माला-1077: जरूरत से ज्यादा सोचना बंद कैसे करें?, श्री प्रेमानंद महाराज जी के अमृत वचनों से नाम जप महिमा

प्रश्न 1: क्या ऐसा संभव है कि श्रीजी मेरे लिए कोई नई सृष्टि रच दें ताकि मैं अतीत में जाकर आपका पहला शिष्य बन सकूं?

उत्तर:
श्री प्रेमानंद महाराज जी कहते हैं कि सृष्टि अनंत है। इसके भीतर अनगिनत लोक हैं — मृत्यु लोक, अंतरिक्ष, स्वर्ग, महर्लोक, जनलोक, तपलोक और सत्यलोक तक। इस विराट रचना का पार कोई नहीं पा सकता। जब इस सृष्टि के रहस्य को ही हम नहीं जान पाए हैं, तो नई सृष्टि की आवश्यकता क्यों?
महाराज जी कहते हैं — “हमें नई रचना की नहीं, बल्कि उसी रचना में अपने प्रभु का दर्शन करने की जरूरत है।” भगवान के अनगिनत ब्रह्मांडों में हम उसी का अंश हैं। साधक को यह नहीं मांगना चाहिए कि वह सबसे बड़ा शिष्य बने, बल्कि यह भावना रखनी चाहिए कि ‘मैं आपके शिष्यों का भी शिष्य बन सकूं, आपके दासों का भी दास बन सकूं।’
जो स्वयं को सबसे छोटा समझता है, वही परमार्थ में सबसे बड़ा बन जाता है। जो “हीरो” बनने की इच्छा रखता है, वह आध्यात्मिकता में “जीरो” रह जाता है। सच्चा भक्ति-पथ वही है जहाँ विनम्रता, समर्पण और दास्यभाव हो।


प्रश्न 2: जब अंत में सब परमात्मा में विलीन हो जाते हैं, तब जीवात्मा और पितृ का क्या अर्थ रह जाता है?

उत्तर:
महाराज जी समझाते हैं कि परमात्मा में विलय का अर्थ मोक्ष तभी है जब यह ज्ञानपूर्वक हो। यदि अज्ञानावस्था में जीव विलीन होता है, तो वह पुनः सृष्टि के चक्र में लौट आता है।
सच्चा विलय तभी होता है जब मनुष्य जीवित अवस्था में ही भगवताकार हो जाए, यानी उसका चित्त भगवान में लीन हो जाए। मृत्यु के बाद का लय केवल भौतिक है; आत्मिक उत्थान नहीं।
इसलिए महाराज जी कहते हैं — “मरने के बाद नहीं, जीते-जी भगवान में लीन हो जाओ।” यही भगवत्-प्राप्ति का मार्ग है। जब तक जीवित रहते हुए अविद्या का नाश नहीं होगा, तब तक मोक्ष अधूरा रहेगा।


प्रश्न 3: पूर्व पाप नष्ट होते ही आनंद आता है — तो कैसे जाने कि पाप कितना शेष है?

उत्तर:
महाराज जी कहते हैं कि जब भीतर आनंद की अनुभूति बढ़ने लगे, वही प्रमाण है कि पाप नष्ट हो रहे हैं। जैसे-जैसे पाप कम होते हैं, भजन में उत्साह बढ़ता है, भगवान की लीला मधुर लगने लगती है, और हर प्राणी के प्रति प्रेम जागता है।
निष्पाप व्यक्ति के लक्षण हैं — वह सुख-दुख, मान-अपमान, लाभ-हानि में समान रहता है। आनंद ही सबसे बड़ा सूचक है कि भीतर की अशुद्धियाँ जल रही हैं।
और यह शुद्धि केवल नाम-जप से संभव है। जितना अधिक नाम-जप होगा, उतना अधिक अंतःकरण निर्मल होगा। महाराज जी कहते हैं — “हर कार्य को भगवान को समर्पित कर दो। कर्म-समर्पण ही भक्ति का सर्वोच्च योग है।”


प्रश्न 4: मन एक जगह टिकता क्यों नहीं, जबकि साधक को स्थिर रहनी में रहना चाहिए?

उत्तर:
श्री प्रेमानंद महाराज जी कहते हैं — “मन का स्वभाव ही है अस्थिर रहना।” वह हर क्षण नई वस्तु, नया व्यक्ति और नया अनुभव चाहता है। यही उसकी ‘नवता-पिपासा’ है।
सच्चा साधक वही है जो मन को रोक सके और परमात्मा में स्थिर कर दे। जब मन का प्रवाह भजन की ओर मोड़ दिया जाता है, तो धीरे-धीरे तरंगें शांत होने लगती हैं।
महाराज जी बताते हैं — “जो साधक दीर्घकाल तक, निरंतर और श्रद्धा से नाम-जप करता है, उसका मन दृढ़ भूमि हो जाता है।” वही बहादुर है जो अपने मन को भगवान में स्थिर कर सके।


प्रश्न 5: गुरु, सद्गुरु, विश्वगुरु — इन शब्दों में कोई भेद है क्या?

उत्तर:
महाराज जी कहते हैं — “सब नाम एक ही तत्व के हैं।” गुरु, सद्गुरु, विश्वगुरु — ये सब भगवान के ही विभिन्न नाम हैं।
असल में गुरु कौन है? जो हमारे चंचल मन को भगवान के चरणों से जोड़ दे। वही सच्चा गुरु, वही सद्गुरु, वही विश्वगुरु है।
भगवान ही गुरु हैं और गुरु ही भगवान हैं। टाइटल भले बदल जाएँ, पर तत्व एक ही है — हरि ही गुरु हैं, और गुरु ही हरि हैं।
महाराज जी कहते हैं — “हमें नामों में नहीं, उनके भाव में देखना चाहिए — जो भगवान के चरणों तक ले जाए वही गुरु है।”


प्रश्न 6: अब मेरा मन सांसारिक नहीं, आध्यात्मिक क्षेत्र में अव्वल आने की इच्छा करता है — क्या यह उचित है?

उत्तर:
महाराज जी मुस्कुराते हुए कहते हैं — “हम अव्वल के बेटे हैं, तो अव्वल आना ही चाहिए!” लेकिन वे साथ ही चेतावनी देते हैं कि परमार्थ की गणित उलटी है।
यहाँ अव्वल वही है जो अपने को सबसे छोटा समझता है। जो प्रणाम करवाता है वह नहीं, जो प्रणाम करता है वही महान है।
महाराज जी कहते हैं — “जो अपने अहंकार को मिटा देता है, वही सर्वोच्च बनता है।”
असली नंबर एक वही है जो तिनके से भी नीचा बन जाए, क्योंकि ‘जो छोटा बनता है, वही प्रभु द्वारा महान बना दिया जाता है।’


प्रश्न 7: सच्ची भक्ति और केवल कर्मकांड में क्या अंतर है?

उत्तर:
महाराज जी स्पष्ट कहते हैं — कर्मकांड आपको स्वर्ग तक पहुँचा सकता है, पर भगवान तक नहीं।
शास्त्र-सम्मत यज्ञ, दान, पूजा आदि का फल केवल पुण्य है, जो क्षणिक है। लेकिन सच्ची भक्ति आपको अविनाशी भगवत-प्रेम देती है।
भक्त वही है जो हर सांस में भगवान का नाम ले, हर कर्म को ईश्वर को समर्पित करे और अपने हृदय में प्रेम रखे।
भगवान कर्मकांडों के अधीन नहीं होते, लेकिन भक्ति के अधीन हो जाते हैं।
भक्ति ही वह सेतु है जो जीव को ब्रह्म से जोड़ती है।


प्रश्न 8: वृंदावन में रहते हुए भक्ति बढ़ जाती है, पर संसार में लौटते ही वह भाव घट क्यों जाता है?

उत्तर:
महाराज जी कहते हैं — “वृंदावन का प्रभाव बाहर भी लाया जा सकता है।”
जहाँ भी नाम-जप और भगवान की कथा होती है, वहाँ वृंदावन जैसा वातावरण स्वतः बन जाता है।
विभीषण ने लंका में रहकर भी भक्ति की, तो हम कहीं भी रहकर क्यों नहीं कर सकते?
यदि हृदय में नाम-जप चलता रहे, भगवान की मधुर छवि का ध्यान बना रहे, तो संसार का कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा।
महाराज जी कहते हैं — “जहाँ हरि नाम की ध्वनि है, वहाँ माया का प्रवेश नहीं।”
अतः हृदय में वृंदावन बसाओ — वहीं स्थिरता मिलेगी।


प्रश्न 9: गुरुदेव की कृपा कब, कैसे और क्यों होती है?

उत्तर:
महाराज जी कहते हैं — “गुरु की कृपा अहेतुकी होती है, इसका कोई नियम नहीं।”
कभी घोर पापी पर भी कृपा हो जाती है, कभी तिरस्कृत व्यक्ति पर। इतिहास भरा पड़ा है ऐसे उदाहरणों से — बिल्वमंगलाचार्य, तुलसीदास जी — जिन पर कृपा हुई और वे महापुरुष बन गए।
गुरु की कृपा तब होती है जब हृदय टूटकर प्रभु को पुकारता है। जब भीतर विनम्रता आती है, तब कृपा स्वतः उतरती है।
महाराज जी कहते हैं — “गुरु की कृपा समझने की चीज़ नहीं, अनुभव करने की चीज़ है।”


प्रश्न 10: धार्मिक कार्य करने से पहले घर में क्लेश और रुकावटें क्यों आती हैं?

उत्तर:
महाराज जी बताते हैं — “यह कोई सिद्धांत नहीं, यह पापों की प्रबलता है।”
जब हमारे पिछले कर्मों के पाप जागते हैं, तो वे विघ्न उत्पन्न करते हैं।
लेकिन उसका उपाय है — नाम-संकीर्तन
महाराज जी कहते हैं — “जहाँ हरि नाम की गर्जना होती है, वहाँ कलिकाल का प्रभाव नहीं पड़ता।”
यदि आप घर में रोज 10-20 मिनट नाम-कीर्तन करें, तो सभी विघ्न मिट जाएंगे।
भगवान का नाम ही सभी पापों, भय और क्लेशों का नाशक है।
अपने घर को ही तीर्थ बना लें — वहाँ की हर दीवार से भक्ति की सुगंध उठने लगेगी।


प्रश्न 11: “व्याकुल होकर गान करने से भगवत साक्षात्कार होता है” — इसका क्या अर्थ है?

उत्तर:
श्री प्रेमानंद महाराज जी कहते हैं — “व्याकुलता ही भजन की पराकाष्ठा है।”
यह तब आती है जब साधक का हृदय संसार से विरक्त होकर केवल प्रभु की चाह में जलने लगता है।
जैसे डूबते समय श्वास के लिए मनुष्य तड़पता है, वैसी ही तड़प जब भगवान के लिए होती है, तब साक्षात्कार होता है।
महाराज जी उदाहरण देते हैं — गोपियों ने व्याकुल होकर पुकारा, तभी भगवान प्रकट हुए।
व्याकुलता कोई भावना नहीं, वह सम्पूर्ण समर्पण की अवस्था है।
जब “अब प्रभु बिना जीना असह्य” लगे, वही व्याकुलता साक्षात्कार का द्वार खोल देती है।


प्रश्न 12: आज की तेज़ गति वाली आधुनिक दुनिया में धर्म की भूमिका आप कैसे देखते हैं?

उत्तर:
महाराज जी कहते हैं — “आज का युग रजोगुण और तमोगुण के खेल में फँसा हुआ है।”
धन, पद, प्रतिष्ठा को ही सम्मान का मापदंड मान लिया गया है, जबकि धर्म और सत्य उपहास का विषय बन गए हैं।
अध्यात्म के बिना मनुष्य पशु-संस्कृति की ओर बढ़ता है।
आज समाज में धर्म की आवश्यकता पहले से अधिक है, क्योंकि यही मानवता का आधार है।
महाराज जी कहते हैं — “यदि अध्यात्म बढ़ेगा तो समाज सुधरेगा।”
जो लोग नाम-जप से, भक्ति से जुड़ रहे हैं, वे अपने भीतर परिवर्तन अनुभव कर रहे हैं।
अतः धर्म ही वह ज्योति है जो आधुनिकता के अंधकार में भी मनुष्य को दिशा देती है।

Credit:

“यह लेख संत श्री प्रेमानंद जी महाराज जी के एकान्तिक वार्तालाप प्रवचन की अमृत वाणी पर आधारित है।”

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