माला-1172: आत्म-साक्षात्कार क्या है ? श्री प्रेमानंद महाराज जी के अमृत वचनों से नाम जप महिमा

प्रश्न 1: सहचरी भाव के लिए बाहरी वेश–भूषा (जटा, बाल, दाढ़ी) कितनी आवश्यक है?

उत्तर:
महाराज जी इस प्रश्न पर बहुत सहज और स्पष्ट भाव से उत्तर देते हैं। वे कहते हैं कि भक्ति का संबंध अंतर से है, बाहरी वेश से नहीं। कोई जटा रखे, कोई न रखे—इससे सहचरी भाव न आता है और न जाता है। समस्या तब होती है जब समाज हर स्थिति में टिप्पणी करता है। यदि कोई दाढ़ी बनाए तो कहा जाता है—बाबा होकर ऐसे क्यों घूम रहे हो; और यदि बाल बढ़ा ले तो कहा जाता है—किस लिए जटा बढ़ा ली।

महाराज जी कहते हैं—जीने दो। साधक का लक्ष्य यह नहीं होना चाहिए कि लोग क्या कहेंगे, बल्कि यह होना चाहिए कि भजन हो रहा है या नहीं। रोज साबुन लगाना, तेल लगाना, कंघी करना—इनसे न तो भक्ति बढ़ती है और न घटती है। और यदि कोई साधक सरल जीवन जी रहा है, तो उसे “जंगली” कहना भी मूर्खता है।

महाराज जी का निष्कर्ष है—
बाहरी दिखावे में मत उलझो। भजन करो।
यदि भजन है, तो सब ठीक है; और यदि भजन नहीं है, तो सारी वेश-भूषा व्यर्थ है।


प्रश्न 2: देहाभिमान श्रीजी की प्राप्ति में सबसे बड़ी बाधा है—इसे कैसे गलाया जाए?

उत्तर:
महाराज जी बहुत दृढ़ता से कहते हैं कि देहाभिमान स्वयं से नहीं गलता। इसके लिए भक्तों की शरण अनिवार्य है। केवल तप, नियम या व्यक्तिगत प्रयास से यह अभिमान नहीं टूटता।

वे बताते हैं कि भक्तों के पावन चरित्रों का श्रवण, उनके चरणों की रज का सेवन, और मन-वचन-कर्म से उनकी सेवा—यही देहाभिमान को गलाने का वास्तविक उपाय है। जब साधक भक्तों के संग में रहता है, उनके जीवन को देखता है, तब जाति, कुल, विद्या, शरीर—सबका अभिमान धीरे-धीरे नष्ट हो जाता है।

महाराज जी कहते हैं—जिसे भगवान की कृपा चाहिए, उसे भक्त-सेवन करना चाहिए। भक्तों की कृपा से पुराने अपराध भी क्षमा हो जाते हैं और हृदय निराभिमानी बनता है। इसी मार्ग से इसी जन्म में भगवत-प्राप्ति संभव है।


प्रश्न 3: आत्म-साक्षात्कार क्या है और उसके बाद कैसी अवस्था होती है?

उत्तर:
महाराज जी समझाते हैं कि आत्म-साक्षात्कार किसी और का अनुभव नहीं, बल्कि अपने ही स्वरूप का अनुभव है। अभी जीव स्वयं को देह मान बैठा है—स्थूल, सूक्ष्म और कारण शरीर में उलझा हुआ है। जब तक इन तीनों शरीरों से अपने को अलग नहीं देखता, तब तक आत्म-स्वरूप का अनुभव नहीं हो सकता।

जहाँ आत्म-स्वरूप का बोध हो जाता है, वहाँ अखंड आनंद प्रकट होता है। उस अवस्था में न शोक रहता है, न चिंता, न भय, न कोई चाह। वही ब्रह्मभूत अवस्था है। यह तभी संभव है जब लोक और परलोक के भोगों से पूर्ण वैराग्य हो, गुरु-चरणों का आश्रय मिले और विवेक जागृत हो।

महाराज जी स्पष्ट करते हैं—यह अनुभव कल्पना से नहीं, जीवन-भर की साधना से आता है।


प्रश्न 4: शरणागति कैसे पुष्ट हो? बुद्धि के तर्क कैसे शांत हों?

उत्तर:
महाराज जी कहते हैं कि शरणागति का आधार है—गुरु-प्रदत्त नाम और मंत्र का निरंतर जप। जितना जप बढ़ेगा, उतनी गुरु में श्रद्धा और विश्वास बढ़ेगा। जो गुरु-मंत्र का जप नहीं करता और मनमानी करता है, उसकी श्रद्धा टिक नहीं पाती और वह दोष-दर्शन करने लगता है।

महाराज जी एक सुंदर उदाहरण देते हैं—
नाम पहरेदार है और ध्यान दरवाजा।
जहाँ नाम और ध्यान है, वहाँ माया प्रवेश नहीं कर पाती। खुला हृदय माया से जल्दी प्रभावित होता है, पर नाम-ध्यान से सुरक्षित हृदय में माया टिक नहीं पाती।


प्रश्न 5: तत्व-ज्ञान होने के बाद क्या माया फिर गिरा सकती है?

उत्तर:
महाराज जी स्पष्ट करते हैं कि माया का अर्थ ही है भ्रम। जब तक तत्व-बोध नहीं होता, तब तक माया प्रतीत होती है। जैसे रस्सी में सर्प का भ्रम अज्ञान से होता है—प्रकाश होने पर सर्प नहीं रहता।

इसी प्रकार ब्रह्म-बोध हो जाने पर माया का अस्तित्व नहीं रहता। माया तब तक है, जब तक अज्ञान है। ज्ञान के प्रकाश में माया स्वयं नष्ट हो जाती है।


प्रश्न 6: क्या त्राटक, कुंडलिनी आदि से वैराग्य हो सकता है?

उत्तर:
महाराज जी अत्यंत दृढ़ शब्दों में कहते हैं—बिना हरि-भजन के कुछ नहीं होता। त्राटक, आसन, योग—ये सब सहायक साधन हैं, मुख्य साधन नहीं। जैसे मंत्र-जप में पद्मासन सहायक है, पर केवल पद्मासन से भगवान नहीं मिलते।

यदि भजन नहीं है, तो सारे साधन शून्य हैं। और यदि भजन है, तो अन्य साधन सहायक बनकर लाभ देते हैं। इसलिए मुख्य साधन नाम-जप ही होना चाहिए।


प्रश्न 7: दीक्षा का वास्तविक अर्थ क्या है?

उत्तर:
महाराज जी कहते हैं—इच्छा का समर्पण ही दीक्षा है। केवल कंठी पहन लेना या कान छिदवा लेना दीक्षा नहीं। अपनी इच्छाओं को गुरुदेव की इच्छा में विलीन कर देना, मनमाने आचरण का त्याग करना और गुरु-आज्ञा पर चलना—यही सच्ची दीक्षा है।


प्रश्न 8: यदि साधक इस जीवन में गिर जाए, तो क्या अगले जन्म में सब ठीक हो जाएगा?

उत्तर:
महाराज जी बहुत कठोर प्रेम के साथ कहते हैं—यह सोच ही पतन का कारण है। आज भोगों की छूट देकर कल सुधरने की योजना बनाना आत्म-धोखा है। जो आज अभ्यास करता है, वही आगे भी वही करेगा।

महाराज जी कहते हैं—इसी जन्म में सुधार करो। नाम में इतनी सामर्थ्य है कि सारे पाप मिटा दे। अगले जन्म पर मत टालो। आज ही भजन को पक्का करो।


प्रश्न 9: क्या नाम-रूपी धन से भगवान को “खरीदा” जा सकता है?

उत्तर:
महाराज जी कहते हैं—हाँ, खरीदा जा सकता है। नाम में इतनी सामर्थ्य है कि भगवान भक्त के अधीन हो जाते हैं। इतिहास और संत-चरित्र इसके प्रमाण हैं। नाम-जप से भगवान स्वयं भक्त की सेवा में लग जाते हैं।


प्रश्न 10: सरलता और उदारता कैसे आए? क्या यह अंतिम जन्म का संकेत है?

उत्तर:
महाराज जी बताते हैं कि सरलता और उदारता भगवान के गुण हैं। जब नाम-जप, संत-संग और लीला-श्रवण बढ़ता है, तब ये गुण हृदय में उतरते हैं। संतों का संग मिलना स्वयं संकेत है कि मुमुक्षुता जाग चुकी है

महाराज जी कहते हैं—क्यों न मान लें कि यही अंतिम जन्म है और इसी जन्म में भगवान को पाना है।


प्रश्न 11: चित्रकूट जैसे धाम में वास का सही भाव क्या होना चाहिए?

उत्तर:
महाराज जी बताते हैं कि हर धाम की अपनी साधना-प्रधानता है। चित्रकूट वैराग्य-प्रधान भूमि है। यदि वहाँ भोग-राग के साथ वास किया जाए, तो विशेष लाभ नहीं मिलता। वैराग्य पूर्वक नाम-जप करने से वहाँ शीघ्र लाभ होता है।


प्रश्न 12: समाज से तिरस्कार मिलने पर धैर्य कैसे बना रहे?

उत्तर:
महाराज जी कहते हैं—जो परमार्थ में चलता है, उसे लोग कुछ भी कहेंगे। पर जो दूसरों को उत्साह देता है, उनका धैर्य संभालता है, वही सच्चा परमार्थ करता है। ऐसे कार्य में भगवान का वात्सल्य स्वयं प्रकट होता है।


निष्कर्ष

महाराज जी का संदेश अत्यंत स्पष्ट है—
नाम-जप को केंद्र बनाओ, वैराग्य को आधार बनाओ और शरणागति को जीवन बना लो।
यही मार्ग माया से पार ले जाता है।


Credit

“यह लेख संत श्री प्रेमानंद जी महाराज के एकान्तिक वार्तालाप प्रवचन की अमृत वाणी पर आधारित है।”

यह भी पढ़ें माला-1166:पूर्व संस्कार और आदतें कैसे बदलती हैं? श्री प्रेमानंद महाराज जी के अमृत वचनों से नाम जप महिमा

Leave a Reply