प्रश्न 1: क्या किसी के हमारे पैर छूने से हमारा पुण्य नष्ट होता है?
उत्तर:
श्री प्रेमानंद महाराज जी बताते हैं कि यदि किसी के पैर छूने की हमारी अंतःप्रेरणा नहीं है, तो पुण्य नष्ट नहीं होता। जब कोई श्रद्धा से प्रणाम करता है और हम उसे भगवान का अंश मानते हैं, तब यह एक भगवत् भावना का आदान-प्रदान बन जाता है। लेकिन यदि हमारे भीतर अभिमान या छुआने की इच्छा है—तो वही भावना भजन को क्षीण करती है। महाराज जी कहते हैं, “सोच बदल दो—हर व्यक्ति में भगवान है, तब पैर छूने में कोई दोष नहीं रहता।”
प्रश्न 2: जब जीवन की दिशा बदल जाती है और सब कुछ गलत लगता है, तो क्या यह हमारी परीक्षा है या श्रीजी की दया?
उत्तर:
श्री प्रेमानंद महाराज जी समझाते हैं कि जब रजोगुण और तमोगुण की वृद्धि होती है, तो मन में संशय और असंतोष उत्पन्न होता है। लेकिन जैसे ही नाम-जप किया जाता है, सात्त्विकता प्रकट होती है और समाधान स्वयं मिलता है। यह परीक्षा भी है और कृपा भी—परीक्षा इसलिए कि हमारा विश्वास दृढ़ हो, और कृपा इसलिए कि नाम-जप से हमें भगवान की उपस्थिति का बोध हो।
प्रश्न 3: यदि हम किसी की सहायता करें और वही व्यक्ति हमें कष्ट दे, तो कैसे व्यवहार करें?
उत्तर:
श्री प्रेमानंद महाराज जी कहते हैं—सेवा का फल भगवान से लेना चाहिए, मनुष्य से नहीं। जब हम किसी की मदद करें, तो उसमें भगवान का रूप देखें और वह सेवा उन्हीं को समर्पित करें। धन्यवाद या प्रशंसा की आकांक्षा दुःख का कारण है। “नेकी कर दरिया में डाल”—यही भाव भक्ति का है।
प्रश्न 4: जो लोग हमें गलत समझते हैं या दुःख पहुँचाते हैं, उनके प्रति हमारा व्यवहार कैसा होना चाहिए?
उत्तर:
महाराज जी स्पष्ट कहते हैं—“लोग क्या सोचते हैं, इससे हमें क्या लेना देना?” हमारा कर्तव्य है धर्मपूर्वक चलना, न कि लोगों की राय से डिगना। बुराई से डरना नहीं, सत्य से चलना है। जो व्यक्ति भगवान के इशारे से चलता है, उसे न आलोचना विचलित करती है, न प्रशंसा। यही स्थिरता भक्ति की पहचान है।
प्रश्न 5: जब मन अपराध करता है, तब बुद्धि को कैसे नियंत्रित करें?
उत्तर:
श्री प्रेमानंद महाराज जी कहते हैं कि जब तक नाम-जप, सत्संग और शास्त्र-स्वाध्याय नहीं होगा, तब तक बुद्धि स्वार्थी बनी रहेगी। स्वार्थी बुद्धि में सहनशीलता नहीं होती, परमार्थी बुद्धि में होती है। इसलिए नाम-स्मरण ही मन को शुद्ध करता है और विवेक को जाग्रत करता है।
प्रश्न 6: जब मन शांति चाहता है पर परिवार हमें व्यस्त रहने को कहता है, तो संतुलन कैसे बनाएं?
उत्तर:
श्री प्रेमानंद महाराज जी कहते हैं—धर्मपूर्वक कर्म करो और साथ में नाम-जप करो। जो कर्म पापयुक्त नहीं है, वही करना चाहिए। परिवार का पालन और परमात्मा का ध्यान, दोनों साथ चल सकते हैं। धन धर्म से कमाओ, और धर्मयुक्त धन से ही परिवार और समाज की सेवा करो। यही सच्चा संतुलन है।
प्रश्न 7: क्या ब्रह्म और श्रीकृष्ण एक ही हैं?
उत्तर:
महाराज जी कहते हैं—“एक ही परम तत्व है, बस भावना अलग है।” भक्ति मार्ग में वही भगवान साकार रूप में अनुभव होते हैं और ज्ञान मार्ग में निराकार रूप में। भगवान तो एक ही हैं—निर्गुण और सगुण, निराकार और साकार, बस उपासक की भावना के अनुसार अनुभव बदलता है।
प्रश्न 8: श्रीकृष्ण कहते हैं ‘सभी प्राणी मुझमें हैं किंतु मैं उनमें नहीं हूँ’, इसका अर्थ क्या है?
उत्तर:
श्री प्रेमानंद महाराज जी समझाते हैं—जैसे बर्फ में पानी पहले से विद्यमान है, उसी तरह सब भूतों में भगवान पहले से ही उपस्थित हैं। इसलिए वे कहते हैं “मैं प्रवेश नहीं करता”, क्योंकि वे पहले से ही सब में विराजमान हैं। यह वाणी शब्दों का रहस्य है—भगवान ही सब रूपों में हैं, प्रवेश का प्रश्न ही नहीं उठता।
प्रश्न 9: गुरु किसे माना जाए?
उत्तर:
श्री प्रेमानंद महाराज जी कहते हैं—गुरु वही है जो हमारे अज्ञान का नाश करे और हमें ब्रह्म से मिला दे। ‘गु’ का अर्थ अंधकार और ‘रु’ का अर्थ प्रकाश है। सच्चा गुरु वही है जो परमात्मा से जोड़ दे, न कि केवल ज्ञान दे। वे स्पष्ट कहते हैं—गुरु साक्षात परम ब्रह्म ही हैं, जो मनुष्य रूप में हमें मोक्ष मार्ग दिखाते हैं।
प्रश्न 10: गृहस्थ जीवन में पारंपरिक व्रत छोड़ना उचित है क्या, यदि मन अब केवल श्रीजी भक्ति में है?
उत्तर:
महाराज जी कहते हैं—यदि किसी ने श्रीजी की आठों पहर उपासना आरंभ कर दी है, तो उसे अलग-अलग व्रतों की आवश्यकता नहीं। जो कर रहे हैं, उन्हें भी भगवान को समर्पित कर दें। श्रीजी की उपासना ही सभी व्रतों का सार है।
प्रश्न 11: आज के व्यस्त जीवन में भक्ति को दृढ़ कैसे करें?
उत्तर:
महाराज जी सिखाते हैं—“कितना भी व्यस्त रहो, नाम-जप के लिए समय निकालो।”
भक्ति कोई विशेष अवस्था नहीं मांगती, बस ईमानदारी मांगती है। यदि 24 घंटे में 2 घंटे भी नाम-जप में लग जाएँ, तो वही जीवन का सबसे बड़ा निवेश है। समय को व्यर्थ न गँवाओ—भजन ही सबसे उपयोगी कार्य है।
प्रश्न 12: क्या आनंद और भक्ति साथ-साथ चल सकते हैं?
उत्तर:
महाराज जी कहते हैं—भक्ति और आनंद अलग नहीं, एक ही हैं। विषयों में जो आनंद खोजा जाता है, वह अस्थायी है; पर भक्ति में मिलने वाला आनंद अनंत और तृप्तिदायक है। विषयों का सुख थकाता है, पर भक्ति का सुख शांत करता है। सच्चा आनंद भगवान के नाम में है।
प्रश्न 13: क्या इस जीवन में भगवान की प्राप्ति संभव है जब शरीर रोगग्रस्त हो?
उत्तर:
महाराज जी कहते हैं—“जब मन राधा नाम में लीन हो जाता है, तब सब रोग मिट जाते हैं।”
वृद्धावस्था या रोग कोई बाधा नहीं, केवल सच्ची लगन चाहिए। राधा-नाम का सतत जप जीवन के सभी दोषों को मिटाकर आत्मा को भगवत शांति प्रदान करता है।
प्रश्न 14: यदि अपराधी को दंड देते समय दया आए तो क्या यह धर्मसंगत है?
उत्तर:
महाराज जी कहते हैं—दया तब तक सही नहीं जब तक न्याय से विचलन न हो।
अपराधी को दंड देना भी उसके कल्याण का मार्ग है। यदि न्याय करते समय भय, प्रलोभन या पक्षपात न हो तो वह दंड ईश्वर की व्यवस्था बन जाता है। दया वहीं है जहाँ निष्पक्षता हो।
प्रश्न 15: यदि हमने कोई पाप किया हो और पश्चाताप हो, तो निवारण कैसे करें?
उत्तर:
श्री प्रेमानंद महाराज जी कहते हैं—महापुरुष से पूछो कि प्रायश्चित क्या होगा, क्योंकि हर पाप का भार अलग होता है। यदि पाप सामान्य है, तो भगवन्नाम जप करो। और यदि गम्भीर है, तो आचार्य से परामर्श लेकर प्रायश्चित करो। जो पाप का प्रायश्चित नहीं करता, वह ब्याज की तरह बढ़ता है। इसलिए नाम-जप से ही उसका क्षय होता है।
प्रश्न 16: स्वार्थ-प्रधान रिश्तों में कैसे शांत रहें?
उत्तर:
श्री प्रेमानंद महाराज जी कहते हैं — बेटा, यही इस संसार की सबसे गहरी माया है।
हम सब जानते हैं कि अधिकांश रिश्ते स्वार्थ पर टिके होते हैं। जब तक किसी का काम बनता है, तब तक वह प्रेम दिखाता है, और जब उसका प्रयोजन पूरा हो जाता है तो वही व्यक्ति बदल जाता है। फिर भी मन उसी के प्रति आकर्षित रहता है — यही मोह है। मोह का मतलब है, सच्चाई जानते हुए भी उससे अलग न हो पाना।
महाराज जी बताते हैं कि जब तक मनुष्य मोह में फँसा रहेगा, तब तक वह सच्ची शांति नहीं पा सकता। मोह ही दुःख का मूल है, जो हमें बार-बार उम्मीद दिलाता है और फिर वही उम्मीद टूटने पर कष्ट देता है।
इससे मुक्त होने का उपाय है — सत्संग, नाम-जप और विवेक का जागरण।
जब हम संतों की वाणी सुनते हैं और निरंतर नाम-जप करते हैं, तो मन धीरे-धीरे निर्मल होने लगता है और विवेक उत्पन्न होता है।
महाराज जी कहते हैं — “सबमें भगवान को देखो, लेकिन किसी से अपेक्षा मत रखो।”
सेवा करो, प्रेम दो, पर बदले में कुछ पाने की चाह मत रखो। जब हर कर्म भगवान को समर्पित कर दोगे, तब तुम्हारा मन शांत रहेगा और कोई भी तुम्हें दुखी नहीं कर सकेगा।
प्रश्न 17: ऑफिस या सामान्य वातावरण में जूते पहनकर नाम-जप करना उचित है क्या?
उत्तर:
महाराज जी कहते हैं—गुरु मंत्र का जप पवित्र अवस्था में करें, पर नाम-जप हर समय कर सकते हैं।
काम करते हुए, चलते हुए, मन में “राधा राधा” स्मरण करते रहो। यही सतत साधना है। मन की पवित्रता सबसे बड़ी शुद्धता है।
प्रश्न 18: क्या जीवित गुरु की मूर्ति बनाना ठीक है?
उत्तर:
महाराज जी कहते हैं—शास्त्र सम्मत नियम है कि जब तक गुरु जीवित हैं, उनकी मूर्ति नहीं बनानी चाहिए।
चित्र या फोटो पूजन में रखे जा सकते हैं, पर मूर्ति निर्माण केवल निकुंज गमन के बाद। यह सम्मान और मर्यादा का संकेत है।
प्रश्न 19: क्या राष्ट्र सेवा स्वयं भगवान की सेवा है?
उत्तर:
श्री प्रेमानंद महाराज जी कहते हैं—हाँ, राष्ट्र सेवा ही भगवान की सेवा है।
यदि हम भय, प्रलोभन और स्वार्थ से मुक्त होकर धर्म के अनुसार राष्ट्र की सेवा करें, तो वह सबसे श्रेष्ठ पूजा बन जाती है। जैसे अर्जुन का युद्ध धर्म के लिए था, वैसे ही राष्ट्रहित में किया गया कर्म भक्ति के समकक्ष है।
“यह लेख संत श्री प्रेमानंद जी महाराज जी के एकान्तिक वार्तालाप प्रवचन की अमृत वाणी पर आधारित है।”
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