प्रश्न 1: राधा बाबा और भाई जी महाराज के मिलन से प्रेम-भक्ति का जो दिव्य परिवर्तन हुआ, वह भक्ति-रस क्या है और कैसे मिलता है?
उत्तर:
महाराज जी बताते हैं कि यह कोई साधारण घटना नहीं थी, बल्कि अनेक जन्मों की साधना, पवित्रता और आंतरिक पात्रता का फल था। भगवान की कृपा सर्वत्र उपलब्ध रहती है, पर उसका प्रकट होना साधक की तैयारी पर निर्भर करता है। राधा बाबा के जीवन में ज्ञान, तपस्या, भजन और निर्मलता पहले से संचित थी; इसलिए उचित समय पर कृपा का निमित्त मिला और अद्वैत भाव प्रेम-भक्ति में बदल गया। यह परिवर्तन किसी बाहरी स्पर्श से नहीं, बल्कि भीतर की परिपक्वता से हुआ। भक्ति-रस वही अनुभव करता है जिसके हृदय में दैन्य, समर्पण और अखंड चाह उत्पन्न हो जाती है। महाराज जी कहते हैं कि हमें उस घटना की नकल नहीं करनी, बल्कि वैसी पात्रता बनानी है—संतों की चरण-रज का सम्मान, नाम-स्मरण, विनम्रता और निरंतर भजन। जब साधक स्वयं को शून्य कर देता है, तब भगवान अपने प्रेम से उसे भर देते हैं। यही प्रेम-भक्ति का वास्तविक रहस्य है।
प्रश्न 2: प्रेम-लक्षणा भक्ति के लिए सद्गुरु-शरण और आचार्य-अनुसरण क्यों आवश्यक है?
उत्तर:
महाराज जी स्पष्ट करते हैं कि प्रेम-भक्ति बुद्धि या तर्क से प्राप्त नहीं होती; वह कृपा से प्रकट होती है, और कृपा का माध्यम सद्गुरु होते हैं। आचार्यों की परंपरा इसलिए आवश्यक है क्योंकि वे स्वयं उस प्रेम को जी चुके होते हैं। उनके बताए मार्ग पर चलने से साधक भटकता नहीं। बिना गुरु-कृपा के साधना अहंकार को भी बढ़ा सकती है, पर गुरु-शरण में वही साधना दैन्य और प्रेम में बदल जाती है। महाराज जी कहते हैं कि पहले श्रद्धा चाहिए—यह दृढ़ विश्वास कि भगवान का प्रेम संभव है और गुरु के मार्ग से ही मिलेगा। फिर आज्ञापालन चाहिए, क्योंकि प्रेम अनुशासन से पुष्ट होता है। रसिक भक्तों की सेवा, नाम-स्मरण और आचार्य-वाणी का अनुसरण—ये सब मिलकर हृदय को कोमल बनाते हैं। जब हृदय कोमल होता है तभी प्रेम टिकता है। इसलिए गुरु-शरण भक्ति की जड़ है, और उसी से प्रेम का वृक्ष फलता है।
प्रश्न 3: अहंकार और ममता रहते हुए भगवत-प्रेम क्यों नहीं प्रकट होता?
उत्तर:
महाराज जी कहते हैं कि “मैं” और “मेरा” ही माया का सबसे मजबूत बंधन है। जब तक साधक स्वयं को कर्ता मानता है और वस्तुओं, संबंधों या प्रतिष्ठा को अपना समझता है, तब तक हृदय में भगवान के लिए स्थान नहीं बनता। प्रेम का स्वभाव है पूर्ण समर्पण, जबकि अहंकार का स्वभाव है अलगाव। दोनों साथ नहीं रह सकते। इसलिए भक्ति का पहला कार्य है—अहंकार को पहचानना। यह केवल त्याग से नहीं, बल्कि भगवान की ओर लगाव बढ़ाने से घटता है। जब “मैं” की जगह “प्रभु” आ जाते हैं और “मेरा” की जगह “सब आपका” भाव स्थिर होता है, तब प्रेम का अंकुर फूटता है। महाराज जी बताते हैं कि संत-संग और नाम-जप से यह परिवर्तन सहज होता है। अहंकार को सीधे दबाने से संघर्ष बढ़ता है, पर प्रेम बढ़ाने से अहंकार स्वयं गल जाता है।
प्रश्न 4: भगवान को अपना मानकर संसार में व्यवहार कैसे करें?
उत्तर:
महाराज जी भरत जी का उदाहरण देते हैं—राज्य चलाते हुए भी वे स्वयं को कर्ता नहीं मानते थे; सब कुछ राम का समझते थे। यही भाव साधक के लिए आदर्श है। संसार छोड़ना आवश्यक नहीं, बल्कि दृष्टि बदलना आवश्यक है। घर, परिवार, कार्य—सब भगवान की सेवा बन सकते हैं यदि भीतर समर्पण हो। समस्या वस्तुओं में नहीं, आसक्ति में है। जब साधक समझता है कि वह केवल सेवक है और सब कुछ प्रभु का है, तब बंधन समाप्त होने लगता है। महाराज जी कहते हैं कि छोटी सी कुटिया भी बंधन बन सकती है और विशाल राज्य भी सेवा बन सकता है—निर्णायक तत्व केवल भाव है। इसलिए हर कार्य से पहले भीतर स्मरण करें—“यह आपका है, मैं आपका हूँ।” यही व्यवहारिक भक्ति है।
प्रश्न 5: खिन्नता से लेकर प्रभु-विरह तक की अवस्था में साधक स्वयं को कैसे संभाले?
उत्तर:
महाराज जी समझाते हैं कि साधना के मार्ग में आने वाली खिन्नता असफलता का संकेत नहीं होती, बल्कि यह दर्शाती है कि मन अब संसार से पूर्ण संतुष्टि नहीं पा रहा। जब बाहर का आकर्षण कम होने लगता है और भीतर भगवान का अनुभव अभी पूर्ण रूप से जागा नहीं होता, तब यह मध्यावस्था उत्पन्न होती है। यही स्थिति आगे चलकर विरह में बदलती है। विरह साधारण दुख नहीं है; यह प्रेम की गहराई को जगाने वाली अग्नि है। यदि साधक इस समय धैर्य रखे, नाम-स्मरण बनाए रखे और संत-वाणी से जुड़ा रहे, तो यही विरह उसे भगवान के और निकट ले जाता है। परंतु यदि वह निराश होकर भजन छोड़ दे, तो पुनः संसार की ओर गिरावट संभव है। इसलिए महाराज जी कहते हैं—इस अवस्था को कृपा मानो, क्योंकि भगवान साधक के हृदय को अपने योग्य बना रहे होते हैं। धैर्य, विनम्रता और निरंतर नाम-जप ही इस समय सबसे बड़ा सहारा है।
प्रश्न 6: हृदय में द्वेष उठे तो उसे प्रेम में कैसे बदला जाए?
उत्तर:
महाराज जी बताते हैं कि द्वेष का मूल कारण अहंकार और अपेक्षा है। जब हमारी इच्छा के अनुसार व्यवहार नहीं होता, तब भीतर विरोध उत्पन्न होता है और वही द्वेष बन जाता है। इसका समाधान बाहरी व्यक्ति को बदलना नहीं, बल्कि अपने दृष्टिकोण को बदलना है। साधक को यह समझना चाहिए कि प्रत्येक जीव भगवान का अंश है और सब अपने-अपने संस्कारों से प्रेरित होकर व्यवहार करते हैं। यह भाव आते ही कठोरता कम होने लगती है। नाम-स्मरण और प्रार्थना से हृदय को कोमलता मिलती है, जिससे क्षमा सहज हो जाती है। महाराज जी कहते हैं कि प्रेम का अर्थ यह नहीं कि सब कुछ सही लगे, बल्कि यह है कि हम भीतर से किसी के लिए अमंगल न चाहें। जब साधक दूसरों के दोषों से अधिक अपनी शुद्धि पर ध्यान देता है, तब द्वेष स्वतः घटने लगता है और उसी स्थान पर करुणा प्रकट होती है। यही परिवर्तन भक्ति का वास्तविक संकेत है।
प्रश्न 7: नाम-कीर्तन और भगवत-चरित्र-श्रवण से प्रेम कैसे प्रकट होता है?
उत्तर:
महाराज जी समझाते हैं कि भगवान का नाम और उनकी लीलाओं का श्रवण केवल धार्मिक क्रिया नहीं, बल्कि हृदय को परिवर्तित करने वाली शक्ति है। जब साधक बार-बार नाम लेता है और भगवान के गुण-चरित्र सुनता है, तब धीरे-धीरे उसका मन संसार से हटकर भगवान की ओर आकर्षित होने लगता है। यह परिवर्तन अचानक नहीं होता; निरंतरता से होता है। जैसे सुगंधित वातावरण में रहने से शरीर में भी सुगंध आ जाती है, वैसे ही भगवत-स्मरण से हृदय में प्रेम की सुगंध फैलने लगती है। महाराज जी कहते हैं कि नाम-कीर्तन मन को शुद्ध करता है और कथा-श्रवण मन को कोमल बनाता है। शुद्ध और कोमल हृदय में ही प्रेम टिकता है। इसलिए भक्ति का सरल मार्ग यही है—नाम लो, कथा सुनो और उस भाव को जीवन में उतारो। धीरे-धीरे वही आनंद स्थायी अनुभव बन जाता है।
प्रश्न 8: अभिमान रहने पर भक्ति क्यों नहीं आती और दैन्य कैसे प्राप्त हो?
उत्तर:
महाराज जी कहते हैं कि अभिमान हृदय का सबसे बड़ा आवरण है। जब तक मनुष्य स्वयं को श्रेष्ठ मानता है, तब तक वह भगवान की कृपा का पात्र नहीं बन पाता, क्योंकि कृपा वहीं ठहरती है जहाँ विनम्रता होती है। दैन्य का अर्थ स्वयं को तुच्छ समझना नहीं, बल्कि यह अनुभव करना है कि जो कुछ भी है वह भगवान की देन है। यह भाव आते ही अहंकार ढीला पड़ने लगता है। संत-संग, सेवा और नाम-जप से दैन्य धीरे-धीरे प्रकट होता है। महाराज जी बताते हैं कि जिस दिन साधक को अपने दोष स्पष्ट दिखाई देने लगें और दूसरों के गुण अच्छे लगने लगें, समझना चाहिए कि दैन्य का आरंभ हो गया। यही दैन्य भक्ति का द्वार खोलता है और भगवान के प्रेम को आकर्षित करता है।
प्रश्न 9: क्षमा का आध्यात्मिक बल क्या है?
उत्तर:
महाराज जी बताते हैं कि क्षमा कमजोरी नहीं, बल्कि अत्यंत ऊँची आध्यात्मिक शक्ति है। जो व्यक्ति भीतर से सुरक्षित और भगवान पर आश्रित होता है, वही सच्ची क्षमा कर सकता है। क्षमा से द्वेष का चक्र टूट जाता है और हृदय हल्का हो जाता है। द्वेष रखने वाला स्वयं जलता है, जबकि क्षमा करने वाला मुक्त हो जाता है। महाराज जी कहते हैं कि क्षमा करने से सामने वाला बदले या न बदले, पर क्षमा करने वाला अवश्य बदल जाता है। उसका मन शांति का अनुभव करता है और भगवान के निकट जाता है। इसलिए क्षमा भक्ति का आभूषण है और प्रेम का स्वाभाविक परिणाम भी।
प्रश्न 10: भगवत-लीला-श्रवण से आसक्ति कैसे उत्पन्न होती है?
उत्तर:
महाराज जी समझाते हैं कि मन जहाँ रस पाता है वहीं टिकता है। संसार की कथाएँ मन को बाहर ले जाती हैं, जबकि भगवान की लीलाएँ मन को भीतर की ओर मोड़ती हैं। बार-बार लीला-श्रवण करने से भगवान का स्वरूप, उनका स्नेह और उनकी करुणा हृदय में जीवित अनुभव बनने लगती है। तब मन स्वयं उस आनंद को फिर-फिर पाना चाहता है। यही आसक्ति का प्रारंभ है। महाराज जी कहते हैं कि यह आसक्ति बंधन नहीं, बल्कि मुक्ति का मार्ग है, क्योंकि यह जीव को भगवान से जोड़ती है। इसलिए कथा-श्रवण को केवल सुनना नहीं, बल्कि भाव से ग्रहण करना चाहिए।
प्रश्न 11: प्रेम और वासना में क्या अंतर है?
उत्तर:
महाराज जी स्पष्ट करते हैं कि वासना लेने की इच्छा है और प्रेम देने की भावना है। वासना स्वार्थ से जुड़ी होती है, इसलिए तृप्त नहीं करती; प्रेम समर्पण से जुड़ा होता है, इसलिए शांति देता है। वासना शरीर तक सीमित रहती है, जबकि प्रेम आत्मा को स्पर्श करता है। जब साधक का मन भगवान की प्रसन्नता में आनंद अनुभव करने लगे, वही प्रेम है। यही भक्ति का सार है।
प्रश्न 12: भगवत-प्राप्ति की महत्त्व-बुद्धि कैसे बढ़े?
उत्तर:
महाराज जी बताते हैं कि जिस वस्तु का महत्त्व समझ में आता है, उसी के लिए मनुष्य प्रयास करता है। इसलिए भगवान के महत्त्व को समझने के लिए संत-संग, शास्त्र-श्रवण और नाम-स्मरण आवश्यक है। बार-बार सुनने और चिंतन करने से हृदय में यह दृढ़ होता है कि संसार क्षणिक है और भगवान ही शाश्वत हैं। यही समझ भगवत-प्राप्ति की तीव्र इच्छा जगाती है। जब यह इच्छा प्रबल हो जाती है, तब साधना स्वतः गहरी होने लगती है और कृपा का मार्ग खुलता है।
Credit:
“यह लेख संत श्री प्रेमानंद जी महाराज के एकान्तिक वार्तालाप प्रवचन की अमृत वाणी पर आधारित है।”
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