प्रश्न 1: राम-नाम जप करने पर भी लौकिक धन-समृद्धि क्यों नहीं मिलती?
उत्तर:
महाराज जी समझाते हैं कि भगवान का नाम किसी सांसारिक सौदे की वस्तु नहीं है। नाम का उद्देश्य धन, पद या सुविधा दिलाना नहीं, बल्कि मनुष्य के भीतर की दरिद्रता को मिटाना है। बाहरी धन सीमित है और नश्वर भी है, पर नाम से मिलने वाला आंतरिक संतोष शाश्वत होता है। इसलिए कई बार ऐसा लगता है कि नाम लेने पर भी भौतिक समृद्धि नहीं बढ़ी, पर वास्तव में नाम साधक को उस स्थिति में ले जाता है जहाँ धन की आवश्यकता का दबाव ही कम होने लगता है। “कबीरा सब जग निर्धना…” का भाव यही है कि संसार का धन भी अंततः अपूर्ण है; वास्तविक धन तो भगवान का स्मरण और प्रेम है। महाराज जी कहते हैं कि नाम लेने वाला यदि भीतर से तृप्त हो गया, तो वही सबसे बड़ा धनी है। इसलिए नाम को भौतिक लाभ से नहीं, आत्मिक जागरण से जोड़कर देखना चाहिए।
प्रश्न 2: “जिसमें तेरी रज़ा है उसी में राज़ी” यह भाव स्थायी कैसे बने?
उत्तर:
महाराज जी बताते हैं कि यह भाव केवल शब्दों से नहीं आता; यह निरंतर साधना और विश्वास से जन्म लेता है। जब साधक बार-बार अनुभव करता है कि भगवान की व्यवस्था अंततः उसके मंगल के लिए ही होती है, तब धीरे-धीरे विरोध समाप्त होने लगता है। प्रारम्भ में मन अपनी इच्छा के अनुसार परिणाम चाहता है, इसलिए असंतोष होता है। पर नाम-स्मरण और समर्पण से यह समझ गहरी होती है कि जो घट रहा है वही उचित है। इस स्वीकार में ही शांति है। महाराज जी कहते हैं—रज़ा में राज़ी होना हार नहीं, बल्कि सर्वोच्च विश्वास है। जब यह भाव स्थिर हो जाता है, तब सुख-दुख दोनों का प्रभाव कम हो जाता है और जीवन में गहरी सहजता आ जाती है।
प्रश्न 3: सामान्य मनुष्य आध्यात्मिक जीवन कैसे पाए?
उत्तर:
महाराज जी स्पष्ट करते हैं कि आध्यात्मिक जीवन किसी विशेष व्यक्ति के लिए आरक्षित नहीं है। यह हर उस मनुष्य के लिए संभव है जो ईमानदारी से भगवान की ओर मुड़ना चाहता है। शुरुआत बहुत सरल है—नाम-स्मरण, संत-संग और जीवन में थोड़ी पवित्रता। साधना धीरे-धीरे मन को बदलती है और कृपा उस परिवर्तन को गहरा करती है। इसलिए न तो केवल प्रयास पर्याप्त है, न केवल प्रतीक्षा; दोनों का संतुलन आवश्यक है। महाराज जी कहते हैं कि छोटा-सा सच्चा कदम भी भगवान को प्रिय होता है। निरंतरता ही साधना की शक्ति है।
प्रश्न 4: कर्म-योग, भक्ति-योग और ज्ञान-योग में किसे अपनाएँ?
उत्तर:
महाराज जी बताते हैं कि ये तीनों मार्ग अंततः भगवान तक ही ले जाते हैं, पर सामान्य मनुष्य के लिए भक्ति-योग सबसे सरल है। कर्म-योग में पूर्ण निष्कामता कठिन है और ज्ञान-योग में सूक्ष्म विवेक चाहिए; पर भक्ति-योग में केवल प्रेम और स्मरण चाहिए। इसलिए नाम-जप और समर्पण से साधक सहज रूप से आगे बढ़ सकता है। भक्ति अन्य दोनों को भी पूर्ण कर देती है।
प्रश्न 5: निकुंज-प्राप्ति के लिए क्या अधिक आवश्यक है—नाम-जप, आत्म-समर्पण या लाड़ली जी की कृपा?
उत्तर:
महाराज जी समझाते हैं कि भक्ति के मार्ग में इन तीनों को अलग-अलग नहीं देखा जा सकता। नाम-जप साधक को भीतर से शुद्ध करता है, आत्म-समर्पण उसके अहंकार को गलाता है और कृपा उस साधना को पूर्णता देती है। यदि केवल जप हो पर समर्पण न हो, तो भक्ति सूखी रह जाती है। यदि समर्पण का भाव हो पर नाम का सहारा न हो, तो मन स्थिर नहीं रहता। और अंततः यदि कृपा न हो तो साधना अपने चरम फल तक नहीं पहुँचती। इसलिए साधक का कार्य है विनम्रता से नाम-स्मरण करना और अपने को प्रभु के चरणों में अर्पित करना। जब यह भाव सच्चा होता है, तब कृपा स्वयं प्रकट होती है। महाराज जी कहते हैं—निकुंज-प्राप्ति साधना से नहीं, कृपा से होती है; पर कृपा उसी पर होती है जो नाम और समर्पण में सच्चा हो जाता है। इसलिए इन तीनों का संतुलन ही पूर्ण भक्ति का मार्ग है।
प्रश्न 6: क्या गृहस्थ जीवन में रहकर मोक्ष या भगवत-प्राप्ति संभव है?
उत्तर:
महाराज जी स्पष्ट कहते हैं कि भगवत-प्राप्ति का संबंध स्थान या वेश से नहीं, बल्कि हृदय की दिशा से है। गृहस्थ जीवन स्वयं में बंधन नहीं है; बंधन तो आसक्ति और अहंकार है। यदि गृहस्थ अपने कर्तव्यों को भगवान की सेवा मानकर निभाए, नाम-स्मरण को जीवन का आधार बनाए और भीतर समर्पण रखे, तो वही जीवन साधना का सर्वोत्तम क्षेत्र बन सकता है। संसार से भागना समाधान नहीं, बल्कि दृष्टि बदलना आवश्यक है। महाराज जी भरत जी जैसे उदाहरणों से समझाते हैं कि बाहरी जिम्मेदारियाँ निभाते हुए भी मन पूर्णतः भगवान में स्थित रह सकता है। इसलिए गृहस्थ के लिए मुख्य नियम है—कर्तव्य में ईमानदारी, व्यवहार में प्रेम और भीतर निरंतर स्मरण। जहाँ यह संतुलन बन गया, वहीं गृहस्थ जीवन भी मोक्ष का मार्ग बन जाता है।
प्रश्न 7: जीवन का अधिकांश भाग बीत जाने के बाद भजन शुरू करने पर क्या इस जन्म में भगवत-प्राप्ति संभव है?
उत्तर:
महाराज जी कहते हैं कि भगवान समय की गणना मनुष्यों की तरह नहीं करते; वे केवल हृदय की सच्चाई देखते हैं। यदि जीवन के अंतिम चरण में भी मनुष्य सच्चे पश्चाताप और गहरी चाह के साथ भगवान को पुकारे, तो कृपा तुरंत प्रकट हो सकती है। कई जन्मों की दूरी एक क्षण की सच्ची पुकार से मिट सकती है। इसलिए देर से शुरुआत होना बाधा नहीं है; असली बाधा है मन का टलना और आलस्य। महाराज जी समझाते हैं कि जिस दिन साधक को यह अनुभव हो जाए कि अब भगवान के बिना जीवन अधूरा है, उसी दिन से वास्तविक साधना शुरू होती है। इसलिए आशा कभी नहीं छोड़नी चाहिए। अंतिम क्षण तक भी नाम-स्मरण जीव को परम शांति तक पहुँचा सकता है।
प्रश्न 8: दूसरों के व्यवहार से प्रभावित हुए बिना सुख-दुख में समभाव कैसे रखें?
उत्तर:
महाराज जी बताते हैं कि समभाव बाहर की परिस्थितियों से नहीं, भीतर के विश्वास से आता है। जब साधक हर घटना को भगवान की व्यवस्था मानने लगता है, तब प्रतिक्रियाएँ धीरे-धीरे कम होने लगती हैं। दूसरों का व्यवहार उनके संस्कारों का परिणाम है; उसे अपने सुख-दुख का कारण मानना अज्ञान है। नाम-स्मरण मन को स्थिर करता है और समर्पण उसे शांत रखता है। महाराज जी कहते हैं—जिसे भगवान का सहारा मिल गया, उसे संसार हिला नहीं सकता। समभाव का अर्थ भावशून्यता नहीं, बल्कि गहरी स्थिरता है जिसमें सुख में अहंकार नहीं और दुख में निराशा नहीं होती। यही संतुलन भक्ति की परिपक्वता का संकेत है।
प्रश्न 9: भगवत-कृपा और संत-कृपा में क्या अंतर है?
उत्तर:
महाराज जी समझाते हैं कि वास्तव में दोनों अलग नहीं हैं। संत-कृपा भगवान की ही कृपा का सजीव माध्यम है। भगवान अदृश्य हैं, इसलिए उनकी कृपा संतों के रूप में अनुभव होती है। संत मार्ग दिखाते हैं, साधना का साहस देते हैं और गिरने से बचाते हैं। भगवान लक्ष्य हैं और संत उस लक्ष्य तक पहुँचाने वाले सेतु। इसलिए जिसने सच्चे संत को पा लिया, उसने भगवान की कृपा का द्वार पा लिया। महाराज जी कहते हैं—संत की शरण में रहना ही भगवान की शरण में रहना है।
प्रश्न 10: अहंकार नष्ट हो जाने पर मुक्ति का अनुभव किसे होता है?
उत्तर:
महाराज जी बताते हैं कि मुक्ति कोई बाहरी घटना नहीं, बल्कि अहंकार के समाप्त होने की आंतरिक अवस्था है। जब “मैं” मिट जाता है, तब बंधन भी समाप्त हो जाता है। उस स्थिति में अनुभव करने वाला अलग नहीं रहता; केवल शुद्ध चेतना ही शेष रहती है। इसलिए मुक्ति को समझना बुद्धि का विषय नहीं, अनुभव का विषय है। जहाँ कर्तापन समाप्त हुआ, वहीं स्वतंत्रता प्रकट हुई।
प्रश्न 11: जीवन में अनुशासन और एकाग्रता कैसे आए?
उत्तर:
महाराज जी कहते हैं कि स्पष्ट लक्ष्य, नियमित दिनचर्या और नाम-स्मरण से मन धीरे-धीरे संयमित होता है। छोटी-छोटी स्थिर आदतें ही बड़ी एकाग्रता का आधार बनती हैं। निरंतरता ही सफलता का रहस्य है।
प्रश्न 12: नाम-निष्ठा कब जागती है?
उत्तर:
जब साधक को नाम में शांति और आनंद मिलने लगे और वह बिना नाम के अधूरापन अनुभव करे—वही निष्ठा का आरंभ है। यह अभ्यास और कृपा दोनों से आती है।
प्रश्न 13: भजन-मार्ग पर चलने वालों के लिए मुख्य आज्ञा क्या है?
उत्तर:
निरंतर नाम लो, विनम्र रहो, संत-संग बनाए रखो और आशा मत छोड़ो—यही भक्ति का सार है।
प्रश्न 14: गृहस्थ जीवन में मोह त्यागकर प्रेमपूर्वक दायित्व कैसे निभाएँ?
उत्तर:
सबको भगवान का मानकर सेवा करें, अपेक्षा कम रखें और कर्तव्य को पूजा समझें—तभी प्रेम स्थिर रहता है।
प्रश्न 15: पूर्ण शरणागति क्या है? दीक्षा से कैसे भिन्न है?
उत्तर:
दीक्षा मार्ग का प्रारंभ है, पर पूर्ण शरणागति वह अवस्था है जहाँ अपनी इच्छा समाप्त होकर केवल भगवान की इच्छा शेष रह जाती है। यही भक्ति की पूर्णता है।।
Credit:
“यह लेख संत श्री प्रेमानंद जी महाराज के एकान्तिक वार्तालाप प्रवचन की अमृत वाणी पर आधारित है।”
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