प्रश्न 1: व्रत, उपवास और संयम क्या शरणागति में बाधा बनते हैं?
उत्तर:
श्री प्रेमानंद महाराज जी बताते हैं कि व्रत और उपवास का उद्देश्य मन को संयम में लाना है, मन को पवित्र बनाना है। यह साधना की प्रारंभिक अवस्था में सहायक होते हैं, लेकिन इनका कोई अंतिम या विशेष महत्व नहीं है।
महाराज जी स्पष्ट करते हैं कि प्रधानता भजन की है। यदि अल्पाहार करके मन भजन में तन्मय हो रहा है, तो अल्पाहार उत्तम है। लेकिन यदि भोजन की चिंता से भजन में विक्षेप आ रहा है, तो साधारण भोजन करके भी भजन करना अधिक श्रेष्ठ है।
साधक को यह नहीं सोचना चाहिए कि मुझे फलाहार ही करना है या केवल उपवास ही रखना है। यह देखना चाहिए कि भगवान की स्मृति में डूबने में क्या सहायक है। जीवन भर यह भाव रहना चाहिए कि हम भगवान के बिना नहीं रह सकते, बाकी सबके बिना रह सकते हैं।
प्रश्न 2: क्या ज्ञान मार्ग और भक्ति मार्ग एक साथ चल सकते हैं?
उत्तर:
महाराज जी कहते हैं कि आरंभ में थोड़ी दूर तक दोनों मार्ग साथ चल सकते हैं, लेकिन सिद्ध अवस्था में नहीं। ज्ञान मार्ग की सिद्धि “मैं” की परिपक्वता है — अहं ब्रह्मास्मि।
भक्ति मार्ग की सिद्धि “दास भाव” है — दासोऽहम। भक्ति में रस है, सेवा है, प्रेम है। ज्ञान मार्ग में समस्त चराचर को अपने आत्म स्वरूप में देखना है, जबकि भक्ति में उसी तत्व को भगवान के रूप में प्रेम करना है।
तत्व एक ही है, लेकिन रस अलग-अलग है। यदि दोनों को एक साथ बहुत आगे तक ले जाने का प्रयास किया गया, तो वह खिचड़ी बन जाएगी और न भक्ति का रस मिलेगा, न ज्ञान का। इसलिए भगवान ने एक मार्ग चुनकर चलने की आज्ञा दी है।
प्रश्न 3: मन, बुद्धि और चेतना क्या हैं?
उत्तर:
श्री प्रेमानंद महाराज जी बताते हैं कि मन, बुद्धि और चेतना — यह सब सूक्ष्म शरीर के अंग हैं।
स्थूल शरीर पंचभूतों से बना है, जिसे हम जाग्रत अवस्था में देखते हैं। सूक्ष्म शरीर में अंतःकरण, इंद्रियाँ और त्रिगुण माया होती है, जो स्वप्न अवस्था में कार्य करती है।
इन दोनों का कारण शरीर होता है, जो सुषुप्त अवस्था में रहता है। इन तीनों को प्रकाशित करने वाली शक्ति चेतना है। वही चेतना आत्मा है — अजन्मा, अविनाशी।
जब जीव इस चेतना को भूलकर शरीरों में राग करता है, तब जन्म-मरण का चक्र चलता रहता है।
प्रश्न 4: मल, विक्षेप और आवरण क्या हैं?
उत्तर:
श्री प्रेमानंद महाराज जी समझाते हैं कि
- मल है — अनेक जन्मों की दुर्वासनाएँ
- विक्षेप है — बार-बार मन का भोगों में जाना
- आवरण है — देहाभिमान और अहंकार
भजन करने से दुर्वासनाएँ नष्ट होती हैं, भोगों की इच्छा शांत होती है और अहंकार गल जाता है।
जब इच्छा, वासना और अहंकार नष्ट हो जाते हैं, तब जीव मल-विक्षेप-आवरण से मुक्त होकर भगवान को प्राप्त हो जाता है।
प्रश्न 5: गुरु के प्रति विरह की स्थिति कैसी होती है?
उत्तर:
श्री प्रेमानंद महाराज जी कहते हैं कि गुरु के प्रति जो प्रेम होता है, वही इष्ट के प्रति प्रेम होता है। गुरु की कृपा से ही नाम-मंत्र मिला, भक्ति मिली, सुख मिला — यह भाव साधक को भीतर से भर देता है।
विरह में रोना आता है, गुरु को याद करके उनसे बातें होती हैं, उनसे प्रार्थना होती है कि कभी हमसे विलग न हों।
गुरु प्रेम का अर्थ केवल साथ रहना नहीं है, बल्कि गुरु की आज्ञा का पालन, गुरु-मंत्र का जप और गुरु के प्रति आंतरिक आसक्ति है।
प्रश्न 6: चिंता कैसे कम हो?
उत्तर:
श्री प्रेमानंद महाराज जी कहते हैं कि चिंता का मूल कारण संसार का चिंतन है। जैसे ही साधक भगवत चिंतन में लगने लगता है, वैसे ही संसार की चिंताएँ अपने-आप कम होने लगती हैं।
धन, भोग और सुविधाएँ मन को शांति नहीं दे सकतीं। जब तक भगवान की शरण नहीं ली जाती, तब तक भय, शोक और चिंता बनी रहती है।
भगवान का नाम चिंतामणि है। जो नाम को हृदय में धारण कर लेता है, उसकी चिंताएँ गल जाती हैं। उठते-बैठते, चलते-फिरते नाम-जप करने से यह लोक और परलोक दोनों मंगलमय हो जाते हैं।
प्रश्न 7: भगवान भक्तों का प्रारब्ध क्यों नहीं मिटाते?
उत्तर:
महाराज जी बताते हैं कि भगवान अपने भक्तों को कायर नहीं बनाते। प्रारब्ध भोग को मिटाने की बजाय, भगवान उसे सहने की सामर्थ्य देते हैं।
प्रत्यक्ष कष्ट भक्त को परिपक्व करता है, मजबूत बनाता है और भगवान के साक्षात्कार का योग बनाता है। प्रतिकूलता में ही शरणागति प्रगाढ़ होती है।
प्रह्लाद, द्रौपदी और गजेंद्र — सभी के जीवन में प्रतिकूलता आई, और उसी क्षण भगवान प्रकट हुए। इसलिए प्रतिकूलता भगवान की कृपा का एक गुप्त रूप है।
प्रश्न 8: क्या हर साधक को ऐसी कठोर परीक्षाओं से गुजरना पड़ता है?
उत्तर:
महाराज जी स्पष्ट करते हैं कि नहीं। भगवान हर भक्त के साथ अलग-अलग व्यवहार करते हैं। जैसे हर रोग की दवा अलग होती है, वैसे ही हर साधक की साधना अलग होती है।
जो देहाभिमानी होता है, उसे भगवान कठिनाइयों से परिपक्व करते हैं। और जो सहज भाव से भक्ति में स्थित है, उसे सुख में भी रख सकते हैं।
डरने की आवश्यकता नहीं है। भगवान अपने निज पार्षदों से ही ऐसे गूढ़ खेल खेलते हैं। साधारण भक्तों से नहीं।
प्रश्न 9: भगवान का पार्षद बनने का अर्थ क्या है?
उत्तर:
श्री प्रेमानंद महाराज जी कहते हैं कि पार्षद बनने का अर्थ है — सर्वस्व समर्पण।
तन, मन, प्राण, इच्छा, प्रतिष्ठा — सब कुछ भगवान के चरणों में अर्पित कर देना। अपना शब्द केवल भगवान के लिए रखना।
जहाँ यह भाव आ जाता है कि “यह शरीर भी मेरा नहीं, प्रभु का है”, वहीं से पार्षद भाव शुरू होता है।
निष्कर्ष
महाराज जी की वाणी का सार यही है कि भक्ति कोई साधारण मार्ग नहीं है। यह समर्पण, धैर्य और नाम-जप का मार्ग है।
नाम-जप से चिंता मिटती है, विक्षेप शांत होता है, अहंकार गलता है और अंततः भगवान की प्राप्ति होती है।
जो इस मार्ग पर श्रद्धा से चलता है, उसका जीवन धीरे-धीरे शांति, स्थिरता और प्रेम से भर जाता है।
Credit
“यह लेख संत श्री प्रेमानंद जी महाराज के एकान्तिक वार्तालाप प्रवचन की अमृत वाणी पर आधारित है।”
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