माला-1165:प्रेम और मोह में अंतर कैसे समझें? श्री प्रेमानंद महाराज जी के अमृत वचनों से नाम जप महिमा

प्रश्न 1: अतीत की गलतियाँ, अपराधबोध और भय नाम-जप में बाधा बनते हैं, इससे मुक्त कैसे हों?

उत्तर:
श्री प्रेमानंद महाराज जी बताते हैं कि जब तक हृदय पूरी तरह पवित्र नहीं होता, तब तक पुराने कर्म और संस्कार वासना बनकर सामने आते रहते हैं। यह इस जन्म के भी हो सकते हैं और पूर्व जन्मों के भी। अपराधबोध और भय का समाधान संसार से नहीं, नाम-जप से होता है।
महाराज जी कहते हैं कि गलती को पहचान लेने के बाद उसे दोहराना नहीं चाहिए। लोग क्या सोचते हैं, इस पर ध्यान देने से साधना नहीं बनती। संसार का स्वभाव है कि वह एक गलती को जीवन भर याद रखता है। इसलिए मनुष्य को भगवान पर भरोसा रखना चाहिए।
सच्ची उन्नति चरित्र से होती है। जो उन्नति चरित्र खोकर होती है, उसका परिणाम विनाश होता है। नाम-जप से बुद्धि शुद्ध होती है, विवेक जागता है और भय-चिंता-शोक का अंत होता है। धर्म से चलने पर ही निर्भय और निश्चिंत जीवन मिलता है।


प्रश्न 2: आत्मबोध ज्ञान के बाद की अंतर यात्रा और नाम-जप की निरंतरता – इनमें क्या अंतर है?

उत्तर:
महाराज जी स्पष्ट करते हैं कि नाम-जप के बिना आत्मबोध स्थायी नहीं हो सकता। नाम-जप से पाप नष्ट होते हैं और बुद्धि पवित्र होती है। जब बुद्धि शुद्ध होती है, तब विवेक प्रकट होता है।
विवेक संसार और परलोक के भोगों से वैराग्य दिलाता है। जब वैराग्य दृढ़ होता है, तब ब्रह्मबोध प्रदान करने वाला ज्ञान प्रकट होता है। इसलिए नाम-जप मूल है।
सिर्फ पढ़ लेने, सुन लेने या प्रवचन कर लेने से आत्मबोध नहीं होता। संसार का चिंतन छोड़े बिना शुद्ध ज्ञान संभव नहीं है। नाम-जप से जगत का चिंतन छूटता है और स्वरूप-बोध में स्थिति आती है।


प्रश्न 3: सच्ची भक्ति की पहचान क्या है?

उत्तर:
श्री प्रेमानंद महाराज जी कहते हैं कि सच्ची भक्ति की पहचान यह है कि भक्त का प्रत्येक आचरण भगवान को समर्पित हो। जीवन का कोई भी कर्म ऐसा न हो जो पापयुक्त हो।
भगवान का थोड़ा सा विस्मरण भी हृदय में व्याकुलता पैदा कर दे—जैसे जल से बाहर निकली मछली तड़पती है। यदि संसार का कोई वैभव आधे पल के लिए भी भगवान के स्मरण से विचलित न कर सके, वही उत्तम भक्ति है।
जहाँ भगवान में ऐसी आसक्ति हो जाए कि सब कुछ छूट जाए, वहीं से प्रेम-लक्षणा भक्ति का प्राकट्य होता है।


प्रश्न 4: संसार में तुरंत आसक्ति हो जाती है, पर भगवान से वैसा प्रेम क्यों नहीं होता?

उत्तर:
श्री प्रेमानंद महाराज जी बताते हैं कि मन और इंद्रियों की गति स्वाभाविक रूप से संसार की ओर होती है। विषय, शरीर और भोग प्रिय लगते हैं, जबकि भगवान अप्रकट हैं।
भगवान से प्रेम के साधन हैं—नाम-जप, संत-संग, लीला-कथा का श्रवण, भक्तों के चरित्र सुनना और पवित्र आचरण। जब धीरे-धीरे संसार का राग कम होता है, तब भगवान से अनुराग बढ़ता है।
प्रेम परीक्षा से गुजरता है। जब संसार के आकर्षण सामने आएँ और मन उनसे हट जाए, तभी भगवान से सच्चा प्रेम प्रकट होता है।


प्रश्न 5: यदि नाम-अपराध हो जाए और पश्चाताप हो, तो क्या नाम-जप का फल मिलेगा?

उत्तर:
महाराज जी कहते हैं कि मनुष्य से गलती हो सकती है। यदि अपराध के बाद पश्चाताप हो और नाम-कीर्तन किया जाए, तो नाम-जप स्वयं अपराधों को नष्ट कर देता है।
नाम-कीर्तन में जो आंतरिक दाह उत्पन्न होता है, वही अपराध-मोचन करता है। लेकिन जानबूझकर अपराध नहीं करना चाहिए। कुसंग से यदि भूल हो जाए, तो चिंता नहीं, नाम-जप से उसे नष्ट किया जा सकता है।


प्रश्न 6: ब्रह्ममुहूर्त कब होता है और क्या केवल स्तोत्र-पाठ से मुक्ति संभव है?

उत्तर:
श्री प्रेमानंद महाराज जी बताते हैं कि प्रातःकालीन ब्रह्ममुहूर्त लगभग 4 बजे से माना जाता है। स्तोत्र-पाठ का फल अवश्य है, लेकिन केवल पाठ से भगवान की प्राप्ति कठिन है।
यदि पाठ के बाद भी दिन भर संसार-चिंतन चलता रहे, तो साधना अधूरी रह जाती है। इसलिए महाराज जी निरंतर नाम-स्मरण पर बल देते हैं। चलते-फिरते, उठते-बैठते नाम चलता रहे, तभी अंतिम समय स्मृति स्थिर रहती है।


प्रश्न 7: गुरु दीक्षा लेने का भय है कि नियम टूट गए तो पाप लगेगा, क्या करें?

उत्तर:
श्री प्रेमानंद महाराज जी कहते हैं—अभी नाम-जप करते रहो। जब गुरु की वास्तविक आवश्यकता जागेगी, तब भय अपने-आप समाप्त हो जाएगा।
नाम-जप ही गुरु-भूख पैदा करता है। तब तक किसी संत को गुरु-भाव से मानो। जब भगवान कृपा करेंगे, तब योग्य गुरु का वरण होगा और आचरण भी शुद्ध हो जाएगा।


प्रश्न 8: कर्मयोग, भक्ति योग और सांख्य योग में से कौन-सा मार्ग अपनाएँ?

उत्तर:
महाराज जी बताते हैं कि एक समय में एक ही मार्ग पर चलना चाहिए।
कर्मयोग में हर कर्म भगवान को समर्पित होता है।
भक्ति योग में भगवान से प्रेम और उपासना होती है।
सांख्य योग में आत्म-तत्त्व का विचार होता है।
जिस भी मार्ग पर चलो, भगवत-स्मृति प्रधान होनी चाहिए। बिना स्मृति के कर्म बंधन बनता है, स्मृति से वही कर्म योग बन जाता है।

प्रश्न 9: भक्ति, ज्ञान और वैराग्य आते तो हैं, पर टिकते क्यों नहीं? इन्हें स्थायी कैसे बनाएँ?

उत्तर:
श्री प्रेमानंद महाराज जी कहते हैं कि जो स्थायी न हो, वह न तो सच्चा ज्ञान है, न भक्ति और न वैराग्य। क्षणिक वैराग्य आकर फिर विषयों में प्रीति हो जाए—यह शुद्ध अवस्था नहीं है। स्थिरता श्रद्धा से आती है। जो ज्ञान मिला है, उसे श्रद्धा और विश्वास के साथ आचरण में उतारना चाहिए।
इंद्रियों का संयमन आवश्यक है। बहिर्मुख इंद्रियों को अंतर्मुख करके परमात्मा के चिंतन में लगाना होगा। जब ऐसा होता है, तब माया का मल नष्ट होता है और शुद्ध ज्ञान प्रकट होता है। यही स्थिर भक्ति और स्थायी वैराग्य का मार्ग है।


प्रश्न 10: क्या हर व्यक्ति किसी निश्चित उद्देश्य को लेकर जन्म लेता है?

उत्तर:
महाराज जी स्पष्ट करते हैं कि मनुष्य उद्देश्य लेकर जन्म नहीं लेता, बल्कि प्रारब्ध लेकर जन्म लेता है। उद्देश्य का निर्माण संग से होता है। जैसा वातावरण, जैसे मित्र और जैसा संग—वैसा ही उद्देश्य बनता है।
साधु-संग मिले तो भगवत-प्राप्ति का उद्देश्य बनता है। कुसंग मिले तो भोगों का उद्देश्य बन जाता है। इसलिए उत्तम संग की कृपा सबसे बड़ी है, क्योंकि वही जीवन की दिशा तय करता है।


प्रश्न 11: संसार के सभी दायित्व निभाते हुए कण-कण में भगवान का दर्शन कैसे करें?

उत्तर:
श्री प्रेमानंद महाराज जी नौ बातें बताते हैं—संतों का संग, लीला-कथा का श्रवण, गुरु चरणों में दृढ़ अनुराग, भगवान के नाम का जप, लीलाओं का गायन, सहनशीलता, सब में भगवान को देखने का अभ्यास, जैसी स्थिति मिले उसमें संतोष और सरल व्यवहार।
इन नियमों के साथ अपने कर्मों को भगवान को समर्पित कर देने से हृदय में दिव्य ज्ञान जागता है। तब कण-कण में भगवान के दर्शन की योग्यता आती है।


प्रश्न 12: शरणागति के बाद क्या कर्म-बंधन से मुक्ति हो जाती है?

उत्तर:
श्री प्रेमानंद महाराज जी कहते हैं कि शरणागति के बाद संचित कर्म नष्ट हो जाते हैं और क्रियमाण कर्म मंगलमय हो जाते हैं। लेकिन जो प्रारब्ध है—जिससे यह शरीर बना है—उसे भोगना पड़ता है।
भजन से प्रारब्ध कटता नहीं, पर उसे भगवान की स्मृति में सहजता से भोग लिया जाता है। यही उपासक की तैयारी होनी चाहिए।


प्रश्न 13: प्रेम और मोह में अंतर कैसे समझें?

उत्तर:
श्री प्रेमानंद महाराज जी बताते हैं—जो शरीर और प्रकृति को लेकर होता है, वह मोह है। जो परमात्मा को लेकर होता है, वही प्रेम है।
मोह अपने सुख की अपेक्षा करता है, जबकि प्रेम प्रिय के सुख में अपना सुख देखता है। जहाँ त्याग, शुभेच्छा और निरंतर वृद्धि हो—वही प्रेम है। संसार में जिसे प्रेम कहा जाता है, वह अधिकतर राग और आसक्ति है।


प्रश्न 14: परमात्मा हृदय में हैं, फिर माया जीव को भ्रमित कैसे कर देती है?

उत्तर:
महाराज जी समझाते हैं कि परमात्मा हृदय में अप्रकट रूप से विराजमान हैं। उन्हें प्रत्यक्ष करना साधना से होता है।
जब तक भजन नहीं होता, माया का पर्दा बना रहता है। भजन से पर्दा हटता है, और जब परमात्मा प्रकट होते हैं, तब माया की कोई सामर्थ्य नहीं रहती। शक्तिमान के प्रकट होते ही शक्ति निष्प्रभावी हो जाती है।


प्रश्न 15: केवल वाणी से कहना कि “मैं श्रीजी को समर्पित हूँ”—क्या यही शरणागति है?

उत्तर:
श्री प्रेमानंद महाराज जी कहते हैं कि वास्तविक शरणागति तन, मन, वचन और अहंकार—सबके समर्पण से होती है।
वाणी से कहा है तो जीवन में उसका पालन दिखना चाहिए। आचरण प्रभु के अनुकूल हो, मन का चिंतन सेवा में हो और भीतर दासत्व का भाव आ जाए। तब शरणागति का रंग चढ़ता है और परमानंद प्रकट होता है।


प्रश्न 16: मोह त्यागकर परिवार का पालन कैसे संभव है?

उत्तर:
महाराज जी कहते हैं—यह भ्रम है कि बिना मोह के परिवार नहीं पल सकता। मोह मलिन है, प्रेम निर्मल है।
यदि अपने बच्चे, पत्नी और माता-पिता में भगवान का भाव करें, तो प्रेम बढ़ेगा और मोह घटेगा। भगवान की भावना से परिवार भी सुरक्षित रहता है और भक्ति भी बढ़ती है। इसके लिए नाम-जप अनिवार्य है।


प्रश्न 17: महाराज जी, आपका सबसे प्रिय कौन है?

उत्तर:
महाराज जी बताते हैं कि संसार नश्वर है, इसलिए उनका एकमात्र प्रिय श्री राधा किशोरी के चरण हैं।
उसी प्रिय के संबंध से वे सबको प्रेम करते हैं। प्रेम शब्द उनके लिए केवल श्रीजी के चरणों में है, और उसी प्रेम के कारण सबके प्रति करुणा और अपनापन है।


प्रश्न 18: भगवत मार्ग पर सही चल रहे हैं या नहीं—इसके क्या संकेत हैं?

उत्तर:
श्री प्रेमानंद महाराज जी कहते हैं कि जब काम, क्रोध, लोभ, मान और प्रतिष्ठा का आकर्षण घटने लगे, तब समझना चाहिए कि साधना सही दिशा में है।
यदि धन, कामिनी और कीर्ति प्रिय लगती रहें, तो भजन का रंग नहीं आया। निरंतर नाम-जप से ही विकार शांत होते हैं और शुद्ध ज्ञान, वैराग्य व भक्ति प्रकट होती है। जितना नाम-जप बढ़ेगा, उतनी ही स्थिति स्थिर होगी।


Credit:
“यह लेख संत श्री प्रेमानंद जी महाराज के एकान्तिक वार्तालाप प्रवचन की अमृत वाणी पर आधारित है।”

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