माला-1167:भगवत साक्षात्कार से पहले कोई विशेष लक्षण या अवस्था आती है क्या? श्री प्रेमानंद महाराज जी के अमृत वचनों से नाम जप महिमा

प्रश्न 1: पति के भजन का आधा फल पत्नी को मिलने का वास्तविक अर्थ क्या है?

उत्तर:
श्री प्रेमानंद महाराज जी इस विषय को बहुत स्पष्ट और व्यावहारिक रूप से समझाते हैं। वे कहते हैं कि “आधा फल” मिलने की बात कोई गणितीय या यांत्रिक नियम नहीं है। यह धर्म, भाव और आचरण पर आधारित है। यदि पत्नी अपने पति को वास्तव में अपना परम आश्रय मानकर, उसकी सेवा में, उसकी आज्ञा में और धर्मयुक्त आचरण में जीवन व्यतीत करती है, तब पति का धर्म, जप, तप और भजन उसके लिए भी फलदायी हो जाता है। क्योंकि ऐसे में पत्नी ने अपने पति को ही अपना ईश्वर मान लिया होता है।

लेकिन महाराज जी यह भी उतनी ही दृढ़ता से कहते हैं कि यदि पत्नी मनमानी करे, पति के प्रति सम्मान न रखे, धर्मविरुद्ध आचरण करे और यह सोचे कि “पति भजन करेगा और मुझे आधा फल मिल जाएगा”, तो यह भ्रम है। ऐसा नहीं होता। अधर्म में रहते हुए किसी के धर्म का फल नहीं मिलता।

महाराज जी का भाव यह है कि पति-पत्नी दोनों यदि धर्मपूर्वक चलें, पति भगवत मार्ग में अग्रसर हो और पत्नी उसे भगवान मानकर श्रद्धा से अपनाए, तो दोनों का जीवन मंगलमय बन जाता है। वहाँ कोई हिसाब-किताब नहीं, वहाँ कृपा बहती है। लेकिन जहाँ आचरण विपरीत है, वहाँ “आधा फल” जैसी कोई व्यवस्था नहीं चलती।


प्रश्न 2: भगवत साक्षात्कार से पहले कोई विशेष लक्षण या अवस्था आती है क्या?

उत्तर:
महाराज जी बहुत सीधी बात कहते हैं—पहले अपनी स्थिति देखो। अभी हम काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद और मत्सर के अधीन हैं। मन और इंद्रियों के गुलाम हैं। ऐसी स्थिति में भगवत साक्षात्कार के लक्षणों की चर्चा करना ऐसा है जैसे कोई प्राथमिक पढ़ाई किए बिना पीएचडी की बात करे।

भगवत साक्षात्कार अंतिम अवस्था है। उससे पहले लंबी यात्रा है। जब साधक निरंतर नाम-जप करता है, भगवान की लीला-कथा सुनता है, परोपकार की वृत्ति अपनाता है और सबमें भगवत भाव देखने लगता है, तब धीरे-धीरे हृदय निर्विकार होने लगता है।

महाराज जी कहते हैं कि जब मन, बुद्धि, चित्त और अहंकार पूरी तरह भगवान में तन्मय हो जाते हैं, जब हृदय में किसी भी प्रकार का विकार, चाह, मान-अपमान, निंदा-स्तुति का प्रभाव नहीं रह जाता, तब वह अवस्था आती है जहाँ केवल भगवान ही शेष रह जाते हैं।

वह अवस्था वर्णन से परे है। उसे सुनकर नहीं, केवल जीकर जाना जाता है। इसलिए महाराज जी का उपदेश यही है—लक्षणों के पीछे मत भागो, नाम-जप में लगो। जब पात्रता बनेगी, भगवान स्वयं प्रकट हो जाएंगे।


प्रश्न 3: माया में फँसे सांसारिक व्यक्ति का कल्याण कैसे संभव है?

उत्तर:
महाराज जी कहते हैं कि हम जैसे सांसारिक लोग बड़े-बड़े तप और कठिन साधनाएँ नहीं कर सकते। यह सत्य है। लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि हमारा कल्याण असंभव है। भगवान ने संतों को इसी लिए पृथ्वी पर प्रकट किया है।

संतों का संग अत्यंत दुर्लभ है, लेकिन उसका फल निश्चित है। जब किसी को संतों का दर्शन, उनका संग और उनके वचनों का श्रवण मिल जाता है, तो उसके भीतर नाम-जप और अध्यात्म के प्रति रुचि जागृत होने लगती है। वही रुचि धीरे-धीरे लालसा बनती है—“मैं भी भगवान को पाऊँ।”

महाराज जी कहते हैं कि जब यह दीन भाव जागृत हो जाता है कि “मैं दोषों से भरा हूँ, फिर भी भगवान से मिलना चाहता हूँ”, तब भगवान स्वयं साधन उपलब्ध कराते हैं। हमें चिंता नहीं करनी चाहिए कि हम बार-बार गिर जाते हैं। संत संग, सत्संग और नाम-जप हमें बार-बार उठाते रहेंगे।

यही सांसारिक व्यक्ति का मार्ग है—तप नहीं, लेकिन संत संग और शरणागति


प्रश्न 4: भजन की भूख और लालसा कैसे बढ़ती है?

उत्तर:
महाराज जी स्पष्ट कहते हैं कि भजन अकेले नहीं होता। भजन संतों की कृपा से होता है। जब तक भजनानंदी महापुरुषों का संग नहीं मिलता, तब तक भजन की वास्तविक भूख जागृत नहीं होती।

जब हम भक्तों और महापुरुषों के चरित्र पढ़ते और सुनते हैं, तब हृदय में एक कसक उठती है—“मेरे भीतर कब ऐसा भजन चलेगा?” यही कसक भजन की भूख है। फिर यह भूख धीरे-धीरे इतनी तीव्र हो जाती है कि संसार के भोग सांप की तरह डरावने लगने लगते हैं।

महाराज जी कहते हैं कि बाहर से साधक संसार में बैठा हो सकता है, लेकिन भीतर से वह भगवान की शरण में भाग चुका होता है। आधे क्षण के लिए भी प्रभु का स्मरण छूट जाए तो उसे व्याकुलता होने लगती है।

इसलिए उपाय यही है—भक्त संग करो, भक्त चरित्र पढ़ो और नाम में हठपूर्वक लगो। हठ से नाम जपने पर ही रुचि आती है और रुचि से प्रेम जागृत होता है।


प्रश्न 5: नाम-जप करते समय हृदय में जलन या विकार उठें तो क्या करें?

उत्तर:
महाराज जी इसे बहुत शुभ संकेत बताते हैं। वे कहते हैं—यह जलन बहुत काम की है। यह जलन ही हृदय में जमी हुई दुर्वासनाओं को भस्म करेगी। जब नाम-जप चलता है और भीतर विकार उठते हैं, तो समझना चाहिए कि दबे हुए संस्कार बाहर आकर नष्ट हो रहे हैं।

महाराज जी की सख्त चेतावनी है—इस समय गलत क्रिया मत करना। यदि विकार उठने पर व्यक्ति विषय-भोग कर लेता है, तो नए संस्कार बन जाते हैं और फिर यात्रा लंबी हो जाती है।

गृहस्थ के लिए महाराज जी संतुलित मार्ग बताते हैं। धर्मयुक्त विषयों का त्याग नहीं है, अधर्मयुक्त विषयों का त्याग है। अपनी पत्नी के साथ धर्मपूर्वक जीवन और अपने कर्म भगवान को अर्पित करना—इससे गृहस्थ भी उसी गति को प्राप्त कर सकता है जो योगी को मिलती है।


प्रश्न 6: गुरु के प्रति भय और संकोच क्यों आवश्यक है?

उत्तर:
महाराज जी कहते हैं कि गुरुदेव से भय बना रहना बहुत बड़ा सौभाग्य है। यह भय साधना को सुरक्षित करता है। जब शिष्य के मन में यह भाव रहता है कि “कहीं मेरे आचरण से गुरुदेव दुखी न हो जाएँ”, तब वह स्वतः संयमित रहता है।

जो गुरु से डरता है, उससे माया डरती है। जो गुरुदेव के सामने नमन होकर खड़ा रहता है, काल भी उसका बाल बाँका नहीं कर सकता। महाराज जी स्पष्ट कहते हैं कि गुरु की अवज्ञा करने वाला चाहे कितनी भी साधना कर ले, भगवत साक्षात्कार नहीं हो सकता।

मंत्र, उपासना और साधना तभी फलित होती है जब गुरु की आज्ञा में रहा जाए। गुरु-कृपा ही मोक्ष का मूल है।


प्रश्न 7: सब कुछ होते हुए भी मनुष्य असंतुष्ट क्यों रहता है?

उत्तर:
महाराज जी कहते हैं कि हमारी चाह वस्तुओं की नहीं, परमात्मा की है। हम अखंड सुख, शुद्ध प्रेम, पूर्ण शांति और अविनाशिता चाहते हैं। ये चारों गुण केवल भगवान में हैं।

इसीलिए धन, पद, प्रतिष्ठा और भोग कभी तृप्ति नहीं देते। जब तक भगवान का नाम हृदय में नहीं उतरता, तब तक “और चाहिए” की आग शांत नहीं होती।

नाम-जप से जब भगवान का स्पर्श मिलता है, तब हृदय कह उठता है—“अब कुछ नहीं चाहिए।” यही सच्चा संतोष है।


प्रश्न 8: जड़-चेतन की ग्रंथि कैसे टूटती है?

उत्तर:
महाराज जी कहते हैं कि यह ग्रंथि वास्तव में लगी ही नहीं है। यह केवल भ्रम है। हमने इस देह को अपना स्वरूप मान लिया है, जबकि हम आत्म स्वरूप हैं।

इस भ्रम को तोड़ने के लिए सद्गुरु की शरण आवश्यक है। जानकारी सबको है, लेकिन शुद्ध ज्ञान नहीं। शुद्ध ज्ञान वही है जो जीवन में उतर जाए।

नाम-जप, सत्संग और गुरु-कृपा से ही यह भ्रम टूटता है। बिना भगवान की आराधना के यह ग्रंथि नहीं कटती। नाम-जप से ही सर्व ज्ञान प्रकाशित होता है। नाम में ही प्रेम, ज्ञान, वैराग्य और भक्ति सब निहित हैं।


✍️ Credit

यह लेख संत श्री प्रेमानंद जी महाराज के एकान्तिक वार्तालाप प्रवचन की अमृत वाणी पर आधारित है।

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