माला-1177: कौन-सी एक बात भगवत-प्राप्ति करा देती है? श्री प्रेमानंद महाराज जी के अमृत वचनों से नाम जप महिमा

प्रश्न 1: संत मार्ग से भगवत-प्राप्ति होती है तो गृहस्थ जीवन की क्या आवश्यकता है? क्या केवल कपड़ा बदलने से भगवान मिल जाते हैं? सच्चे संत के लक्षण क्या हैं?

उत्तर:
महाराज जी समझाते हैं कि भगवान की प्राप्ति का संबंध बाहरी स्थिति से नहीं, बल्कि भीतर की भावना से है। गृहस्थ जीवन बाधा नहीं है; यदि मन भगवान में लगा है तो वही गृहस्थी साधना का स्थान बन जाती है। केवल वस्त्र बदल लेने या बाहरी रूप धारण कर लेने से भगवत-प्राप्ति नहीं होती, क्योंकि भगवान वेश नहीं, हृदय देखते हैं। सच्चा संत वही है जिसके भीतर अहंकार नहीं रहता, जो सबके प्रति करुणा रखता है और स्वयं भगवान के स्मरण में स्थित रहता है। उसका जीवन दूसरों को शांति देता है, न कि आकर्षण या प्रदर्शन। महाराज जी कहते हैं—गृहस्थ हो या त्यागी, यदि नाम-स्मरण नहीं है तो दूरी है; और यदि नाम है तो वही निकटता है। इसलिए मार्ग बदलने से पहले हृदय बदलना आवश्यक है।


प्रश्न 2: नाम-जप की विभिन्न अवस्थाओं के बाद निरंतर मानसिक भजन की स्थिति कैसी होती है?

उत्तर:
महाराज जी बताते हैं कि प्रारंभ में नाम जिह्वा से लिया जाता है, फिर धीरे-धीरे वह मन में उतरता है। जब साधना गहरी होती है तो नाम अलग से लेने की आवश्यकता नहीं रहती—वह स्वयं भीतर चलता रहता है। यही निरंतर मानसिक भजन की अवस्था है। इस स्थिति में साधक बाहर से सामान्य दिखता है, पर भीतर उसका चित्त भगवान से जुड़ा रहता है। उसे संसार के बीच रहते हुए भी एक आंतरिक शांति का अनुभव होता है। यह अवस्था प्रयास से नहीं, कृपा और अभ्यास दोनों से आती है। महाराज जी कहते हैं—नियमित जप करते रहो, एक दिन नाम तुम्हें पकड़ लेगा। तब भजन करना नहीं पड़ेगा, भजन अपने-आप होगा।


प्रश्न 3: कौन-सी एक बात भगवत-प्राप्ति करा देती है और कौन-सी बात मार्ग से गिरा देती है?

उत्तर:
महाराज जी के अनुसार भगवान की प्राप्ति का मूल कारण है अनन्य आश्रय—जब साधक भीतर से केवल भगवान पर निर्भर हो जाता है। यही भाव उसे कृपा का पात्र बनाता है। इसके विपरीत जो बात साधक को गिरा देती है वह है अहंकार। जैसे ही मनुष्य अपने साधन, ज्ञान या नियमों पर गर्व करने लगता है, उसी क्षण दूरी बढ़ने लगती है। भगवान के मार्ग में विनय ही सुरक्षा है। महाराज जी कहते हैं—जहाँ “मैं” बढ़ता है वहाँ भगवान दूर होते हैं, और जहाँ “मैं” मिटता है वहाँ भगवान प्रकट होते हैं। इसलिए साधना से अधिक विनम्रता की रक्षा करनी चाहिए।


प्रश्न 4: भक्ति और भगवत-प्रेम इतने दुर्लभ क्यों हैं?

उत्तर:
महाराज जी बताते हैं कि संसार की इच्छाएँ बहुत प्रबल होती हैं, इसलिए मन भगवान की ओर स्थिर नहीं हो पाता। भक्ति दुर्लभ इसलिए लगती है क्योंकि मनुष्य उसे पूरे मन से चाहता ही नहीं—वह साथ-साथ संसार भी चाहता है। सच्चा प्रेम तभी आता है जब भगवान के अतिरिक्त कोई सहारा शेष नहीं रहता। यह दुर्लभ है, पर असंभव नहीं। जिस हृदय में सच्ची पुकार उठती है, वहाँ कृपा अवश्य होती है। इसलिए निराश होने की आवश्यकता नहीं; निरंतर नाम-जप और संत-संग से वही दुर्लभ प्रेम भी प्राप्त हो सकता है।


प्रश्न 5: सात्त्विक अहंकार से कैसे बचें?

उत्तर:
महाराज जी कहते हैं कि साधना करते-करते यह भाव आ सकता है कि “मैं नियमपालक हूँ, मैं श्रेष्ठ हूँ।” यही सात्त्विक अहंकार है। इससे बचने का उपाय है—अपने दोषों को देखना और दूसरों में भगवान को देखना। जब साधक समझता है कि जो कुछ भी हो रहा है वह भगवान की कृपा से है, तब अहंकार टिक नहीं पाता। विनम्रता ही भक्ति की रक्षा करती है। महाराज जी बार-बार कहते हैं—अपने को छोटा मानो, तभी भगवान बड़े रूप में अनुभव होंगे।


प्रश्न 6: धाम से दूर होने के विरह को कैसे देखें?

उत्तर:
महाराज जी समझाते हैं कि यदि धाम से दूर होना भगवान की सेवा या किसी उच्च कर्तव्य के कारण है, तो उसे विरह नहीं बल्कि सेवा का विस्तार समझना चाहिए। भगवान स्थान में सीमित नहीं हैं; उनका स्मरण जहाँ है, वही धाम है। बाहरी दूरी भीतर की निकटता को रोक नहीं सकती। इसलिए विरह को दुख न मानकर प्रेम की गहराई समझना चाहिए। यह भाव साधक को और अधिक स्मरण में स्थिर करता है।


प्रश्न 7: बाहरी पवित्रता और भक्ति का संतुलन कैसे रखें?

उत्तर:
महाराज जी कहते हैं कि पवित्रता आवश्यक है, पर यदि उसी में मन उलझ जाए और भजन छूटने लगे, तो संतुलन बिगड़ जाता है। बाहरी शुद्धता साधन है, लक्ष्य नहीं। वास्तविक पवित्रता हृदय की है। यदि मन भगवान में लगा है तो वही सर्वोच्च शुद्धि है। इसलिए बाहरी नियमों का पालन करें, पर उन्हें भजन से बड़ा न बना दें।


प्रश्न 8: क्या मृत्यु-भय से की गई भक्ति सही है?

उत्तर:
महाराज जी बताते हैं कि प्रारंभ में भय भी भगवान की ओर मोड़ सकता है, इसलिए उसे गलत नहीं कहा जा सकता। परंतु भक्ति की परिपक्व अवस्था भय से नहीं, प्रेम से होती है। यदि साधक भजन करते-करते भगवान को अपना मान ले, तो भय स्वयं समाप्त हो जाता है। इसलिए शुरुआत चाहे किसी कारण से हो, अंत प्रेम में होना चाहिए।


प्रश्न 9: भगवान के मिलन का अनुभव कैसा होता है?

उत्तर:
महाराज जी कहते हैं कि उस अनुभव को शब्दों में बाँधना संभव नहीं। वहाँ शांति, प्रेम और पूर्णता एक साथ प्रकट होते हैं। साधक को ऐसा लगता है कि उसकी सारी खोज समाप्त हो गई। कोई इच्छा शेष नहीं रहती, केवल आनंद रहता है। यही जीवन का परम लक्ष्य है।


प्रश्न 10: सब सुख होने पर भी शांति क्यों नहीं मिलती? सच्ची शांति कैसे मिले?

उत्तर:
महाराज जी समझाते हैं कि बाहरी सुख शरीर को आराम दे सकते हैं, पर मन को शांति नहीं दे सकते। मन की शांति केवल भगवान के स्मरण से आती है। नाम-जप से भीतर के पाप और अशांति धीरे-धीरे मिटते हैं और हृदय हल्का होने लगता है। यही वास्तविक शांति है—जो परिस्थिति बदलने से नहीं, भगवान से जुड़ने से मिलती है। इसलिए स्थायी शांति का मार्ग केवल भजन है।


Credit:
“यह लेख संत श्री प्रेमानंद जी महाराज के एकान्तिक वार्तालाप प्रवचन की अमृत वाणी पर आधारित है।”

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