माला-1162: अत्यंत शीघ्र भगवत प्राप्ति का कोई उपाय है? श्री प्रेमानंद महाराज जी के अमृत वचनों से नाम जप महिमा

प्रश्न 1: अत्यंत शीघ्र भगवत प्राप्ति का कोई उपाय है? रोना कैसे आए?

उत्तर:
श्री प्रेमानंद जी महाराज बताते हैं कि भगवत प्राप्ति का मार्ग किसी बाहरी उपाय से नहीं, बल्कि भीतर की विकलता से खुलता है। जब तक मनुष्य को अपने बल, अपने पुरुषार्थ और अपनी सामर्थ्य का भरोसा रहता है, तब तक उसके भीतर से रोना नहीं आता। वह नाम जप करता है, भजन करता है, पर भीतर कहीं यह भाव रहता है कि “मैं कर लूँगा।”
नाम जप करते-करते जब साधक हर ओर से हार जाता है, जब उसे अनुभव हो जाता है कि अब मेरे भीतर कोई सामर्थ्य नहीं बची, तब उसके भीतर से सच्ची पुकार उठती है। उसे लगता है—आज का दिन भी चला गया, भगवान नहीं मिले; अब कहाँ जाऊँ, किससे कहूँ। इसी अवस्था में जो रोना आता है, वही अनमोल है।
महाराज जी बताते हैं कि इस प्रकार के रोने और विलाप में अनंत जन्मों के अशुभ संस्कार जल जाते हैं और साधक भगवत प्राप्ति के योग्य बन जाता है। यह रोना दिखावे का नहीं होता, बल्कि ऐसा होता है कि बिना प्रभु के जीवन असह्य हो जाता है।


प्रश्न 2: क्या इसी पंचभूत शरीर में रहते हुए किसी भक्त को स्वर्ग या उससे उच्च लोकों का वास्तविक अनुभव हो सकता है?

उत्तर:
श्री प्रेमानंद जी स्पष्ट करते हैं कि यह संभव है, पर यह साधारण भजन से नहीं होता। जब भजन अत्यंत गाढ़ा हो जाता है, तब भगवान ऐसा विधान कर सकते हैं। कुछ महापुरुष ऐसे हुए हैं जिनका शरीर साधना करते-करते चिदानंदमय हो गया और वे सशरीर भगवान के धाम को गए।
महाराज जी समझाते हैं कि सामान्य नियम यह है कि शरीर छूटने के बाद ही धाम की प्राप्ति होती है, पर असाधारण भजन में भगवान नियम भी बदल सकते हैं। ऐसा अनुभव देह भाव छोड़ने पर होता है। साधक भगवत भाव रूपी देह को प्राप्त कर लेता है और उसी भाव देह से भगवान के धाम, रूप और लीला का साक्षात अनुभव करता है।
बाहर से देखने पर वह यहीं रहता है, पर भीतर से वह भगवान के पास होता है।


प्रश्न 3: एक वैष्णव की परम अवस्था क्या होती है?

उत्तर:
श्री प्रेमानंद जी महाराज कहते हैं कि वैष्णव की परम अवस्था वह है जिसमें साधक अपने को पूरी तरह भूल जाता है। उसे न अपना स्मरण रहता है, न देह का, न जीव का, न माया का। केवल अपने आराध्य प्रभु का स्मरण शेष रह जाता है।
ऐसी अवस्था में चलते-फिरते, उठते-बैठते भगवान का स्वरूप हृदय में विराजमान रहता है। साधक को यह भी भान नहीं रहता कि प्राण हैं या प्रभु। “मैं” पूरी तरह प्रभु में लीन हो जाता है।
महाराज जी बताते हैं कि ऐसे भक्त के कारण पूरे लोक पवित्र हो जाते हैं, क्योंकि जहाँ अहंकार नहीं, वहाँ भगवान स्वयं विराजमान रहते हैं।


प्रश्न 4: सेवा और नाम-जप करने पर अपने भीतर अहंकार की अनुभूति होने लगे तो क्या करें?

उत्तर:
श्री प्रेमानंद महाराज जी इसे साधक की प्रारंभिक अवस्था बताते हैं और साथ ही इसे अत्यंत खतरनाक भी कहते हैं। यदि सेवा या नाम-जप के कारण अपने को दूसरों से श्रेष्ठ मानने का भाव आ गया, तो यह परमार्थ की बड़ी हानि कर देता है।
सच्ची सेवा और भजन तब प्रारंभ होते हैं, जब साधक अपने को सबसे नीच समझने लगता है। यह भाव होना चाहिए कि यदि भजन हो रहा है, सेवा हो रही है, तो यह मेरी सामर्थ्य नहीं, बल्कि भगवान की कृपा है।
महाराज जी कहते हैं कि जहाँ भी भीतर अहंकार उठता दिखे, वहीं डर जाना चाहिए और भगवान से प्रार्थना करनी चाहिए—“प्रभु, मुझे बचाइए।” अहंकार परमार्थ में पतन का कारण बनता है।


प्रश्न 5: इच्छाओं पर नियंत्रण कैसे पाया जाए?

उत्तर:
श्री प्रेमानंद महाराज जी बताते हैं कि इच्छाओं का मूल कारण हृदय की तपन है। जब तक भगवान का नाम जप नहीं होता, तब तक हृदय संतप्त रहता है और कामनाएँ शांत नहीं होतीं।
नाम जप से हृदय शीतल होता है और धीरे-धीरे इच्छाएँ स्वतः शांत होने लगती हैं। इसके साथ संतोष आता है। संतोष के बिना कामनाओं का नाश संभव नहीं।
जब साधक का भरोसा भगवान पर जम जाता है, तब या तो उसकी कामनाएँ पूरी हो जाती हैं या भगवान उसे ऐसा सुख दे देते हैं कि कामना करने की आवश्यकता ही नहीं रह जाती।


प्रश्न 6: श्रीकृष्ण से सच्चा निष्काम प्रेम कैसे हो?

उत्तर:
श्री प्रेमानंद जी महाराज समझाते हैं कि कामनाओं का मूल स्थान देह-भाव है। जब तक मनुष्य अपने को शरीर मानता है, तब तक कामनाएँ बनी रहती हैं।
निष्कामता तब आती है, जब “मैं” भगवान के चरणों में समर्पित हो जाता है। इसके लिए तन, मन और वाणी—तीनों का समर्पण आवश्यक है।
जब साधक अपने कर्म भगवान के अनुकूल करता है, भोजन-वाणी को अर्पित करता है और मन को भगवान की सेवा में लगाता है, तब अहंकार स्वतः गल जाता है। जहाँ अहंकार समाप्त होता है, वहीं निष्काम भक्ति प्रकट होती है।


प्रश्न 7: भोगों में महत्व-बुद्धि क्यों बनी रहती है?

उत्तर:
महाराज जी कहते हैं कि जब तक भोगों में महत्व-बुद्धि है, तब तक भगवान में महत्व-बुद्धि नहीं आ सकती। और जब भगवान में महत्व-बुद्धि जाग जाती है, तब संसार के भोग विष के समान लगने लगते हैं।
डटकर नाम जप करने से अंतःकरण पवित्र होता है। पवित्रता आते ही भोगों से निर्लिप्तता आती है और फिर भगवान के नाम, रूप, लीला और धाम में स्वाभाविक आसक्ति उत्पन्न हो जाती है।


प्रश्न 8: पूर्ण समर्पण कैसे होता है?

उत्तर:
श्री प्रेमानंद महाराज जी बताते हैं कि समर्पण की शुरुआत वहीं से होती है, जहाँ साधक दुख या सुख में केवल भगवान के सामने रोता है। किसी और के सामने नहीं।
जैसे बच्चा भय लगने पर माँ की गोद में दौड़ता है, वैसे ही साधक को हर परिस्थिति में भगवान की ओर दौड़ना चाहिए। यही शरणागति धीरे-धीरे परिपक्व होकर पूर्ण समर्पण बन जाती है।


प्रश्न 9: गुरु की छाया बनकर रहने का सौभाग्य कैसे मिलता है?

उत्तर:
श्री प्रेमानंद महाराज जी कहते हैं कि गुरु-कृपा सब पर है, पर गुरु की छाया बनकर रह पाना विशेष भगवत कृपा से होता है।
गुरु की छाया बनने का अर्थ केवल शरीर से पास रहना नहीं है, बल्कि गुरु की आज्ञा का पालन करना है। गुरु को मानने वाले बहुत हैं, पर गुरु की बात मानने वाले बहुत कम।
जो गुरु की आज्ञा को अपना सर्वस्व मान लेता है, वही वास्तव में गुरु-भक्त कहलाता है।


प्रश्न 10: नाम-जप क्या खर्च हो जाता है?

उत्तर:
श्री प्रेमानंद महाराज जी स्पष्ट करते हैं कि जो नाम-जप भगवान को समर्पित किया जाता है, वह खर्च नहीं होता। वह भगवतिक बैंक में जमा होता है और उसका ब्याज मिलता है।
यदि साधक भगवान से कोई इच्छा करता है और वह पूर्ण हो जाती है, तो वह ब्याज से होती है, मूल नाम-जप सुरक्षित रहता है। अंततः मूल फल भगवत प्राप्ति ही होती है।


प्रश्न 11: भजन में शिथिलता आने पर क्या करें?

उत्तर:
महाराज जी बताते हैं कि शिथिलता दो प्रकार की होती है—तमोगुण जनित और अपराध जनित।
तमोगुण जनित शिथिलता थोड़े समय की होती है। उसमें भजन प्रियता बनी रहती है और थोड़ी देर बाद भजन फिर चलने लगता है।
अपराध जनित शिथिलता में भजन प्रियता समाप्त हो जाती है, अशांति और जलन बढ़ती है। ऐसे में आत्मचिंतन, क्षमा-याचना और निंदा से बचना आवश्यक है।
रोग के अनुसार उपाय करना चाहिए, एक ही दवा सबके लिए नहीं होती।

Credit:

“यह लेख संत श्री प्रेमानंद जी महाराज जी के एकान्तिक वार्तालाप प्रवचन की अमृत वाणी पर आधारित है।”

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