख लें, तो वही भाव हमें भगवान तक पहुँचा देता है। महाराज जी स्पष्ट कहते हैं कि पहचान से अधिक आवश्यक है श्रद्धा और सेवा-भाव। संत-संग ही परमार्थ का द्वार खोलता है।


प्रश्न 5: गुरु-आज्ञा का बोध सामान्य जनों को कैसे हो?

उत्तर:
महाराज जी बताते हैं कि सत्संग में संतों की वाणी के माध्यम से स्वयं भगवान बोलते हैं। यदि व्यक्तिगत आदेश न मिले, तो सत्संग में कही गई बात को ही गुरु-आज्ञा मानकर जीवन में उतारना चाहिए। जो राधा-नाम जप करता है और गुरु-वचन मानता है, उसका संबंध गुरु से दृढ़ हो जाता है। तब कोई भी विपत्ति उसे परास्त नहीं कर सकती। महाराज जी यह भी बताते हैं कि काम, क्रोध, लोभ आदि विकार अत्यंत शक्तिशाली हैं, उनसे बचने का एकमात्र उपाय है—निरंतर भजन और नाम-जप। गुरु-आज्ञा का पालन ही कृपा का पात्र बनाता है।


प्रश्न 6: मंत्र-साक्षात्कार का अर्थ क्या है?

उत्तर:
महाराज जी कहते हैं कि जब मंत्र का साक्षात्कार होता है, तब इष्ट का स्वरूप और लीला स्वयं प्रकट होने लगती है। जप करने का प्रयास नहीं करना पड़ता—अजपा-जाप चलने लगता है। हर क्षण मंत्र की उपस्थिति अनुभव होती है और साधक को अनुभव होता है कि गुरुदेव ही युगल सरकार के रूप में प्रकट हैं। इस अवस्था में नाम-जप ही सब कुछ बना देता है—लोक और परलोक दोनों का कल्याण। कलियुग में नाम ही प्रधान साधन है, इसलिए निरंतर नाम-स्मरण ही सच्ची उन्नति का मार्ग है।


प्रश्न 7: निर्गुण-निराकार साधना में नाम-जप का क्या महत्व है?

उत्तर:
महाराज जी स्पष्ट कहते हैं कि बिना नाम-जप के निर्गुण का सच्चा अनुभव संभव नहीं। नाम ही साधक को साकार से निराकार तक ले जाता है। मन को स्थिर और निर्मल करने की शक्ति नाम में ही है। थोड़ी देर की शून्यता स्थायी नहीं होती, क्योंकि मन को आश्रय चाहिए। जब साधक गुरु-दिए नाम का निरंतर जप करता है, तब अंतःकरण शुद्ध और शांत होता है, और उसी में परम सत्य का अनुभव होता है। इसलिए नाम-जप ही सर्वोपरि साधना है।


प्रश्न 8: आध्यात्मिक फिल्म बनाने वाले को क्या सावधानी रखनी चाहिए?

उत्तर:
महाराज जी कहते हैं कि फिल्मों का समाज पर गहरा प्रभाव पड़ता है। यदि उनमें व्यसन, विलासिता और अनैतिकता दिखाई जाएगी, तो समाज उसी दिशा में जाएगा। इसलिए फिल्म-निर्माताओं को राष्ट्रभक्ति, भगवान की भक्ति, परिवार की एकता और नैतिक जीवन को प्रस्तुत करना चाहिए। ऐसी फिल्में समाज को सुधारती हैं और नई पीढ़ी को सही दिशा देती हैं। कला का उद्देश्य केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि उत्थान होना चाहिए।


प्रश्न 9: विपत्ति में विश्वास की शक्ति कहाँ से आती है?

उत्तर:
महाराज जी बताते हैं कि भगवान के नाम में ही हर कष्ट सहने की सामर्थ्य है। जो जितना नाम-जप करता है, उतना ही धैर्यवान और दृढ़ बनता है। केवल प्रवचन सुनने से नहीं, बल्कि नाम-स्मरण से जीवन बदलता है। नाम ऐसा दिव्य सहारा है जो हर लोक में साथ देता है। इसलिए शुद्ध आचरण और निरंतर नाम-जप से ही विपत्ति में अटूट विश्वास मिलता है।


प्रश्न 10: भगवान के विरह-भाव की प्राप्ति कैसे हो?

उत्तर:
महाराज जी बताते हैं कि गोपियों का जीवन निरंतर कृष्ण-स्मरण से भरा था—हर कर्म कृष्ण को अर्पित था। जब जीवन में भगवत-विस्मरण समाप्त हो जाता है, तब विरह-भाव प्रकट होता है। इसके लिए चार साधन आवश्यक हैं—गुरु-सेवा, संत-संग, निरंतर नाम-जप और भगवान की लीला-कथा का चिंतन। इससे वैराग्य उत्पन्न होता है और हृदय में मिलन की तीव्र तड़प जागती है। यही सच्ची भक्ति की पराकाष्ठा है।


समापन भाव:
महाराज जी की समस्त वाणी का सार यही है कि
नाम-जप, गुरु-श्रद्धा, संत-संग और भगवत-प्रेम—यही जीवन को परम सत्य तक पहुँचाने वाला मार्ग है।

Credit:
“यह लेख संत श्री प्रेमानंद जी महाराज के एकान्तिक वार्तालाप प्रवचन की अमृत वाणी पर आधारित है।”

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