माला-1186:भक्ति करते-करते “मैं कुछ बन गया हूँ” ऐसा अहंकार क्यों आता है और इससे कैसे बचें? श्री प्रेमानंद महाराज जी के अमृत वचनों से नाम जप महिमा

प्रश्न 1: भक्ति करते-करते “मैं कुछ बन गया हूँ” ऐसा अहंकार क्यों आता है और इससे कैसे बचें?

उत्तर:
महाराज जी समझाते हैं कि साधना के मार्ग में यह एक अत्यंत सूक्ष्म और खतरनाक मोड़ होता है। प्रारम्भ में साधक स्वयं को दोषपूर्ण देखता है, इसलिए विनम्रता रहती है। लेकिन जब जप बढ़ता है, नियम बनने लगते हैं, लोगों का सम्मान मिलने लगता है या भीतर शांति का कुछ अनुभव होता है, तब मन चुपचाप यह मानने लगता है कि अब मैं दूसरों से अलग या श्रेष्ठ हूँ। यही आध्यात्मिक अहंकार है, जो सामान्य अहंकार से भी अधिक सूक्ष्म होता है। बाहरी पापों से बचना आसान है, पर “मैं साधक हूँ” यह भावना पकड़ ले तो भक्ति रुक जाती है।
महाराज जी कहते हैं कि इससे बचने का एक ही उपाय है—अपने दोषों को देखना और भगवान की कृपा को कारण मानना। यदि साधक यह मान ले कि जो कुछ भी हो रहा है वह मेरी योग्यता से नहीं, प्रभु की दया से है, तो अहंकार टिक नहीं पाता। संत-संग भी अत्यंत आवश्यक है, क्योंकि संतों के सामने अपनी वास्तविक स्थिति स्पष्ट दिखाई देती है। सेवा, दैन्य और प्रार्थना—ये तीनों अहंकार को गलाने वाली अग्नि हैं। जहाँ “मैं” कम होता है, वहीं भक्ति बढ़ती है। इसलिए महाराज जी बार-बार कहते हैं—साधना से बड़ा दैन्य है; जिसने दैन्य बचा लिया, उसने भक्ति बचा ली।


प्रश्न 2: साधना और कृपा का संबंध क्या है?

उत्तर:
महाराज जी बताते हैं कि साधना और कृपा को अलग-अलग समझना ही भ्रम है। वास्तव में साधना भी कृपा से ही मिलती है और कृपा का अनुभव भी साधना से ही होता है। मनुष्य को यह अवसर मिलना कि वह भगवान का नाम ले सके, संतों की वाणी सुन सके या भक्ति की ओर मुड़ सके—यह स्वयं कृपा का प्रारम्भिक रूप है। परंतु यदि साधक प्रयास न करे, तो वह कृपा सुप्त ही रह जाती है।
दूसरी ओर केवल प्रयास से भी सब कुछ नहीं होता। कई लोग नियम करते हैं, पर हृदय में प्रेम नहीं जागता; वहीं कोई साधारण व्यक्ति आँसू बहाकर प्रभु को पुकारे तो कृपा तुरंत अनुभव होती है। इसलिए महाराज जी कहते हैं—साधना दरवाज़ा खटखटाना है और कृपा भीतर से खुलना है। दोनों साथ-साथ चलते हैं। साधक का काम है निरंतर भजन, विनम्रता और धैर्य; परिणाम कब और कैसे प्रकट होगा, यह भगवान पर छोड़ देना ही सच्चा विश्वास है। जहाँ यह संतुलन बन गया, वहीं साधना सफल और कृपा प्रकट हो जाती है।


प्रश्न 3: अनन्य भक्ति का वास्तविक अर्थ क्या है?

उत्तर:
महाराज जी स्पष्ट करते हैं कि अनन्यता का अर्थ मन में कोई विचार न आना नहीं है। मन का स्वभाव विचार करना है; उसे जबरन रोकना भक्ति नहीं कहलाता। अनन्य भक्ति का अर्थ है—आश्रय केवल भगवान का होना। चाहे जीवन में कितनी भी परिस्थितियाँ आएँ, भीतर का भरोसा किसी मनुष्य, वस्तु या परिस्थिति पर नहीं, केवल प्रभु पर टिके—यही अनन्यता है।
महाराज जी कहते हैं कि अनन्यता का दूसरा रूप है—हर स्थिति में भगवान का ही संकेत देखना। सुख मिले तो कृपा, दुख मिले तो भी कृपा; लाभ हो तो धन्यवाद, हानि हो तो भी समर्पण। यह दृष्टि बनते-बनते साधक का हृदय स्थिर हो जाता है। तब भक्ति प्रयास नहीं रहती, स्वभाव बन जाती है।
अनन्यता का सर्वोच्च चिन्ह है—भगवान के बिना असहाय अनुभव होना। जैसे चातक को केवल स्वाति की बूंद चाहिए, वैसे ही साधक को केवल प्रभु का स्मरण प्रिय लगे। यही अनन्य भक्ति है, और इसी से प्रेम का जन्म होता है।


प्रश्न 4: चातक जैसी अनन्यता भजन में कैसे आए? गुरु-कृपा की भूमिका क्या है?

उत्तर:
महाराज जी बताते हैं कि चातक की उपमा अत्यंत गहरी है। चातक आकाश की ओर ही देखता है; पृथ्वी का जल उसे स्वीकार नहीं। इसी प्रकार साधक को भी धीरे-धीरे संसार के सहारों से मन हटाकर भगवान की ओर टिकाना पड़ता है। यह केवल अपने प्रयास से संभव नहीं होता, क्योंकि मन बार-बार पुराने सहारों की ओर भागता है।
यहीं गुरु-कृपा का महत्व प्रकट होता है। गुरु साधक को बार-बार स्मरण कराते हैं कि वास्तविक सहारा कौन है। उनकी वाणी दिशा देती है, उनका जीवन प्रेरणा देता है और उनका आशीर्वाद भीतर शक्ति जगाता है। जब साधक गुरु के चरणों को पकड़कर चलता है, तब उसकी भक्ति स्थिर होने लगती है।
महाराज जी कहते हैं—अनन्यता का अर्थ संसार छोड़ना नहीं, बल्कि भीतर का सहारा बदलना है। गुरु उस परिवर्तन के माध्यम बनते हैं। निरंतर नाम-जप, आज्ञापालन और दैन्य—इनसे चातक जैसी तड़प धीरे-धीरे जागती है, और वही तड़प अंततः भगवान के मिलन में बदल जाती है।


प्रश्न 5: मृत्यु का भय क्यों रहता है और नाम-जप से कैसे मिटता है?

उत्तर:
महाराज जी समझाते हैं कि मृत्यु का भय वास्तव में शरीर से अत्यधिक आसक्ति का परिणाम है। मनुष्य स्वयं को शरीर मान लेता है, इसलिए शरीर के समाप्त होने का विचार ही भय उत्पन्न करता है। इसके साथ ही अज्ञात भविष्य की चिंता भी जुड़ी रहती है—मृत्यु के बाद क्या होगा? यही अनिश्चितता डर को गहरा बनाती है।
नाम-जप इस भय को जड़ से बदल देता है। जब साधक बार-बार भगवान का स्मरण करता है, तब उसकी पहचान धीरे-धीरे शरीर से हटकर आत्मा से जुड़ने लगती है। उसे अनुभव होने लगता है कि जीवन केवल शरीर तक सीमित नहीं है और भगवान का आश्रय मृत्यु के पार भी है। यही विश्वास भय को कम करता-करता समाप्त कर देता है।
महाराज जी कहते हैं—जिसने नाम को पकड़ लिया, उसके लिए मृत्यु अंत नहीं, मिलन का द्वार बन जाती है। तब मृत्यु शत्रु नहीं रहती, बल्कि प्रभु के निकट जाने का अवसर बन जाती है। इसलिए निर्भय जीवन का सबसे सरल उपाय है—निरंतर नाम-स्मरण।


प्रश्न 6: भगवान शिव की कृपा का साधक के जीवन में क्या महत्व है?

उत्तर:
महाराज जी बताते हैं कि भगवान शिव करुणा और अनुग्रह के अद्भुत प्रतीक हैं। वे शीघ्र प्रसन्न होने वाले हैं और साधक के छोटे से भाव को भी स्वीकार कर लेते हैं। शिव-कृपा का अर्थ केवल बाहरी वरदान नहीं, बल्कि भीतर वैराग्य, शांति और भक्ति की प्रवृत्ति का जागना है। जब शिव की कृपा होती है, तब मन संसार के मोह से ढीला पड़ने लगता है और भगवान की ओर झुकाव बढ़ता है।
महाराज जी कहते हैं कि शिव भक्ति के द्वारपाल हैं—वे साधक को भीतर की ओर मोड़ते हैं। उनका स्मरण मन को सरल, शांत और ग्रहणशील बनाता है, जिससे प्रेम-भक्ति का बीज अंकुरित हो सके। बिना इस आंतरिक शुद्धि के उच्च भक्ति स्थिर नहीं होती। इसलिए शिव-कृपा को मार्ग की तैयारी कहा जा सकता है और भगवान का प्रेम उस मार्ग की पूर्णता है।
अंततः महाराज जी यही संकेत देते हैं कि सभी कृपा का लक्ष्य एक ही है—हृदय को भगवान के प्रेम के योग्य बनाना। जहाँ यह योग्यतानुभव जागा, वहीं साधना सफल हो गई।


Credit:
“यह लेख संत श्री प्रेमानंद जी महाराज के एकान्तिक वार्तालाप प्रवचन की अमृत वाणी पर आधारित है।”

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