प्रश्न 1: भगवान के प्रेम का अनुभव पूर्ण होता है या समर्पण के अनुसार?
उत्तर:
महाराज जी बताते हैं कि भगवान का प्रेम किसी सीमा में बंधा हुआ नहीं है। उनका प्रेम तो अनंत और सर्वव्यापक है, परंतु उस प्रेम का अनुभव साधक के भीतर उतनी ही मात्रा में प्रकट होता है जितना उसका समर्पण गहरा होता है। जैसे सूर्य सब पर समान प्रकाश देता है, पर बंद खिड़की वाले घर में प्रकाश कम दिखाई देता है—वैसे ही भगवान की कृपा सब पर समान है, पर अनुभव समर्पण के अनुसार होता है। जब साधक अपने मन, बुद्धि, अहंकार और अपेक्षाओं को धीरे-धीरे प्रभु के चरणों में छोड़ देता है, तब भीतर का पर्दा हटने लगता है और वही प्रेम अनुभव बनकर प्रकट होता है। इसलिए समस्या प्रेम की कमी नहीं, समर्पण की कमी है। महाराज जी कहते हैं—समर्पण बढ़ाओ, अनुभव स्वयं बढ़ेगा।
प्रश्न 2: सभी इच्छाओं को प्रभु से जोड़कर एकरूप कैसे हों?
उत्तर:
महाराज जी समझाते हैं कि इच्छाओं को दबाने से शांति नहीं मिलती, बल्कि उन्हें भगवान की ओर मोड़ने से मिलती है। मन में इच्छा उठे तो उसे संसार की ओर न ले जाकर प्रभु की ओर जोड़ देना चाहिए। धीरे-धीरे साधक समझता है कि वास्तविक तृप्ति केवल भगवान से ही मिलती है। जब यह समझ स्थिर हो जाती है, तब इच्छाएँ स्वयं शांत होने लगती हैं। यही एकरूपता की शुरुआत है। यह अचानक नहीं होती—नाम-जप, स्मरण और संत-संग से हृदय की दिशा बदलती है। अंततः वही अवस्था आती है जहाँ इच्छा भी भगवान के लिए होती है और तृप्ति भी भगवान में ही मिलती है।
प्रश्न 3: सच्चा समर्पण क्या है?
उत्तर:
महाराज जी के अनुसार सच्चा समर्पण शब्दों से नहीं, भीतर की स्थिति से पहचाना जाता है। जब तक मनुष्य अपनी बुद्धि और इच्छा को सर्वोपरि मानता है, तब तक समर्पण अधूरा है। वास्तविक समर्पण तब है जब साधक अपनी योजना छोड़कर भगवान की इच्छा को स्वीकार करता है। सुख मिले या दुख—दोनों को प्रभु की व्यवस्था मानकर शांत रहना ही समर्पण की पहचान है। यह स्थिति अभ्यास और कृपा दोनों से आती है। जहाँ चिंता कम और विश्वास अधिक हो जाए, समझना चाहिए कि समर्पण बढ़ रहा है।
प्रश्न 4: हर समय प्रसन्न रहने का साधन क्या है?
उत्तर:
महाराज जी कहते हैं कि बाहरी कारणों से मिलने वाली खुशी स्थायी नहीं होती। सच्ची प्रसन्नता भगवान के स्मरण से आती है। जब मन नाम-जप में टिकता है, तब भीतर शांति का स्रोत खुलता है जो परिस्थितियों पर निर्भर नहीं होता। प्रसन्नता का अर्थ समस्या का अभाव नहीं, बल्कि भगवान की उपस्थिति का अनुभव है। इसलिए जो साधक स्मरण में रहता है, वह दुख में भी टूटता नहीं। यही स्थायी आनंद है।
प्रश्न 5: कौन-सी विरक्ति श्रेष्ठ है?
उत्तर:
महाराज जी बताते हैं कि भोग से तृप्त होकर आई विरक्ति स्थायी नहीं होती, क्योंकि इच्छा का बीज भीतर रहता है। सच्ची विरक्ति वह है जो विवेक से आती है—जहाँ साधक अनुभव करता है कि संसार क्षणभंगुर है और भगवान ही शाश्वत हैं। यह वैराग्य भीतर शांति देता है, दबाव नहीं। इसलिए विवेकजन्य विरक्ति श्रेष्ठ है।
प्रश्न 6: भगवत तत्व, भगवत साक्षात्कार और भगवत दर्शन में क्या अंतर है?
उत्तर:
महाराज जी समझाते हैं कि भगवत तत्व का अर्थ केवल भगवान का रूप देख लेना नहीं, बल्कि उनके वास्तविक स्वरूप का बोध होना है। दर्शन एक क्षणिक अनुभूति हो सकती है—जैसे किसी दिव्य रूप का अनुभव या किसी अलौकिक स्थिति का स्पर्श। परंतु भगवत साक्षात्कार उससे कहीं अधिक गहरी अवस्था है, जहाँ साधक की दृष्टि बदल जाती है और उसे हर स्थिति में भगवान का ही अस्तित्व अनुभव होने लगता है। वहाँ भगवान बाहर देखने की वस्तु नहीं रहते, बल्कि भीतर और बाहर सर्वत्र एक ही सत्य के रूप में प्रकट होते हैं। यही तत्व-बोध है। महाराज जी कहते हैं कि जब तक साधक भगवान को किसी विशेष स्थान या रूप में सीमित देखता है, तब तक तत्व की पूर्णता नहीं आई। पूर्ण साक्षात्कार में भेद समाप्त हो जाता है और साधक का चित्त स्थिर शांति और प्रेम से भर जाता है।
प्रश्न 7: कलियुग में 24 घंटे नाम-जप कैसे संभव है?
उत्तर:
महाराज जी बताते हैं कि निरंतर नाम-जप का अर्थ यह नहीं कि जिह्वा से लगातार शब्द बोले जाएँ, बल्कि यह है कि मन की धारा भगवान की ओर स्थिर हो जाए। प्रारंभ में जप प्रयास से होता है—नियम बनाकर, समय निकालकर, माला लेकर। धीरे-धीरे वही नाम मन में बसने लगता है और साधक के काम करते हुए भी भीतर चलता रहता है। यही अखंड जप की शुरुआत है। महाराज जी कहते हैं कि अभ्यास, धैर्य और कृपा—इन तीनों से यह अवस्था आती है। जब मन संसार में रस लेना छोड़कर नाम में आनंद लेने लगता है, तब जप अपने-आप होने लगता है। यही कलियुग का सबसे सरल और सर्वोच्च साधन है।
प्रश्न 8: खिन्नता से लेकर प्रभु-विरह तक की अवस्था में साधक स्वयं को कैसे संभाले?
उत्तर:
महाराज जी समझाते हैं कि साधना के मार्ग में मन की खिन्नता कोई असामान्य बात नहीं है। जब संसार का आकर्षण घटता है और भगवान का पूर्ण अनुभव अभी नहीं हुआ होता, तब बीच की अवस्था में शून्यता जैसी अनुभूति होती है। यही खिन्नता आगे चलकर विरह का रूप लेती है। यदि साधक इस अवस्था में धैर्य रखे और नाम-जप से जुड़ा रहे, तो यही विरह प्रेम को गहरा करता है। परंतु यदि वह निराश होकर भजन छोड़ दे, तो गिरावट आ सकती है। इसलिए इस समय सबसे आवश्यक है—संत-संग, नाम-स्मरण और धैर्य। महाराज जी कहते हैं कि विरह दुख नहीं, बल्कि मिलन की तैयारी है; इसलिए इसे कृपा समझकर सहना चाहिए।
प्रश्न 9: आध्यात्मिक जीवन के प्रारंभिक चरण में व्याकुलता से कैसे निकलें?
उत्तर:
महाराज जी बताते हैं कि प्रारंभिक साधना में मन स्थिर नहीं रहता और पुरानी इच्छाएँ बार-बार उठती हैं, जिससे व्याकुलता होती है। इससे घबराने की आवश्यकता नहीं है। नियमित नाम-जप, सत्संग और संयमित जीवन से धीरे-धीरे मन शांत होने लगता है। जैसे गंदा पानी समय के साथ साफ होता है, वैसे ही अंतःकरण भी भजन से निर्मल होता है। महाराज जी कहते हैं कि शुरुआत में धैर्य सबसे बड़ी साधना है। जो टिक गया, वही आगे बढ़ा। इसलिए जल्दी परिणाम चाहने के बजाय निरंतर अभ्यास आवश्यक है।
प्रश्न 10: भगवान से प्रेम न करके संसार में उलझे रहने का परिणाम क्या है?
उत्तर:
महाराज जी स्पष्ट करते हैं कि संसार का सुख सीमित है और इच्छा को समाप्त नहीं करता, बल्कि बढ़ाता है। इसलिए जो मन केवल संसार में उलझा रहता है, उसे स्थायी शांति कभी नहीं मिलती। बाहर सब कुछ होने पर भी भीतर खालीपन बना रहता है। इसके विपरीत भगवान से प्रेम होने पर साधक को ऐसी तृप्ति मिलती है जो किसी वस्तु से नहीं मिल सकती। महाराज जी कहते हैं कि जीवन का वास्तविक उद्देश्य भगवान की ओर मुड़ना है; यदि यह नहीं हुआ तो बाकी सब अधूरा रह जाता है।
प्रश्न 11: क्या भोग से वैराग्य संभव है?
उत्तर:
महाराज जी बताते हैं कि भोग से इच्छा समाप्त नहीं होती, बल्कि और सूक्ष्म रूप में लौट आती है। सच्चा वैराग्य विवेक से आता है—जब साधक अनुभव करता है कि संसार क्षणभंगुर है और स्थायी सुख भगवान में है। यह समझ ही विरक्ति को स्थिर बनाती है। इसलिए भोग से नहीं, ज्ञान और भजन से वैराग्य उत्पन्न होता है।
प्रश्न 12: शरणागति के बाद हर परिस्थिति मंगल कैसे लगे?
उत्तर:
महाराज जी कहते हैं कि सच्ची शरणागति में साधक यह विश्वास कर लेता है कि जो कुछ भी हो रहा है, वह प्रभु की कृपा से ही हो रहा है। तब सुख-दुख दोनों का प्रभाव कम हो जाता है और मन शांत रहता है। यही मंगल-दृष्टि है।
प्रश्न 13: संत-संग का वास्तविक महत्व क्या है?
उत्तर:
महाराज जी बताते हैं कि साधना के मार्ग में संत-संग केवल एक सहायक साधन नहीं, बल्कि जीवन की दिशा बदल देने वाला दिव्य अवसर है। मनुष्य का मन अत्यंत चंचल है और वह जिस संग में रहता है, वैसा ही बनता जाता है। यदि संग संसारिक विषयों का हो तो मन नीचे की ओर खिंचता है, और यदि संतों का हो तो वही मन धीरे-धीरे भगवान की ओर मुड़ने लगता है। संत केवल उपदेश देने वाले नहीं होते; उनका जीवन स्वयं चलता-फिरता शास्त्र होता है। उनके निकट रहने से साधक को यह अनुभव होता है कि भक्ति कोई कल्पना नहीं बल्कि जीने की वास्तविक अवस्था है। महाराज जी कहते हैं कि संत-संग से श्रद्धा जागती है, नाम में रुचि आती है और गिरने से रक्षा होती है। इसलिए जिसने सच्चा संत-संग पा लिया, उसने आधी दूरी पार कर ली। शेष मार्ग भजन स्वयं पूरा कर देता है।
प्रश्न 14: नाम-स्मरण सर्वोच्च साधन क्यों माना गया है?
उत्तर:
महाराज जी समझाते हैं कि अन्य साधन समय, स्थान और परिस्थिति पर निर्भर हो सकते हैं, पर भगवान का नाम हर समय उपलब्ध रहता है। नाम लेने के लिए विशेष योग्यता, विद्या या बाहरी व्यवस्था की आवश्यकता नहीं होती। यही कारण है कि कलियुग में नाम को सबसे सरल और सर्वोच्च साधन कहा गया है। नाम केवल उच्चारण नहीं, बल्कि भगवान की जीवित उपस्थिति है। जब साधक श्रद्धा से नाम लेता है तो धीरे-धीरे उसका मन शांत होने लगता है, भीतर की अशुद्धियाँ कम होती हैं और भगवान से संबंध अनुभव होने लगता है। महाराज जी कहते हैं कि नाम ही वह सेतु है जो जीव को सीधे भगवान से जोड़ देता है। इसलिए जिसने नाम को पकड़ लिया, उसने मुक्ति का मार्ग पकड़ लिया। नाम-स्मरण में निरंतरता ही उसकी शक्ति है, और यही साधना को पूर्णता तक पहुँचाती है।
प्रश्न 15: विषय-इच्छाएँ बार-बार क्यों उठती हैं?
उत्तर:
महाराज जी बताते हैं कि विषयों की इच्छाएँ वर्तमान जीवन की नहीं, बल्कि अनेक जन्मों के संचित संस्कारों की देन होती हैं। जब साधक भक्ति के मार्ग पर चलता है तब ये संस्कार तुरंत समाप्त नहीं होते, बल्कि समय-समय पर उठते रहते हैं। इससे घबराने की आवश्यकता नहीं है। यह साधना की असफलता नहीं बल्कि शुद्धि की प्रक्रिया का भाग है। जैसे गहरी जड़ वाला वृक्ष धीरे-धीरे ही उखड़ता है, वैसे ही विषय-वासना भी निरंतर नाम-जप और सत्संग से कमजोर होती है। महाराज जी कहते हैं कि इच्छाओं से लड़ने के बजाय नाम में मन लगाना चाहिए, क्योंकि प्रकाश आने पर अंधकार स्वयं हट जाता है। धैर्य रखने वाला साधक ही अंततः विजय पाता है। इसलिए बार-बार उठती इच्छा को देखकर निराश न हों, बल्कि इसे भजन बढ़ाने का संकेत समझें।
प्रश्न 16: मिलन से पहले विरह क्यों आता है?
उत्तर:
महाराज जी समझाते हैं कि विरह कोई नकारात्मक अवस्था नहीं, बल्कि प्रेम की परिपक्वता की तैयारी है। जब साधक का मन संसार से हटने लगता है और भगवान का पूर्ण अनुभव अभी प्राप्त नहीं हुआ होता, तब बीच की अवस्था में गहरी तड़प उत्पन्न होती है। यही विरह है। यह तड़प हृदय को कोमल बनाती है, अहंकार को गलाती है और भगवान के प्रति सच्ची चाह जगाती है। बिना विरह के प्रेम की गहराई प्रकट नहीं होती। महाराज जी कहते हैं कि जिस हृदय ने विरह का दर्द सह लिया, वही मिलन के आनंद को धारण कर सकता है। इसलिए विरह को दुख न समझें; यह भगवान की विशेष कृपा है जो साधक को अपने निकट ला रही होती है।
प्रश्न 17: भगवान में पूर्ण आश्रय का अनुभव कैसा होता है?
उत्तर:
महाराज जी बताते हैं कि पूर्ण आश्रय कोई बाहरी घटना नहीं बल्कि भीतर की गहरी शांति की अवस्था है। जब साधक का विश्वास परिस्थितियों पर नहीं बल्कि भगवान पर टिक जाता है, तब भय धीरे-धीरे समाप्त होने लगता है। उसे अनुभव होता है कि जो कुछ भी घट रहा है वह प्रभु की व्यवस्था में सुरक्षित है। इस अवस्था में भविष्य की चिंता कम हो जाती है और वर्तमान में संतोष बढ़ता है। यही आश्रय का लक्षण है। महाराज जी कहते हैं कि जहाँ पूर्ण आश्रय है वहाँ अकेलापन नहीं रहता, क्योंकि साधक हर समय भगवान की उपस्थिति अनुभव करता है। यह अनुभव शब्दों से अधिक मौन में समझ आता है।
प्रश्न 18: संसार की अस्थिरता को समझकर साधक क्या करे?
उत्तर:
महाराज जी कहते हैं कि संसार की अस्थिरता को देखकर निराश होना उद्देश्य नहीं है। इसका सही उपयोग यह है कि साधक समझे—जो बदलने वाला है उसमें स्थायी सुख नहीं मिल सकता। यह समझ उसे भगवान की ओर मोड़ती है। अस्थिरता वैराग्य जगाने के लिए है, उदासी पैदा करने के लिए नहीं। जब यह दृष्टि बनती है तो मन धीरे-धीरे शाश्वत की खोज करने लगता है। यही खोज भक्ति की शुरुआत है। इसलिए संसार की नश्वरता को कृपा समझें, क्योंकि वही मनुष्य को सत्य की ओर ले जाती है।
प्रश्न 19: मृत्यु महोत्सव कैसे बनती है?
उत्तर:
महाराज जी बताते हैं कि मृत्यु का भय उसी को होता है जिसने जीवन को केवल शरीर तक सीमित माना है। जो साधक जीवनभर भगवान का स्मरण करता है, उसके लिए मृत्यु अंत नहीं बल्कि मिलन का द्वार बन जाती है। जैसे कोई प्रिय से मिलने जा रहा हो, वैसे ही उसका भाव हो जाता है। इसलिए मृत्यु को शोक नहीं बल्कि परम परिवर्तन कहा गया है। महाराज जी कहते हैं—जिसने नाम को पकड़ लिया, उसके लिए मृत्यु भी कृपा का क्षण बन जाती है। यही कारण है कि संत मृत्यु को उत्सव की दृष्टि से देखते हैं।
प्रश्न 20: “मैं पतित हूँ पर प्रभु का हूँ” यह भाव कैसे स्थिर हो?
उत्तर:
महाराज जी समझाते हैं कि यह भाव विनम्रता और विश्वास दोनों का संगम है। जब साधक अपने दोषों को स्वीकार करता है लेकिन भगवान से संबंध नहीं छोड़ता, तब सच्ची शरणागति प्रकट होती है। यह भाव नाम-जप, प्रार्थना और संत-संग से धीरे-धीरे स्थिर होता है। इसमें निराशा नहीं, बल्कि आशा छिपी होती है—क्योंकि प्रभु का होना ही सबसे बड़ा सहारा है।
प्रश्न 21: नाम-जप से अंतःकरण की शुद्धि कैसे होती है?
उत्तर:
महाराज जी बताते हैं कि नाम केवल ध्वनि नहीं बल्कि चेतना को शुद्ध करने वाली दिव्य शक्ति है। निरंतर नाम-स्मरण से मन की अशुद्ध प्रवृत्तियाँ कमजोर होने लगती हैं और भीतर हल्कापन अनुभव होता है। जैसे जल से मल धुलता है, वैसे ही नाम से संस्कार धुलते हैं। यह प्रक्रिया धीरे-धीरे होती है, पर निश्चित होती है।
प्रश्न 22: मनुष्य जीवन का अंतिम लक्ष्य क्या है?
उत्तर:
महाराज जी के अनुसार मनुष्य जीवन केवल भोग या उपलब्धि के लिए नहीं, बल्कि भगवान की प्राप्ति के लिए मिला है। यही जीवन की पूर्णता है। जब हृदय में शुद्ध प्रेम प्रकट हो जाता है, तब यात्रा सफल मानी जाती है।
प्रश्न 23: सम्पूर्ण मार्ग का सार क्या है?
उत्तर:
महाराज जी पूरे आध्यात्मिक पथ को अत्यंत सरल सूत्र में बताते हैं—नाम पकड़ो, संत-संग रखो, विनम्र रहो और प्रेम माँगो। यही साधना का सार है और यही जीवन की सिद्धि है। जिसने यह समझ लिया, उसके लिए मार्ग कठिन नहीं रहता बल्कि कृपा से भर जाता है।
Credit:
“यह लेख संत श्री प्रेमानंद जी महाराज के एकान्तिक वार्तालाप प्रवचन की अमृत वाणी पर आधारित है।”
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